PR:-(04)महंगाई, तनाव और आर्थिक डर। परमात्मा क्या कहते हैं?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
परमात्मा क्या कहते हैं?
इस पर हम चौथा विषय कर रहे हैं।
यह श्रृंखला में आप जिस भी समस्या या प्रश्न का समाधान परमात्मा की दृष्टि से जानना चाहते हैं, वो इस श्रृंखला में लिया जाएगा।
यह पॉडकास्ट और वीडियो — दोनों रूपों में उपलब्ध रहेगा।
आज का विषय है: महंगाई, तनाव और आर्थिक डर।
परमात्मा क्या कहते हैं?
आज भारत में हर घर में एक ही चर्चा है—महंगाई बढ़ रही है।
कमाई उतनी की उतनी है।
नौकरी का तनाव बढ़ रहा है।
मनुष्य के मन में एक गहरी असुरक्षा घर कर गई है।
भविष्य को लेकर भी असुरक्षा है कि आगे क्या होगा?
चारों तरफ समस्याएँ ही समस्याएँ दिखती हैं।
लेकिन क्या यह सच में डरने की बात है?
क्या आपको इससे डर लगता है?
या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक कारण है?
दुनिया की तस्वीर देखें तो—हर ओर आर्थिक प्रतिस्पर्धा है।
महंगाई बढ़ रही है।
कंपनियों में छंटनी हुई है।
नई नौकरियों का तनाव है।
शेयर बाज़ारों में उतार-चढ़ाव जारी है।
आम इंसान दिन–रात पैसे कमाने में लगा है।
लोग क्रेडिट कार्ड और EMI में उलझे हुए हैं।
बचत की चिंता, कर्ज़ की चिंता—लोगों को भीतर से खा रही है।
लगता है जिंदगी हाथ से निकल न जाए,
भविष्य क्या होगा?
बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा या नहीं?
इतने सारे प्रश्न—
फिर रिटायरमेंट के बाद क्या होगा?
यही डर सबसे बड़ी बेचैनी का कारण है।
दुनिया सोचती है—अगर और पैसा आ जाए तो जीवन सुरक्षित हो जाए।
पर फिर भी करोड़पति भी असुरक्षित और तनावग्रस्त हैं।
अरबपति भी तनावग्रस्त हैं।
परमात्मा की दृष्टि:
सिर्फ पुण्य ही सुरक्षित है।
पुण्य क्या होता है?
आत्मा समझकर कर्म करना—यह पुण्य है।
जिसे जिस समय जो आवश्यकता है, उसे वह देना—यह पुण्य है।
आज दुनिया को क्या चाहिए?
सुख और शांति।
और यह सुख–शांति शरीर को नहीं, आत्मा को चाहिए।
दुनिया की कोई भी पद–संपत्ति स्थाई नहीं है।
क्योंकि सब देह से जुड़ा है।
सुख और शांति आत्मा से जुड़ा है।
सब कुछ कर्म का हिसाब–किताब है।
जीतता वही है जिसने पुण्य किया।
पुण्य दो प्रकार से होता है—
देह समझकर किया गया,
और आत्मा समझकर किया गया।
आत्मा समझकर किया गया पुण्य—सतयुग, त्रेता और संगम में फल देता है।
देह समझकर किया गया कर्म—द्वापर, कलियुग और संगम में फल देता है।
अब हमें क्या करना है?
शुभ कर्म जोड़ना।
आत्मा समझकर कर्म करना।
परमात्मा शिक्षा देते हैं—
“पैसे का मोह छोड़ो। श्रेष्ठ कर्म करो। अंत में आत्मा के साथ केवल पुण्य कमाई जाती है।”
आत्मा के साथ क्या जाता है?
जब आत्मा परमधाम जाती है तो क्या लेकर जाती है?
बुद्धि और संस्कार।
आत्मा जैसे आती है, वैसे ही जाती है—
अपनी ओरिजिनल फ़ॉर्म में।
जो रिकॉर्ड अंदर है—वही अविनाशी, स्थाई रिकॉर्ड लेकर जाती है।
कुछ भी यहां से उठाकर नहीं ले जाते।
कर्म का नियम — जो बोया वो काटना ही पड़ेगा।
इसमें कोई छूट नहीं।
अब हमें क्या करना है?
1. Fear to Faith — भय को विश्वास में बदलो।
यदि किसी को भविष्य का भय है—
कहीं पूर्वजन्म के कर्मों का फल बुरा न मिले…
तो जान लो—परमात्मा के घर न्याय होता है, अन्याय नहीं।
दुनिया की कोर्ट में एक खुश, एक दुखी होता है।
पर परमात्मा की कोर्ट में दोनों को न्याय मिलता है।
दोनों खुश होते हैं।
परमात्मा सब बच्चों को बराबर देखते हैं।
इसलिए अपने साथ अन्याय होने का डर कभी न रखें।
कभी भी अन्याय नहीं हो सकता।
जो होगा—अच्छा होगा।
जो हो रहा है—वो भी अच्छा है।
2. Tension to Trust — टेंशन को ट्रस्ट में बदलो।
क्या होगा? कैसे होगा?
इस टेंशन को खत्म करो।
परमात्मा कहते हैं—
“मेरे ऊपर ट्रस्ट रखो। मेरे न्याय पर विश्वास रखो।”
टेंशन किस बात का?
जब परमात्मा साथ है तो चिंता कैसी?

