(14)क्या कोई आत्मा श्री कृष्ण बन सकती है?
“श्री कृष्ण
भगवान थे।
आज हम उसका 14वा विषय करेंगे।
क्या कोई आत्मा
श्री कृष्ण बन सकती है?
क्या कोई आत्मा श्री कृष्ण बन सकती है?
क्या लगता है आपको?
क्या आज भी कोई आत्मा श्री कृष्ण बनने की पात्रता बना सकती है?
क्या कोई मेहनत करे, पुरुषार्थ करे और वह बन जाए?
श्री कृष्ण ऐसा हो सकता है?
नहीं भाई जी।
नहीं हो सकता।
ड्रामा निश्चित है।
फिर भी पुरुषार्थ क्यों?
तब नहीं बन सकते, ड्रामा निश्चित है तो फिर मेहनत क्यों करें भाई?
जब हम कृष्ण बन नहीं सकते, फिर क्या जरूरत है मेहनत करने की?
नर से नारायण हम बन नहीं सकते, फिर हम नारायण बनने का पुरुषार्थ क्यों करें?
क्यों लक्ष्य रखें अपना?
संगम युग का गहरा रहस्य
डिस्क्लेमर
यह प्रस्तुति ब्रह्मा कुमारीज की साकार एवं अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन पर आधारित है।
यह आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, देवी-देवता या आस्था का विरोध करना नहीं है।
यह विषय संगम युग, पुरुषार्थ, ड्रामा और देवता पद की पात्रता की आध्यात्मिक समझ पर आधारित है।
दर्शक इसे श्रद्धा एवं विवेक दोनों से सुनें और स्वयं मनन करें।
आशा और प्रश्न का संगम।
आज का प्रश्न अत्यंत प्रेरणादायक है।
आज का जो प्रश्न है वह प्रेरणा देने वाला है कि हम क्यों पुरुषार्थ करें?
जबकि तय है।
क्या आज भी कोई आत्मा कृष्ण बनने की पात्रता बना सकती है?
कोई मेहनत करे तो क्या वह श्री कृष्ण बन सकता है?
जब हम सुनते हैं कि नंबर वन आत्मा निश्चित है।
नंबर वन जो सीट है, वह फिक्स है।
जब हम यह सुनते हैं — ड्रामा पूर्व नियत है, पहले से ही तय है।
फिर पुरुषार्थ क्यों?
फिर प्रयास क्यों करें?
फिर यह लक्ष्य क्यों रखा गया हमारे सामने कि लक्ष्मी-नारायण बनना तुम्हारा लक्ष्य है?
जब हम बन ही नहीं सकते तो इसे अपने दिमाग में क्यों रखें?
आज हम इस गहरे रहस्य को समझेंगे।
नंबर एक — पात्रता और पद में अंतर।
पात्रता क्या होता है? उम्मीदवार बनना।
सबसे पहले समझें — पात्रता और पद अलग हैं।
पद है अंतिम परिणाम।
पात्रता है योग्यता।
आप एलिजिबल हैं — यह पात्रता है।
पर पद उसका परिणाम है।
जरूरी नहीं कि जो पात्र हो, वही पद ले सके।
सारे पढ़ाई करते हैं, परंतु पद सबको नहीं मिलता।
मुरली 1 अगस्त 1972
“पुरुषार्थ करते रहो। जो होगा सो ड्रामा अनुसार होगा।”
इसका अर्थ —
पद निश्चित हो सकता है,
लेकिन पात्रता बनाना हमारा पुरुषार्थ है।
उदाहरण — प्रतियोगी परीक्षा।
मान लीजिए एक परीक्षा है।
गोल्ड मेडल पहले से तय है।
लेकिन सभी विद्यार्थी पढ़ते हैं।
क्यों?
क्योंकि पढ़ाई से ज्ञान मिलता है।
क्षमता बढ़ती है।
आत्मविश्वास आता है।
गोल्ड मेडल एक को मिलेगा।
लेकिन पढ़ाई का लाभ सबको मिलता है।
ठीक वैसे ही पात्रता बनाना हमारा धर्म है।
पात्रता कैसे बनती है?
चार आधार हैं —
पवित्रता,
ज्ञान,
योग,
सेवा।
इन चार स्तंभों पर हमारा पद बनता है।
जब तक हम पवित्र नहीं बनेंगे,
ज्ञान की धारणा नहीं होगी।
योग स्थिर नहीं होगा।
सेवा सफल नहीं होगी।
मुरली 5 मार्च 1968
“यह राजयोग की पढ़ाई है जिससे तुम राजाई पाते हो।”
पात्रता क्या है?
पढ़ाई प्लस अभ्यास।
क्या नंबर वन स्थान बदल सकता है?
नंबर वन स्थान नारायण का है।
क्या यह बदल सकता है?
6 अक्टूबर 1969 को बताया गया —
जो पहले नंबर में है, वे पहले नंबर में ही रहेगा।
यह ड्रामा की निश्चितता है।
लेकिन इसका अर्थ निराशा नहीं है।
क्यों?
क्योंकि आध्यात्मिकता प्रतिस्पर्धा नहीं, परिवर्तन है।
हमारा किसी से कंपटीशन नहीं है।
हमें अपने आप को बदलना है।
पात्रता बनाने का वास्तविक लाभ —
वर्तमान जीवन सुखमय बन जाएगा।
संबंध मधुर हो जाएंगे।
मन शांत होगा।
आत्मविश्वास उच्च होगा।
भविष्य में —
ऊंच पद,
सुखमय जन्म,
देवत्व की अनुभूति।
उदाहरण — सूर्य और दीपक।
सूर्य एक है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दीपक का महत्व नहीं।
दीपक भी प्रकाश देता है।
ठीक वैसे ही कृष्ण एक है।
लेकिन देवत्व अनेक है।
33 करोड़ देवताओं में
कृष्ण एक 16 कला संपूर्ण देवता है।
संगम युग का उद्देश्य —
मुरली 21 जनवरी 1969
“बाप आते हैं तुम्हें देवता बनाने।”
बाप का उद्देश्य केवल एक कृष्ण बनाना नहीं,
बल्कि पूरी नई दुनिया बनाना है।
इसलिए हर आत्मा महत्वपूर्ण है।
हर पुरुषार्थ मूल्यवान है।
पात्रता का आंतरिक अनुभव —
जब आत्मा अपने को पात्र बनाती है,
गुण धारण करती है —
चेहरा शांत हो जाता है।
वाणी मधुर हो जाती है।
दृष्टि पवित्र हो जाती है।
व्यवहार दिव्य हो जाता है।
यह केवल भविष्य की तैयारी नहीं,
यह वर्तमान का रूपांतरण है।
निराश क्यों नहीं होना चाहिए?
कई लोग सोचते हैं —
अगर मैं नंबर वन नहीं बन सकता तो प्रयास क्यों करूं?
यह सोच गलत है।
मुरली 18 जनवरी 1969
“पुरुषार्थ ही तुम्हारा भाग्य बनाता है।”
अर्थात भाग्य स्थिर नहीं।
पुरुषार्थ से भाग्य प्रकट होता है।
जितना पुरुषार्थ, उतना भाग्य।
गहरा आध्यात्मिक निष्कर्ष —
नंबर वन निश्चित है।
लेकिन पात्रता बनाना सबका अधिकार है।
आत्म चिंतन —
क्या हम परिणाम पर केंद्रित हैं?
या प्रक्रिया पर?
क्या हम तुलना करते हैं?
या परिवर्तन करते हैं?
क्या हम स्थान चाहते हैं?
या श्रेष्ठता?
अंतिम संदेश —
श्री कृष्ण बनने का स्थान भले निश्चित हो,
लेकिन कृष्ण जैसी पात्रता बनाना हर आत्मा के लिए संभव है।
और यही संगम युग का सबसे सुंदर संदेश है।
परिणाम ड्रामा का है,
लेकिन प्रयास हमारा है।
जो भी परिणाम होगा, वह ड्रामा अनुसार होगा।
परंतु पुरुषार्थ हमारा कर्तव्य है।
जितना पुरुषार्थ करेंगे,
उतना उच्च पद पाएंगे।
यहां न्याय होता है।
अन्याय नहीं होता।

