Creaate YouTube वीडियो & disclamer, डिस्क्रिप्शन और हैशटैग्स “अति इंद्रिय सुख
को हम अध्ययन कर रहे हैं।
आज हम अति इंद्रिय सुख का आठवां विषय ले रहे हैं।
शिव बाबा की याद में अति इंद्रिय सुख क्यों आता है?
शिव बाबा की याद में अति इंद्रिय सुख क्यों आता है?
क्यों आता है अति इंद्रिय सुख शिव बाबा की याद में?
कभी सोचा?
भाई जी, ये आत्मा का सुख है। बाबा हमें आत्मा का पाठ पढ़ाते हैं।
हमें सिर्फ शिव बाबा को याद करने से क्यों आता है, बाकी किसी और को याद करें तो क्यों नहीं आता?
बाकी हम किसी को भी याद करेंगे। हां जी, बोलो।
देहधारी है भाई जी, वो देह का सुख है।
बाकी परमात्मा के सिवाय सभी देहधारी हैं। कोई भी ऐसा नहीं कि जिसकी देह न हो।
देह होने के कारण, उसको याद करेंगे तो उससे अति इंद्रिय सुख, इंद्रियों से परे का सुख नहीं मिल सकता।
क्योंकि वो जितनी भी आत्माएं हैं, वो इंद्रियों के साथ हैं।
देह के साथ होने का मतलब है इंद्रियों के साथ होना।
एक परमात्मा है जिसके पास इंद्रियां नहीं हैं।
और हमें भी परमात्मा को तभी याद कर सकते हैं जब हम अपने को आत्मा समझें।
हम परमात्मा की डायरेक्शन पर तब तक नहीं चल सकते जब तक हम अपने आप को देह समझ रहे हैं।
मुझ आत्मा की भी इंद्रियों से परे की अवस्था है।
तब मैं परमात्मा को अनुभव कर, परमात्मा से अति इंद्रिय सुख का अनुभव कर पाता हूं।
जब मेरी अवस्था देह से अलग है, मैं देह से न्यारा अपने को अनुभव कर रहा हूं, तभी अति इंद्रिय सुख का अनुभव होगा।
क्योंकि मैं भी इंद्रियों से परे, परमात्मा भी इंद्रियों से परे — तब हम अति इंद्रिय सुख का अनुभव कर सकते हैं।
यह अनुभव है।
और सच्चे आनंद का रहस्य — आत्मा, परमात्मा और सच्चे आनंद का क्या रहस्य है — इसको भी आज हम समझने का प्रयास करेंगे।
अब इसको हम इस प्रकार से भी कह सकते हैं —
क्या यह सुख इंद्रियों से परे है?
तो कहेंगे हां, क्योंकि इंद्रियों से यह सुख लिया ही नहीं जा सकता।
यह सुख सिर्फ आत्मा लेती है।
इंद्रियां शरीर का पार्ट हैं।
दूसरा प्रश्न है — इसके अंदर ध्यान में क्यों बहने लगते हैं आंसू?
जब हम वास्तव में अपने आप को इस देह से न्यारा और परमात्मा की डायरेक्शन पर गुण, शक्ति और खुशी का अनुभव करते हैं, वही होता है अति इंद्रिय सुख।
हमें देह में रहते हुए अपने आप को देह से न्यारा समझना है।
जब तक हम देह से न्यारा अनुभव नहीं कर सकते, तब तक अति इंद्रिय सुख का अनुभव भी नहीं कर सकते।
शिव बाबा की याद में अति इंद्रिय सुख क्यों आता है?
आज संसार सुख की तलाश में है।
आज सारी दुनिया सुख को ढूंढ रही है।
कोई पैसा, कोई रिश्ते, कोई नशा, कोई मनोरंजन में सुख ढूंढ रहा है।
लेकिन फिर भी मन अशांत है, दिल खाली है, और आत्मा थकी हुई है।
मन अशांत क्यों है?
क्योंकि अपने को देह समझ बैठा है।
दिल खाली क्यों है?
क्योंकि दिल को सच्चा प्यार करने वाला कोई नहीं है।
आत्मा थकी हुई क्यों है?
क्योंकि जो कुछ भी मिल रहा है, वो क्षणिक है।
मन, बुद्धि और संस्कार — तीनों को केवल अविनाशी के साथ मिलने से ही तृप्ति मिल सकती है।
आज दुनिया में कोई लगातार प्यार करने को तैयार नहीं है।
हर एक देह के अर्थ में लगा हुआ है।
आत्मा के लिए कोई नहीं सोचता।
इसी कारण आत्मा थकी हुई है।
तो फिर ऐसा कौन सा सुख है जो मन को भर देता है, आंखों से आंसू बहा देता है और बिना कारण मुस्कान दे देता है?
यही होती है अति इंद्रिय सुख की निशानी।
बिना संसार की कोई खुशी मिले, फिर भी अंदरूनी खुशी मिलती है — बाबा से मिलने वाली खुशी।
इतनी खुशी कि बोलना भी मुश्किल हो जाता है।
जिसे कहते हैं — गदगद हो जाना।
चलते-चलते हंसने लग जाना, बैठे-बैठे मुस्कराना।
दूसरा कहेगा — पागल है।
संसार में भी जब किसी प्रिय की याद आती है तो खुशी होती है, आंसू आते हैं।
लेकिन वह अति इंद्रिय सुख नहीं होता।
क्योंकि वह देहधारियों से मिलने वाला देहिक सुख है।
ब्रह्मा कुमारी ज्ञान कहता है —
वही अति इंद्रिय सुख है जो शिव बाबा की याद से मिलता है।
देहधारियों की याद से भी खुशी मिलती है,
परंतु उसे अति इंद्रिय सुख नहीं कहेंगे।
अति इंद्रिय सुख क्या है?
इंद्रियों से परे।
जो आंखों से नहीं देखा जाता,
जो कानों से नहीं सुना जाता,
जो स्वाद, स्पर्श या रूप से जुड़ा नहीं।
जो भी सुख देह के माध्यम से मिला — वह अति इंद्रिय नहीं है।
अति इंद्रिय सुख वह है जो आत्मा अनुभव करती है और परमात्मा द्वारा आत्मा को मिलता है।
गहरी याद में अचानक शांति छा जाना।
एकांत में बैठे-बैठे अशरीरी हो जाना।
खुशी में झूमना, आंसू बहना —
यही अति इंद्रिय सुख है।
ज्ञान सुनाते समय जब किसी की तृप्ति दिखाई देती है, वह भी सुख देता है।
परंतु अति इंद्रिय सुख तब होता है जब उस खुशी के लिए “थैंक यू” बाबा को किया जाता है।
जब पहली बार ज्ञान सुना और लगा —
कमाल है, भगवान आकर पढ़ा रहा है।
और आंखों से आंसू निकल आए —
यही अति इंद्रिय सुख है।
क्योंकि इसमें देह का कोई आधार नहीं है।
गहरी याद में बैठे-बैठे शांति, आनंद का अनुभव होना —
वह शरीर से नहीं, आत्मा से जुड़ा होता है।
हार्मोन्स शरीर में अभिव्यक्ति देते हैं,
पर सुख का स्रोत आत्मा और परमात्मा का मिलन है।
सांसारिक सुख और अति इंद्रिय सुख में अंतर समझना बहुत आवश्यक है।
सांसारिक सुख — समय के साथ घटता है।
अति इंद्रिय सुख — अभ्यास से बढ़ता है।
सांसारिक सुख थकाता है।
अति इंद्रिय सुख शक्ति भर देता है।
सांसारिक सुख आसक्ति बढ़ाता है।
अति इंद्रिय सुख निर्लिप्तता सिखाता है।
अति इंद्रिय सुख में परमात्मा माध्यम हैं,
पर आत्मा फंसती नहीं।
योग के बाद मन हल्का और शांत हो जाता है।
मुरली:
“यह ईश्वरीय आनंद ऐसा है जो कभी कम नहीं होता।”
शिव बाबा की याद विशेष क्यों है?
क्योंकि शिव बाबा जन्म-मरण से परे हैं,
सर्वशक्तिमान हैं,
सच्चे माता-पिता, गुरु और सतगुरु हैं।
जब आत्मा अपने मूल पिता को पहचानती है,
तो सुरक्षा, प्रेम और अपनापन स्वतः जागृत होता है।
याद से ही आत्मा पवित्र और शक्तिशाली बनती है।
अति इंद्रिय सुख कब और कैसे अनुभव होता है?
जब याद निस्वार्थ होती है।
सिर्फ मिलन की भावना होती है।
जब “मैं करता हूं” से बदलकर
“बाबा करा रहा है” हो जाता है।
तब खुशी मिलती है।
यह सुख शब्दों में नहीं बताया जा सकता।
यह अनुभव है, तर्क नहीं।
जैसे शहद का स्वाद,
मां के आंचल का सुकून —
जो पाता है वही जानता है।
अति इंद्रिय सुख का प्रभाव जीवन पर —
सहनशक्ति बढ़ती है,
व्यर्थ इच्छाएं समाप्त होती हैं,
अकेलापन मिट जाता है,
भय समाप्त हो जाता है।
जो आत्मा बाबा के साथ है,
वह भीड़ में भी अकेली नहीं होती।
सच्चा सुख वही है
जो दुख में भी साथ न छोड़े।
संगम युग और अति इंद्रिय सुख का गहरा संबंध है।
यह अनुभव संगम युग में कराया जाता है,
और सतयुग में इसका फल मिलता है।
निष्कर्ष —
अति इंद्रिय सुख कोई कल्पना नहीं है।
यह ध्यान का साइड इफेक्ट नहीं है।
यह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रमाण है।
अंतिम संदेश —
यदि यह अनुभव चाहिए,
तो रोज थोड़ी देर याद का अभ्यास करें,
ज्ञान को जीवन में उतारें,
और शिव बाबा को अपना मानें।
जिस दिन दिल से स्वीकार कर लेंगे,
वही आपको अति इंद्रिय सुख के पास ले जाएगा।
