शिव बाबा है ज्ञान
श्री कृष्ण है विज्ञान
शिव बाबा ज्ञान का सागर है और श्री कृष्ण ज्ञान का साकार विज्ञान है।
क्योंकि शिव बाबा केवल ज्ञान सुनाता है, ज्ञान देता है।
परंतु श्री कृष्ण उस ज्ञान को अपने जीवन में धारण करके देता है,
धारण करके दिखाता है, प्रस्तुत करता है।
अब तक हम समझते थे श्री कृष्ण भगवान है,
श्री कृष्ण ही ज्ञान देने वाला है।
परंतु अब हमें समझ आई है कि वास्तव में
गीता ज्ञान का दाता शिव बाबा है, न कि श्री कृष्ण।
श्री कृष्ण तो पहली आत्मा है जिसने ज्ञान को अपने जीवन में
धारण करके प्रैक्टिकल रूप में हम सबके सामने किया।
हम सबको भी आप समान बनने की विधि समझाने के निमित्त
मॉडल बना।
परंतु उसने दिखाया कि मैं कैसे सारा ज्ञान धारण करके बना हूं।
परंतु श्री कृष्ण ज्ञान नहीं देता,
वह विज्ञान है।
वह बोलता कौन है और करता कौन है?
आज हमें यही अंतर समझना है कि
गीता ज्ञान का देने वाला कौन है
और उस ज्ञान को जीवन में धारण करने वाला कौन है।
यह बड़ा गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य है —
बोलने वाला कौन और करने वाला कौन?
अक्सर लोग कहते हैं “भगवान बोले”, “भगवानो वाच”,
परंतु वास्तव में भगवान कैसे बोलते हैं,
किसके लिए बोलते हैं
और कौन उसे अपने जीवन में धारण करता है —
यह समझने की बात है।
क्या हर दिव्य कार्य बोलकर ही होता है?
या कुछ आत्माएं ऐसी होती हैं जो बोलती नहीं,
करके दिखाती हैं?
आज का विषय बहुत गूढ़ है।
जब यह बात समझ में आ जाती है
तो बहुत सरल हो जाती है।
शिव बाबा है ज्ञान।
श्री कृष्ण है विज्ञान।
श्री कृष्ण बोलेगा नहीं, करेगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि श्री कृष्ण बोल नहीं सकता,
बल्कि उसे बोलने की आवश्यकता ही नहीं है।
मुरली है – 18 जनवरी 1968
“मैं ज्ञान का सागर हूं।
तुम मेरे बच्चे ज्ञान को जीवन में लाने वाले हो।”
ज्ञान और विज्ञान का आध्यात्मिक अंतर क्या है?
ज्ञान यानी नॉलेज —
सत्य को जानना,
आत्मा की पहचान,
समय, कर्म और ड्रामा की समझ।
विज्ञान क्या है?
जो ज्ञान प्राप्त किया,
उसे जीवन में उतारना।
संस्कारों में परिवर्तन लाना।
ज्ञान सुनना अलग बात है,
ज्ञान को जीवन में लाना अलग बात है।
बार-बार सही कर्म करने से
संस्कार बनते हैं।
और संस्कार बनते हैं
तो जीवन स्वतः उदाहरण बन जाता है।
शिव बाबा पढ़ाते हैं,
श्री कृष्ण पास होकर दिखाते हैं।
शिव बाबा का कार्य है —
बोलना, समझाना,
अज्ञान का अंधकार मिटाना।
मुरली है – 1 जनवरी 1969
“मैं आकर तुम्हें आत्मा और परमात्मा का ज्ञान देता हूं।”
श्री कृष्ण ज्ञान का सागर नहीं,
गुणों का सागर है।
मुरली है – 14 नवंबर 1965
“श्री कृष्ण ज्ञान का सागर नहीं, गुणों का सागर है।”
श्री कृष्ण ने शिव बाबा से ज्ञान लेकर
गुणों को धारण किया,
संस्कार बनाए
और देवता बना।
देवताओं का जीवन स्वतः सिद्ध होता है।
वे उपदेश नहीं देते,
उनका जीवन ही प्रेरणा बन जाता है।
इसलिए श्री कृष्ण बोलता नहीं,
उसका जीवन बोलता है।
मुरली है – 27 मार्च 1969
“जहां सब देवताएं हैं, वहां ज्ञान देने की आवश्यकता नहीं।”
आज की सबसे बड़ी भूल है —
शिव बाबा, ब्रह्मा बाबा और श्री कृष्ण
तीनों को एक समझ लेना।
मुरली है – 22 सितंबर 1966
“भगवान और देवता के कार्य अलग-अलग हैं।”
शिव बाबा ज्ञान देते हैं।
श्री कृष्ण ज्ञान का स्वरूप बनता है।
शिव बाबा परिवर्तन कराता है।
श्री कृष्ण परिवर्तन का परिणाम है।
आज ज्ञान सुनने का समय है,
आज बदलने का समय है,
ताकि कल बोलना न पड़े —
जीवन स्वयं बोले।
उपसंहार (अंतिम संदेश)
शिव बाबा ज्ञान का स्रोत है।
श्री कृष्ण ज्ञान की सफलता है।
एक सिखाता है,
दूसरा सिद्ध करता है।
आज सुनने और बदलने का समय है,
ताकि कल हमारा जीवन स्वयं बोले।
