2-3: In Jainism, the liberated soul and in B.K. knowledge, the Supreme Soul — are they one and the same?

J.D.BK ज्ञान 2-3 जैन धर्म में सिद्ध आत्मा और बी के ज्ञान में परम आत्मा — क्या यही एक हैं?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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जैन दर्शन और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान

सिद्ध आत्मा और परमात्मा — क्या यही एक हैं?


 भूमिका : एक सूक्ष्म लेकिन निर्णायक आध्यात्मिक अंतर

आज हम एक ऐसे विषय पर मनन करने जा रहे हैं,
जो बाहर से देखने में छोटा लगता है
लेकिन अंदर से सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान की दिशा तय कर देता है।

सिद्ध आत्मा और परमात्मा — क्या दोनों एक हैं या अलग हैं?
 क्या जैन धर्म की सिद्ध आत्मा ही परमात्मा है?
 या परमात्मा कोई अलग सत्ता है?

यह विषय विशेष रूप से जैन भाई-बहनों के लिए अत्यंत आवश्यक है,
क्योंकि जैन दर्शन सिद्ध आत्मा को मानता है
लेकिन परमात्मा को एक अलग सत्ता के रूप में स्वीकार नहीं करता।


जैन दर्शन में आत्मा और सिद्ध आत्मा की धारणा

आत्मा किसे कहते हैं?

जैन दर्शन में आत्मा को “जीव” कहा जाता है।

जैन दर्शन के अनुसार —
✔ आत्मा शुद्ध है
✔ आत्मा चैतन्य है
✔ आत्मा अनादि है
✔ आत्मा पर कर्मों का बंधन लगता है
✔ आत्मा ही कर्म करती है और आत्मा ही कर्म का फल भोगती है

कर्मों से मुक्त होना ही मोक्ष है।
मोक्ष प्राप्त होने पर जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।


 सिद्ध आत्मा क्या है? (Jain Philosophy)

जिस आत्मा ने —

✔ अपने समस्त कर्मों का क्षय कर लिया
✔ जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गई
✔ सिद्धशिला में स्थित हो गई

वह कहलाती है — सिद्ध आत्मा

सिद्ध आत्मा —

  • न जन्म लेती है

  • न कर्म करती है

  • न संसार में लौटती है

जैन धर्म मानता है कि
हर आत्मा सिद्ध बन सकती है।

महावीर स्वामी, ऋषभदेव, 24 तीर्थंकर —
सभी सिद्ध आत्माएँ हैं।


 अब प्रश्न उठता है…

यदि सिद्ध आत्मा पूर्ण पवित्र है,
कर्मातीत है,
जन्म-मरण से परे है —

 तो क्या वही परमात्मा है?

यहीं से जैन दर्शन और बीके ज्ञान में मूल अंतर प्रारंभ होता है।


 ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा कौन है?

 मुरली प्रमाण

साकार मुरली — 2 अक्टूबर 1966

“मैं आत्माओं का बाप हूँ।
मैं कभी जन्म-मरण में नहीं आता।”

ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार —

✔ परमात्मा केवल एक है
✔ परमात्मा अजन्मा है
✔ परमात्मा अशरीरी है
✔ परमात्मा अयोनी है
✔ परमात्मा कभी शरीर धारण नहीं करता
✔ परमात्मा संसार के कर्म नहीं करता
✔ परमात्मा ज्ञान देने का कर्म करता है

वह पतितों को पावन बनाने आता है
और मुक्ति का मार्ग दिखाता है।


 बाप कभी साधक नहीं बनता

अव्यक्त मुरली — 15 फरवरी 1973

“बाप कभी साधक नहीं बनता।
वह सदा सिद्ध स्वरूप ही रहता है।”

परमात्मा को साधना नहीं करनी पड़ती।
वह सदा से सिद्ध है।
वह कभी पतित नहीं बनता।


 सिद्ध आत्मा और परमात्मा में मौलिक अंतर

विषय सिद्ध आत्मा परमात्मा
संख्या अनेक केवल एक
कर्म कर्मों से मुक्त हुई आत्मा कभी कर्मों में आया ही नहीं
साधना साधना से सिद्ध बनी सदा सिद्ध
भूमिका स्वयं मुक्त सबको मुक्त करने वाला
जन्म पहले जन्म-मरण में थी कभी जन्म नहीं लेता
संबंध अन्य आत्माओं से अलग सभी आत्माओं का पिता

 मुरली प्रमाण

साकार मुरली — 21 जनवरी 1969

“तुम आत्माएँ साधक हो।
मैं सिद्ध स्वरूप बाप हूँ।”


 क्या सिद्ध आत्मा को परमात्मा कह सकते हैं?

बीके ज्ञान के अनुसार — नहीं

क्यों?

 मुरली — 18 जनवरी 1969

“जो कभी पतित बना हो,
वह पतित-पावन नहीं कहला सकता।”

सिद्ध आत्मा पहले पतित थी,
फिर साधना करके पावन बनी।

परमात्मा कभी पतित नहीं बना,
इसलिए वही सच्चा पतित-पावन है।


 सुंदर उदाहरण

 तैरना सीखकर किनारे पहुँचा व्यक्ति — सिद्ध आत्मा
 लाइफ गार्ड जो सबको बचाता है — परमात्मा

सिद्ध आत्मा स्वयं पार होती है।
परमात्मा सबको पार लगाता है।


 निष्कर्ष

✔ जैन धर्म की सिद्ध आत्मा — एक मुक्त आत्मा है
✔ ब्रह्मा कुमारीज का परमात्मा — सर्व आत्माओं का मुक्ति दाता है


 साकार मुरली — 30 मार्च 1968

“पहले आत्मा को जानो,
फिर बाप को पहचानो।”


 अंतिम सत्य

बीके ज्ञान के अनुसार —

 हर आत्मा सिद्ध बन सकती है
 लेकिन परमात्मा कोई बनता नहीं
 वह सदा परम ही रहता है

प्रश्न 1: सिद्ध आत्मा और परमात्मा — क्या दोनों एक ही हैं?

उत्तर:
बीके ज्ञान के अनुसार — नहीं।
सिद्ध आत्मा एक मुक्त हुई आत्मा है, जबकि परमात्मा सदा से मुक्त, अजन्मा और सभी आत्माओं का पिता है।


 प्रश्न 2: जैन दर्शन में आत्मा किसे कहते हैं?

उत्तर:
जैन दर्शन में आत्मा को “जीव” कहा जाता है।
आत्मा शुद्ध, चैतन्य और अनादि है। आत्मा पर कर्मों का बंधन लगता है, वही कर्म करती है और वही कर्मफल भोगती है।
कर्मों से मुक्त होना ही मोक्ष है।


 प्रश्न 3: जैन दर्शन में सिद्ध आत्मा क्या है?

उत्तर:
जिस आत्मा ने

  • अपने समस्त कर्मों का क्षय कर लिया,

  • जन्म–मरण के चक्र से मुक्त हो गई,

  • सिद्धशिला में स्थित हो गई —
    वह सिद्ध आत्मा कहलाती है।

सिद्ध आत्मा न जन्म लेती है, न कर्म करती है, न संसार में लौटती है।


 प्रश्न 4: क्या हर आत्मा सिद्ध बन सकती है?

उत्तर:
जैन दर्शन के अनुसार — हाँ।
हर आत्मा में सिद्ध बनने की संभावना है। महावीर स्वामी, ऋषभदेव और 24 तीर्थंकर सिद्ध आत्माएँ माने जाते हैं।


 प्रश्न 5: यदि सिद्ध आत्मा पूर्ण पवित्र और कर्मातीत है, तो क्या वही परमात्मा है?

उत्तर:
यहीं से मूल अंतर शुरू होता है।
बीके ज्ञान के अनुसार सिद्ध आत्मा परमात्मा नहीं है, क्योंकि सिद्ध आत्मा पहले कर्मबंधन में थी और साधना से मुक्त हुई है, जबकि परमात्मा कभी कर्मबंधन में आया ही नहीं।


 प्रश्न 6: ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा कौन है?

उत्तर:
परमात्मा केवल एक है। वह अजन्मा, अशरीरी, अयोनी है और कभी जन्म–मरण में नहीं आता।
वह संसार के कर्म नहीं करता, बल्कि ज्ञान देकर सबको मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

साकार मुरली — 2 अक्टूबर 1966
“मैं आत्माओं का बाप हूँ।
मैं कभी जन्म-मरण में नहीं आता।”


प्रश्न 7: क्या परमात्मा साधना करके सिद्ध बनता है?

उत्तर:
नहीं। परमात्मा को साधना नहीं करनी पड़ती। वह सदा से सिद्ध है।

अव्यक्त मुरली — 15 फरवरी 1973
“बाप कभी साधक नहीं बनता।
वह सदा सिद्ध स्वरूप ही रहता है।”


 प्रश्न 8: सिद्ध आत्मा और परमात्मा में मुख्य अंतर क्या हैं?

उत्तर:

विषय सिद्ध आत्मा परमात्मा
संख्या अनेक केवल एक
कर्म कर्मों से मुक्त हुई आत्मा कभी कर्मों में आया ही नहीं
साधना साधना से सिद्ध बनी सदा सिद्ध
भूमिका स्वयं मुक्त सबको मुक्त करने वाला
जन्म पहले जन्म–मरण में थी कभी जन्म नहीं लेता
संबंध अन्य आत्माओं से अलग सभी आत्माओं का पिता

साकार मुरली — 21 जनवरी 1969
“तुम आत्माएँ साधक हो।
मैं सिद्ध स्वरूप बाप हूँ।”


 प्रश्न 9: क्या सिद्ध आत्मा को परमात्मा कह सकते हैं?

उत्तर:
बीके ज्ञान के अनुसार — नहीं।

मुरली — 18 जनवरी 1969
“जो कभी पतित बना हो,
वह पतित-पावन नहीं कहला सकता।”

सिद्ध आत्मा पहले पतित थी और साधना से पावन बनी।
परमात्मा कभी पतित नहीं बना — वही सच्चा पतित-पावन है।


 प्रश्न 10: इसे एक सरल उदाहरण से कैसे समझें?

उत्तर:

  • तैरना सीखकर किनारे पहुँचा व्यक्ति — सिद्ध आत्मा

  • लाइफ गार्ड जो सबको बचाता है — परमात्मा

सिद्ध आत्मा स्वयं पार होती है।
परमात्मा सबको पार लगाता है।


 प्रश्न 11: निष्कर्ष क्या है?

उत्तर:

  • जैन धर्म की सिद्ध आत्मा — एक मुक्त आत्मा है।

  • ब्रह्मा कुमारीज का परमात्मा — सर्व आत्माओं का मुक्ति दाता है।

साकार मुरली — 30 मार्च 1968
“पहले आत्मा को जानो,
फिर बाप को पहचानो।”


 अंतिम सत्य

बीके ज्ञान के अनुसार —

  • हर आत्मा सिद्ध बन सकती है,

  • लेकिन परमात्मा कोई बनता नहीं,

  • वह सदा परम ही रहता है।

डिस्क्लेमर :
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी भी धर्म या परंपरा की आलोचना नहीं, बल्कि जैन दर्शन और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान के आध्यात्मिक बिंदुओं को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना है।
यह प्रस्तुति केवल आत्म-चिंतन, अध्ययन एवं आत्म-शक्ति जागरण के लिए है।

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