(19)संभोग से योग की यात्रा
क्या श्री कृष्ण आवाज आ रही है मेरी?
हां जी भाई जी आ रही है।
क्या श्री कृष्ण भगवान थे?
आज हम इसका 19वां पाठ कर रहे हैं।
संभोग से योग की यात्रा।
काम वासना से आत्मिक प्रेम तक
काम वासना से आत्मिक प्रेम तक
आत्मा का दिव्य परिवर्तन
आत्मा का दिव्य परिवर्तन
डिस्क्लेमर यह प्रस्तुति ब्रह्मा कुमारीज की साकार एवं अव्यक्त मूल्यों के अध्ययन पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, दांपत्य जीवन या सामाजिक व्यवस्था की आलोचना करना नहीं। यह विषय काम वासना से आत्मिक प्रेम की ओर परिवर्तन, राजयोग और पवित्रता की आध्यात्मिक समझ पर आधारित है। दर्शक इसे परिपक्वता, सम्मान और आत्म चिंतन की भावना से सुनें।
एक अत्यंत संवेदनशील लेकिन आवश्यक विषय। यह विषय बड़ा संवेदनशील है, परंतु आवश्यक है।
आज हम एक ऐसे विषय पर मनन करेंगे जो अक्सर मन में आता है। सोचते सभी हैं परंतु खुलकर चर्चा कम होती है।
आज का विषय है संभोग से योग की यात्रा।
यह विषय केवल संबंध का नहीं है।
यह विषय केवल शारीरिक संबंध का नहीं है।
यह आत्मा की चेतना के स्तर का विषय है।
आत्मा की चेतना क्या होती है?
चेतना — जागृत अवस्था।
चैतन अर्थात जागृत।
आत्मा की सुप्त अवस्था में ही हम गलतियां करते हैं।
जब आत्मा जाग जाती है, ज्ञान प्रकाश में आ जाती है — यह उस स्तर का विषय है।
जो आत्माएं अज्ञानता की नींद में सोई हुई हैं, वह इस विषय पर चिंतन नहीं कर सकतीं।
जो आत्मा ज्ञान के संपर्क में आ गई है, जिसने जागना शुरू कर दिया है, जिसकी ज्योति जगी हुई है — यह विषय उस स्तर का है।
प्रश्न यह नहीं कि संभोग है या नहीं।
प्रश्न यह है कि चेतना कहां है?
समझ कितनी है?
सुख कहां खोज रहे हैं?
प्रेम किस स्तर का है?
दुनिया इसे प्रेम समझती है, परंतु आज विचार यह करना है कि यह प्रेम किस प्रकार का है, किस स्तर का है।
आज हम भौतिक आकर्षण से आत्मिक संबंध तक की यात्रा को समझेंगे।
भौतिक आकर्षण — नश्वर संसार की चीजों के प्रति आकर्षण।
दैहिक आकर्षण।
वहां से बुद्धि को हटाकर रूहानी संबंध में कैसे लगाएं?
संभोग क्या है? — आध्यात्मिक दृष्टि
संभोग शब्द का सामान्य अर्थ:
शारीरिक आकर्षण
देह आधारित संबंध
इंद्रिय सुख
यह प्रकृति का नियम है।
सृष्टि विस्तार का माध्यम भी रहा है।
समस्या कब शुरू होती है?
जब यह पहचान बन जाए।
जब यह निर्भरता बन जाए।
जब हम इसके हैबिचुअल हो जाएं।
जब यह सुख का एकमात्र स्रोत बन जाए।
यदि कोई व्यक्ति मान ले कि कोई भी संबंध — पत्नी, पति, बेटा, भाई, बहन, दोस्त — ही मेरे सुख का आधार है, तो यह निर्भरता बंधन बन जाती है।
निर्भरता बंधन है।
योग क्या है?
आत्मा की स्मृति
परमात्मा से संबंध
आंतरिक संतोष
प्रेम का सूक्ष्म अनुभव
राजयोग सिवाय परमात्मा के और कोई नहीं दे सकता।
ईश्वर के साथ संबंध से श्रेष्ठ संबंध कोई नहीं।
मैं देह नहीं हूं। मैं आत्मा हूं।
मेरा अविनाशी संबंध परमात्मा से है।
देह का संबंध टेंपरेरी है।
संसार में टेंपरेरी सुख है।
यहां परमानेंट संतुष्टता है।
मुरली 5 मार्च 1968
योग से शक्ति मिलती है।
योग में सुख बाहरी नहीं, रूहानी होता है।
आत्मा द्वारा अनुभव किया जाने वाला अनुभव।
संभोग और योग का मूल अंतर
संभोग — देह आधारित
योग — आत्मा आधारित
संभोग — क्षणिक सुख
योग — स्थायी शांति
संभोग — निर्भरता
योग — स्वतंत्रता
संभोग — उत्तेजना
योग — स्थिरता
संभोग — अनुभव
योग — अस्तित्व
पतन की प्रक्रिया
देह अभिमान
आकर्षण
इच्छा
आसक्ति
ये चार आत्मा को पतन की ओर ले जाते हैं।
आत्मा परमधाम से आती है।
सतयुग में आत्म अभिमानी रहती है।
द्वापर में देह अभिमान आता है।
कलियुग में आत्म विस्मृति पूर्ण हो जाती है।
मुरली 13 जनवरी 1969
काम महाशत्रु है।
काम विकार नर्क का द्वार है।
यह निंदा नहीं, चेतावनी है।
ऊर्जा का रूपांतरण
दमन नहीं, ट्रांसफॉर्मेशन।
ऊर्जा को दबाना नहीं, दिशा देना है।
काम ऊर्जा:
सृजन शक्ति
आकर्षण शक्ति
जीवन शक्ति
योग इसे बदल देता है।
शुद्ध संबंध
करुणा
रूहानी आकर्षण
उदाहरण — नदी और बांध
नदी अनियंत्रित हो तो बाढ़।
बांध बनाकर दिशा दें तो ऊर्जा, खेती, बिजली।
ऊर्जा को चैनलाइज करो।
योगी संबंध
सम्मान आधारित
स्वतंत्र
पवित्र
आत्मा आधारित
मुरली 21 जनवरी 1969
पवित्रता से देवत्व आता है।
क्या यह संभव है?
हाँ — संगम युग में।
मुरली 1 अगस्त 1972
पुरुषार्थ से परिवर्तन संभव है।
विधि क्या है?
बार-बार स्मृति:
मैं देह नहीं, आत्मा हूं।
मन, बुद्धि, संस्कार — श्रीमत पर।
फिर आत्मा सूक्ष्म शक्तियों की राजा बनती है।
फिर कर्म इंद्रियों की भी राजा बनती है।
दृष्टि परिवर्तन
ना दुख देना है, ना दुख लेना है।
सबको सुख देना है।
संस्कार परिवर्तन
जिस्मानी संस्कार मिटते हैं।
रूहानी संस्कार बनते हैं।
प्रेम का सर्वोच्च रूप
संभोग आधारित प्रेम:
अपेक्षा
स्वामित्व
भय
योग आधारित प्रेम:
स्वतंत्रता
सम्मान
सुरक्षा
अविनाशी संबंध
दिव्य प्रेम — आत्मा से आत्मा का संबंध।
गहरा निष्कर्ष
संभोग — स्थूल चेतना
योग — सूक्ष्म चेतना
ऊर्जा एक ही है, दिशा अलग।
स्थूल में विनाशकारी
सूक्ष्म में कल्याणकारी
आध्यात्मिक यात्रा
संयम → नियंत्रण → योग
जब परमात्मा के डायरेक्शन पर चलेंगे,
तो यह विश्व कल्याण की दिशा बनेगा।
यही संभोग से योग की यात्रा है।

