J.D.BK ज्ञान 3-2 शुभ और अशुभ कर्म कैसे आत्मा से जुड़ते हैं?

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और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान

दोनों के आधार पर
शुभ और अशुभ कर्म

कैसे आत्मा से जुड़ते हैं?
शुभ और अशुभ कर्म आत्मा से कैसे जुड़ते हैं?

कर्मों की गति का
आज हम दूसरा विषय कर रहे हैं।

डिस्क्लेमर

यह प्रवचन
ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा
सिखाए गए आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है,
जो श्रीमद् भागवत गीता
एवं साकार व अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन से प्रस्तुत किया गया है।

इसका उद्देश्य
किसी भी धर्म ग्रंथ या मान्यता का खंडन करना नहीं,
बल्कि कर्म के सूक्ष्म नियम को आध्यात्मिक दृष्टि से समझना-समझाना है।

यह ज्ञान आत्मिक शांति, आत्म उन्नति
और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए है,
ताकि सभी इसका लाभ उठा सकें और अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकें।

अब हमारा विशेष प्रश्न यह है कि
शुभ और अशुभ कर्म कैसे आत्मा से जुड़ते हैं?

तो हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि
शुभ कर्म क्या होते हैं और अशुभ कर्म क्या होते हैं।

आत्मिक स्मृति में किया गया कर्म शुभ कर्म होता है।
और देह अभिमान की स्मृति में किया गया कर्म अशुभ कर्म होता है।

आत्म स्मृति में किया गया कर्म शुभ है।
आत्म विस्मृति में किया गया कर्म अशुभ है।

कर्म कैसे आत्मा से जुड़ता है?

विचार से संस्कार तक —
कर्म बंधन का यह गुप्त विज्ञान है।

संकल्प कहां उठते हैं?
मन में।

मन के अंदर संकल्प उठते हैं।
वह संकल्प बुद्धि के पास जाता है।
बुद्धि तय करती है कि उसे स्वीकार करना है या अस्वीकार।

बुद्धि तर्क की भाषा समझती है।
वह संस्कारों के आधार पर निर्णय लेती है।

अगर कोई विचार पहले से संस्कार बना हुआ है
तो वह स्वतः स्वीकार हो जाता है।
अगर नया विचार है, तो बुद्धि तर्क करती है।

जिस तर्क की शक्ति अधिक होती है,
बुद्धि उसी के अनुसार निर्णय देती है।

बार-बार किया गया कर्म
संस्कार बन जाता है।

मन – बुद्धि – संस्कार की यात्रा

मन संकल्प करता है
बुद्धि निर्णय लेती है
संस्कार बनता है
और वही कर्म का आधार बनता है।

मन का काम है संकल्प करना
बुद्धि का काम है निर्णय लेना
और संस्कार बनाकर भविष्य तय करना।

सूक्ष्म सत्य

कर्म केवल बाहर नहीं बनते।
कर्म आत्मा के भीतर जुड़ते हैं।

मनुष्य कर्म को हल्का समझता है
पर उसका बोझ आत्मा पर पड़ता है।

आत्मा और कर्म का संबंध

साकार मुरली — 18 जनवरी 1965
तुम आत्मा हो।
शरीर तुम्हारा रथ है।

रथ को चलाने वाली आत्मा है।
कर्म करने वाली आत्मा है।

शरीर साधन है,
कर्ता आत्मा है।

जैसे पेन से लिखाई होती है
लेकिन लिखने वाला हाथ होता है,
वैसे शरीर से कर्म होता है
पर करने वाली आत्मा होती है।

कर्म के तीन सूक्ष्म चरण

संकल्प (विचार)

वाणी (बोल)

कर्म (क्रिया)

संकल्प भी कर्म है।
बोल भी कर्म है।
यहां तक कि सांस लेना भी कर्म है।

शुभ और अशुभ कर्म की परिभाषा

जो कर्म आत्मा को हल्का करे
शांति बढ़ाए
और दूसरों को सुख दे
वह शुभ कर्म है।

जो कर्म आत्मा को भारी करे
अशांति फैलाए
और दुख का कारण बने
वह अशुभ कर्म है।

कर्म आत्मा से कैसे जुड़ता है?
पहला चरण — विचार

जैसे विचार होंगे
वैसी भावना बनेगी
वैसी वृत्ति बनेगी
वैसी दृष्टि बनेगी
और वैसे ही कर्म होंगे।

दूसरा चरण — भावना

भावना जितनी गहरी होगी
कर्म उतना शक्तिशाली होगा।

तीसरा चरण — कर्म

बार-बार किया गया कर्म
संस्कार बन जाता है।

संस्कार से स्वभाव

कर्म से संस्कार बनते हैं
संस्कार से स्वभाव बनता है

जो संस्कार बन जाते हैं
वही आत्मा के साथ अगले जन्म तक जाते हैं।

निष्कर्ष

कर्म आत्मा से जुड़ते हैं
क्योंकि कर्ता आत्मा है।

मन संकल्प करता है
बुद्धि निर्णय लेती है
और आत्मा कर्म करती है।

यही कर्म
संस्कार बनते हैं
और यही हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं।

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