AV-10/14-10-1987-“ब्राह्मण जीवन – बाप से सर्व सम्बन्ध अनुभव करने की जीवन”
“ब्राह्मण जीवन – बाप से सर्व सम्बन्ध अनुभव करने की जीवन”
आज बापदादा अपने अनेक बार मिलन मनाने वाले, अनेक कल्पों से मिलने वाले बच्चों से फिर मिलन मनाने आये हैं। यह अलौकिक, अव्यक्ति मिलन भविष्य स्वर्ण युग में भी नहीं हो सकता। सिर्फ इस समय इस विशेष युग को वरदान है – बाप और बच्चों के मिलने का। इसलिए इस युग का नाम ही है संगमयुग अर्थात् मिलन मनाने का युग। ऐसे युग में ऐसा श्रेष्ठ मिलन मनाने के विशेष पार्टधारी आप आत्मायें हो। बापदादा भी ऐसे कोटों में कोई श्रेष्ठ भाग्यवान आत्माओं को देख हर्षित होते हैं और स्मृति दिलाते हैं। आदि से अन्त तक कितनी स्मृतियाँ दिलाई हैं? याद करो तो लम्बी लिस्ट निकल आयेगी। इतनी स्मृतियाँ दिलाई हैं जो आप सभी स्मृति-स्वरूप बन गये हो। भक्ति में आप स्मृति-स्वरूप आत्माओं के यादगार रूप में भक्त भी हर समय सिमरण करते रहते हैं। आप स्मृतिस्वरूप आत्माओं के हर कर्म की विशेषता का सिमरण करते रहते हैं। भक्ति की विशेषता ही सिमरण अर्थात् कीर्तन करना है। सिमरण करते-करते मस्ती में कितना मग्न हो जाते हैं। अल्पकाल के लिए उन्हों को भी और कोई सुध-बुध नहीं रहती। सिमरण करते-करते उसमें खो जाते हैं अर्थात् लवलीन हो जाते हैं। यह अल्पकाल का अनुभव उन आत्माओं के लिए कितना प्यारा और न्यारा होता है! यह क्यों होता? क्योंकि जिन आत्माओं का सिमरण करते हैं, यह आत्मायें स्वयं भी बाप के स्नेह में सदा लवलीन रही हैं, बाप की सर्व प्राप्तियों में सदा खोई हुई रही हैं। इसलिए, ऐसी आत्माओं का सिमरण करने से भी उन भक्तों को अल्पकाल के लिए आप वरदानी आत्माओं द्वारा अंचली रूप में अनुभूति प्राप्त हो जाती है। तो सोचो, जब सिमरण करने वाली भक्त आत्माओं को भी इतना अलौकिक अनुभव होता है तो आप स्मृति-स्वरूप, वरदाता, विधाता आत्माओं को कितना प्रैक्टिकल जीवन में अनुभव प्राप्त होता है! इसी अनुभूतियों में सदा आगे बढ़ते चलो।
हर कदम में भिन्न-भिन्न स्मृति-स्वरूप का अनुभव करते चलो। जैसा समय, जैसा कर्म वैसे स्वरूप की स्मृति इमर्ज (प्रत्यक्ष) रूप में अनुभव करो। जैसे अमृतवेले दिन का आरम्भ होते बाप से मिलन मनाते – मास्टर वरदाता बन वरदाता से वरदान लेने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ, डायरेक्ट भाग्यविधाता द्वारा भाग्य प्राप्त करने वाली पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा हूँ – इस श्रेष्ठ स्वरूप को स्मृति में लाओ। वरदानी समय है, वरदाता विधाता साथ में है। मास्टर वरदानी बन स्वयं भी सम्पन्न बन रहे हो और अन्य आत्माओं को भी वरदान दिलाने वाले वरदानी आत्मा हो – इस स्मृति-स्वरूप को इमर्ज करो। ऐसे नहीं कि यह तो हूँ ही। लेकिन भिन्न-भिन्न स्मृति-स्वरूप को समय प्रमाण अनुभव करो तो बहुत विचित्र खुशी, विचित्र प्राप्तियों का भण्डार बन जायेंगे और सदैव दिल से प्राप्ति के गीत स्वत: ही अनहद शब्द के रूप में निकलता रहेगा – “पाना था सो पा लिया…”। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न समय और कर्म प्रमाण स्मृति-स्वरूप का अनुभव करते जाओ। मुरली सुनते हो तो यह स्मृति रहे कि गॉडली स्टूडेन्ट लाइफ (ईश्वरीय विद्यार्थी जीवन) अर्थात् भगवान का विद्यार्थी हूँ, स्वयं भगवान मेरे लिए परमधाम से पढ़ाने लिए आये हैं। यही विशेष प्राप्ति है जो स्वयं भगवान आता है। इसी स्मृति-स्वरूप से जब मुरली सुनते हैं तो कितना नशा होता! अगर साधरण रीति से नियम प्रमाण सुनाने वाला सुना रहा है और सुनने वाला सुन रहा है तो इतना नशा अनुभव नहीं होगा। लेकिन भगवान के हम विद्यार्थी हैं – इस स्मृति को स्वरूप में लाकर फिर सुनो, तब अलौकिक नशे का अनुभव होगा। समझा?
भिन्न-भिन्न समय के भिन्न-भिन्न स्मृति-स्वरूप के अनुभव में कितना नशा होगा! ऐसे सारे दिन के हर कर्म में बाप के साथ स्मृति-स्वरूप बनते चलो – कभी भगवान का सखा वा साथी रूप का, कभी जीवन-साथी रूप का, कभी भगवान मेरा मुरब्बी बच्चा है अर्थात् पहला-पहला हकदार, पहला वारिस है। कोई ऐसा बहुत सुन्दर और बहुत लायक बच्चा होता है तो माँ-बाप को कितना नशा रहता है कि मेरा बच्चा कुल दीपक है वा कुल का नाम बाला करने वाला है! जिसका भगवान बच्चा बन जाए, उसका नाम कितना बाला होगा! उसके कितने कुल का कल्याण होगा! तो जब कभी दुनिया के वातावरण से या भिन्न-भिन्न समस्याओं से थोड़ा भी अपने को अकेला या उदास अनुभव करो तो ऐसे सुन्दर बच्चे रूप से खेलो, सखा रूप में खेलो। कभी थक जाते हो तो माँ के रूप में गोदी में सो जाओ, समा जाओ। कभी दिलशिकस्त हो जाते हो तो सर्वशक्तिवान स्वरूप से मास्टर सर्वशक्तिवान के स्मृति-स्वरूप का अनुभव करो तो दिलशिकस्त से दिलखुश हो जायेंगे। भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न सम्बन्ध से, भिन्न-भिन्न अपने स्वरूप के स्मृति को इमर्ज रूप में अनुभव करो तो बाप का सदा साथ स्वत: ही अनुभव करेंगे और यह संगमयुग की ब्राह्मण जीवन सदा ही अमूल्य अनुभव होती रहेगी।
और बात कि इतने सर्व सम्बन्ध निभाने में इतने बिज़ी रहेंगे जो माया को आने की भी फुर्सत नहीं मिलेगी। जैसे लौकिक बड़ी प्रवृत्ति वाले सदैव यही कहते कि प्रवृत्ति को सम्भालने में इतने बिजी रहते हैं जो और कोई बात याद ही नहीं रहती है क्योंकि बहुत बड़ी प्रवृत्ति है। तो आप ब्राह्मण आत्माओं की प्रभु से प्रीत निभाने की प्रभु-प्रवृत्ति कितनी बड़ी है! आपकी प्रभु-प्रीत की प्रवृत्ति सोते हुए भी चलती है! अगर योग-निंद्रा में हो तो आपकी निंद्रा नहीं लेकिन योगनिंद्रा है। नींद में भी प्रभु-मिलन मना सकते हो। योग का अर्थ ही है मिलन। योग-निंद्रा अर्थात् अशरीरी-पन के स्थिति की अनुभूति। तो यह भी प्रभु-प्रीत है ना। तो आप जैसी बड़े ते बड़ी प्रवृत्ति किसकी भी नहीं है! एक सेकेण्ड भी आपको फुर्सत नहीं है क्योंकि भक्ति में भक्त के रूप में भी गीत गाते रहते थे कि बहुत दिनों के बाद प्रभु आप मिले हो, तो गिन-गिन के हिसाब पूरा लेंगे। तो एक-एक सेकेण्ड का हिसाब लेने वाले हो। सारे कल्प के मिलने का हिसाब इस छोटे से एक जन्म में पूरा करते हो। पांच हजार वर्ष के हिसाब से यह छोटा-सा जन्म कुछ दिनों के हिसाब में हुआ ना। तो थोड़े से दिनों में इतना लम्बे समय का हिसाब पूरा करना है, इसलिए कहते हैं श्वांसो-श्वांस सिमरो। भक्त सिमरण करते हैं, आप स्मृति-स्वरूप बनते हो। तो आपको सेकेण्ड भी फुर्सत है? कितनी बड़ी प्रवृत्ति है! इसी प्रवृत्ति के आगे वह छोटी-सी प्रवृत्ति आकर्षित नहीं करेगी और सहज, स्वत: ही देह सहित देह के सम्बन्ध और देह के पदार्थ वा प्राप्तियों से नष्टोमोहा, स्मृति-स्वरूप हो जायेंगे। यही लास्ट पेपर माला के नम्बरवार मणके बनायेगा।
जब अमृतवेले से योगनिंद्रा तक भिन्न-भिन्न स्मृति-स्वरूप के अनुभवी हो जायेंगे तो बहुतकाल के स्मृति-स्वरूप का अनुभव अन्त में स्मृति-स्वरूप के क्वेश्चन में पास विद् ऑनर बना देगा। बहुत रमणीक जीवन का अनुभव करेंगे क्योंकि जीवन में हर एक मनुष्य आत्मा की पसन्दी ‘वैराइटी हो’- यही चाहते हैं। तो यह सारे दिन में भिन्न-भिन्न सम्बन्ध, भिन्न-भिन्न स्वरूप की वैराइटी अनुभव करो। जैसे दुनिया में भी कहते हैं ना – बाप तो चाहिए ही लेकिन बाप के साथ अगर जीवन-साथी का अनुभव न हो तो भी जीवन अधूरी समझते हैं, बच्चा न हो तो भी अधूरी जीवन समझते हैं। हर सम्बन्ध को ही सम्पन्न जीवन समझते हैं। तो यह ब्राह्मण जीवन भगवान से सर्व सम्बन्ध अनुभव करने वाली सम्पन्न जीवन है! एक भी सम्बन्ध की कमी नहीं करना। एक सम्बन्ध भी भगवान से कम होगा, तो कोई न कोई आत्मा उस सम्बन्ध से अपने तरफ खींच लेगी। जैसे कई बच्चे कभी-कभी कहते हैं बाप के रूप में तो है ही लेकिन सखा व सखी अथवा मित्र का तो छोटा-सा रूप है ना, उसके लिए तो आत्मायें चाहिए क्योंकि बाप तो बड़ा है ना। लेकिन परमात्मा के सम्बन्ध के बीच कोई भी छोटा या हल्का आत्मा का सम्बन्ध मिक्स हो जाता तो ‘सर्व’ शब्द समाप्त हो जाता है और यथाशक्ति की लाइन में आ जाते हैं। ब्राह्मणों की भाषा में हर बात में ‘सर्व’ शब्द आता है। जहाँ ‘सर्व’ है, वहाँ ही सम्पन्नता है। अगर दो कला भी कम हो गई तो दूसरी माला के मणके बन जाते। इसलिए, सर्व सम्बन्धों के सर्व स्मृति-स्वरूप बनो। समझा? जब भगवान खुद सर्व सम्बन्ध का अनुभव कराने की ऑफर कर रहा है तो ऑफरीन लेना चाहिए ना। ऐसी गोल्डन आफर सिवाए भगवान के और इस समय के, न कभी और न कोई कर सकता। कोई बाप भी बने और बच्चा भी बने – यह हो सकता है? यह एक की ही महिमा है, एक की ही महानता है। इसलिए सर्व सम्बन्ध से स्मृति-स्वरूप बनना है। इसमें मज़ा है ना? ब्राह्मण जीवन किसलिए है? मज़े में वा मौज में रहने के लिए। तो यह अलौकिक मौज मनाओ। मज़े की जीवन अनुभव करो। अच्छा।
(अहमदाबाद के हंसमुख भाई के शरीर छोड़ने पर बापदादा के उच्चारे हुए महावाक्य)
जो बच्चे जिस संस्कार से जाते हैं, उसकी अर्थी भी वही कार्य करती है। सेवा के उमंग वाले की अन्त तक भी सेवा ही होती रहती है। अज्ञानी लोग सारा जीवन रोते रहते तो अन्त में और भी रोते हैं। यहाँ ब्राह्मण जीवन में सेवा में रहते तो अन्त तक सेवा का साधन बन जाता है। फ़र्क है ना। आप लोग वहाँ कोई अर्थी को देखने नहीं गये, सेवा करने गये ना। चारों तरफ सेवा का वातावरण रहा ना। ब्राह्मण जीवन है ही सेवा के लिए। इसलिए हर बात में सच्चे ब्राह्मण सेवाधारी की सेवा ही होती रहती। ऐसी आत्मा को अगर कोई याद भी करेगा तो उनकी सेवा ही सामने आयेगी। मंजुला (हंसमुख भाई की युगल) तो है ही शिव शक्ति। अच्छा।
आज देहली दरबार वाले हैं। राज्य दरबार वाले हो या दरबार में सिर्फ देखने वाले हो? दरबार में राज्य करने वाले और देखने वाले – दोनों ही बैठते हैं। आप सब कौन हो? देहली की दो विशेषतायें हैं। एक – देहली दिलाराम की दिल है, दूसरा – गद्दी का स्थान है। दिल है तो दिल में कौन रहेगा? दिलाराम। तो देहली निवासी अर्थात् दिल में सदा दिलाराम को रखने वाले। ऐसे अनुभवी आत्मायें और अभी से स्वराज्य अधिकारी सो भविष्य में विश्व-राज्य अधिकारी। दिल में जब दिलाराम है तो राज्य अधिकारी अभी हैं और सदा रहेंगे। तो सदा अपनी जीवन में देखो कि यह दोनों विशेषतायें हैं? दिल में दिलाराम और फिर अधिकारी भी। ऐसे गोल्डन चांस, गोल्डन से भी डायमण्ड चांस लेने वाले कितने भाग्यवान हो! अच्छा।
अभी तो बेहद सेवा का बहुत अच्छा साधन मिला है – चाहे देश में, चाहे विदेश में। जैसे नाम है, वैसे ही सुन्दर कार्य है! नाम सुन करके ही सभी को उमंग आ रहा है – “सर्व के स्नेह, सहयोग से सुखमय संसार”! यह तो लम्बा कार्य है, एक वर्ष से भी अधिक है। तो जैसे कार्य का नाम सुनते ही सभी को उमंग आता है, ऐसे ही कार्य भी उमंग से करेंगे। जैसे सुन्दर नाम सुनकर खुश हो रहे हैं, वैसे कार्य होते सदा खुश हो जायेंगे। यह भी सुनाया ना प्रत्यक्षता का पर्दा हिलने का अथवा पर्दा खुलने का आधार बना है और बनता रहेगा। सर्व के सहयोगी – जैसे कार्य का नाम है, वैसे ही स्वरूप बन सहज कार्य करते रहेंगे तो मेहनत निमित्त मात्र और सफलता पदमगुणा अनुभव करते रहेंगे। ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि करावनहार निमित्त बनाए करा रहा है। मैं कर रहा हूँ, नहीं। इससे सहयोगी नहीं बनेंगे। करावनहार करा रहा है। चलाने वाला कार्य को चला रहा है। जैसे आप सभी को जगदम्बा का स्लोगन याद है – हुक्मी हुक्म चला रहा है। यही स्लोगन सदा स्मृति-स्वरूप में लाते सफलता को प्राप्त होते रहेंगे। बाकी चारों ओर उमंग-उत्साह अच्छा है। जहाँ उमंग-उत्साह है वहाँ सफलता स्वयं समीप आकर गले की माला बन जाती है। यह विशाल कार्य अनेक आत्माओं को सहयोगी बनाए समीप लायेगा क्योंकि प्रत्यक्षता का पर्दा खुलने के बाद इस विशाल स्टेज पर हर वर्ग वाला पार्टधारी स्टेज पर प्रत्यक्ष होना चाहिए। हर वर्ग का अर्थ ही है – विश्व की सर्व आत्माओं के वैराइटी वृक्ष का संगठन रूप। कोई भी वर्ग रह न जाए जो उल्हना दे कि हमें तो सन्देश नहीं मिला। इसलिए, नेता से लेकर झुग्गी-झोपड़ी तक वर्ग है। पढ़े हुए सबसे टॉप साइन्सदान और फिर जो अनपढ़ हैं, उन्हों को भी यह ज्ञान की नॉलेज देना, यह भी सेवा है। तो सभी वर्ग अर्थात् विश्व की हर आत्मा को सन्देश पहुँचाना है। कितना बड़ा कार्य है! यह कोई कह नहीं सकता कि हमको तो सेवा का चान्स नहीं मिलता। चाहे कोई बीमार है; तो बीमार, बीमार की सेवा करो; अनपढ़, अनपढ़ों की सेवा करो। जो भी कर सकते, वह चांस है। अच्छा, बोल नहीं सकते तो मन्सा वायुमण्डल से सुख की वृत्ति, सुखमय स्थिति से सुखमय संसार बनाओ। कोई भी बहाना नहीं दे सकता कि मैं नहीं कर सकता, समय नहीं है। उठते-बैठते 10-10 मिनट सेवा करो। अंगुली तो देंगे ना? कहाँ नहीं जा सकते हो, तबियत ठीक नहीं है तो घर बैठे करो लेकिन सहयोगी बनना जरूर है, तब सर्व का सहयोग मिलेगा। अच्छा।
उमंग-उत्साह देख बापदादा भी खुश होते हैं। सभी के मन में लगन है कि अब प्रत्यक्षता का पर्दा खोल के दिखायें। आरम्भ तो हुआ है ना। तो फिर सहज होता जायेगा। विदेश वाले बच्चों के प्लैन्स भी बापदादा तक पहुँचते रहते हैं। स्वयं भी उमंग में हैं और सर्व का सहयोग भी उमंग-उत्साह से मिलता रहता है। उमंग को उमंग, उत्साह को उत्साह मिलता है। यह भी मिलन हो रहा है। तो खूब धूमधाम से इस कार्य को आगे बढ़ाओ। जो भी उमंग-उत्साह से बनाया है और भी बाप के, सर्व ब्राह्मणों के सहयोग से, शुभ कामनाओं शुभ भावनाओं से और भी आगे बढ़ता रहेगा। अच्छा।
चारों ओर के सदा याद और सेवा के उमंग-उत्साह वाले श्रेष्ठ बच्चों को, सदा हर कर्म में स्मृति-स्वरूप की अनुभूति करने वाले अनुभवी आत्माओं को, सदा हर कर्म में बाप के सर्व सम्बन्ध का अनुभव करने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा ब्राह्मण जीवन के मजे की जीवन बिताने वाले महान् आत्माओं को बापदादा का अति स्नेह-सम्पन्न यादप्यार स्वीकार हो।
विदेशी बच्चे सेवा पर जाने की छुट्टी बापदादा से ले रहे हैं, बापदादा ने देश-विदेश के सभी बच्चों को यादप्यार दी:- सेवाधारी बच्चों को विश्व-सेवाधारी बाप विशेष यादप्यार दे रहे हैं। सभी सेवाधारी बच्चे सेवा के उमंग-उत्साह से अच्छे आगे बढ़ रहे हैं और सदा ही आगे बढ़ते रहेंगे। यह सेवा का उमंग अनेक बातों से किनारा कर एक बाप और सेवा में मगन बनाने के निमित्त बन जाता है। सहज, निर्विघ्न, निरन्तर सेवाधारी बनना अर्थात् सहज मायाजीत बनना। इसलिए, जो सेवा के प्लैन बना रहे हैं, वह खूब धूमधाम से आगे बढ़ाते चलो। बापदादा बच्चों को निमित्त बनाए स्वयं बैकबोन बन सहज सिद्धि प्राप्त करा रहे हैं। बाप के सहयोग के पात्र सहजयोगी आत्मायें स्वत: बनती हैं। जो कुछ समय पहले मुश्किल लगता था, वह अब सहज बन गया है और आगे और भी सहज बनता जायेगा। स्वयं सब वर्ग वाले ऑफर करेंगे। पहले आप उन्हों को सहयोगी बनाने की मेहनत करते, लेकिन अभी वह स्वयं सहयोगी बनने की ऑफर कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। तो समय प्रति समय सेवा की रूपरेखा बदल रही है और बदलती रहेगी। अभी आप लोगों को ज्यादा कहना नहीं पड़ेगा लेकिन वह स्वयं कहेंगे कि यह कार्य श्रेष्ठ है, इसीलिए हमें भी सहयोगी बनना ही चाहिए। समय समीप की यह निशानी है, तो सभी बच्चों को यादप्यार और रूह-रिहान के रेसपाण्ड में बाप भी रूह-रिहान कर रहे हैं और यादप्यार दे रहे हैं।
विदाई के समय (प्रात: 4 बजे सतगुरुवार के दिन)
सभी बच्चे सतगुरु की याद में रहने वाले सत् बच्चे हैं। इसलिए सतगुरु सभी वरदानी आत्माओं को सदा सन्तुष्टमणि का विशेष वरदान दे रहे हैं। सन्तुष्टता सेवा को सदा ही सहज सफलता में बदल देती है। कहने में सेवा आती है लेकिन अनुभूति सफलता की है। सेवा सिद्धि-रूप बन जाती है। इस वरदान से सभी यह अलौकिक अनुभव कर रहे हैं और करते रहेंगे। इसलिए सत् बाप, सत् शिक्षक, सत् गुरु का सभी बच्चों को यादप्यार और गुडमॉर्निंग। गुड कहो, गोल्डन कहो, डायमण्ड कहो – जो भी कहो लेकिन बापदादा की स्नेह सम्पन्न यादप्यार सदा बच्चों के साथ है।
ब्राह्मण जीवन – बाप से सर्व सम्बन्ध अनुभव करने की जीवन
ओम शांति।
संगमयुग — मिलन मनाने का युग।
यह वह दिव्य समय है जब आत्मा स्वयं परमपिता परमात्मा से प्रत्यक्ष मिलन का अनुभव करती है। यह अव्यक्त मिलन भविष्य स्वर्णिम युग में भी संभव नहीं। यह केवल अभी — इस संगम के क्षणों में ही उपलब्ध है।
1️⃣ संगमयुग — मिलन का विशेष समय
अव्यक्त मुरली – 18 जनवरी 1985
“संगमयुग मिलन मनाने का युग है।”
यह समय बाप और बच्चों के मिलन का वरदान है।
भक्ति में भक्त स्मरण करते हैं, लेकिन यहाँ आत्माएँ स्वयं स्मृति-स्वरूप बनती हैं।
उदाहरण
जैसे कोई भक्त मंदिर में जाकर भजन गाता है और कुछ समय के लिए आनंदित होता है।
लेकिन यहाँ आत्मा स्वयं परमात्म-स्नेह में लवलीन होकर प्रत्यक्ष अनुभव करती है — यह अल्पकालिक नहीं, बल्कि जीवन का आधार बन जाता है।
2️⃣ स्मृति-स्वरूप जीवन — हर क्षण नई अनुभूति
अव्यक्त मुरली – 02 अक्टूबर 1986
“जैसा समय, वैसा स्वरूप स्मृति में लाओ।”
ब्राह्मण जीवन का अर्थ है — समय और कर्म के अनुसार अपना श्रेष्ठ स्वरूप इमर्ज करना।
अमृतवेले का स्वरूप
✔ मास्टर वरदाता
✔ भाग्यविधाता से भाग्य लेने वाली आत्मा
✔ पद्मापद्म भाग्यवान
मुरली समय
✔ “मैं गॉडली स्टूडेन्ट हूँ”
✔ स्वयं भगवान मुझे पढ़ाने आए हैं
उदाहरण
यदि साधारण विद्यार्थी की तरह सुनेंगे तो साधारण अनुभव होगा।
लेकिन यदि स्मृति रहे — “भगवान स्वयं मुझे पढ़ा रहे हैं” — तो अलौकिक नशा अनुभव होगा।
3️⃣ बाप से सर्व सम्बन्ध अनुभव करना
अव्यक्त मुरली – 14 अप्रैल 1983
“भगवान से सर्व सम्बन्ध निभाओ।”
ब्राह्मण जीवन की पूर्णता “सर्व” शब्द में है।
बाप के साथ सम्बन्धों की वैरायटी
✔ पिता
✔ सखा
✔ जीवन-साथी
✔ मुरब्बी बच्चा
✔ सर्वशक्तिवान साथी
✔ माँ की गोद
उदाहरण
जब मन उदास हो — सखा रूप अनुभव करो।
जब थक जाओ — माँ की गोद में विश्राम करो।
जब आत्मबल कम लगे — मास्टर सर्वशक्तिवान बनो।
जहाँ “सर्व” है — वहाँ सम्पन्नता है।
यदि एक भी सम्बन्ध कम हुआ, तो आत्मा किसी और सहारे की ओर आकर्षित हो जाती है।
4️⃣ प्रभु-प्रवृत्ति — सबसे बड़ी व्यस्तता
अव्यक्त मुरली – 09 नवंबर 1984
“श्वांसो-श्वांस स्मृति-स्वरूप बनो।”
जैसे लौकिक प्रवृत्ति वाले कहते हैं — “हम बहुत व्यस्त हैं।”
वैसे ब्राह्मण आत्मा की प्रभु-प्रवृत्ति 24 घंटे चलती है।
✔ योगनिद्रा भी प्रभु-मिलन है
✔ सोते हुए भी मिलन सम्भव
✔ एक-एक सेकण्ड का हिसाब
उदाहरण
5000 वर्षों का हिसाब इस छोटे संगम जीवन में पूरा करना है।
इसलिए यह जीवन अत्यंत मूल्यवान है।
5️⃣ सेवा ही ब्राह्मण जीवन का स्वभाव
अव्यक्त मुरली – 05 मार्च 1987
“ब्राह्मण जीवन सेवा के लिए है।”
जो आत्मा सेवा के उमंग में रहती है, उसका अन्त भी सेवा का साधन बन जाता है।
उदाहरण
अहमदाबाद के हंसमुख भाई के देहत्याग के समय —
वातावरण शोक का नहीं, सेवा का बना।
ब्राह्मण जीवन रोने का नहीं — सेवा का है।
6️⃣ दिल में दिलाराम — राज्य अधिकारी जीवन
अव्यक्त मुरली – 21 फरवरी 1986 (देहली दरबार)
देहली की दो विशेषताएँ:
✔ दिलाराम की दिल
✔ गद्दी का स्थान
जिसके दिल में दिलाराम है — वही स्वराज्य अधिकारी है।
और वही भविष्य का विश्व-राज्य अधिकारी।
7️⃣ “सर्व के स्नेह, सहयोग से सुखमय संसार” — विशाल सेवा
अव्यक्त मुरली – 1986 सेवा सन्देश
हर वर्ग तक सन्देश पहुँचाना है —
✔ नेता
✔ वैज्ञानिक
✔ विद्यार्थी
✔ झुग्गी-झोपड़ी निवासी
✔ बीमार
✔ अनपढ़
कोई बहाना नहीं —
यदि बोल नहीं सकते, तो मन्सा सेवा करो।
सिद्धांत
“करावनहार करा रहा है”
मैं नहीं — वह करा रहा है।
8️⃣ सतगुरु का वरदान — सन्तुष्टमणि
अव्यक्त मुरली – प्रातः 4 बजे, सतगुरुवार
“सन्तुष्टता सेवा को सफलता में बदल देती है।”
सेवा करते हुए यदि सन्तुष्ट हो —
तो सेवा सिद्धि-रूप बन जाती है।
निष्कर्ष — ब्राह्मण जीवन की वास्तविक परिभाषा
ब्राह्मण जीवन है:
✔ सर्व सम्बन्ध अनुभव करने की जीवन
✔ स्मृति-स्वरूप रहने की जीवन
✔ सेवा और मौज की जीवन
✔ हर क्षण मिलन मनाने की जीवन
यह संगमयुग की गोल्डन ऑफर है।
न पहले थी, न आगे होगी।
तो इस अलौकिक मौज का अनुभव करो।
मज़े में रहो — मौज में रहो।
1. संगमयुग को “मिलन मनाने का युग” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि यही वह विशेष समय है जब आत्माएँ प्रत्यक्ष परमपिता परमात्मा से मिलन का अनुभव करती हैं। यह अलौकिक और अव्यक्त मिलन भविष्य के स्वर्णिम युग में भी संभव नहीं। इसलिए इस युग का नाम ही संगमयुग है — बाप और बच्चों के मिलन का पावन समय।
2. भक्ति में “सिमरण” और ज्ञान में “स्मृति-स्वरूप” बनने में क्या अंतर है?
उत्तर:
भक्ति में भक्त आत्माएँ स्मरण करती हैं, कीर्तन करती हैं और अल्पकाल के लिए लवलीन हो जाती हैं।
लेकिन ब्राह्मण आत्माएँ स्वयं स्मृति-स्वरूप बनती हैं — अर्थात् वे बाप के स्नेह और प्राप्तियों में सदा लवलीन रहती हैं।
भक्ति में अनुभव क्षणिक है, ज्ञान में अनुभव जीवन का स्वभाव बन जाता है।
3. “भिन्न-भिन्न स्मृति-स्वरूप” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जैसा समय और जैसा कर्म, वैसा अपना श्रेष्ठ स्वरूप स्मृति में लाना — यही भिन्न-भिन्न स्मृति-स्वरूप है।
-
अमृतवेले: मास्टर वरदाता, पद्मापद्म भाग्यवान
-
मुरली समय: गॉडली स्टूडेंट
-
सेवा समय: वरदानी आत्मा
-
समस्या के समय: मास्टर सर्वशक्तिवान
इस प्रकार हर समय नई अनुभूति का अनुभव करना।
4. मुरली सुनते समय “गॉडली स्टूडेंट” की स्मृति क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
यदि साधारण विद्यार्थी की तरह सुनेंगे तो साधारण अनुभव होगा।
लेकिन यदि यह स्मृति हो कि “स्वयं भगवान मुझे पढ़ाने आए हैं” — तो अलौकिक नशा और दिव्य अनुभूति होगी।
स्मृति से ही अनुभव की गहराई बढ़ती है।
5. बाप से “सर्व सम्बन्ध” निभाने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
परमात्मा को हर सम्बन्ध में अनुभव करना:
-
पिता
-
सखा
-
जीवन-साथी
-
बच्चा
-
माँ
-
सर्वशक्तिवान साथी
जब मन उदास हो — सखा रूप।
जब थकान हो — माँ की गोद।
जब कमजोरी हो — मास्टर सर्वशक्तिवान।
यही पूर्ण ब्राह्मण जीवन है।
6. यदि किसी एक सम्बन्ध की कमी रह जाए तो क्या होता है?
उत्तर:
यदि एक भी सम्बन्ध परमात्मा से कम हुआ, तो आत्मा किसी अन्य आत्मा में वह कमी पूरी करने का प्रयास करेगी।
इससे “सर्व” शब्द समाप्त होकर “यथाशक्ति” बन जाता है।
जहाँ “सर्व” है, वहीं सम्पन्नता है।
7. ब्राह्मण जीवन को “प्रभु-प्रवृत्ति” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि यह जीवन 24 घंटे प्रभु-प्रीत में व्यस्त रहता है।
यहाँ तक कि योग-निद्रा भी प्रभु-मिलन है।
भक्ति में भक्त गाते थे — “गिन-गिन के हिसाब लेंगे।”
अब इस छोटे-से जन्म में 5000 वर्ष का हिसाब पूरा करना है, इसलिए श्वांसो-श्वांस स्मृति आवश्यक है।
8. “नष्टोमोहा” स्थिति कैसे आती है?
उत्तर:
जब आत्मा हर समय स्मृति-स्वरूप और सर्व सम्बन्धों में व्यस्त रहती है, तो देह और देह के सम्बन्ध स्वतः ही आकर्षण खो देते हैं।
माया को आने की फुर्सत नहीं मिलती।
यही लास्ट पेपर में पास विद ऑनर बनाता है।
9. ब्राह्मण जीवन की “वैराइटी” क्या है?
उत्तर:
दुनिया में लोग हर सम्बन्ध चाहते हैं।
लेकिन ब्राह्मण जीवन में एक ही परमात्मा से सर्व सम्बन्ध अनुभव होते हैं।
यही सम्पूर्ण और सम्पन्न जीवन है।
10. “गोल्डन ऑफर” क्या है?
उत्तर:
परमात्मा स्वयं सर्व सम्बन्ध निभाने की ऑफर दे रहे हैं।
ऐसी ऑफर न पहले कभी थी, न आगे होगी।
भगवान स्वयं बाप भी बने और बच्चा भी — यह उनकी ही महिमा है।
11. ब्राह्मण जीवन का मूल उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
मौज और मज़े में रहना।
स्मृति-स्वरूप बनकर हर क्षण अलौकिक अनुभव करना।
जीवन को बोझ नहीं, वरदान समझना।
12. सेवा और ब्राह्मण जीवन का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
ब्राह्मण जीवन सेवा के लिए है।
जिस आत्मा में सेवा का उमंग होता है, उसका अन्त भी सेवा का साधन बन जाता है।
जीवन भी सेवा, अन्त भी सेवा — यही ब्राह्मण की विशेषता है।
13. “दिल में दिलाराम” रखने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
दिल को परमात्मा का सिंहासन बनाना।
जब दिल में दिलाराम है, तो आत्मा स्वराज्य अधिकारी है।
और वही भविष्य का विश्व-राज्य अधिकारी बनेगा।
14. “सर्व के स्नेह, सहयोग से सुखमय संसार” कैसे बनेगा?
उत्तर:
जब हर वर्ग — नेता से लेकर झुग्गी-झोपड़ी तक — सभी को सन्देश पहुँचे।
कोई भी आत्मा यह न कहे कि हमें सन्देश नहीं मिला।
बोल नहीं सकते तो मन्सा सेवा करें।
10-10 मिनट भी सेवा करें — यही सहयोग है।
15. सफलता का रहस्य क्या है?
उत्तर:
“मैं कर रहा हूँ” नहीं —
“करावनहार करा रहा है” — यह भावना।
सन्तुष्टता सेवा को सफलता में बदल देती है।
सेवा सिद्धि-रूप बन जाती है।
डिस्क्लेमर
यह प्रस्तुति प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त मुरली शिक्षाओं एवं आध्यात्मिक अध्ययन पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, परम्परा या व्यक्तिगत मान्यताओं का खंडन करना नहीं है। यह वीडियो केवल आत्म-अनुभूति, ईश्वरीय सम्बन्ध और आध्यात्मिक जीवन की गहराई को स्पष्ट करने हेतु है। दर्शक इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ग्रहण करें।

