AV-09/09-10-1987-अलौकिक राज्य दरबार का समाचार
“अलौकिक राज्य दरबार का समाचार”
आज बापदादा अपने स्व-राज्य अधिकारी बच्चों की राज्य दरबार देख रहे हैं। यह संगमयुग की निराली, श्रेष्ठ शान वाली अलौकिक दरबार सारे कल्प में न्यारी और अति प्यारी है। इस राज्य-सभा की रूहानी रौनक, रूहानी कमल-आसन, रूहानी ताज और तिलक, चेहरे की चमक, स्थिति के श्रेष्ठ स्मृति के वायुमण्डल में अलौकिक खुशबू अति रमणीक, अति आकर्षित करने वाली है। ऐसी सभा को देख बापदादा हर एक राज्य-अधिकारी आत्मा को देख हर्षित हो रहे हैं। कितनी बड़ी दरबार है! हर एक ब्राह्मण बच्चा स्वराज्य-अधिकारी है। तो कितने ब्राह्मण बच्चे हैं! सभी ब्राह्मणों की दरबार इकट्ठी करो तो कितनी बड़ी राज्य-दरबार हो जायेगी! इतनी बड़ी राज्य दरबार किसी भी युग में नहीं होती। यही संगमयुग की विशेषता है जो ऊंचे ते ऊंचे बाप के सर्व बच्चे स्वराज्य-अधिकारी बनते हैं। वैसे लौकिक परिवार में हर एक बाप बच्चों को कहते हैं कि यह मेरा बच्चा ‘राजा’ बेटा है वा इच्छा रखते हैं कि मेरा हर एक बच्चा ‘राजा’ बने। लेकिन सभी बच्चे राजा बन ही नहीं सकते। यह कहावत परमात्म बाप की कॉपी की है। इस समय बापदादा के सब बच्चे राजयोगी अर्थात् स्व के राजे नम्बरवार जरूर हैं लेकिन हैं सभी राज-योगी, प्रजा योगी कोई नहीं है। तो बापदादा बेहद की राज्यसभा देख रहे थे। सभी अपने को स्वराज्य अधिकारी समझते हो ना? नये-नये आये हुए बच्चे राज्य-अधिकारी हो वा अभी बनना है? नये-नये हैं तो मिलना-जुलना सीख रहे हैं। अव्यक्त बाप की अव्यक्ति बातें समझने की भी आदत पड़ती जायेगी। फिर भी इस भाग्य को अभी से भी समय पर ज्यादा समझेंगे कि हम सभी आत्मायें कितनी भाग्यवान हैं!
तो बापदादा सुना रहे थे – अलौकिक राज्य दरबार का समाचार। सभी बच्चों के विशेष ताज और चेहरे की चमक के ऊपर न चाहते भी अटेन्शन जा रहा था। ताज ब्राह्मण जीवन की विशेषता – ‘पवित्रता’ का ही सूचक है। चेहरे की चमक रूहानी स्थिति में स्थित रहने की रूहानियत की चमक है। साधारण रीति से भी किसी भी व्यक्ति को देखेंगे तो सबसे पहले दृष्टि चेहरे तरफ ही जायेगी। यह चेहरा ही वृत्ति और स्थिति का दर्पण है। तो बापदादा देख रहे थे – चमक तो सभी में थी लेकिन एक थे सदा रूहानियत की स्थिति में स्थित रहने वाले, स्वत: और सहज स्थिति वाले और दूसरे थे सदा रूहानी स्थिति के अभ्यास द्वारा स्थित रहने वाले। एक थे सहज स्थिति वाले, दूसरे थे प्रयत्न कर स्थित रहने वाले अर्थात् एक थे सहज योगी, दूसरे थे पुरूषार्थ से योगी। दोनों की चमक में अन्तर रहा। उनकी नेचुरल ब्युटी थी और दूसरों की पुरूषार्थ द्वारा ब्युटी थी। जैसे आजकल भी मेकप कर ब्युटीफुल बनते हैं ना। नेचुरल (स्वाभाविक) ब्युटी की चमक सदा एकरस रहती है और दूसरी ब्युटी कभी बहुत अच्छी और कभी परसेन्टेज में रहती है; एक जैसी, एकरस नहीं रहती। तो सदा सहज योगी, स्वत: योगी स्थिति नम्बरवन स्वराज्य-अधिकारी बनाती है। जब सभी बच्चों का वायदा है – ब्राह्मण जीवन अर्थात् एक बाप ही संसार है वा एक बाप दूसरा न कोई; जब संसार ही बाप है, दूसरा कोई है ही नहीं तो स्वत: और सहज योगी स्थिति सदा रहेगी ना, वा मेहनत करनी पड़ेगी? अगर दूसरा कोई है तो मेहनत करनी पड़ती है – यहाँ बुद्धि न जाए, वहाँ जाए। लेकिन एक बाप ही सब कुछ है फिर बुद्धि कहाँ जायेगी? जब जा ही नहीं सकती तो अभ्यास क्या करेंगे? अभ्यास में भी अन्तर होता है। एक है स्वत: अभ्यास, है ही है और दूसरा होता है मेहनत वाला अभ्यास। तो स्वराज्य-अधिकारी बच्चों का सहज अभ्यासी बनना – यही निशानी है सहज योगी, स्वत: योगी की। उन्हों के चेहरे की चमक अलौकिक होती है जो चेहरा देखते ही अन्य आत्मायें अनुभव करती कि यह श्रेष्ठ प्राप्ति-स्वरूप सहजयोगी हैं। जैसे स्थूल धन वा स्थूल पद के प्राप्ति की चमक चेहरे से मालूम होती है कि यह साहूकार कुल का वा ऊंच पद अधिकारी है, ऐसे यह श्रेष्ठ प्राप्ति, श्रेष्ठ राज्य अधिकार अर्थात् श्रेष्ठ पद की प्राप्ति का नशा वा चमक चेहरे से दिखाई देती है। दूर से ही अनुभव करते कि इन्होंने कुछ पाया है। प्राप्ति स्वरूप आत्मायें हैं। ऐसे ही सभी राज्य अधिकारी बच्चों के चमकते हुए चेहरे दिखाई दें। मेहनत के चिन्ह नहीं दिखाई दें, प्राप्ति के चिन्ह दिखाई दें। अभी भी देखो, कोई-कोई बच्चों के चेहरे को देख यही कहते हैं – इन्होंने कुछ पाया है और कोई-कोई बच्चों के चेहरे को देख यह भी कहते कि ऊंची मंजिल है लेकिन त्याग भी बहुत ऊंचा किया है। त्याग दिखाई देता है, भाग्य नहीं दिखाई देगा चेहरे से। या यह कहेंगे कि मेहनत बहुत अच्छी कर रहे हैं।
बापदादा यही देखने चाहते हैं कि हर एक बच्चे के चेहरे से सहजयोगी की चमक दिखाई दे, श्रेष्ठ प्राप्ति के नशे की चमक दिखाई दे क्योंकि प्राप्तियों के भण्डार बाप के बच्चे हो। संगमयुग के प्राप्तियों के वरदानी समय के अधिकारी हो। निरन्तर योग कैसे लगावें वा निरन्तर अनुभव कर भण्डार की अनुभूति कैसे करें – अब तक भी इसी मेहनत में ही समय नहीं गँवाओ लेकिन प्राप्तिस्वरूप के भाग्य को सहज अनुभव करो। समाप्ति का समय समीप आ रहा है। अब तक किसी न किसी बात की मेहनत में लगे रहेंगे तो प्राप्ति का समय तो समाप्त हो जायेगा। फिर प्राप्तिस्वरूप का अनुभव कब करेंगे? संगमयुग को, ब्राह्मण आत्माओं को वरदान है “सर्व प्राप्ति भव”। ‘सदा पुरूषार्थी भव’ का वरदान नहीं है, ‘प्राप्ति भव’ का वरदान है। ‘प्राप्ति भव’ की वरदानी आत्मा कभी भी अलबेलेपन में आ नहीं सकती। इसलिए उनको मेहनत नहीं करनी पड़ती। तो समझा, क्या बनना है?
राज्यसभा में राज्य अधिकारी बनने की विशेषता क्या है, यह स्पष्ट हुआ ना? राज्य अधिकारी हो ना, वा अभी सोच रहे हो कि हैं वा नहीं हैं? जब विधाता के बच्चे, वरदाता के बच्चे बन गये; राजा अर्थात् विधाता, देने वाला। अप्राप्ति कुछ नहीं तो लेंगे क्या? तो समझा, नये-नये बच्चों को इस अनुभव में रहना है। युद्ध में ही समय नहीं गँवाना है। अगर युद्ध में ही समय गँवाया तो अन्त-मति भी युद्ध में रहेंगे। फिर क्या बनना पड़ेगा? चन्द्रवंश में जायेंगे वा सूर्यवंशी में? युद्ध वाला तो चन्द्रवंश में जायेगा। चल रहे हैं, कर रहे हैं, हो ही जायेंगे, पहुँच जायेंगे – अभी तक ऐसा लक्ष्य नहीं रखो। अब नहीं तो कब नहीं। बनना है तो अब, पाना है तो अब – ऐसे उमंग-उत्साह वाले ही समय पर अपनी सम्पूर्ण मंजिल को पा सकेंगे। त्रेता में राम सीता बनने के लिए तो कोई भी तैयार नहीं है। जब सतयुग सूर्यवंश में आना है, तो सूर्यवंश अर्थात् सदा मास्टर विधाता और वरदाता, लेने की इच्छा वाला नहीं। मदद मिल जाए, यह हो जाए तो बहुत अच्छा, पुरूषार्थ में अच्छा नम्बर ले लेंगे – नहीं। मदद मिल रही है, सब हो रहा है – इसको कहते हैं स्वराज्य अधिकारी बच्चे। आगे बढ़ना है या पीछे आये है तो पीछे ही रहना है? आगे जाने का सहज रास्ता है – सहजयोगी, स्वत:योगी बनो। बहुत सहज है। जब है ही एक बाप, दूसरा कोई नहीं तो जायेंगे कहाँ? प्राप्ति ही प्राप्ति है फिर मेहनत क्यों लगेगी? तो प्राप्ति के समय का लाभ उठाओ। सर्व प्राप्ति स्वरूप बनो। समझा? बापदादा तो यही चाहते हैं कि एक-एक बच्चा, चाहे लास्ट आने वाला, चाहे स्थापना के आदि में आने वाला, हर एक बच्चा नम्बरवन बने। राजा बनना, न कि प्रजा। अच्छा।
महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का ग्रुप आया है। देखो, महा शब्द कितना अच्छा है। महाराष्ट्र स्थान भी महा शब्द का है और बनना भी महान् है। महान् तो बन गये ना क्योंकि बाप के बने माना महान् बने। महान् आत्मायें हो। ब्राह्मण अर्थात् महान्। हर कर्म महान्, हर बोल महान्, हर संकल्प महान् है। अलौकिक हो गये ना। तो महाराष्ट्र वाले सदा ही स्मृति स्वरूप बनो कि महान् हैं। ब्राह्मण अर्थात् महान् चोटी हैं ना।
मध्य प्रदेश – सदा ‘मध्याजी भव’ के नशे में रहने वाले। ‘मन्मनाभव’ के साथ ‘मध्याजी भव’ का भी वरदान है। तो अपना स्वर्ग का स्वरूप इसको कहते हैं ‘मध्याजी भव’ तो अपने श्रेष्ठ प्राप्ति के नशे में रहने वाले अर्थात् ‘मध्याजी भव’ के मन्त्र के स्वरूप में स्थित रहने वाले। वह भी महान् हो गये। ‘मध्याजी भव’ हैं तो ‘मन्मनाभव’ भी जरूर होंगे। तो मध्य प्रदेश अर्थात् महामन्त्र का स्वरूप बनने वाले। तो दोनों ही अपनी-अपनी विशेषता से महान् हैं। समझा, कौन हो?
जब से पहला पाठ शुरू किया, वह भी यही किया कि मैं कौन? बाप भी वही बात याद दिलाते हैं। इसी पर मनन करना। शब्द एक ही है कि ‘मैं कौन’ लेकिन इसके उत्तर कितने हैं? लिस्ट निकालना – ‘मैं कौन?’ अच्छा।
चारों ओर के सर्व प्राप्तिस्वरूप, श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व अलौकिक राज्य सभा अधिकारी महान् आत्माओं को, सदा रूहानियत की चमक धारण करने वाली विशेष आत्माओं को, सदा स्वत: योगी, सहजयोगी, ऊंचे ते ऊंची आत्माओं को ऊंचे ते ऊंचे बापदादा का स्नेह सम्पन्न यादप्यार स्वीकार हो।
अलौकिक राज्य दरबार का समाचार
1️⃣ संगमयुग की निराली राज्य सभा
आज बापदादा अपने स्व‑राज्य अधिकारी बच्चों की दिव्य राज्य दरबार देख रहे हैं।
यह कोई साधारण सभा नहीं — यह संगमयुग की अलौकिक, श्रेष्ठ और अद्वितीय सभा है, जो पूरे कल्प में न्यारी और अति प्यारी है।
इस सभा की विशेषताएँ:
- रूहानी रौनक
- कमल समान स्थिरता
- ताज और तिलक की दिव्यता
- चेहरे की आत्मिक चमक
- श्रेष्ठ स्मृति का सुगंधित वायुमण्डल
✨ उदाहरण: जैसे किसी राजमहल में राजसी गरिमा होती है, वैसे ही यहाँ आत्मिक राजसी शान अनुभव होती है।
हर ब्राह्मण आत्मा स्वराज्य अधिकारी है — यही इस सभा की महानता है।
2️⃣ स्वराज्य अधिकारी — सभी राजयोगी
लौकिक संसार में हर पिता चाहता है कि उसका बच्चा राजा बने, पर सब राजा नहीं बनते।
लेकिन परमात्म पिता की इस दिव्य सभा में:
- सभी बच्चे राजयोगी हैं
- सभी स्व के राजा हैं
- कोई भी प्रजा नहीं है
संदेश: यह संगमयुग की सबसे बड़ी विशेषता है — सबको स्वराज्य का अधिकार।
3️⃣ ताज और चेहरे की रूहानी चमक
बापदादा का विशेष ध्यान दो बातों पर गया:
ताज क्या दर्शाता है?
ब्राह्मण जीवन की विशेषता — पवित्रता
चेहरे की चमक क्या दर्शाती है?
रूहानी स्थिति में स्थित रहने की आत्मिक आभा
चेहरा ही स्थिति और वृत्ति का दर्पण है।
4️⃣ सहजयोगी बनाम पुरुषार्थी योगी
बापदादा ने दो प्रकार की आत्माएँ देखीं:
सहजयोगी (स्वतः योगी)
- नेचुरल स्थिति
- बिना प्रयास स्थिर योग
- निरंतर एकरस चमक
🔄 पुरुषार्थी योगी
- प्रयास से योग
- कभी स्थिर, कभी अस्थिर
- चमक में अंतर
उदाहरण: जैसे प्राकृतिक सुंदरता और कृत्रिम मेकअप में अंतर स्पष्ट दिखता है।
सहजयोगी आत्माओं की रूहानी चमक स्वतः आकर्षित करती है।
5️⃣ प्राप्ति स्वरूप बनो, मेहनत स्वरूप नहीं
बापदादा चाहते हैं कि बच्चों के चेहरे से:
- त्याग नहीं
- संघर्ष नहीं
- मेहनत के चिन्ह नहीं
बल्कि
- प्राप्ति का नशा
- भाग्य की चमक
- सहजयोग की आभा दिखाई दे।
उदाहरण: जैसे धनवान व्यक्ति की सम्पन्नता उसके व्यक्तित्व से झलकती है।
6️⃣ “सर्व प्राप्ति भव” — संगमयुग का वरदान
यह समय केवल पुरुषार्थ का नहीं — प्राप्ति का समय है।
- निरंतर संघर्ष में समय न गंवाएँ
- प्राप्तियों का अनुभव करें
- भाग्य को जीएँ
अगर अभी भी युद्ध में ही उलझे रहे तो:
- अन्तिम समय भी संघर्ष में बीतेगा
- श्रेष्ठ मंजिल छूट सकती है
संदेश: पाना है तो अभी पाओ। बनना है तो अभी बनो।
7️⃣ राज्य अधिकारी की पहचान
स्वराज्य अधिकारी आत्मा:
- लेने की इच्छा नहीं रखती
- मदद की प्रतीक्षा नहीं करती
- स्वयं सम्पन्न रहती है
- आगे बढ़ने का साहस रखती है
संदेश: राजा बनो — प्रजा नहीं।
8️⃣ सहज मार्ग — एक बाप, दूसरा न कोई
जब संकल्प पक्का है:
एक बाप ही संसार है
तो:
- बुद्धि भटकेगी नहीं
- योग सहज होगा
- स्थिति स्थिर होगी
उदाहरण: एक लक्ष्य हो तो यात्रा सरल हो जाती है।
9️⃣ विशेष सेवाभूमियों का सम्मान
🟣 महाराष्ट्र — महानता की भूमि
- ‘महा’ बनने की स्मृति
- हर कर्म महान
- ब्राह्मण = महान आत्मा
मध्य प्रदेश — “मध्याजी भव” की भूमि
- श्रेष्ठ प्राप्ति का नशा
- महामंत्र स्वरूप जीवन
- मन्मनाभव की स्थिति
संदेश: अपनी भूमि की विशेषता को जीवन में उतारो।
🔟 आत्मचिंतन का मूल प्रश्न — “मैं कौन?”
आध्यात्मिक जीवन का पहला और अंतिम पाठ:
मैं कौन?
इस एक प्रश्न के अनेकों उत्तर हैं:
- मैं आत्मा
- मैं ब्राह्मण
- मैं स्वराज्य अधिकारी
- मैं राजयोगी
- मैं प्राप्ति स्वरूप
- मैं भाग्यवान
अभ्यास: प्रतिदिन “मैं कौन?” का मनन करें।
मुरली नोट्स (Murli Notes)
तिथि: 05 जनवरी 1986 (अव्यक्त बापदादा मुरली संदर्भित)
- संगमयुग की राज्य सभा अलौकिक और अद्वितीय है
- सभी ब्राह्मण आत्माएँ स्वराज्य अधिकारी हैं
- पवित्रता ब्राह्मण जीवन का ताज है
- रूहानियत चेहरे की चमक से प्रकट होती है
- सहजयोगी स्थिति नम्बरवन बनाती है
- पुरुषार्थ से अधिक प्राप्ति का अनुभव आवश्यक है
- संगमयुग का वरदान: “सर्व प्राप्ति भव”
- प्राप्ति स्वरूप बनो, संघर्ष स्वरूप नहीं
- राजा बनो, प्रजा नहीं
- एक बाप की स्मृति योग को सहज बनाती है
समापन संदेश
सदा स्वयं को स्वराज्य अधिकारी समझो। सहजयोगी बनो। प्राप्ति स्वरूप बनो। भाग्य की चमक से जीवन को प्रकाशित करो।
बापदादा का स्नेह सम्पन्न यादप्यार।
प्रश्न 1: संगमयुग की यह राज्य सभा साधारण सभा से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
यह कोई साधारण सभा नहीं है, बल्कि संगमयुग की अलौकिक, श्रेष्ठ और अद्वितीय राज्य सभा है। पूरे कल्प में यह समय न्यारा और अत्यंत प्यारा है। यहाँ रूहानी रौनक, कमल समान स्थिरता, ताज-तिलक की दिव्यता, चेहरे की आत्मिक चमक और श्रेष्ठ स्मृति का सुगंधित वायुमंडल अनुभव होता है।
जैसे राजमहल में राजसी गरिमा होती है, वैसे ही यहाँ आत्मिक राजसी शान होती है।
प्रश्न 2: इस दिव्य दरबार की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर:
इस दरबार की महानता यह है कि हर ब्राह्मण आत्मा स्वराज्य अधिकारी है। यहाँ कोई साधारण नहीं — सभी आत्माएँ आत्मिक राजसी स्थिति में विराजमान हैं।
प्रश्न 3: परमात्म पिता की सभा लौकिक दुनिया से कैसे अलग है?
उत्तर:
लौकिक संसार में हर पिता चाहता है कि उसका बच्चा राजा बने, पर सब राजा नहीं बनते।
लेकिन इस दिव्य सभा में:
-
सभी बच्चे राजयोगी हैं
-
सभी स्व के राजा हैं
-
कोई भी प्रजा नहीं है
यही संगमयुग की सबसे बड़ी विशेषता है — सबको स्वराज्य का अधिकार।
प्रश्न 4: बापदादा का विशेष ध्यान किन दो बातों पर गया?
उत्तर:
(1) ताज: ब्राह्मण जीवन की पवित्रता का प्रतीक
(2) चेहरे की चमक: रूहानी स्थिति में स्थित रहने की आत्मिक आभा
चेहरा ही आत्मा की स्थिति और वृत्ति का दर्पण है।
प्रश्न 5: सहजयोगी और पुरुषार्थी योगी में क्या अंतर है?
उत्तर:
सहजयोगी आत्माएँ:
-
स्वाभाविक योग स्थिति
-
बिना प्रयास स्थिरता
-
निरंतर एकरस चमक
-
नेचुरल आध्यात्मिक आकर्षण
पुरुषार्थी योगी:
-
प्रयास से योग
-
कभी स्थिर, कभी अस्थिर
-
स्थिति में उतार-चढ़ाव
-
चमक में अंतर
जैसे प्राकृतिक सुंदरता और कृत्रिम मेकअप में स्पष्ट अंतर होता है।
प्रश्न 6: बापदादा बच्चों में कैसी अवस्था देखना चाहते हैं?
उत्तर:
बच्चों के चेहरे पर त्याग, संघर्ष या मेहनत के चिन्ह नहीं — बल्कि:
-
प्राप्ति का नशा
-
भाग्य की चमक
-
सहजयोग की आभा
जैसे धनवान व्यक्ति की सम्पन्नता उसके व्यक्तित्व से स्वतः झलकती है।
प्रश्न 7: “सर्व प्राप्ति भव” वरदान का क्या अर्थ है?
उत्तर:
यह समय केवल पुरुषार्थ का नहीं, बल्कि प्राप्ति का समय है।
-
निरंतर संघर्ष में समय न गँवाएँ
-
ईश्वरीय प्राप्तियों का अनुभव करें
-
अपने श्रेष्ठ भाग्य को जीएँ
यदि अभी भी संघर्ष में उलझे रहे, तो अंतिम समय भी उसी में बीतेगा और श्रेष्ठ मंज़िल छूट सकती है।
प्रश्न 8: स्वराज्य अधिकारी आत्मा की पहचान क्या है?
उत्तर:
स्वराज्य अधिकारी आत्मा:
-
लेने की इच्छा नहीं रखती
-
मदद की प्रतीक्षा नहीं करती
-
स्वयं सम्पन्न रहती है
-
आगे बढ़ने का साहस रखती है
संदेश: राजा बनो — प्रजा नहीं।
प्रश्न 9: सहज मार्ग क्या है जिससे योग सरल हो जाता है?
उत्तर:
जब संकल्प पक्का हो कि “एक बाप ही मेरा संसार है”, तब:
-
बुद्धि भटकती नहीं
-
योग सहज हो जाता है
-
स्थिति स्थिर रहती है
एक लक्ष्य होने से यात्रा सरल हो जाती है।
प्रश्न 10: विशेष सेवाभूमियों का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
उत्तर:
महाराष्ट्र — महानता की भूमि
-
‘महा’ बनने की स्मृति
-
हर कर्म महान
-
ब्राह्मण = महान आत्मा
मध्य प्रदेश — मध्याजी भव की भूमि
-
श्रेष्ठ प्राप्ति का नशा
-
महामंत्र स्वरूप जीवन
-
मन्मनाभव की स्थिति
संदेश: अपनी भूमि की विशेषता को जीवन में उतारें।
प्रश्न 11: आत्मचिंतन का मूल प्रश्न क्या है?
उत्तर:
आध्यात्मिक जीवन का पहला और अंतिम पाठ है — “मैं कौन?”
इसके गहरे उत्तर:
-
मैं आत्मा
-
मैं ब्राह्मण
-
मैं स्वराज्य अधिकारी
-
मैं राजयोगी
-
मैं प्राप्ति स्वरूप
-
मैं भाग्यवान
प्रतिदिन इस चिंतन का अभ्यास आत्मिक स्थिति को मजबूत करता है।
Disclaimer
यह आध्यात्मिक सामग्री ब्रह्माकुमारीज की मुरली शिक्षाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, सकारात्मक जीवन मूल्यों और राजयोग साधना के अनुभव को साझा करना है। दर्शक अपने विवेकानुसार आध्यात्मिक बिंदुओं को ग्रहण करें।
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