(29)The best disciple in the world. The best disciple. Modeled after Brahma Baba and emulated by Mama Saraswati

S-B:-(29)विश्व की सर्वश्रेष्ठ शिष्या। सर्वश्रेष्ठ शिष्य। ब्रह्मा बाबा के आदर्श और मम्मा सरस्वती का अनुकरण।

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ब्रह्मा बाबा, शिव बाबा और मम्मा — विश्व की सर्वश्रेष्ठ शिष्या।
सर्वश्रेष्ठ शिष्य।
ब्रह्मा बाबा के आदर्श और मम्मा सरस्वती का अनुकरण।

मम्मा सरस्वती ने पूरी तरह अनुकरण किया।
आदर्श अनुयाई — Ideal Follower Relationship।
मम्मा एक आदर्श अनुयाई थी ब्रह्मा बाबा की।

आदर्श कौन? और अनुयाई कौन?
हर युग में आदर्श होते हैं और उनको अपनाने वाले अनुयाई भी होते हैं।
लेकिन संगम युग पर इस आदर्श–अनुयाई संबंध का सर्वोच्च रूप दिखता है।

ब्रह्मा बाबा आदर्श पिता, और मम्मा सरस्वती अनुयाई पुत्री के रूप में।


अव्यक्त मुरली 18 जनवरी 1970

“ब्रह्मा ने हर रीति आदर्श दिखाया।”
बाबा कहते हैं —
ब्रह्मा ने हर रीति आदर्श दिखाया और
सरस्वती ने हर रीति में उसका अनुसरण किया।


ब्रह्मा बाबा आदर्श पिता — मर्यादाओं का मूर्त स्वरूप

ब्रह्मा बाबा का जीवन केवल शब्द नहीं,
बल्कि व्यवहार में उतरा हुआ ज्ञान था।

उनका आदर्श इन रूपों में दिखाई देता है:

  1. पूर्ण पवित्रता

  2. मर्यादा पुरुषोत्तम जीवन

  3. अधिक आज्ञाकारिता

  4. नम्रता

  5. संगठित पालन

  6. हर परिस्थिति में स्थिर बुद्धि

बाबा की आज्ञा पर चलना है — बिल्कुल उससे जरा भी हिल नहीं सकते।
पूरे संगठन का पालन करना।
और हर परिस्थिति में स्थिर बुद्धि रहना।


साकार मुरली 3 मार्च 1968

“ब्रह्मा ने जैसा किया, वही बच्ची के लिए राइट पाथ बना।”

जो ब्रह्मा बाबा ने किया, वही मम्मा के लिए रास्ता था।
उसी रास्ते पर चलना था।
कुछ भी सोचना नहीं, बुद्धि चलानी नहीं —
बस जो बाबा कर रहे हैं, मुझे वही और वैसे करना है।

जब यज्ञ पर कठिनाइयाँ आईं, वे कहते —
“डरना नहीं, बाप साथ है।”

उनका व्यवहार ही पाठ था।
उनका जीवन ही मुरली थी।
क्योंकि वे पूरी तरह बाबा की श्रीमत पर चल रहे थे।
इसीलिए कहा — “ब्रह्मा बाबा के कदमों पर कदम रखकर चलो।”
मम्मा भी ऐसे ही चली।


मम्मा सरस्वती — आदर्शों का प्रथम अनुपालन

मम्मा ने ब्रह्मा बाबा के सभी आदर्श सबसे पहले अपनाए।
वे केवल पहली विद्यार्थी नहीं —
वे पहली अनुयाई थीं।
पूरी तरह जीवन में धारण करने वाली, अनुसरण करने वाली।

इसीलिए उन्होंने सेकंड नंबर प्राप्त किया —
बाबा के बाद दूसरा स्थान।


साकार मुरली 25 मई 1969

“सरस्वती पहली शिष्य है जो बाप-दादा की रीति नीति को पहले अपनाती है।”


मम्मा की विशेषताएँ

  • गहरी ब्रह्मचर्य

  • अटल निश्चय

  • परम मर्यादा

  • तीव्र स्मृति

  • अद्भुत सेवा भाव

  • शांत और संयमी वाणी


ब्रह्मचर्य में आदर्श — मम्मा का सर्वोच्च जीवन

मम्मा ने ब्रह्मचर्य को इतना गहराई से अपनाया
कि वे ब्रह्मा बाबा की परम योगिनी कहलाईं।


साकार मुरली 12 अप्रैल 1968

“सरस्वती ब्रह्मचर्य में बड़ी तीव्र है।
वे सदा मर्यादा में रहती है।”


मम्मा की दृष्टि में केवल आत्मा

मम्मा की दृष्टि में शरीर नहीं — केवल आत्मा दिखाई देती थी।
ना देह, ना देह का आकर्षण।
उनकी निगाह की शुद्धता आज भी भाई-बहनों को दिव्य अनुभूति देती है।


निश्चय — मम्मा का अटल विश्वास

जिस प्रकार ब्रह्मा बाबा निश्चयमूर्ति थे,
वैसे ही मम्मा भी “बाप है तो सब कुछ है”
इस निश्चय में स्थित रही।


साकार मुरली 10 जून 1969

“सरस्वती का निश्चय अचल व अविनाशी है।”

समाज ने विरोध किया, आलोचना की,
पर मम्मा कहती —
“यह ईश्वर का कार्य है। इसमें हिचक नहीं।”
उनकी अटल बुद्धि सबके लिए शक्ति बनी।


मर्यादा मूर्ति मम्मा

मम्मा को मर्यादा मूर्ति सरस्वती कहा गया।
उनकी हर वाणी, हर दृष्टि, हर कदम —
एक आदर्श प्रतिध्वनि थी।


अव्यक्त मुरली 4 मार्च 1970

“सरस्वती मर्यादाओं में सर्वोत्तम है। उसकी हर रीति मर्यादा पुरुषोत्तम को दिखाती है।”

मम्मा कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहती थीं।
उनकी सादगी, ममता और निष्ठा —
ईश्वरीय मर्यादाओं की मिसाल बन गई।


विश्व की सर्वश्रेष्ठ शिष्या क्यों?

क्योंकि उन्होंने पहली मुरली पहले अपनाई।
बाबा के हर आदर्श को व्यवहार में उतारा।
ब्रह्मा की रीति को मॉडल बनाया।
और ज्ञान की देवी बनकर सिखाया।

पहली मुरली — “मैं आत्मा हूँ।”
मम्मा सबको आत्मा रूप में देखती थीं —
यह पहली मुरली का पूर्ण पालन था।


21 जुलाई 1968 की मुरली

“सरस्वती प्रथम श्रेष्ठ और सर्वोत्तम शिष्य है।”

मम्मा किसी को उपदेश नहीं देती थीं —
वे जीवन से शिक्षा देती थीं।
उनका जीवन ही पाठशाला था।

वे कभी लेट नहीं होती थीं —
हमेशा बिफोर टाइम उपस्थित।


मम्मा का जीवन — एक जीवित मुरली

जैसे ब्रह्मा बाबा का व्यवहार ही ज्ञान था,
मम्मा भी बच्चों के लिए एक जीवित मुरली थीं।