(40) 19-12-1985 “Follow Father”

अव्यक्त मुरली-(40)19-12-1985 “फॉलो फादर”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

19-12-1985 “फॉलो फादर”

आज सर्व स्नेही बच्चों के स्नेह का रेसपाण्ड करने के लिए बापदादा मिलन मनाने के लिए आये हैं। विदेही बापदादा को देह का आधार लेना पड़ता है। किसलिए? बच्चों को भी विदेही बनाने के लिए। जैसे बाप विदेही, देह में आते हुए भी विदेही स्वरूप में, विदेहीपन का अनुभव कराते हैं। ऐसे आप सभी जीवन में रहते, देह में रहते विदेही आत्मा-स्थिति में स्थित हो इस देह द्वारा करावनहार बन करके कर्म कराओ। यह देह करनहार है। आप देही करावनहार हो। इसी स्थिति को “विदेही स्थिति” कहते हैं। इसी को ही फॉलो फादर कहा जाता है। सदा फॉलो फादर करने के लिए अपनी बुद्धि को दो स्थितियों में स्थित रखो। बाप को फॉलो करने की स्थिति है – सदा अशरीरी भव, विदेही भव, निराकारी भव! दादा अर्थात् ब्रह्मा बाप को फॉलो करने के लिए सदा अव्यक्त स्थिति भव, फरिश्ता स्वरूप भव, आकारी स्थिति भव। इन दोनों स्थिति में स्थित रहना फॉलो फादर करना है। इससे नीचे व्यक्त भाव, देह भान, व्यक्ति भाव, इसमें नीचे नहीं आओ। व्यक्ति भाव वा व्यक्त भाव नीचे ले आने का आधार है। इसलिए सबसे परे इन दो स्थितियों में सदा रहो। तीसरी के लिए ब्राह्मण जन्म होते ही बापदादा की शिक्षा मिली हुई है कि इस गिरावट की स्थिति में संकल्प से वा स्वप्न में भी नहीं जाना, यह पराई स्थिति है। जैसे अगर कोई बिना आज्ञा के परदेश चला जाए तो क्या होगा? बापदादा ने भी यह आज्ञा की लकीर खींच दी है, इससे बाहर नहीं जाना है। अगर अवज्ञा करते हैं तो परेशान भी होते हैं, पश्चाताप भी करते हैं। इसलिए सदा शान में रहने का, सदा प्राप्ति स्वरुप स्थिति में स्थित होने का सहज साधन है “फॉलो फादर”। फॉलो करना तो सहज होता है ना! जीवन में बचपन से फॉलो करने के अनुभवी हो। बचपन में भी बाप बच्चे को अंगुली पकड़ चलने में, उठने-बैठने में फॉलो कराते हैं। फिर जब गृहस्थी बनते हैं तो भी पति पत्नी को एक-दो के पीछे फॉलो कर चलना सिखलाते हैं। फिर आगे बढ़ गुरू करते हैं तो गुरू के फॉलोअर्स ही बनते हैं अर्थात् फॉलो करने वाले। लौकिक जीवन में भी आदि और अन्त में फॉलो करना होता है। अलौकिक, पारलौकिक बाप भी एक ही सहज बात का साधन बताते हैं – क्या करूँ, कैसे करूँ, ऐसे करूँ या वैसे करूँ इस विस्तार से छुड़ा देते हैं। सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही बात है – “फॉलो फादर”।

साकार रूप में भी निमित्त बन कर्म सिखलाने के लिए पूरे 84 जन्म लेने वाली ब्रह्मा की आत्मा निमित्त बनी। कर्म में कर्म बन्धनों से मुक्त होने में, कर्म सम्बन्ध को निभाने में, देह में रहते विदेही स्थिति में स्थित रहने में, तन के बन्धनों को मुक्त करने में, मन की लगन में मगन रहने की स्थिति में, धन का एक-एक नया पैसा सफल करने में, साकार ब्रह्मा साकार जीवन में निमित्त बने। कर्मबन्धनी आत्मा, कर्मातीत बनने का एक्जैम्पुल बने। तो साकार जीवन को फॉलो करना सहज है ना। यही पाठ हुआ फॉलो फादर। प्रश्न भी चाहे तन के पूछते, सम्बन्ध के पूछते वा धन के पूछते हैं। सब प्रश्नों का जवाब ब्रह्मा बाप की जीवन है। जैसे आजकल के साइन्स वाले हर एक प्रश्न का उत्तर कम्प्युटर से पूछते हैं क्योंकि समझते हैं मनुष्य की बुद्धि से यह कम्प्युटर एक्यूरेट है। बनाने वाले से भी बनी हुई चीज़ को एक्यूरेट समझ रहे हैं। लेकिन आप साइलेन्स वालों के लिए ब्रह्मा की जीवन ही एक्यूरेट कम्प्युटर है। इसलिए क्या, कैसे के बजाए जीवन के कम्प्युटर से देखो। कैसा और क्या का क्वेश्चन ऐसे में बदल जायेगा। प्रश्नचित के बजाए प्रसन्नचित हो जायेंगे। प्रश्नचित हलचल बुद्धि है। इसलिए प्रश्न का चिन्ह भी टेढ़ा है। क्वेश्चन लिखो तो टेढ़ा बांका हैं ना। और प्रसन्नचित है बिन्दी। तो बिन्दी में कोई टेढ़ापन है? चारों तरफ से एक ही है। बिन्दी को किसी भी तरफ से देखो तो सीधा ही देखेंगे। और एक जैसा ही देखेंगे। चाहे उल्टा चाहे सुल्टा देखो। प्रसन्नचित अर्थात् एकरस स्थिति में एक बाप को फॉलो करने वाले। फिर भी सार क्या निकला? फॉलो ब्रह्मा साकार रूप फादर वा फॉलो आकार रूप ब्रह्मा फादर। चाहे ब्रह्मा बाप को फॉलो करो चाहे शिव बाप को फॉलो करो। लेकिन शब्द वही है फॉलो फादर। इसलिए ब्रह्मा की महिमा “ब्रह्मा वन्दे जगतगुरू” कहते हैं क्योंकि फॉलो करने के लिए साकार रूप में ब्रह्मा ही साकार जगत के लिए निमित्त बने। आप सभी भी अपने को शिवकुमार, शिवकुमारी नहीं कहलाते हो। ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारी कहलाते हो। साकार रचना के निमित्त साकार श्रेष्ठ जीवन का सैम्पुल ब्रह्मा ही बनता है। इसलिए सतगुरू शिव बाप को कहते, गुरू सिखलाने वाले को भी कहते हैं। जगत के आगे सिखलाने वाले ब्रह्मा ही निमित्त बनते हैं। तो हर कर्म में फॉलो करना है। ब्रह्मा को इस हिसाब से जगतगुरू कहते हैं। इसलिए जगत ब्रह्मा की वन्दना करते हैं। जगतपिता का टाइटल भी ब्रह्मा का है। विष्णु को वा शंकर को प्रजापति नहीं कहते। वह मालिक के हिसाब से पति कह देते हैं। लेकिन है पिता। जितना ही जगत का प्यारा उतना ही जगत से न्यारा बन अभी अव्यक्त रूप में फॉलो अव्यक्त स्थिति भव का पाठ पढ़ा रहे हैं। समझा, किसी भी आत्मा का ऐसा इतना न्यारापन नहीं होता। यह न्यारेपन की ब्रह्मा की कहानी फिर सुनायेंगे।

आज तो शरीर को भी संभालना है। जब लोन लेते हैं तो अच्छा मालिक वो ही होता है जो शरीर को, स्थान को शक्ति प्रमाण कार्य में लगावे। फिर भी बापदादा दोनों के शक्तिशाली पार्ट को रथ चलाने के निमित्त बना है। यह भी ड्रामा में विशेष वरदान का आधार है। कई बच्चों को क्वेश्चन भी उठता है कि यही रथ निमित्त क्यों बना। दूसरे तो क्या इनको (गुल्जार दादी को) भी उठता है। लेकिन जैसे ब्रह्मा भी अपने जन्मों को नहीं जानते थे ना, यह भी अपने वरदान को भूल गई है। यह विशेष साकार ब्रह्मा का आदि साक्षात्कार के पार्ट समय का बच्ची को वरदान मिला हुआ है। ब्रह्मा बाप के साथ आदि समय एकान्त के तपस्वी स्थान पर इस आत्मा के विशेष साक्षात्कार के पार्ट को देख ब्रह्मा बाप ने बच्ची के सरल स्वभाव, इनोसेन्ट जीवन की विशेषता को देख यह वरदान दिया था कि जैसे अभी इस पार्ट में आदि में ब्रह्मा बाप की साथी भी बनी और साथ भी रही, ऐसे आगे चल बाप के साथी बनने की, समान बनने की ड्यूटी भी सम्भालेगी। ब्रह्मा बाप के समान सेवा में पार्ट बजायेंगी। तो वो ही वरदान तकदीर की लकीर बन गये। और ब्रह्मा बाप समान रथ बनने का पार्ट बजाना यह नूँध नूँधी गई। फिर भी बापदादा इस पार्ट बजाने के लिए बच्ची को भी मुबारक देते हैं। इतना समय इतनी शक्ति को एडजेस्ट करना, यह एडजेस्ट करने की विशेषता की लिफ्ट के कारण एक्स्ट्रा गिफ्ट है। फिर भी बापदादा को शरीर का सब देखना पड़ता है। बाजा पुराना है और चलाने वाले शक्तिशाली हैं। फिर भी हाँ जी, हाँ जी के पाठ के कारण अच्छा चल रहा है। लेकिन बापदादा भी विधि और युक्ति पूर्वक ही काम चला रहे हैं। मिलने का वायदा तो है लेकिन विधि, समय प्रमाण परिवर्तन होती रहेगी। अभी तो 18वे वर्ष में सब सुनायेंगे। 17 तो पूरा करना ही है।

“Follow Father — विदेही जीवन की कला”

स्रोत : अव्यक्त मुरली 19-12-1985 (बापदादा)


अध्याय 1 : बापदादा का मिलन — विदेही बनने की शिक्षा

बापदादा आज सर्व स्नेही बच्चों से मिलने आये हैं —
स्नेह का रेसपॉन्स देने के लिए।

परंतु विदेही बाप को देह का आधार लेना पड़ता है। क्यों?

 बच्चों को भी विदेही बनाने के लिए।

बाप स्वयं देह में रहते हुए भी
विदेही स्वरूप का अनुभव कराते हैं।

शिक्षा:

आप देह में रहते हुए भी
 देह के कर्ता नहीं
 देह के मालिक नहीं
 देह के बंधन में नहीं
बल्कि
देही करावनहार आत्मा बनो।


अध्याय 2 : विदेही स्थिति क्या है?

बापदादा समझाते हैं —

देह करनहार है
आप देही करावनहार हो

यही है —
विदेही स्थिति
अशरीरी स्थिति
निराकारी स्थिति

यही है

 “Follow Father”


अध्याय 3 : Follow Father की दो महान स्थितियाँ

बाप को फॉलो करने की स्थिति
 सदा अशरीरी भव
 सदा विदेही भव
 सदा निराकारी भव

दादा (ब्रह्मा बाप) को फॉलो करने की स्थिति
 सदा अव्यक्त भव
 फरिश्ता स्वरूप भव
 आकारी स्थिति भव

यही है सच्चा Follow Father


अध्याय 4 : व्यक्ति भाव — गिरावट की जड़

बापदादा की स्पष्ट आज्ञा है —

 व्यक्ति भाव में नहीं जाना
 देहभान में नहीं जाना
 व्यक्त भाव में नहीं आना

यह स्थिति पराई है।
यह गिरावट की स्थिति है।

जैसे बिना आज्ञा कोई परदेश चला जाए —
तो परेशानी होगी ही।

 इसलिए बापदादा ने आज्ञा की लकीर खींच दी है
इससे बाहर नहीं जाना।


अध्याय 5 : Follow Father — सबसे सहज साधन

बापदादा कहते हैं —

क्या करूँ?
कैसे करूँ?
ऐसे करूँ या वैसे करूँ?

इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है —

 Follow Father

जैसे बचपन में बच्चा बाप की उंगली पकड़ कर चलना सीखता है
वैसे ही ब्राह्मण जीवन में
बाप की उंगली पकड़ कर चलो।


अध्याय 6 : ब्रह्मा बाप — चलता-फिरता कम्प्यूटर

आज साइंस वाले कम्प्यूटर से पूछते हैं
लेकिन आप साइलेन्स वालों के लिए —

 ब्रह्मा बाप का जीवन ही एक्यूरेट कम्प्यूटर है।

हर प्रश्न का उत्तर ब्रह्मा बाप की जीवन शैली में है।

तन का प्रश्न हो
सम्बन्ध का प्रश्न हो
धन का प्रश्न हो

 उत्तर ब्रह्मा बाप का जीवन है।


अध्याय 7 : प्रश्नचित नहीं — प्रसन्नचित बनो

प्रश्नचित = हलचल बुद्धि
प्रसन्नचित = बिन्दी स्वरूप स्थिति

 प्रश्न का चिन्ह टेढ़ा होता है
 बिन्दी हर तरफ से सीधी होती है

प्रसन्नचित आत्मा =
एकरस स्थिति
एक बाप को फॉलो करने वाली आत्मा


अध्याय 8 : ब्रह्मा बाप — जगतगुरू

इसलिए कहा जाता है —

“ब्रह्मा वन्दे जगतगुरू”

क्योंकि साकार जगत के लिए
साकार श्रेष्ठ जीवन का सैम्पल
ब्रह्मा बाप बने।

हम शिवकुमार नहीं कहलाते
हम ब्रह्माकुमार कहलाते हैं।


अध्याय 9 : जितना जगत से प्यारा, उतना जगत से न्यारा

ब्रह्मा बाप —

जगत का भी प्यारा
जगत से न्यारा भी

और अब अव्यक्त रूप में
हमें सिखा रहे हैं —

 अव्यक्त स्थिति में रहो
 फरिश्ता स्वरूप बनो
 विदेही बनो


 Murli Notes (19-12-1985)

मुख्य Points:

1️⃣ विदेही स्थिति में रहना ही Follow Father है
2️⃣ देह में रहते हुए देहभान से न्यारा बनना है
3️⃣ ब्रह्मा बाप का जीवन ही चलता-फिरता कम्प्यूटर है
4️⃣ प्रश्नचित नहीं — प्रसन्नचित बनो
5️⃣ व्यक्ति भाव से सदा ऊपर रहो
6️⃣ अशरीरी, निराकारी, अव्यक्त स्थिति में स्थित रहो


 निष्कर्ष

Follow Father कोई कठिन साधना नहीं है
Follow Father जीवन जीने की कला है

जहाँ
 देह में रहते हुए देह से न्यारे
 संसार में रहते हुए फरिश्ता
 कर्म करते हुए करावनहार

यही है
सच्चा ब्राह्मण जीवन
सच्चा फरिश्ता जीवन
सच्चा Follow Father

Disclaimer (अस्वीकरण)

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली दिनांक 19-12-1985 पर आधारित आध्यात्मिक शिक्षाओं का अध्ययन है।
इसका उद्देश्य आत्म-जागृति, विदेही स्थिति और फरिश्ता जीवन की प्रेरणा देना है।
यह वीडियो किसी धर्म, व्यक्ति या संस्था के विरोध में नहीं है।
यह केवल आत्म-परिवर्तन और ईश्वरीय जीवन शैली को समझने हेतु प्रस्तुत किया गया है।

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