(49)24-12-1984 “The Importance of Divine Affection”

अव्यक्त मुरली-(49)24-12-1984 “ईश्वरीय स्नेह का महत्व”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

24-12-1984 “ईश्वरीय स्नेह का महत्व”

आज स्नेह के सागर अपने स्नेही चात्रक बच्चों से मिलने आये हैं। अनेक जन्मों से इस सच्चे अविनाशी ईश्वरीय स्नेह के प्यासे रहे। जन्म-जन्म की प्यासी चात्रक आत्माओं को अब सच्चे स्नेह, अविनाशी स्नेह का अनुभव हो रहा है। भक्त आत्मा होने के कारण आप सभी बच्चे स्नेह के भिखारी बन गये। अब बाप भिखारी से स्नेह के सागर के वर्से के अधिकारी बना रहे हैं। अनुभव के आधार से सबकी दिल से अब यह आवाज स्वत: ही निकलता है कि ईश्वरीय स्नेह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तो भिखारी से अधिकारी बन गये। विश्व में हर एक आत्मा को जीवन में आवश्यक चीज स्नेह ही है। जीवन में स्नेह नहीं तो जीवन नीरस अनुभव करते हैं। स्नेह इतनी ऊंची वस्तु है जो आज के साधारण लोग स्नेह को ही भगवान मानते हैं। प्यार ही परमात्मा है वा परमात्मा ही प्यार है। तो स्नेह इतना ऊंचा है जितना भगवान को ऊंचा मानते हैं। इसलिए भगवान को स्नेह वा प्यार कहते हैं। यह क्यों कहा जाता, अनुभव नहीं है। फिर भी परमात्म बाप जब इस सृष्टि पर आये हैं तो सभी बच्चों को प्रैक्टिकल जीवन में साकार स्वरूप से स्नेह दिया है, दे रहे हैं। तब अनुभव नहीं होते हुए भी यही समझते हैं कि स्नेह ही परमात्मा है। तो परमात्म बाप की पहली देन स्नेह है। स्नेह ने आप सबको ब्राह्मण जन्म दिया है। स्नेह की पालना ने आप सबको ईश्वरीय सेवा के योग्य बनाया है। स्नेह ने सहज योगी, कर्मयोगी, स्वत: योगी बनाया है। स्नेह ने हद के त्याग को भाग्य अनुभव कराया है। त्याग नहीं भाग्य है। यह अनुभव सच्चे स्नेह ने कराया ना। इसी स्नेह के आधार पर किसी भी प्रकार के तूफान ईश्वरीय तोफा अनुभव करते। स्नेह के आधार पर मुश्किल को अति सहज अनुभव करते हैं। इसी ईश्वरीय स्नेह ने अनेक सम्बन्धों में लगी हुई दिल को, अनेक टुकड़े हुई दिल को एक से जोड़ लिया है। अब एक दिल एक दिलाराम है। दिल के टुकड़े नहीं हैं। स्नेह ने बाप समान बना दिया। स्नेह ने ही सदा साथ के अनुभव कारण सदा समर्थ बना दिया। स्नेह ने युग परिवर्तन कर लिया। कलियुगी से संगमयुगी बना दिया। स्नेह ने ही दु:ख दर्द की दुनिया से सुख के खुशी की दुनिया में परिवर्तन कर लिया। इतना महत्व है इस ईश्वरीय स्नेह का। जो महत्व को जानते हैं वही महान बन जाते हैं। ऐसे महान बने हो ना। सभी से सहज पुरुषार्थ भी यही है। स्नेह में सदा समाये रहो। लवलीन आत्मा को कभी स्वप्न मात्र भी माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता है क्योंकि लवलीन अवस्था माया प्रूफ अवस्था है। तो स्नेह में रहना सहज है ना। स्नेह ने सभी को मधुबन निवासी बनाया है। स्नेह के कारण पहुँचे हो ना। बापदादा भी सभी बच्चों को यही वरदान देते “सदा स्नेही भव”। स्नेह ऐसा जादू है जिससे जो मांगेंगे वह प्राप्त कर सकेंगे। सच्चे स्नेह से, दिल के स्नेह से, स्वार्थी स्नेह से नहीं। समय पर स्नेही बनने वाले नहीं। जब कोई आवश्यकता का समय आवे उस समय मीठा बाबा, प्यारा बाबा कहकर निभाने वाले नहीं। सदा ही इस स्नेह में समाये हुए हो। ऐसे के लिए बापदादा सदा छत्रछाया है। समय पर याद करने वाले वा मतलब से याद करने वाले, ऐसे को भी यथाशक्ति, यथा स्नेह रिटर्न में सहयोग मिलता है। लेकिन यथा शक्ति सम्पन्न सम्पूर्ण सफलता नहीं मिलती। तो सदा स्नेह द्वारा सर्व प्राप्ति स्वरूप अनुभव करने के लिए सच्ची दिल के स्नेही बनो। समझा।

बापदादा सभी मधुबन घर के श्रृंगार बच्चों को विशेष स्नेह की बधाई दे रहे हैं। हर एक बच्चा बाप के घर का विशेष श्रृंगार है। इस मधुबन बेहद घर के बच्चे ही रौनक हैं। ऐसे अपने को समझते हो ना। दुनिया वाले क्रिसमस मनाने के लिए कहाँ-कहाँ जाते हैं। और यह विशेष विदेशी वा भारत के बच्चे स्वीट होम में पहुँचे हैं। बड़ा दिन, बड़े ते बड़े बाप से बड़ी दिल से मनाने के लिए।

यह बड़ा दिन विशेष बाप और दादा दोनों के यादगार निशानी का दिन है। एक दाता रूप से शिवबाबा की निशानी और बूढ़ा स्वरूप ब्रह्मा बाप की निशानी। कभी भी युवा रूप नहीं दिखायेंगे। क्रिसमस फादर बूढ़ा ही दिखाते हैं। और दो रंग भी जरूर दिखायेंगे। सफेद और लाल। तो बाप और दादा दोनों की यह निशानी है। बापदादा छोटे बच्चों को जो उन्हों की इच्छा है, उससे भरपूर कर देता है। छोटे-छोटे बच्चे बड़े स्नेह से इस विशेष दिन पर अपनी दिल पसन्द चीजें क्रिसमस फादर से मांगते हैं वा संकल्प रखते हैं। और निश्चय रखते हैं कि वह जरूर पूर्ण करेगा। तो यह यादगार भी आप बच्चों का है। चाहे पुराने शूद्र जीवन के कितने भी बुजुर्ग हो लेकिन ब्राह्मण जीवन में छोटे बच्चे ही हैं। तो सभी छोटे बच्चे जो भी श्रेष्ठ कामना करते वह पूर्ण होती हैं ना। इसलिए यह याद निशानी लास्ट धर्म वालों में भी चली आ रही है। आप सभी को इस संगमयुग के बड़े दिन की बहुत-बहुत सौगातें बापदादा द्वारा मिल गई हैं ना। विशेष यह बड़ा दिन सौगातों का दिन है। तो बापदादा सबसे बड़ी सौगात – स्वराज्य और स्वर्ग का राज्य देता है। जिसमें अप्राप्त कोई वस्तु रह नहीं जाती। सर्व प्राप्ति स्वरूप बन जाते हो। तो बड़ा दिन मनाने वाले बड़ी दिल वाले हैं। विश्व को देने वाले तो बड़ी दिल वाले हुए ना। तो सभी को संगमयुगी बड़े दिन की बड़ी दिल से बड़े ते बड़े बापदादा बधाई दे रहे हैं। वो लोग 12 बजे के बाद मनायेंगे, आप सबसे नम्बर आगे हो ना। तो पहले आप मना रहे हो। पीछे दुनिया वाले मनायेंगे। विशेष रूप में डबल विदेशी आज बहुत उमंग उत्साह से याद सौगात बाप प्रति स्थूल सूक्ष्म रूप में दे रहे हैं। बापदादा भी सभी डबल विदेशी बच्चों को स्नेह के सौगात के रिटर्न में पदमगुणा, सदा स्नेही साथी रहेंगे, सदा स्नेह के सागर में समाये हुए लवलीन स्थिति का अनुभव करेंगे, ऐसे वरदान भरी याद और अमर प्यार की रिटर्न में सौगात दे रहे हैं। सदा गाते और खुशी में नाचते रहेंगे। सदा मुख मीठा रहेगा। ऐसे ही स्नेही भारत के बच्चों को भी विशेष सहज योगी, स्वत: योगी के वरदान की यादप्यार दे रहे हैं।

सभी बच्चों को दाता और विधाता बापदादा अविनाशी स्नेह सम्पन्न सदा समर्थ स्वरूप से सहज अनुभव करने की यादप्यार दे रहे हैं सभी को यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से:- 1. सदा अपने को इस पुरानी दुनिया की आकर्षण से न्यारे और बाप के प्यारे, ऐसे अनुभव करते हो? जितना न्यारे होंगे उतना स्वत: ही प्यारे होंगे। न्यारे नहीं तो प्यारे नहीं। तो न्यारे हैं और प्यारे हैं या कहाँ न कहाँ लगाव है? जब किसी से लगाव नहीं तो बुद्धि एक बाप तरफ स्वत: जायेगी। दूसरी जगह जा नहीं सकती। सहज और निरन्तर योगी की स्थिति अनुभव होगी। अभी नहीं सहजयोगी बनेंगे तो कब बनेंगे? इतनी सहज प्राप्ति है, सतयुग में भी अभी की प्राप्ति का फल है। तो अभी सहजयोगी और सदा के राज्य भाग्य के अधिकारी सहजयोगी बच्चे सदा बाप के समान समीप हैं। तो अपने को बाप के समीप साथ रहने वाले अनुभव करते हो? जो साथ हैं उनको सहारा सदा है। साथ नहीं रहते तो सहारा भी नहीं मिलता। जब बाप का सहारा मिल गया तो कोई भी विघ्न आ नहीं सकता। जहाँ सर्व शक्तिवान बाप का सहारा है तो माया स्वयं ही किनारा कर लेती है। ताकत वाले के आगे निर्बल क्या करेगा? किनारा करेगा ना। ऐसे माया भी किनारा कर लेगी, सामना नहीं करेगी। तो सभी मायाजीत हो? भिन्न-भिन्न प्रकार से, नये-नये रूप से माया आती है लेकिन नॉलेजफुल आत्मायें माया से घबराती नहीं। वह माया के सभी रूप को जान लेती हैं और जानने के बाद किनारा कर लेती। जब मायाजीत बन गये तो कभी कोई हिला नहीं सकता। कितनी भी कोई कोशिश करे लेकिन आप न हिलो।

अमृतवेले से रात तक बाप और सेवा इसके सिवाए और कोई लगन न रहे। बाप मिला और सेवाधारी बने क्योंकि जो मिला है उसको जितना बाँटेंगे उतना बढ़ेगा। एक दो और पदम पाओ। यही याद रखो कि हम सर्व भण्डारों के मालिक हैं, भरपूर भण्डारे हैं। जिसको दुनिया ढूंढ रही है उसके बच्चे बने हैं। दु:ख की दुनिया से किनारा कर लिया। सुख के संसार में पहुँच गये। तो सदा सुख के सागर में लहराते, सबको सुख के खजाने से भरपूर करो।

अध्याय : ईश्वरीय स्नेह का महत्व

(अव्यक्त मुरली – 24-12-1984 | बापदादा)


 भूमिका : स्नेह की प्यास और आत्मा की पुकार

आज स्नेह के सागर बापदादा अपने स्नेही चातक बच्चों से मिलने आये हैं।
आत्माएँ अनेक जन्मों से जिस सच्चे, अविनाशी स्नेह की प्यासी थीं —
आज वही स्नेह अनुभव में आ रहा है।

Murli Note (24-12-1984):

जन्म-जन्म की प्यासी चातक आत्माओं को अब सच्चे ईश्वरीय स्नेह का अनुभव हो रहा है।


 1. भिखारी से अधिकारी बनने की यात्रा

भक्ति मार्ग में आत्मा स्नेह की भिखारी बन जाती है —
लेकिन जब परमात्मा स्वयं मिलते हैं,
तो वही आत्मा स्नेह के सागर के वर्से की अधिकारी बन जाती है।

उदाहरण:
जैसे कोई जीवन भर पानी की भीख माँगता रहा हो और अचानक झरने का मालिक बन जाए।

Murli Note:

ईश्वरीय स्नेह हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है।


 2. जीवन में स्नेह नहीं तो जीवन नीरस

हर आत्मा के जीवन की सबसे आवश्यक वस्तु स्नेह है।
स्नेह के बिना जीवन बोझ बन जाता है।

इसीलिए दुनिया कहती है –
“प्यार ही भगवान है, और भगवान ही प्यार है।”

Murli Note:

परमात्मा की पहली देन स्नेह है।


 3. स्नेह से ब्राह्मण जीवन और योगी स्थिति

ईश्वरीय स्नेह ने ही —

  • ब्राह्मण जन्म दिया

  • सेवा योग्य बनाया

  • सहज योगी, कर्मयोगी और स्वतः योगी बनाया

Murli Note:

स्नेह ने त्याग को भाग्य अनुभव कराया।


 4. स्नेह : तूफानों को तोहफा बना देता है

जिसके पास ईश्वरीय स्नेह का आधार है,
उसके लिए मुश्किल भी सहज हो जाती है।

उदाहरण:
जैसे मज़बूत छत के नीचे बैठा बच्चा आँधी-तूफान से डरता नहीं।

Murli Note:

स्नेह के आधार पर हर तूफान ईश्वरीय तोहफा बन जाता है।


 5. अनेक दिलों से एक दिलाराम तक

स्नेह ने —

  • अनेक संबंधों में बँटी हुई दिल को

  • एक दिल – एक दिलाराम में जोड़ दिया

अब दिल के टुकड़े नहीं,
सिर्फ़ एक बाप और एक याद


 6. लवलीन स्थिति : माया-प्रूफ अवस्था

जो आत्मा स्नेह में समाई हुई है,
उस पर माया का प्रभाव स्वप्न मात्र भी नहीं पड़ सकता।

Murli Note:

लवलीन अवस्था माया-प्रूफ अवस्था है।


 7. “सदा स्नेही भव” – बापदादा का वरदान

बापदादा का विशेष वरदान है —

“सदा स्नेही भव”

मतलब —

  • समय देखकर याद नहीं

  • मतलब से याद नहीं

  • बल्कि सदा दिल से स्नेह में स्थित


 8. बड़ा दिन (Christmas) : बाप-दादा की यादगार

यह बड़ा दिन

  • शिवबाबा (दाता रूप)

  • ब्रह्मा बाप (विधाता रूप)

दोनों की यादगार है।

Murli Insight:
क्रिसमस फादर का वृद्ध रूप —
ब्रह्मा बाप की निशानी है।


 9. ब्राह्मण जीवन में हम सभी बच्चे हैं

चाहे शूद्र जीवन में कितने भी बुज़ुर्ग हों,
लेकिन ब्राह्मण जीवन में हम छोटे बच्चे हैं।

और छोटे बच्चे —
जो भी सच्चे दिल से माँगते हैं,
वह पूर्ण होता है।


 10. सबसे बड़ी सौगात : स्वराज्य और स्वर्ग

इस बड़े दिन पर बापदादा की सबसे बड़ी सौगात —

  • स्वराज्य

  • स्वर्ग का राज्य

जहाँ —

अप्राप्त कुछ भी शेष नहीं रहता।


 11. डबल विदेशी और भारत के बच्चों को विशेष वरदान

डबल विदेशी बच्चों को —

  • सदा स्नेही साथी

  • पदमगुणा रिटर्न

  • लवलीन स्थिति का अनुभव

भारत के बच्चों को —

  • सहज योगी

  • स्वतः योगी बनने का वरदान


 12. पुरुषार्थ का सार

  • न्यारे बनो तो प्यारे बनोगे

  • एक बाप की ओर बुद्धि रखो

  • अमृतवेले से रात तक — बाप और सेवा

Murli Note:

जो मिला है, उसे बाँटो — बाँटने से बढ़ता है।


 निष्कर्ष

जो ईश्वरीय स्नेह के महत्व को जान लेते हैं,
वही महान आत्मा बन जाते हैं।

संदेश:
 स्नेह में सदा समाये रहो
 सदा स्नेही बनो
 सदा सर्व-प्राप्ति स्वरूप बनो

प्रश्न 1. बापदादा आज किन बच्चों से मिलने आये हैं?
उत्तर :
आज स्नेह के सागर बापदादा अपने स्नेही चातक बच्चों से मिलने आये हैं, जो अनेक जन्मों से सच्चे और अविनाशी स्नेह के प्यासे रहे हैं।


प्रश्न 2. आत्माओं को आज किस प्रकार का अनुभव हो रहा है?
उत्तर :
आत्माओं को आज जन्म-जन्म की प्यास बुझाने वाला सच्चा ईश्वरीय स्नेह अनुभव में आ रहा है।

Murli Note (24-12-1984):

जन्म-जन्म की प्यासी चातक आत्माओं को अब सच्चे ईश्वरीय स्नेह का अनुभव हो रहा है।


 1. भिखारी से अधिकारी बनने की यात्रा

प्रश्न 3. भक्ति मार्ग में आत्मा की क्या स्थिति रहती है?
उत्तर :
भक्ति मार्ग में आत्मा स्नेह की भिखारी बन जाती है, क्योंकि उसे सच्चे स्नेह का अनुभव नहीं होता।


प्रश्न 4. परमात्मा के मिलने से आत्मा में क्या परिवर्तन आता है?
उत्तर :
परमात्मा के मिलने से आत्मा भिखारी से स्नेह के सागर के वर्से की अधिकारी बन जाती है।


प्रश्न 5. ईश्वरीय स्नेह को जन्म-सिद्ध अधिकार क्यों कहा गया है?
उत्तर :
क्योंकि ईश्वरीय स्नेह आत्मा का मूल अधिकार है, जो परमात्मा से मिलते ही स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाता है।

Murli Note:

ईश्वरीय स्नेह हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है।


 2. जीवन में स्नेह नहीं तो जीवन नीरस

प्रश्न 6. जीवन में स्नेह का क्या महत्व है?
उत्तर :
स्नेह जीवन की सबसे आवश्यक वस्तु है। स्नेह के बिना जीवन नीरस और बोझ समान बन जाता है।


प्रश्न 7. संसार “प्यार ही भगवान है” क्यों कहता है?
उत्तर :
क्योंकि स्नेह इतना ऊँचा और पवित्र अनुभव है कि मनुष्य उसे ही भगवान के समान मान लेता है।

Murli Note:

परमात्मा की पहली देन स्नेह है।


 3. स्नेह से ब्राह्मण जीवन और योगी स्थिति

प्रश्न 8. ईश्वरीय स्नेह से कौन-कौन से वरदान प्राप्त होते हैं?
उत्तर :
ईश्वरीय स्नेह से—

  • ब्राह्मण जन्म

  • सेवा की योग्यता

  • सहज योगी, कर्मयोगी और स्वतः योगी स्थिति प्राप्त होती है।


प्रश्न 9. त्याग को भाग्य कैसे अनुभव किया जाता है?
उत्तर :
जब त्याग स्नेह के आधार पर होता है, तब वह त्याग नहीं बल्कि सौभाग्य अनुभव होता है।

Murli Note:

स्नेह ने त्याग को भाग्य अनुभव कराया।


 4. स्नेह : तूफानों को तोहफा बना देता है

प्रश्न 10. ईश्वरीय स्नेह मुश्किलों को कैसे सहज बना देता है?
उत्तर :
ईश्वरीय स्नेह के आधार से हर कठिन परिस्थिति भी ईश्वरीय तोहफा अनुभव होने लगती है।


प्रश्न 11. स्नेह का आधार होने पर आत्मा डर से मुक्त क्यों रहती है?
उत्तर :
क्योंकि स्नेह आत्मा को सुरक्षा और विश्वास का अनुभव कराता है, जैसे मज़बूत छत के नीचे बैठा बच्चा आँधी से नहीं डरता।

Murli Note:

स्नेह के आधार पर हर तूफान ईश्वरीय तोहफा बन जाता है।


 5. अनेक दिलों से एक दिलाराम तक

प्रश्न 12. ईश्वरीय स्नेह ने दिलों में क्या परिवर्तन किया है?
उत्तर :
ईश्वरीय स्नेह ने अनेक संबंधों में बँटी हुई दिल को एक दिल—एक दिलाराम में जोड़ दिया है।


 6. लवलीन स्थिति : माया-प्रूफ अवस्था

प्रश्न 13. लवलीन स्थिति क्या है?
उत्तर :
लवलीन स्थिति वह अवस्था है जिसमें आत्मा सदा ईश्वरीय स्नेह में समाई रहती है।


प्रश्न 14. लवलीन आत्मा पर माया का प्रभाव क्यों नहीं पड़ता?
उत्तर :
क्योंकि लवलीन अवस्था माया-प्रूफ अवस्था होती है, जहाँ माया प्रवेश नहीं कर सकती।

Murli Note:

लवलीन अवस्था माया-प्रूफ अवस्था है।


 7. “सदा स्नेही भव” – बापदादा का वरदान

प्रश्न 15. “सदा स्नेही भव” वरदान का अर्थ क्या है?
उत्तर :
इसका अर्थ है—समय देखकर या मतलब से नहीं, बल्कि सदा दिल से स्नेह में स्थित रहना।


 8. बड़ा दिन (Christmas) : बाप-दादा की यादगार

प्रश्न 16. बड़ा दिन किनकी यादगार है?
उत्तर :
बड़ा दिन शिवबाबा (दाता रूप) और ब्रह्मा बाप (विधाता रूप) दोनों की संयुक्त यादगार है।


प्रश्न 17. क्रिसमस फादर का वृद्ध रूप किसका संकेत है?
उत्तर :
वह ब्रह्मा बाप के वृद्ध रूप की निशानी है।


 9. ब्राह्मण जीवन में हम सभी बच्चे हैं

प्रश्न 18. ब्राह्मण जीवन में सभी को बच्चा क्यों कहा गया है?
उत्तर :
क्योंकि ब्राह्मण जीवन आत्मिक है, जहाँ उम्र नहीं बल्कि भाव और स्नेह प्रधान होता है।


प्रश्न 19. छोटे बच्चों की विशेषता क्या बताई गई है?
उत्तर :
जो भी छोटे बच्चे सच्चे दिल से माँगते हैं, वह अवश्य पूर्ण होता है।


 10. सबसे बड़ी सौगात : स्वराज्य और स्वर्ग

प्रश्न 20. बापदादा की सबसे बड़ी सौगात क्या है?
उत्तर :
स्वराज्य और स्वर्ग का राज्य, जहाँ कोई भी वस्तु अप्राप्त नहीं रहती।


 11. विशेष वरदान

प्रश्न 21. डबल विदेशी बच्चों को कौन-से विशेष वरदान मिले?
उत्तर :
सदा स्नेही साथी, पदमगुणा रिटर्न और लवलीन स्थिति का अनुभव।


प्रश्न 22. भारत के बच्चों को कौन-सा विशेष वरदान मिला?
उत्तर :
सहज योगी और स्वतः योगी बनने का वरदान।


 12. पुरुषार्थ का सार

प्रश्न 23. सच्चे पुरुषार्थ का आधार क्या है?
उत्तर :
न्यारे बनना, एक बाप की ओर बुद्धि रखना और सदा बाप व सेवा में लगन रखना।


प्रश्न 24. बाँटने से प्राप्ति क्यों बढ़ती है?
उत्तर :
क्योंकि जो मिला है उसे बाँटने से वह पदमगुणा होकर बढ़ता है।

Murli Note:

जो मिला है, उसे बाँटो — बाँटने से बढ़ता है।


 निष्कर्ष

प्रश्न 25. ईश्वरीय स्नेह का अंतिम संदेश क्या है?
उत्तर :
स्नेह में सदा समाये रहो, सदा स्नेही बनो और सर्व-प्राप्ति स्वरूप बनकर महान आत्मा बनो।

प्रश्न 1 : बापदादा आज किन दो सत्ताओं को देख रहे हैं?

उत्तर :
बापदादा आज दो सत्ताओं को देख रहे हैं—

  1. राज सत्ता

  2. ईश्वरीय सत्ता

राज सत्ता सदा हलचल में रहती है और बदलती रहती है,
जबकि ईश्वरीय सत्ता अचल, अविनाशी और सदा सत्य है।


प्रश्न 2 : ईश्वरीय सत्ता को “सत्यता की शक्ति” क्यों कहा गया है?

उत्तर :
ईश्वरीय सत्ता को सत्यता की शक्ति इसलिए कहा गया है क्योंकि—

  • देने वाला सत् बाप है

  • सत् शिक्षक है

  • और सतगुरू है

जहाँ देने वाला ही सत् है, वहाँ से मिलने वाली शक्ति भी सत्य और अडोल होती है।


 प्रश्न 3 : सत्यता की शक्ति क्या है?

उत्तर :
सत्यता की शक्ति वह दिव्य शक्ति है—

  • जो सतयुग (सचखण्ड) की स्थापना कर रही है

  • जो अविनाशी वर्सा और अविनाशी पद दिलाती है

  • जिसे कोई भी मिटा नहीं सकता

क्योंकि सत् का अर्थ है अविनाशी, इसलिए इसके वरदान भी अविनाशी हैं।


 प्रश्न 4 : मुरली के अनुसार सत्यता की शक्ति से क्या स्वतः बनता है?

उत्तर :
सत्यता की शक्ति से स्वतः—

  • सत ज्ञान

  • सत पहचान

  • सत जीवन
    बन जाता है।

असत्य अज्ञान है और ज्ञान सत्य है,
इसलिए सत्य ज्ञान के सामने अज्ञान रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है।


 प्रश्न 5 : “सत्यम् शिवम् सुन्दरम्” का गूढ़ अर्थ क्या है?

उत्तर :

  • सत्यम् – सत्य

  • शिवम् – कल्याणकारी

  • सुन्दरम् – श्रेष्ठ स्वरूप

अर्थात् परमात्मा का स्वरूप ही सत्यता की शक्ति है—
जो सत्य भी है, कल्याणकारी भी है और श्रेष्ठ भी है।


 प्रश्न 6 : ब्राह्मण जीवन में सबसे पहला सत्य कौन-सा जाना गया?

उत्तर :
सबसे पहला सत्य यह जाना गया कि—

  1. मैं सत आत्मा हूँ

  2. सत बाप की सत्य पहचान क्या है

इसी पहचान से सत्य ज्ञान आता है
और सत्यता की शक्ति स्वतः जीवन में धारण हो जाती है।


 प्रश्न 7 : सत्यता की शक्ति की मुख्य निशानी क्या है?

उत्तर :
सत्यता की शक्ति की मुख्य निशानी है—
“सच तो बिठो नच”

अर्थात् सत्यता की शक्ति वाला—

  • निर्भय होता है

  • बेफिक्र बादशाह होता है

  • और सदा खुशी में नाचता रहता है

जहाँ भय, चिंता और उलझन है,
वहाँ सत्यता की शक्ति अभी पूरी नहीं है।


 प्रश्न 8 : कमजोरी और सत्यता की शक्ति का क्या संबंध है?

उत्तर :
यदि—

  • संकल्प कमजोर हैं

  • संस्कार कमजोर हैं

तो मन में—

  • हलचल

  • उदासी

  • व्यर्थ संकल्प
    ज़रूर आते हैं।

सत्यता की शक्ति स्वयं को महसूस कराती है।
बाप से और अपने आप से कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता।


 प्रश्न 9 : “साँप पर नाचना” मुरली का प्रतीक क्या दर्शाता है?

उत्तर :
इस चित्र में—

  • साँप = माया, परिस्थिति, विकार

  • नाचना = विजय और खुशी

सत्यता की शक्ति वाला माया को भी अपनी स्टेज बना लेता है
और हर परिस्थिति में विजयी बन जाता है।


 प्रश्न 10 : कृष्ण बनने वाली आत्माओं की पहचान क्या है?

उत्तर :
राम के जीवन में कभी वियोग, कभी खुशी दिखाई देती है,
लेकिन कृष्ण बनने वाली आत्माएँ—

  • हर स्थिति को नाचने की स्टेज बना लेती हैं

कोई व्यक्ति, परिस्थिति, प्रकृति या माया
उन्हें हिला नहीं सकती।


 प्रश्न 11 : “सत्य की नैया” से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर :
मुरली के अनुसार—

  • सत्य की नैया डगमगा सकती है

  • लेकिन डूब नहीं सकती

डगमगाना भी एक खेल है,
और खेल में अंत में सदा विजय ही होती है।


 प्रश्न 12 : आत्म-परीक्षण के लिए बापदादा क्या चेक करने को कहते हैं?

उत्तर :
बापदादा कहते हैं—
अपने आप से पूछो:

  • क्या मेरे संकल्प सत्य हैं?

  • क्या मेरी दृष्टि सत्य है?

  • क्या मेरी वृत्ति अचल है?

  • क्या मेरे बोल सत्य हैं?

  • क्या मेरे सम्बन्ध सत्यता पर आधारित हैं?

जहाँ भी असत्य छिपा है,
वहीं हलचल आएगी।


 प्रश्न 13 : संगमयुग को “उत्सव का युग” क्यों कहा गया है?

उत्तर :
क्योंकि ब्राह्मण जीवन में—

  • संगमयुग मनाने का युग है

  • हर दिन बड़ा दिन है

  • रोज़ नाचने-गाने और खुशी मनाने का समय है

संगमयुग थोड़े समय का है,
लेकिन सबसे महान युग है।


 प्रश्न 14 : पंजाब सेवा के लिए बापदादा ने क्या विशेष निर्देश दिए?

उत्तर :
बापदादा ने कहा—

  • डरने का समय नहीं है

  • शान्ति फैलाने का समय है

  • अशान्त आत्माओं को ईश्वरीय सहारे की अनुभूति करानी है

एक-दो आत्माओं में शान्ति भरने से
शान्ति की लहर फैलती जाएगी।


 प्रश्न 15 : सतगुरूवार पर बापदादा ने कौन-से विशेष वरदान दिए?

उत्तर :
बापदादा ने वरदान दिए—

  • सदा सफलता स्वरूप रहो

  • सदा हिम्मत और हुल्लास में रहो

  • सदा छत्रछाया में सेफ रहो

  • एक बल, एक भरोसा रखो

  • साक्षी बनकर सब दृश्य देखते हुए हर्षित रहो


 प्रश्न 16 : समापन में बापदादा का भाव क्या है?

उत्तर :
बापदादा सभी सत्यता की शक्ति स्वरूप बच्चों को—

  • सत बाप

  • सत शिक्षक

  • सतगुरू
    का यादप्यार और नमस्ते देते हैं
    और सदा विजयी, खुशी में नाचने वाला बनने का आशीर्वाद देते हैं।

 डिस्क्लेमर

यह वीडियो/सामग्री
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की
अव्यक्त मुरलियों एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक समझ को बढ़ाना है।
यह किसी भी प्रकार के धार्मिक विवाद या आलोचना हेतु नहीं है।

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