आज हम 97वा विषय कर रहे हैं।
क्या श्री कृष्ण ने अर्जुन को लड़ाई के मैदान में गीता ज्ञान दिया था?
क्वेश्चन विषय है यह जिस पर आज हमने चर्चा करनी है।
क्या लगता है आपको गीता का ज्ञान युद्ध के मैदान में दिया जाता है?
लड़ाई करेंगे कि ज्ञान छोड़ेंगे? दिखाया दिखाया है।
नंबर एक: प्रचलित मान्यता
प्रचलित मान्यता है, लोगों का विश्वास है कि श्री कृष्ण ने युद्ध भूमि में अर्जुन को गीता सुनाई।
कारण
क्यों युद्ध के अंदर गीता?
गीता महाभारत का एक हिस्सा माना जाता है।
महाभारत में एक हिस्सा है। उस छोटी सी हिस्से को गीता कहा।
युद्ध में महाभारत का युद्ध हुआ था। उसमें यह ज्ञान सुनाया गया।
और दूसरा, श्रीमद् भागवत और अन्य शास्त्र भी इस बात का समर्थन करते हैं कि कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में गीता का ज्ञान सुनाया।
क्यों उठता है प्रश्न?
कारण तो हो गया। भी दो कारण हैं जिनके कारण यह समझा जाता है कि युद्ध के मैदान में कृष्ण ने उनको ज्ञान सुनाया।
यह प्रश्न क्यों उठता है?
गीता का ज्ञान अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक है।
गीता का ज्ञान क्या है? बहुत गहरा है और फिलॉसफी का है, दर्शन का है।
युद्ध के बीच इतने गहरे उपदेश संभव कैसे?
इतना गहरा ज्ञान युद्ध के मैदान में समझाना संभव नहीं।
समय की सीमा और युद्ध की स्थिति
समय की सीमा और युद्ध की स्थिति इसे अव्यवहारिक बनाती है।
महाभारत में संदेह की गुंजाइश
महाभारत के अंदर संदेह की गुंजाइश है।
युद्ध भूमि का वातावरण: शंखनाद, रथों का शोर, सेना, सैनिकों की पुकार।
और इस गीता में 700 श्लोक हैं।
इतने गहरे ज्ञान के लिए शांत वातावरण की आवश्यकता है।
क्योंकि चारों तरफ इतने शंख बज रहे हैं, इतना शोर, इतने हाथी, इतने घोड़े। सोचो क्या हालत होगी?
18 अक्षोणी सेनाएं रथों पर, हाथियों पर, घोड़ों पर।
अब वहां सारे के सारे पहुंच गए हैं और उनको 700 श्लोक इतने गहरे गीता ज्ञान के सुनाए जा रहे!
इसके लिए तो बहुत शांत वातावरण चाहिए।
यह ज्ञान एक गुप्त आध्यात्मिक प्रक्रिया का परिणाम था।
ये ज्ञान आत्माओं का अध्ययन करने की प्रक्रिया का परिणाम था।
किसी ने बहुत अच्छी तरह यह ज्ञान का मंथन किया हुआ है और वो सुनाया जा रहा है,
ना कि युद्ध के शोर में दिया गया उपदेश।
ये तो गहराई से सोच-समझकर सुनाने-सुनने वाला ज्ञान है,
ना कि इतने बड़े युद्ध के शोर में दिया गया उपदेश।
क्योंकि यहां पर जब सारे शोर मच गए, शंख बज गए, युद्ध शुरू होने वाला है तब अर्जुन कहता है कृष्ण को कि मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो।
युद्ध के शंख बज गए।
फिर अर्जुन ने दोनों तरफ देखा कि मेरे ही परिवार के लोग इधर भी हैं तो उधर भी।
मेरे ही गुरुजन – द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, कृपाचार्य – सारे मेरे गुरु बड़े हैं।
और दूसरी तरफ प्रजा भी मेरी है। चाहे वो इस तरफ खड़ी है या उस तरफ।
राजाएं, योद्धा, मित्र-संबंधी – सब हमारे ही हैं।
तो चाहे वो कौरवों के हों या पांडवों के, परिवार तो एक ही है।
पांडव तो भाई-भाई हैं।
इसलिए उसने युद्ध करने से इंकार कर दिया।
जब अर्जुन ने युद्ध नहीं करना चाहा,
कृष्ण युद्ध करना चाहता था क्या?
क्यों उसे इतना उल्टा-सीधा ज्ञान दिया?
अर्जुन ने कहा – 18 अक्षोणी पुरुष मर जाएंगे।
सारा परिवार खत्म हो जाएगा।
प्रजा भी क्या बचेगी? सिर्फ बुड्ढे, औरतें और छोटे बच्चे।
जो युद्ध करने लायक थे, वो युद्ध में आ गए।
बच्चे नहीं।
उस समय लड़ाई ऐसे नहीं होती थी।
जिसके पास हथियार है उसी से युद्ध होता था।
बच्चों को शामिल नहीं किया जाता था।
ब्रह्माकुमारी दृष्टिकोण – परमात्मा ही गीता ज्ञान दाता
गीता का ज्ञान परमपिता परमात्मा ने प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम से दिया।
समय: संगम युग
जब नया सतयुग स्थापित होना है।
ज्ञान का श्रोता केवल अर्जुन नहीं बल्कि हम सब आत्माएं हैं।
उदाहरण
यदि कोई डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में हो और अचानक कोई घंटों का प्रवचन देने लगे,
तो डॉक्टर क्या करेगा? सुनेगा या ऑपरेशन रोकेगा?
वैसे ही युद्धभूमि में इतना विशाल ज्ञान संभव नहीं।
मुरली 14 जून 2025 का सार
बाबा कहते हैं:
“बच्चे, गीता का भगवान मैं हूं, कृष्ण नहीं।
मैं आता हूं ब्रह्मा तन में।
यह युद्ध मैदान नहीं, यह है ज्ञान यज्ञ।”
निष्कर्ष – नई समझ की ओर
गीता का ज्ञान शाश्वत सत्य है।
ज्ञान दाता परमात्मा शिव हैं, माध्यम ब्रह्मा।
स्थान: शांत वातावरण – माउंट आबू।
बाबा कहते हैं:
“ज्ञान देता है शिव बाबा।
आकर ब्रह्मा के तन में प्रवेश करके माउंट आबू में शांत वातावरण में सुनाता है।
ना कि किसी युद्ध के मैदान में।”