Avyakt Murli-(18)21-03-1983

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अव्यक्त मुरली-(18)“प्रथम और अन्तिम पुरूषार्थ”03-04-1983

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

03-04-1983 “प्रथम और अन्तिम पुरूषार्थ”

आज बेहद का बाप बेहद की स्थिति में स्थित रहने वाले, बेहद की बुद्धि, बेहद की दृष्टि, बेहद की वृत्ति, बेहद के सेवाधारी ऐसे श्रेष्ठ बच्चों से साकार स्वरूप में, साकार वतन में बेहद के स्थान पर मिलने आये हैं। सारे ज्ञान का वा इस पढ़ाई की चारों ही सब्जेक्ट का मूल सार यही एक बात “बेहद” है। बेहद शब्द के स्वरूप में स्थित होना, यही फर्स्ट और लास्ट का पुरूषार्थ है। पहले बाप का बनना अर्थात् मरजीवा बनना। इसका भी आधार है देह की हद से बेहद देही स्वरूप में स्थित होना। और लास्ट में फरिश्ता स्वरूप बन जाना – इसका भी अर्थ है सर्व हद के रिश्ते से परे फरिश्ता बनना। तो आदि और अन्त पुरूषार्थ और प्राप्ति, लक्षण और लक्ष्य, स्मृति और समर्थी दोनों ही स्वरूप में क्या रहा? “बेहद”। आदि से लेकर अन्त तक किन-किन प्रकार की हदें पार कर चुके हो वा करनी हैं। इस लिस्ट को तो अच्छी तरह से जानते हो ना! जब सर्व हदों से पार बेहद स्वरूप में, बेहद घर, बेहद के सेवाधारी, सर्व हदों के ऊपर विजय प्राप्त करने वाले विजयी रत्न बन जाते तब ही अन्तिम कर्मातीत स्वरूप का अनुभव स्वरूप बन जाते।

हदें हैं अनेक, बेहद है एक। अनेक प्रकार की हदें अर्थात् अनेक मेरा मेरा। एक मेरा बाबा, दूसरा न कोई इस बेहद के मेरे में अनेक मेरा समा जाता है। विस्तार सार स्वरूप बन जाता है। विस्तार मुश्किल होता है या सार मुश्किल होता है? तो आदि और अन्त का पाठ क्या हुआ? बेहद। इसी अन्तिम मंजिल पर कहाँ तक समीप आये हैं, इसको चेक करो। हद की लिस्ट सामने रख देखो कहाँ तक पार किया है! लिस्ट का वर्णन करने की तो आवश्यकता नहीं है। सबके पास कितने बार की सुनी हुई यह लिस्ट कॉपियों में तो बहुत नोट है। सबके पास ज्यादा से ज्यादा माल डायरियाँ वा कापियाँ होंगी। जानते तो सभी हो, वर्णन भी बहुत अच्छा कर सकते हो। ज्ञाता भी हो, वक्ता भी हो। बाकी क्या रहा? बापदादा भी सभी टीचर्स अथवा स्टूडेन्ट्स सबके भाषण सुनते हैं। बापदादा के पास वीडियों नहीं है क्या? आपकी दुनिया में तो अभी निकला है। बापदादा तो शुरू से वतन में देखते रहते हैं। सुनते रहते हैं। वर्णन करने का श्रेष्ठ रूप देखकर बापदादा मुबारक भी देते हैं क्योंकि बापदादा की एक प्वॉइंट को भिन्न-भिन्न रमणीक रूप से सुनाते हो। जैसे गाया हुआ है बाप तो बाप है लेकिन बच्चे बाप के भी सिरताज हैं। ऐसे सुनाने में बाप से भी सिरताज हो। बाकी क्या फॉलो करना है? तीसरी स्टेज है – पार कर्ता। इसमें कोई न कोई हद की दीवार को पार करने में, कोई तो उस हद में लटक जाते हैं, कोई अटक जाते हैं। पार करने वाले कोई-कोई मंजिल के समीप दिखाई देते हैं। किसी भी हद को पार करने की निशानी क्या दिखाई देगी वा अनुभव होगी? पार करने की निशानी है पार किया, उपराम बना। तो उपराम बनना ही पार करने की निशानी है। उपराम स्थिति अर्थात् उड़ती कला की निशानी। उड़ता पंछी बन कर्म के इस कल्प वृक्ष की डाली पर आयेगा। उड़ती कला के बेहद के समर्थ स्वरूप से कर्म किया और उड़ा। कर्म रूपी डाली के बन्धन में नहीं फँसेगा। कर्म बन्धन में फँसा अर्थात् हद के पिंजरे में फँसा। स्वतन्‍त्र से परतन्‍त्र बना। पिंजरे के पंछी को उड़ता पंछी तो नहीं कहेंगे ना। ऐसे कल्प वृक्ष के भिन्न-भिन्न कर्म की डाली पर बाप के उड़ते पंछी श्रेष्ठ आत्मायें कभी-कभी कमज़ोरी के पंजों से डाली के बन्धन में आ जाते हैं। फिर क्या करते? कहानी सुनी है ना! इसको कहा जाता है हद को पार करने की शक्ति कम है। इस कल्प वृक्ष के अन्दर चार प्रकार की डालियाँ हैं। लेकिन पाँचवीं डाली ज्यादा आकर्षण वाली है। गोल्डन, सिल्वर, कॉपर, आयरन और संगम है हीरे की डाली। फिर हीरो बनने के बजाए हीरे की डाली में लटक जाते हैं। संगमयुग का ही सर्व श्रेष्ठ कर्म है ना। यह श्रेष्ठ कर्म ही हीरे की डाली है। चाहे संगमयुगी कैसा भी श्रेष्ठ कर्म हो लेकिन श्रेष्ठ कर्म के भी बन्धन में फँस गया, जिसको दूसरे शब्दों में आप सोने की जंजीर कहते हो। श्रेष्ठ कर्म में भी हद की कामना, यह सोने की जंजीर है। चाहे डाली हीरे की है, जंजीर भी सोने की है लेकिन बन्धन तो बन्धन है ना! बापदादा सर्व उड़ते पंछियों को स्मृति दिला रहे हैं, सर्व बन्धनों अर्थात् हदों को पार कर्ता बने हो!

आज का विशेष संगठन गऊपाल की माताओं का है। इतने बड़े संगठन को देख गऊपाल भी खुश हो रहे हैं। बापदादा भी मीठी-मीठी माताओं को “वन्दे मातरम्” कहते हैं क्योंकि नई सृष्टि की स्थापना के कार्य में ब्रह्मा बाप ने भी माता गुरू को सब समर्पण किया। इस ईश्वरीय ज्ञान की विशेषता वा नवीनता है ही शक्ति अवतार को आगे रखना। माता गुरू का सिलसिला स्थापन करना, यही नवीनता है। इसलिए यादगार में भी गऊ मुख का गायन पूजन है। ऐसे हद की मातायें नहीं लेकिन बेहद की जगत मातायें हो, नशा है ना! जगत का कल्याण करने वाली हो, जग कल्याणकारी अर्थात् विश्व कल्याणकारी हो। सिर्फ घर कल्याणी तो नहीं हो ना। कब घर कल्याणी का गीत सुना है क्या? विश्व कल्याणी का सुना है। तो ऐसी बेहद की माताओं का संगठन, श्रेष्ठ संगठन हुआ ना। मातायें तो अनुभवी मूर्त हो ना! कुमारियों को धोखे से बचने की ट्रेनिंग देनी पड़ती है। मातायें तो अनुभवी होने के कारण हद के धोखे में नहीं आने वाली हो ना! मैजारिटी नये-नये हैं। नये-नये छोटे बच्चों पर ज्यादा ही स्नेह होता है। बापदादा भी सभी माताओं का “भले पधारे” कहकर के स्वागत करते हैं। अच्छा।

ऐसे सदा बेहद की स्थिति में स्थित रहने वाले, सदा उड़ता पंछी, उड़ती कला में उड़ने वाले, सदा अन्तिम फरिश्ता स्वरूप का अनुभव करने वाले, सदा बाप समान कर्मबन्धनों से कर्मातीत, ऐसे मंजिल के समीप श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

सेवाधारियों के प्रति:-

बापदादा सभी निमित्त सेवाधारी बच्चों को किस रूप में देखते हैं? निमित्त सेवाधारी अर्थात् फालो फादर करने वाले। बाप भी सेवाधारी बन करके ही आते हैं ना। जो भी भिन्न-भिन्न रूप हैं, वह हैं तो सेवा के लिए ना! तो बाप का भी विशेष रूप सेवा का है। तो निमित्त सेवाधारी अर्थात् फालो फादर करने वाले। बापदादा हरेक बच्चे को इसी नज़र से देखते हैं। बापदादा के सेवा के कार्य में आदि रत्न हो ना! जन्मते ही बाप ने क्या गिफ्ट में दिया? सेवा ही दी है ना। सेवा की गिफ्ट के आदि रत्न हो। बापदादा सभी की विशेषताओं को जानते हैं। जन्म से वरदान मिलना, यह भी ड्रामा में हीरो पार्ट है। वैसे तो सभी सेवाधारी हैं लेकिन जन्मते ही सेवा का वरदान और आवश्यकता के समय में निमित्त बनना यह भी किसी-किसी की विशेषता है। जो हैं ही आवश्यकता के समय पर सेवा के साथी, ऐसी आत्मा की आवश्यकता सदा है। अच्छा – सभी में अपनी-अपनी विशेषतायें हैं, अगर एक-एक की विशेषता का वर्णन करें तो कितना समय चाहिए। लेकिन बापदादा के पास हरेक की विशेषता सदा सामने है। कितनी हरेक में विशेषतायें हैं, कभी अपने आपको देखा है? विशेषतायें सबमें अपनी-अपनी हैं लेकिन बापदादा विशेष आत्माओं को एक ही बात बार-बार स्मृति में दिलाते हैं, कौन-सी? जब भी कोई भी सेवा के क्षेत्र में आते हो, प्लैनिंग बनाते हो वा प्रैक्टिकल में आते हो तो सदा बाप समान स्थिति में स्थित होकर फिर कोई भी प्लैन बनाओ और प्रैक्टिकल में आओ। जैसे बाप सबका है, कोई भी नहीं कहेगा कि यह फलाने का बाप है, फलाने का नहीं, सब कहेंगे मेरा बाबा। ऐसे जो निमित्त सेवाधारी हैं, उन्हों की विशेषता यही है कि हरेक महसूस करे, अनुभव करे कि यह हमारे हैं। 4-6 का है, हमारा नहीं, यह नहीं। हमारे हैं, हरेक के मुख से यह आवाज न भी निकले तो भी संकल्प में इमर्ज हो कि यह हमारे हैं – इसको ही कहा जाता है फालो फादर। सबको हमारे-पन की फीलिंग आये। यही पहला स्टेप बाप का है। यही तो बाप की विशेषता है ना। हरेक के मन से निकलता है “मेरा बाबा।” तेरा बाबा कोई कहता है? तो यह मेरा है बेहद का भाई है या बहन है वा दीदी है दादी है, यही सबके मन से शुभ आशीर्वाद निकले। यह मेरा है क्योंकि चाहे कहीं भी रहते हो लेकिन विशेष आत्मायें तो बेहद की हो ना! निमित्त सेवार्थ कहीं भी रहो लेकिन हो तो बेहद सेवा के निमित्त ना। प्लैन भी बेहद का, विश्व का बनाते हो या हरेक अपने-अपने स्थान का बनाते हो! यह तो नहीं करते ना! बेहद का प्लैन बनाते, देश विदेश सबका बनाते हो ना! तो बेहद की भावना, बेहद की श्रेष्ठ कामना – यह है फालो फादर। अभी यह प्रैक्टिकल अनुभव करो। अभी सब बुजुर्ग हो। बुजुर्ग का अर्थ ही है अनुभवी। अनेक बातों के अनुभवी हो ना! कितने अनुभव हैं! एक तो अपना अनुभव। दूसरा अनेकों के अनुभवों से अनुभवी। अनुभवी आत्मा अर्थात् बुजुर्ग आत्मा। वैसे भी कोई बुजुर्ग होता है तो हद के हिसाब से भी उसको पिताजी, काका जी कहते हैं। ऐसे बेहद के अनुभवी अर्थात् सबको अपनापन महसूस हो।

सहयोगी आत्माओं को तो बापदादा सदा ही सहयोग के रिटर्न में स्नेह देते हैं। सहयोगी हो अर्थात् सदा स्नेह के पात्र हो। इसलिए देंगे क्या, सबको स्नेह ही देंगे। सबको फीलिंग आये कि यह स्नेह का भण्डार हैं। हर कदम में, हर नज़र में स्नेह अनुभव हो। यही तो विशेषता है ना! ऐसा कोई प्लैन बनाओ कि हमें क्या करना है। विशेष आत्माओं का विशेष फर्ज क्या है? विशेष कर्म क्या है? जो साधारण से भिन्न हो। चाहे भावना तो समानता की रखनी है लेकिन दिखाई दे यह विशेष आत्मायें हैं। हर कदम में विशेषता अनुभव हो तब कोई मानेंगे विशेष आत्मायें हैं। विशेष आत्मायें अर्थात् विशेष करने वाली। कहने वाली नहीं लेकिन करने वाली। अच्छा।

महावीर बच्चे सदा ही तन्दुरूस्त हैं क्योंकि मन तन्दुरूस्त है, तन तो एक खेल करता है। मन में कोई रोग होगा तो रोगी कहा जायेगा, अगर मन निरोगी है तो सदा तन्दुरूस्त है। सिर्फ शेष शैय्या पर विष्णु के समान ज्ञान का सिमरण कर हर्षित होते। यही खेल है। जैसे साकार बाप विष्णु समान टांग पर टांग चढ़ाए खेल करते थे ना। ऐसे कुछ भी होता है तो यह भी निमित्त मात्र खेल करते। सिमरण कर मनन शक्ति द्वारा और ही सागर के तले में जाने का चांस मिलता है। जब सागर में जायेंगे तो जरूर बाहर से मिस होंगे। तो कमरे में नहीं हो लेकिन सागर के तले में हो। नये-नये रत्न निकालने के लिए तले में गये हो।

कर्मभोग पर विजय प्राप्त कर कर्मयोगी की स्टेज पर रहना इसको कहा जाता है – विजयी रत्न। सदा यही स्मृति रहती कि यह भोगना नहीं लेकिन नई दुनिया के लिए योजना है। फुर्सत मिलती है ना, फुर्सत का काम ही क्या है? नई योजना बनाना। पलंग भी प्लैनिंग का स्थान बन गया।

माताओं के ग्रुप से:-

सभी ऐसा अनुभव करते हो कि तकदीर का सितारा चमक रहा है? जिस चमकते हुए सितारे को देख और आत्मायें भी ऐसा बनने की प्रेरणा लेती रहें, ऐसे सितारे हो ना! कभी सितारे की चमक कम तो नहीं होती है ना! अविनाशी बाप के अविनाशी सितारे हो ना! सदा एक रस हो या कभी उड़ती कला कभी ठहरती कला? सदा उड़ती कला का युग है। उड़ती कला के समय पर कोई चढ़ती कला भी करे तो भी अच्छा नहीं लगेगा। प्लेन की सवारी मिले तो दूसरी सवारी अच्छी लगेगी? तो उड़ती कला के समय वाले नीचे नहीं आओ। सदा ऊपर रहो। पिंजरे के पंछी नहीं, पिंजरा टूट गया है या दो चार लकीरें अभी रही हैं।

तार भी अगर रह जाती है तो वह अपनी तरफ खींचेगी। 10 रस्सी तोड़ दी, एक रस्सी रह गई तो वह भी अपनी तरफ खींचेगी। तो सर्व रस्सियाँ तोड़ने वाले, सब हदें पार करने वाले ऐसे बेहद के उड़ते पंछी, हद में नहीं फंस सकते। 63 जन्म तो हद में फँसते आये। अब एक जन्म हद से निकालो। यह एक जन्म है ही हद से निकालने का तो जैसा समय वैसा काम करना चाहिए ना। समय हो उठने का और कोई सोये तो अच्छा लगेगा? इसलिए सदा हदों से पार बेहद में रहो। माताओं को अविनाशी सुहाग का तिलक तो लगा हुआ है ना। जैसे लौकिक में सुहाग की निशानी तिलक है, ऐसे अविनाशी सुहाग अर्थात् सदा स्मृति का तिलक लगा हुआ हो। ऐसी सुहागिन सदा भागिन (भाग्यवान) हैं। कल्प-कल्प की भाग्यवान आत्मायें हो। ऐसा भाग्य जो कोई भाग्य को छीन नहीं सकता। सदा अधिकारी आत्मायें हो, विश्व का मालिक, विश्व का राज्य ही आपका हो गया। राज्य अपना, भाग्य अपना, भगवान अपना इसको कहा जाता है – अधिकारी आत्मा। अधिकारी हैं तो अधीनता नहीं।

प्रश्न:- आप बच्चों की कमाई अखुट और अविनाशी है कैसे?

उत्तर:- आप ऐसी कमाई करते हो जो कभी कोई छीन नहीं सकता। कोई गड़बड़ हो नहीं सकती। दूसरी कमाई में तो डर रहता है, इस कमाई को अगर कोई छीनना भी चाहे तो भी आपको खुशी होगी क्योंकि वह भी कमाई वाला हो जायेगा। अगर कोई लूटने आये तो और ही खुश होंगे, कहेंगे लो। तो इससे और ही सेवा हो जायेगी। तो ऐसी कमाई करने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। अच्छा, ओम् शान्ति।

प्रस्तावना

ओम् शान्ति।
आज का विषय है — “प्रथम और अन्तिम पुरूषार्थ”।
बापदादा बेहद की स्थिति में स्थित रहने वाले बच्चों को स्मृति दिलाते हैं कि सारे ज्ञान का मूल सार एक ही है — “बेहद”।
फर्स्ट और लास्ट पुरूषार्थ का अर्थ है —

  • शुरुआत में मरजीवा बनना (देह की हद से परे आत्मिक स्थिति में स्थित होना),

  • और अन्त में फरिश्ता स्वरूप बन जाना (सर्व हदों से पार कर्मातीत स्थिति प्राप्त करना)।


 हद और बेहद

  • हदें अनेक हैं, लेकिन बेहद एक है।

  • हद का अर्थ है — “मेरा-मेरा”।

  • बेहद का अर्थ है — “एक मेरा बाबा, दूसरा न कोई।”

  • यही प्रथम से अन्त तक के पुरूषार्थ का मूल पाठ है।


 हद को पार करने की निशानी

  • जब आत्मा हद पार कर लेती है तो उसकी स्थिति उपराम हो जाती है।

  • उपराम स्थिति = उड़ती कला की निशानी।

  • ऐसा पंछी कर्म करता हुआ भी कर्म-बन्धन में नहीं फँसता।


 संगमयुग की श्रेष्ठता

  • संगमयुग = हीरे की डाली।

  • यहां सबसे श्रेष्ठ कर्म करने का अवसर मिलता है।

  • लेकिन सावधानी यह है कि श्रेष्ठ कर्म में भी बन्धन न बने, वरना इसे “सोने की जंजीर” कहा जायेगा।

  • असली पुरूषार्थ है — बन्धन-मुक्त रहते हुए सेवा करना।


 माताओं की भूमिका

  • मातायें केवल घर-कल्याणी नहीं, बल्कि जगत-कल्याणी हैं।

  • मातृ-शक्ति का कार्य है — नई सृष्टि की स्थापना में सहयोग करना।

  • जगत मातायें = विश्व कल्याणकारी आत्मायें।


 सेवाधारियों का स्वरूप

  • बाप भी सेवाधारी बनकर आते हैं।

  • इसलिए सेवाधारी बच्चे भी “Follow Father” बनें।

  • सेवाधारी की पहचान है — सबको अपनापन और स्नेह का अनुभव कराना।

  • हर आत्मा को लगे — “यह हमारे हैं, मेरे बाबा जैसे।”


 विशेष आत्माओं की विशेषता

  • विशेष आत्मायें केवल कहने वाली नहीं, बल्कि करने वाली होती हैं।

  • हर कदम में विशेषता झलकनी चाहिए।

  • ऐसी आत्मायें ही “सितारे” बन दूसरों को प्रेरणा देती हैं।


 अखुट और अविनाशी कमाई

प्रश्न: बच्चों की कमाई अखुट और अविनाशी क्यों है?
उत्तर:

  • क्योंकि यह ऐसी कमाई है जिसे कोई छीन नहीं सकता।

  • अगर कोई इसे लूटने भी आये तो वह भी कमाई वाला बन जायेगा।

  • यह कमाई सेवा रूप में और अधिक बढ़ती जाती है।


 निष्कर्ष

तो बच्चों,

  • प्रथम पुरूषार्थ = मरजीवा बनना,

  • अन्तिम पुरूषार्थ = फरिश्ता बनना।

  • हदों से पार होकर बेहद की स्थिति में रहना ही सच्ची विजय है।

  • यही स्थिति हमें विश्व कल्याणकारी और कर्मातीत स्वरूप तक ले जाती है।

    विषय: “प्रथम और अन्तिम पुरूषार्थ”


    प्रश्न 1:
    प्रथम और अन्तिम पुरूषार्थ का अर्थ क्या है?
    उत्तर:
    प्रथम पुरूषार्थ = मरजीवा बनना (देह की हद से परे आत्मिक स्थिति में स्थित होना)।
    अन्तिम पुरूषार्थ = फरिश्ता स्वरूप बनना (सर्व हदों से पार कर्मातीत स्थिति प्राप्त करना)।


    प्रश्न 2:
    “हद” और “बेहद” में क्या अन्तर है?
    उत्तर:

    • हद = अनेक प्रकार का “मेरा-मेरा” (शरीर, संबंध, धन, मान)।

    • बेहद = “एक मेरा बाबा, दूसरा न कोई।”
      यही प्रथम से अन्त तक का मूल पाठ है।


    प्रश्न 3:
    हद को पार करने की निशानी क्या है?
    उत्तर:
    जब आत्मा हद पार कर लेती है तो उसकी स्थिति उपराम हो जाती है।
    उपराम स्थिति = उड़ती कला की निशानी।
    ऐसा पंछी कर्म करता हुआ भी कर्म-बन्धन में नहीं फँसता।


    प्रश्न 4:
    संगमयुग की श्रेष्ठता क्या है और उसमें सावधानी क्यों चाहिए?
    उत्तर:
    संगमयुग = हीरे की डाली, जहाँ सबसे श्रेष्ठ कर्म करने का अवसर मिलता है।
    लेकिन यदि श्रेष्ठ कर्म में भी बन्धन बन जाये तो वह “सोने की जंजीर” कहलाता है।
    असली पुरूषार्थ है — बन्धन-मुक्त रहते हुए सेवा करना।


    प्रश्न 5:
    माताओं की भूमिका “जगत-कल्याणी” क्यों कही जाती है?
    उत्तर:
    मातायें केवल घर-कल्याणी नहीं, बल्कि जगत-कल्याणी हैं।
    उनका कार्य है नई सृष्टि की स्थापना में सहयोग करना और विश्व-कल्याणकारी आत्मा बनना।


    प्रश्न 6:
    सेवाधारी की असली पहचान क्या है?
    उत्तर:
    सेवाधारी = “Follow Father”।
    उसकी पहचान है — सबको अपनापन और स्नेह का अनुभव कराना।
    हर आत्मा को लगे — “यह हमारे हैं, जैसे मेरा बाबा।”


    प्रश्न 7:
    विशेष आत्माओं की विशेषता क्या है?
    उत्तर:
    विशेष आत्मायें केवल कहने वाली नहीं, बल्कि करने वाली होती हैं।
    उनकी हर कदम में विशेषता झलकती है।
    वे सितारे बनकर दूसरों को प्रेरणा देती हैं।


    प्रश्न 8:
    बच्चों की कमाई अखुट और अविनाशी क्यों है?
    उत्तर:
    क्योंकि यह ऐसी कमाई है जिसे कोई छीन नहीं सकता।
    अगर कोई इसे लूटने भी आये तो वह भी कमाई वाला बन जायेगा।
    यह सेवा रूप में और अधिक बढ़ती जाती है।


    निष्कर्ष:
    प्रथम पुरूषार्थ = मरजीवा बनना,
    अन्तिम पुरूषार्थ = फरिश्ता बनना।
    हदों से पार होकर बेहद की स्थिति में रहना ही सच्ची विजय है।                                                                                                                                                                                                      Disclaimer यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा प्रदत्त ईश्वरीय ज्ञान, मुरली एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक अध्ययन, आत्म-चिंतन और आत्म कल्याण है। यह किसी भी धर्म, पंथ या परंपरा की आलोचना या विरोध नहीं करता। कृपया इसे मनन, स्व-उन्नति और आत्म शांति की दृष्टि से ही ग्रहण करें।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      प्रथम और अन्तिम पुरूषार्थ, मरजीवा बनना, फरिश्ता स्वरूप, कर्मातीत स्थिति, हद और बेहद, मेरा-मेरा का अर्थ, एक मेरा बाबा दूसरा न कोई, उपराम स्थिति, उड़ती कला, संगमयुग की श्रेष्ठता, सोने की जंजीर, बन्धन-मुक्त सेवा, मातृ शक्ति, जगत कल्याणी मातायें, विश्व कल्याणकारी आत्मायें, सेवाधारी का स्वरूप, Follow Father, विशेष आत्मायें, सितारे आत्मायें, अखुट और अविनाशी कमाई, ओम् शान्ति, ब्रह्माकुमारी मुरली, BK Murli Gyaan, आत्मा का पुरूषार्थ, बेहद की स्थिति,                                                                                                                                                  First and last effort, becoming a living being, angelic form, karmateet state, limited and limitless, meaning of mine and mine, one is my Baba and no other, supreme state, flying stage, superiority of Confluence Age, gold chain, bondage-free service, maternal power, world welfare mothers, world benefactor souls, form of server, Follow Father, special souls, star souls, inexhaustible and imperishable earnings, Om Shanti, Brahma Kumari. Murli, BK Murli Gyaan, effort of the soul, unlimited state,