(40)“नये ज्ञान और ज्ञान दाता को अथॉरिटी से प्रत्यक्ष करो तब प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजेगा”01-06-1983
“नए ज्ञान और ज्ञानदाता की प्रत्यक्षता | 1 जून 1983 की अव्यक्त मुरली |
नए ज्ञान और ज्ञानदाता की प्रत्यक्षता
1. प्रत्यक्षता का नगाड़ा कब बजेगा?
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बाबा कहते हैं – जब नया ज्ञान और ज्ञानदाता (परमपिता परमात्मा शिव) को अथॉरिटी से प्रत्यक्ष करेंगे।
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अथॉरिटी का मतलब – आत्मा के अनुभव से, जीवन की शक्ति से और प्रमाण सहित प्रत्यक्ष करना।
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तब सब आत्माएं अनुभव करेंगी कि इन वाक्यों में ही परमात्मा बोल रहे हैं।
उदाहरण :
जैसे विज्ञान की कोई नई खोज प्रयोग द्वारा सिद्ध होती है, वैसे ही परमात्मा का नया ज्ञान जीवन में प्रयोग कर प्रत्यक्ष होगा।
2. मीटिंग का वास्तविक अर्थ
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बापदादा ने कहा – मीटिंग का मतलब है ताज और तख्तधारी आत्माओं की सभा।
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ताज = सेवा और जिम्मेवारी का ताज।
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तख्त = आत्म-स्वामित्व और बेहद राज्य का तख्त।
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हर ब्राह्मण आत्मा बेहद सेवा की जिम्मेवारी का ताजधारी है।
Murli Note (01.06.1983) :
“कोई बाजार से ताज नहीं खरीदना है। जिम्मेवारी का ताज पहनना है – कि मैं सर्व आत्माओं को बाप का परिचय दूँ।”
3. ब्रह्मा बाप अव्यक्त क्यों बने?
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शरीर में रहकर वे बेहद की सेवा नहीं कर सकते थे।
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इसलिए अव्यक्त होकर वे बच्चों को हद से बेहद में ले जाने के निमित्त बने।
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हमें शरीर में रहते ही अव्यक्त स्थिति में रहकर बेहद की सेवा करनी है।
उदाहरण :
जैसे कोई मास्टर विदेश में बैठकर इंटरनेट से पूरी दुनिया को गाइड करता है, वैसे ही ब्रह्मा बाप अव्यक्त वतन से सेवा कर रहे हैं।
4. पांच अथॉरिटी की शक्ति
बापदादा ने बच्चों को पाँच अथॉरिटी याद दिलाई :
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ज्ञान की अथॉरिटी
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योगबल की अथॉरिटी
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श्रेष्ठ धारणा की अथॉरिटी
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डायरेक्ट बाप के वारिसपन की अथॉरिटी
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विश्व परिवर्तन के निमित्त बनने की अथॉरिटी
Murli Note (01.06.1983) :
“आप सर्व अथॉरिटी वाले श्रेष्ठ आत्माएं हैं। अभी शेष है – इस सत्य ज्ञान की अथॉरिटी को प्रत्यक्ष करना।”
5. नया ज्ञान ही असली फाउंडेशन
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धरनी (ground) और वायुमंडल परिवर्तन की सेवा हो चुकी है।
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लेकिन नया ज्ञान – यही बीज और फाउंडेशन है।
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जब तक आत्मा और परमात्मा के वचनों का अंतर स्पष्ट नहीं होगा, लोग तिनके जैसे सहारे (मंदिर, गुरुद्वारे, भक्ति-पथ) को नहीं छोड़ेंगे।
उदाहरण :
जैसे छात्र पुराने नोट्स छोड़कर नए सिलेबस को अपनाता है, वैसे ही आत्मा को परमात्मा का नया ज्ञान अपनाना पड़ेगा।
6. ज्ञानदाता की प्रत्यक्षता
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पहले ज्ञान प्रत्यक्ष होगा, फिर दाता प्रत्यक्ष होंगे।
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जब लोग अनुभव करेंगे कि यह नया ज्ञान कहीं और नहीं, केवल ब्रह्माकुमारियों में मिल रहा है – तब वे ज्ञानदाता शिव को मानेंगे।
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यही प्रत्यक्षता विश्व-परिवर्तन का आधार बनेगी।
Murli Note (01.06.1983) :
“यह नया ज्ञान देने वाली अथॉरिटी आप हो। सत्य ज्ञान देने वाली अथॉरिटी आप हो। यही प्रत्यक्षता अभी शेष है।”
निष्कर्ष
1 जून 1983 की इस अव्यक्त मुरली में बाबा ने याद दिलाया –
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हमें ताज व तख्तधारी बनकर बेहद की सेवा करनी है।
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ब्रह्मा बाप अव्यक्त होकर हमें हद से बेहद में ले जा रहे हैं।
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और अब समय है कि हम नए ज्ञान और ज्ञानदाता को अथॉरिटी से प्रत्यक्ष करें।
नए ज्ञान और ज्ञानदाता की प्रत्यक्षता – प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: प्रत्यक्षता का नगाड़ा कब बजेगा?
उत्तर: जब आत्माएं नए ज्ञान और ज्ञानदाता परमात्मा शिव को अथॉरिटी से प्रत्यक्ष करेंगी। प्रत्यक्षता का अर्थ है – अनुभव से सिद्ध करना कि यह ज्ञान परमात्मा के ही वचन हैं।
प्रश्न 2: मीटिंग का सच्चा अर्थ क्या है?
उत्तर: मीटिंग का अर्थ केवल संगठित होना नहीं है, बल्कि ताज और तख्तधारी आत्माओं की सभा है। हर ब्राह्मण आत्मा बेहद सेवा की जिम्मेवारी का ताज और आत्म-स्वामित्व का तख्त धारण करती है।
प्रश्न 3: ब्रह्मा बाप अव्यक्त क्यों हुए?
उत्तर: शरीर में रहते वे बेहद सेवा नहीं कर सकते थे। इसलिए वे अव्यक्त होकर बच्चों को हद से बेहद में ले जाने का निमित्त बने। अव्यक्त स्थिति से वे विश्व सेवा में सहयोग देते हैं।
प्रश्न 4: बाबा ने कौन-सी पाँच अथॉरिटी बताई?
उत्तर:
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ज्ञान की अथॉरिटी
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योगबल की अथॉरिटी
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श्रेष्ठ धारणा की अथॉरिटी
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डायरेक्ट बाप के वारिसपन की अथॉरिटी
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विश्व परिवर्तन के निमित्त बनने की अथॉरिटी
प्रश्न 5: नया ज्ञान क्यों सबसे ज़रूरी है?
उत्तर: धरनी और वायुमंडल परिवर्तन की सेवा हो चुकी है, लेकिन आत्मा और परमात्मा के नए ज्ञान को प्रत्यक्ष करना ही फाउंडेशन है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा, आत्माएं पुराने सहारे (मंदिर, गुरुद्वारे, भक्ति-पथ) को नहीं छोड़ेंगी।
प्रश्न 6: ज्ञान और ज्ञानदाता की प्रत्यक्षता में क्या क्रम है?
उत्तर: पहले नया ज्ञान प्रत्यक्ष होगा। जब लोग अनुभव करेंगे कि यह सत्य ज्ञान केवल ईश्वरीय विश्वविद्यालय में मिल रहा है, तभी ज्ञानदाता परमात्मा शिव की प्रत्यक्षता होगी।
Disclaimer (वीडियो की शुरुआत में)
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय की 1 जून 1983 की अव्यक्त मुरली पर आधारित है।
इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक अध्ययन, मनन और सेवा है।
यह आधिकारिक ब्रह्माकुमारी संस्था का विकल्प नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत अध्ययन और अनुभव के लिए प्रस्तुत किया गया है।
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