(13)The mystery of reincarnation and karma.

AAT.(13)पुनर्जन्म और कर्म का रहस्य।

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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आत्मा का रहस्य — पुनर्जन्म और कर्म का लेखाजोखा

13वाँ हिस्सा — आत्मा की यात्रा

हम आत्मा का रहस्य अध्ययन कर रहे हैं।
आज हमारा 13वाँ भाग है— पुनर्जन्म और कर्म का रहस्य।

आत्मा शरीर छोड़ने के बाद कहां जाती है?

शरीर छोड़ने के बाद आत्मा कहां जाती है— यह प्रश्न हर मन में है।

कुछ कहते हैं— आत्मा कहीं चली जाती है।
कुछ कहते हैं— परम अवस्था में रहती है।
कुछ कहते हैं— वह परमधाम जाती है।

परंतु सच्चाई क्या है?

बीके ज्ञान कहता है—
आत्मा शरीर छोड़ने के बाद वहीं जाती है, जहां उसका अगला पार्ट है। जहां उसका कार्मिक अकाउंट है, वहीं जन्म लेती है।

एक शरीर छोड़ा — दूसरा शरीर ले लिया।
यह ही है पुनर्जन्म।

जब आत्मा का पूरा कार्मिक अकाउंट दुनिया के सभी आत्माओं के साथ बराबर हो जाता है—
तब वह परमधाम (शांति धाम) जाती है।

शरीर छोड़ने का मतलब यह नहीं कि हर आत्मा तुरंत परमधाम चली जाए।
दो बातें हैं:

  1. शरीर छोड़ना

  2. दूसरा शरीर धारण करना

जब तक उसका कर्म-बंध बराबर नहीं होता, आत्मा पृथ्वी पर ही जन्म लेती रहती है।


आत्मा की यात्रा और कर्मों का लेखाजोखा

(अव्यक्त मुरली — 16 नवम्बर 2025)

आत्मा अपनी यात्रा पर है।
जहां उसका कर्म-बंध है, वहां जन्म लेती है।
एक स्थान पर जन्म लेकर, पार्ट खत्म होने पर दूसरी जगह— फिर तीसरी जगह।
जब सारे कर्मों का हिसाब बराबर हो जाता है— तब आत्मा परमधाम जाती है।


आत्मा और शरीर का अटूट संबंध

आत्मा चैतन्य, अमर और शाश्वत तत्व है।
शरीर केवल उसका वाहन है।

जैसे गाड़ी चालक के बिना नहीं चल सकती,
वैसे ही शरीर आत्मा के बिना कार्य नहीं कर सकता।

मुरली में बाबा कहते हैं:

“अपने को आत्मा समझो, शरीर नहीं।”
“तुम शरीर के चालक हो, मालिक नहीं।”

मैं आत्मा हूँ, यह शरीर मेरा नहीं—
मैं इस शरीर के द्वारा अपना भाग्य लिख रहा हूँ।

जैसे बल्ब तभी प्रकाश देता है जब धारा प्रवाहित हो।
धारा रुकते ही अंधेरा हो जाता है।
उसी तरह आत्मा शरीर छोड़ दे, तो शरीर निष्क्रिय हो जाता है।


पुनर्जन्म — वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया

आत्मा एक शरीर छोड़कर
अपने कर्मों की यात्रा लेकर
दूसरा शरीर धारण करती है।

कुछ आत्माएँ तुरंत नया जन्म ले लेती हैं,
कुछ बीच में थोड़े समय “विराम अवस्था” में रहती हैं।

इस अवस्था में आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहती है।
पर यह सूक्ष्म शरीर केवल उसी को दिखाई देता है,
जिससे उसका कार्मिक अकाउंट जुड़ा हो।
अन्य किसी को दिखाई नहीं देगा।


आत्मा कभी मरती नहीं — केवल पोशाक बदलती है

हर आत्मा के पास एक अदृश्य कार्मिक रिकॉर्ड-बुक होती है।
अच्छे-बुरे हर कर्म का लेखाजोखा सुरक्षित रहता है।

  • अच्छे कर्म सुखद परिस्थितियां लाते हैं।

  • नकारात्मक कर्म दुख और परीक्षाएं लाते हैं।

यह ब्रह्मांड का सबसे न्यायिक सिद्धांत है—
“जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।”

उदाहरण:
यदि किसी आत्मा ने दुख दिया है,
तो जरूरी नहीं कि अगले जन्म में ही उसे फल मिले।
किसी भी जन्म में— जब समय पूरा हो— वह हिसाब बराबर होगा।
ड्रामा त्रुटिहीन है।


विश्राम अवस्था — आत्मा का इंतज़ार

जैसे नाटक का कलाकार पर्दे के पीछे तब तक इंतजार करता है
जब तक उसका सीन नहीं आता—
वैसे ही आत्मा परमधाम में अपने अगले पार्ट के समय की प्रतीक्षा करती है।

पर ध्यान रहे—
परमधाम में कोई तैयारी नहीं होती।
पार्ट पहले से ही फिक्स है,
समय आने पर आत्मा स्वतः उतर आती है।


शरीर के बिना आत्मा की अवस्था

आत्मा बिना शरीर के—

  • विचार कर सकती है

  • महसूस कर सकती है

लेकिन प्रैक्टिकल क्रिया नहीं कर सकती।

उसे आभास हो सकता है कि वह दौड़ रही है,
या किसी पर आ रही है,
परंतु प्रैक्टिकल चोट नहीं पहुंचा सकती।

यदि किसी को दुख देना हो,
तो उसे किसी शरीर का आधार लेना पड़ेगा—

  • या तो उसके शरीर में प्रवेश करके

  • या किसी और के शरीर में प्रवेश करके।

इसलिए शरीर आवश्यक है।


आत्मा का भटकना — सत्य या भ्रम?

लोग कहते हैं— आत्मा भटकती रहती है।
परंतु बीके ज्ञान कहता है—

आत्मा कभी भटकती नहीं।
वह केवल अपने कर्मों के अनुसार
सही समय और सही स्थान पर पहुँचती है।

आत्मा पेड़ पर बैठकर इंतज़ार नहीं करती।
वह गर्भ में जाकर भी बाहर निकल सकती है,
यदि उसे किसी आत्मा से अपना कर्मिक हिसाब पूरा करना है।

आत्मा को आने-जाने में
एक सेकंड भी देरी नहीं होती।

भटकाव केवल भ्रम है।
आत्मा अपने अगले अध्याय की तैयारी में रहती है।


निष्कर्ष — आत्मा की अनंत यात्रा

आत्मा शाश्वत, अजर, अमर है।
शरीर केवल एक पोशाक है,
कर्मों को निभाने का साधन है।

आत्मा का हर कदम—
जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म—
सब उसके कर्मों पर आधारित है।

पूरा चक्र एक स्तिक (static), ठीक, त्रुटिहीन,
ब्रह्मांडीय ड्रामा
है—
जो अनादि से चलता आ रहा है।