अव्यक्त मुरली-(42)28-11-1984 “संकल्प को सफल बनाने का सहज साधन”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
28-11-1984 “संकल्प को सफल बनाने का सहज साधन”
आज विश्व रचता, विश्व कल्याणकारी बाप विश्व की परिक्रमा करने के लिए, विशेष सर्व बच्चों की रेख-देख करने के लिए चारों ओर गये। ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को भी देखा। स्नेही सहयोगी बच्चों को भी देखा। भक्त बच्चों को भी देखा, अज्ञानी बच्चों को भी देखा। भिन्न-भिन्न आत्मायें अपनी-अपनी लगन में मगन देखा। कोई कुछ कार्य करने की लगन में मगन और कोई तोड़ने के कार्य में मगन, कोई जोड़ने के कार्य में मगन, लेकिन सभी मगन जरूर हैं। सभी के मन में संकल्प यही रहा कि कुछ मिल जाए, कुछ ले लें, कुछ पा लें, इसी लक्ष्य से हरेक अपने-अपने कार्य में लगा हुआ है। चाहे हद की प्राप्ति है, फिर भी कुछ मिल जाए वा कुछ बन जावें यही तात और लात सभी तरफ देखी। इसी के बीच ब्राह्मण बच्चों को विशेष देखा। देश में चाहे विदेश में सभी बच्चों में यही एक संकल्प देखा कि अब कुछ कर लें। बेहद के कार्य में कुछ विशेषता करके दिखावें। अपने में भी कोई विशेषता धारण कर विशेष आत्मा बन जायें। ऐसा उमंग मैजारिटी बच्चों में देखा। उमंग-उत्साह का बीज स्वयं के पुरूषार्थ से, साथ-साथ समय के वातावरण से सबके अन्दर प्रत्यक्ष रूप में देखा। इसी उमंग के बीज को बार-बार निरन्तर बनाने के अटेन्शन देने का पानी और चेकिंग अर्थात् सदा वृद्धि को पाने की विधि रूपी धूप देते रहें – इसमें नम्बरवार हो जाते हैं। बीज बोना सभी को आता है लेकिन पालना कर फल स्वरूप बनाना इसमें अन्तर हो जाता है।
बापदादा अमृतवेले से सारे दिन तक बच्चों का यह खेल कहो वा लगन का पुरूषार्थ कहो, रोज देखते हैं। हर एक बहुत अच्छे ते अच्छे स्व प्रति वा सेवा के प्रति उमंगों के संकल्प करते कि अभी से यह करेंगे, ऐसे करेंगे, अवश्य करेंगे। करके ही दिखायेंगे ऐसे श्रेष्ठ संकल्प के बीज बोते रहते हैं। बापदादा से रूह-रूहान में भी बहुत मीठी-मीठी बातें करते हैं। लेकिन जब उस संकल्प को अर्थात् बीज को प्रैक्टिकल में लाने की पालना करते तो क्या होता? कोई न कोई बातों में वृद्धि की विधि में वा फलस्वरूप बनाने की विशेषता में नम्बरवार यथाशक्ति बन जाते हैं। किसी भी संकल्प रूपी बीज को फलीभूत बनाने का सहज साधन एक ही है, वह है – “सदा बीज रूप बाप से हर समय सर्व शक्तियों का बल उस बीज में भरते रहना”। बीज रूप द्वारा आपके संकल्प रूपी बीज सहज और स्वत: वृद्धि को पाते फलीभूत हो जायेंगे। लेकिन बीज रूप से निरन्तर कनेक्शन न होने के कारण और आत्माओं को वा साधनों को वृद्धि की विधि बना देते हैं। इस कारण ऐसे करें वैसे करें, इस जैसा करें, इस विस्तार में समय और मेहनत ज्यादा लगाते हैं। क्योंकि किसी भी आत्मा और साधन को अपना आधार बना लेते हैं। सागर और सूर्य से पानी और धूप मिलने के बजाए कितने भी साधनों के पानी से आत्माओं को आधार समझ सकाश देने से बीज फलीभूत हो नहीं सकता। इसलिए मेहनत करने के बाद, समय लगाने के बाद जब प्रत्यक्ष फल की प्राप्ति नहीं होती तो चलते-चलते उत्साह कम हो जाता और स्वयं से वा साथियों से वा सेवा से निराश हो जाते हैं। कभी खुशी, कभी उदासी दोनों लहरें ब्राह्मण जीवन के नाव को कभी हिलाती कभी चलाती। आजकल कई बच्चों के जीवन की गति-विधि यह दिखाई देती है। चल भी रहे हैं, कार्य कर भी रहे हैं लेकिन जैसा होना चाहिए वैसा अनुभव नहीं करते हैं इसलिए खुशी है लेकिन खुशी में नाचते रहें, वह नहीं है। चल रहे हैं लेकिन तीव्रगति की चाल नहीं है। सन्तुष्ट भी हैं कि श्रेष्ठ जीवन वाले बन गये, बाप के बन गये, सेवाधारी बन गये, दु:ख दर्द की दुनिया से किनारे हो गये। लेकिन सन्तुष्टता के बीच कभी कभी असन्तुष्टता की लहर न चाहते, न समझते भी आ जाती है, क्योंकि ज्ञान सहज है, याद भी सहज है लेकिन सम्बन्ध और सम्पर्क में न्यारे और प्यारे बनकर प्रीत निभाना इसमें कहाँ सहज कहाँ मुश्किल बन जाता।
ब्राह्मण परिवार और सेवा की प्रवृत्ति, इसको कहा जाता है सम्बन्ध सम्पर्क। इसमें किसी न किसी बात से जैसा अनुभव होना चाहिए वैसा नहीं करते। इस कारण दोनों लहरें चलती हैं। अभी समय की समीपता के कारण पुरूषार्थ की यह रफ्तार समय प्रमाण सम्पूर्ण मंजिल पर पहुँचा नहीं सकेगी। अभी समय है विघ्न विनाशक बन विश्व के विघ्नों के बीच दु:खी आत्माओं को सुख चैन की अनुभूति कराना। बहुत काल से निर्विघ्न स्थिति वाला ही विघ्न विनाशक का कार्य कर सकता है। अभी तक अपने जीवन में आये हुए विघ्नों को मिटाने में बिजी रहेंगे, उसमें ही शक्ति लगायेंगे तो दूसरों को शक्ति देने के निमित्त कैसे बन सकेंगे। निर्विघ्न बन शक्तियों का स्टॉक जमा करो-तब शक्ति रूप बन विघ्न-विनाशक का कार्य कर सकेंगे। समझा!
विशेष दो बातें देखी। अज्ञानी बच्चे भारत में सीट लेने में वा सीट दिलाने में लगे हुए हैं। दिन रात स्वप्न में भी सीट ही नजर आती और ब्राह्मण बच्चे सेट होने में लगे हुए हैं। सीट मिली हुई है लेकिन सेट हो रहे हैं। विदेश में अपने ही बनाये हुए विनाशकारी शक्ति से बचने के साधन ढूँढने में लगे हुए हैं। मैजारिटी की जीवन, जीवन नहीं लेकिन क्वेश्चन मार्क बन गई है। अज्ञानी बचाव में लगे हुए हैं और ज्ञानी प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने में लगे हुए हैं। यह है विश्व का हाल-चाल। अब परेशानियों से बचाओ। भिन्न-भिन्न परेशानियों में भटकती हुई आत्माओं को शान्ति का ठिकाना दो। अच्छा।
सदा सम्पन्न स्थिति की सीट पर सेट रहने वाले, स्व के और विश्व के विघ्न-विनाशक, बीजरूप बाप के सम्बन्ध से हर श्रेष्ठ संकल्प रूपी बीज को फलीभूत बनाए प्रत्यक्ष फल खाने वाले, सदा सन्तुष्ट रहने वाले, सन्तुष्टमणी बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
हास्टेल की कुमारियों से बापदादा की मुलाकात:-
अपने भाग्य को देख हर्षित रहती हो ना? उल्टे रास्ते पर जाने से बच गई। गँवाने के बजाए कमाने वाली जीवन बना दी। लौकिक जीवन में बिना ज्ञान के गँवाना ही गँवाना है और ज्ञानी जीवन में हर सेकेण्ड कमाई ही कमाई है। वैसे तकदीरवान सभी ब्राह्मण हैं लेकिन फिर भी कुमारियाँ हैं डबल तकदीरवान। और कुमारी जीवन में ब्रह्माकुमारी बनना, ब्राह्मण बनना यह बहुत महान है। कम बात नहीं है। बहुत बड़ी बात है। ऐसे नशा रहता है क्या बन गई। साधारण कुमारी से शक्ति रूप हो गई। माया का संघार करने वाली शक्तियाँ हो ना! माया से घबराने वाली नहीं, संघार करने वाली। कमजोर नहीं, बहादुर। कभी छोटी मोटी बात पर घबराती तो नहीं हो? सदा श्रेष्ठ प्राप्ति को याद रखेंगी तो छोटी-छोटी बातें कुछ नहीं लगेंगी। अभी पूरा जीवन का सौदा किया या जब तक हास्टेल में है तब तक का सौदा है? कभी भी कोई श्रेष्ठ जीवन से साधारण जीवन में समझते हुए जा नहीं सकते। अगर कोई लखपति हो उसको कहो गरीब बनो, तो बनेगा? सरकमस्टाँस के कारण कोई बन भी जाता तो भी अच्छा नहीं लगता। तो यह जीवन है – स्वराज्य अधिकारी जीवन। उससे साधारण जीवन में जा नहीं सकते। तो अभी समझदार बनकर अनुभव कर रही हो या एक दो के संग में चल रही हो? अपनी बुद्धि का फैसला किया है? अपने विवेक की जजमेन्ट से यह जीवन बनाई है ना! या माँ बाप ने कहा तो चली आई? अच्छा!
(2) कुमारियों ने अपने आपको ऑफर किया? जहाँ भी सेवा में भेजें वहाँ जायेंगी? पक्का सौदा किया है या कच्चा? पक्का सौदा है तो जहाँ बिठाओ, जो कराओ… ऐसे तैयार हो? अगर कोई भी बन्धन है तो पक्का सौदा नहीं। अगर खुद तैयार हो तो कोई रोक नहीं सकता। बकरी को बाँध कर बिठाते हैं, शेर को कोई बाँध नहीं सकता। तो शेरनी किसके बंधन में कैसे आ सकती। वह जंगल में रहते भी स्वतन्त्र है। तो कौन हो? शेरनी? शेरनी माना मैदान में आनेवाली। जब एक बल एक भरोसा है तो हिम्मत बच्चों की, मदद बाप की। कैसा भी कड़ा बन्धन है लेकिन हिम्मत के आधार पर वह कड़ा बन्धन भी सहज छूट जाता है। जैसे दिखाते हैं जेल के ताले भी खुल गये तो आपके बन्धन भी खुल जायेंगे। तो ऐसे बनो। अगर थोड़ा सा भी बन्धन है तो उसको योग अग्नि से भस्म कर दो। भस्म हो जायेगा तो नामनिशान गुम। तोड़ने से फिर भी गाँठ लगा सकते। इसलिए तोड़ो नहीं लेकिन भस्म करो तो सदा के लिए मुक्त हो जायेंगे।
अध्याय – संकल्प को सफल बनाने का सहज साधन
(अव्यक्त मुरली: 28 नवंबर 1984 – “संकल्प को सफल बनाने का सहज साधन”)
1. प्रस्तावना — बापदादा का विश्व-परिक्रमा दृश्य
बापदादा विश्व रचने वाले, विश्व कल्याणकारी हैं। आज वे चारों ओर गए —
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ज्ञानी बच्चों को देखा
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स्नेही सहयोगी बच्चों को देखा
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भक्त आत्माओं को देखा
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अज्ञानी आत्माओं को देखा
हर आत्मा अपनी-अपनी लगन में मगन दिखी।
कोई जोड़ने में, कोई तोड़ने में, कोई बनाने में, कोई पाने में।
उदाहरण:
जैसे बाजार में हर दुकानदार किसी न किसी धंधे में लगा है — कोई मिठाई बना रहा है, कोई बेच रहा है, कोई साफ कर रहा है — पर हर किसी की मनशा एक ही…
“कुछ मिल जाए।”
इसी तरह दुनिया का हर मनुष्य–चाहे हद का हो या बेहद का—कुछ न कुछ पाने की लगन में है।
2. ब्राह्मण बच्चों का विशेष दृश्य — उमंग का बीज
दुनियादारी में व्यस्त भीड़ के बीच बापदादा ने ब्राह्मण बच्चों का एक अद्भुत दृश्य देखा:
सबके मन में एक ही संकल्प—“अब कुछ कर दिखाएँ”।
-
कुछ विशेषता धारण करें
-
बेहद की सेवा में आगे आएँ
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स्वयं को ऊँचा बनाएँ
यह उमंग केवल बच्चों के प्रयास से ही नहीं, समय के वातावरण से भी बढ़ रहा है।
परंतु समस्या क्या आती है?
बीज बो देते हैं लेकिन
पालना नहीं करते → फल नहीं मिलता।
3. संकल्प-बीज क्यों सफल नहीं होते?
रोज अमृतवेले अच्छे संकल्प बनाते हैं:
“यह करेंगे… ऐसे करेंगे… अवश्य करेंगे…”
बापदादा से बहुत मीठी रूहानी बातचीत भी करते हैं।
लेकिन जब उन संकल्पों को व्यवहार में लाने की बात आती है—
-
कहीं कमी
-
कहीं कमजोरी
-
कहीं ढीलापन
आ जाता है।
उदाहरण:
जैसे कोई किसान रोज कहे—
“आज खेत सींचूँगा, कल खाद डालूँगा…”
पर करे कुछ भी नहीं!
तो फसल कैसे उगेगी?
4. संकल्प को सफल बनाने का एकमात्र सहज साधन
बापदादा बहुत साफ कहते हैं:
**“संकल्प को फलीभूत बनाने का एक ही साधन है —
सदा बीजरूप बाप से कनेक्शन।”**
जब संकल्प-बीज में
-
शक्ति की धूप
-
अटेन्शन का पानी
-
निरंतर याद की खाद
भरती है— तभी वह सहज बढ़ता है।
लेकिन बच्चे कभी-कभी
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साधन
-
परिस्थितियों
-
लोगों
को आधार बना लेते हैं।
इससे मेहनत बढ़ जाती है, पर फल कम मिलता है।
मुख्य सिद्धांत
“सागर और सूर्य से पानी-धूप मिले तो बीज बढ़ेगा।
साधनों से नहीं।”
5. क्यों कम हो जाती है खुशी और उत्साह?
बापदादा बताते हैं:
-
प्रयास करते हैं
-
चल रहे हैं
-
सेवा कर रहे हैं
-
श्रेष्ठ जीवन भी मिला है
फिर भी…
कभी खुशी, कभी उदासी की लहरें चलती रहती हैं।
क्यों?
क्योंकि
-
ज्ञान सहज
-
योग सहज
-
परन्तु
“सम्बंध और सम्पर्क में न्यारे-प्यारे रहकर प्रीत निभाना—यहीं मुश्किल पड़ जाती है।”
6. विश्व का वर्तमान हाल — दो विशेष दृश्य
(1) अज्ञानी बच्चों का हाल
-
भारत में सीट पाने में लगे हुए
-
विदेश में सेफ्टी साधनों की खोज में
-
जीवन “Question Mark” बनता जा रहा है
(2) ब्राह्मण बच्चों का हाल
-
सीट मिली हुई है
-
लेकिन “सेट” होने में लगे हुए हैं
-
प्रत्यक्षता का झंडा लहराने की तैयारी
7. अभी का समय — विघ्न-विनाशक बनने का आह्वान
“ब्रह्मण जीवन की नाव”
—कभी लहर ऊपर, कभी नीचे।
लेकिन अब समय है—
“निर्विघ्न स्थिति का स्टॉक जमा करो।”
तभी
दुनिया के विघ्न विनाशक बन सकेंगे।
अगर अपनी चुनौतियों में ही बिजी रहे,
तो दूसरों को शक्ति कैसे देंगे?
8. कुमारियों के लिए बापदादा के मृदु वचन (हॉस्टल मुलाकात)
1. भाग्य पर हर्षित रहो
साधारण कुमारी से
शक्ति रूपा बन गई हो।
2. माया से घबराना नहीं — संघार करना
यदि छोटी बातें हिला दें,
तो कमज़ोरी आएगी।
3. जीवन का पूरा सौदा — अधूरा नहीं
लखपति को गरीब बनना अच्छा नहीं लगता—
इसी तरह ब्राह्मण जीवन से साधारण में गिरना अशोभनीय।
4. स्वनिर्णय, स्वविवेक और स्वराज्य
ज्ञान जीवन किसी के कहने से नहीं—
स्वनिर्णय से बनना चाहिए।
5. शेरनी बनो — बंधन तोड़ो नहीं, भस्म करो
योग-अग्नि से बंधन भस्म हो जाए
तो नाम-निशान मिट जाता है।
अंतिम आशीर्वाद-संदेश
“सदा सम्पन्न स्थिति की सीट पर सेट रहने वाले,
विघ्न-विनाशक,
बीज रूप बाप से शक्ति लेकर संकल्प-बीज को फलीभूत बनाने वाले,
सदा संतुष्टमणि बच्चे —
बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।”
Q1. बापदादा ने विश्व-परिक्रमा करते समय क्या दृश्य देखा?
A: बापदादा ने देखा कि दुनिया की हर आत्मा अपनी-अपनी लगन में मगन है—
-
कोई जोड़ने में
-
कोई तोड़ने में
-
कोई बनाने में
-
कोई पाने में
सबके मन में एक ही संकल्प था:
“कुछ मिल जाए… कुछ पा लें।”
जैसे बाजार में हर दुकानदार किसी न किसी काम में लगा है पर उद्देश्य एक ही—लाभ पाना।
Q2. दुनियादारी की भीड़ में ब्राह्मण बच्चों का विशेष दृश्य क्या था?
A: ब्राह्मण बच्चों में एक अद्भुत उमंग दिखाई दिया—
-
“अब कुछ कर दिखाएँ”
-
स्वयं को विशेष बनाएं
-
बेहद की सेवा में आगे आएँ
बापदादा ने देखा कि बच्चों के अंदर उत्साह का बीज जग चुका है—
ये उमंग उनके पुरुषार्थ से भी और समय के वातावरण से भी बढ़ता जा रहा है।
Q3. संकल्प-बीज बोने के बाद भी फल क्यों नहीं मिलता?
A: क्योंकि बच्चे संकल्प लेते तो बहुत हैं, लेकिन…
-
उनकी पालना
-
अटेन्शन
-
नियमित चेकिंग
कमी हो जाती है।
उदाहरण:
जैसे किसान रोज कहे कि “आज खेत सींचूँगा…” लेकिन करे कुछ भी नहीं—तो फसल कैसे उगेगी?
Q4. रोज अमृतवेले लिए गए अच्छे संकल्प व्यवहार में क्यों नहीं उतरते?
A: संकल्प तो बहुत ऊँचे बनते हैं—
“यह करेंगे… ऐसे करेंगे… अवश्य करेंगे…”
पर व्यवहार में लाते समय
-
ढीलापन
-
कमजोरी
-
परिस्थितियों का प्रभाव
आ जाता है।
इसलिए संकल्प और कर्म के बीच अंतर रह जाता है।
Q5. बापदादा के अनुसार संकल्प को सफल बनाने का सबसे सहज एकमात्र साधन क्या है?
A:
⭐ “सदा बीजरूप बाप के साथ कनेक्शन रखा जाए।”
याद, शक्ति और अटेन्शन की धूप-खाद जब सीधा बाप से मिलती है, तभी संकल्प-बीज सहज फलीभूत होता है।
यदि बच्चे आधार बनाते हैं
-
साधन
-
परिस्थितियाँ
-
या किसी मनुष्य को
तो संकल्प कमजोर हो जाते हैं।
Q6. सागर और सूर्य (बाप) से कनेक्शन क्यों जरूरी है?
A: क्योंकि केवल बाप ही
-
शक्ति
-
शांति
-
प्रकाश
का स्रोत हैं।
साधन व मनुष्यों से मिलने वाला “पानी-धूप” कमजोर होती है—वह स्थायी फल नहीं दे सकती।
Q7. ब्राह्मण जीवन में खुशी और उदासी की लहरें क्यों आती हैं?
A:
-
ज्ञान सहज है
-
योग भी सहज है
लेकिन
“सम्बंध और सम्पर्क में न्यारे-प्यारे रहकर प्रीत निभाने में कठिनाई आती है।”
यहीं से ही मन की लहरें उठती हैं—कभी खुशी… कभी हल्की उदासी।
Q8. वर्तमान विश्व का हाल बापदादा ने दो भागों में कैसे बताया?
A:
(1) अज्ञानी बच्चों का हाल
-
भारत में: सीट पाने की दौड़
-
विदेश में: विनाशकारी साधनों से बचने की खोज
-
जीवन “Question Mark” बन गया है
(2) ब्राह्मण बच्चों का हाल
-
सीट तो मिली हुई है
-
लेकिन “सेट होने” में लगे हुए हैं
-
प्रत्यक्षता का झंडा लहराने की तैयारी कर रहे हैं
Q9. बापदादा क्यों कहते हैं कि अब समय विघ्न-विनाशक बनने का है?
A: क्योंकि
-
विश्व को शांति चाहिए
-
आत्माओं को शक्ति चाहिए
-
समस्याएँ बढ़ रही हैं
यदि ब्राह्मण बच्चे अपनी ही चुनौतियों में उलझे रहें,
तो वे दुनिया तक शक्ति कैसे पहुँचाएंगे?
इसलिए आदेश:
⭐ “निर्विघ्न स्थिति का स्टॉक जमा करो।”
Q10. कुमारियों को बापदादा ने कौन-कौन से विशेष वचन दिए?
A:
(1) भाग्य पर हर्षित रहो
साधारण कुमारी से शक्ति रूपा बनना—बहुत बड़ा भाग्य है।
(2) माया से घबराना नहीं
तुम विनाशकारी शक्तियाँ हो, डरने की नहीं—संहार करने की।
(3) जीवन का पूरा सौदा करो
ब्राह्मण जीवन से साधारण जीवन में गिरना अशोभनीय है।
(4) स्वनिर्णय और स्वविवेक
ज्ञान जीवन किसी के कहने से नहीं—स्व-विवेक से बनाना चाहिए।
(5) शेरनी बनो — बंधन भस्म करो
तोड़ने से नहीं—
योग-अग्नि से बंधन भस्म होते हैं।
तब नाम-निशान भी मिट जाता है।
Q11. मुरली का अंतिम आशीर्वाद क्या है?
A:
“सदा सम्पन्न स्थिति की सीट पर सेट रहने वाले,
विघ्न-विनाशक,
बीज-रूप बाप से शक्ति लेकर
हर संकल्प-बीज को फलीभूत बनाने वाले,
सदा संतुष्टमणि बच्चे —
बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।”
YouTube Disclaimer (Hindi)
Disclaimer:
यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन, प्रेरणा और आत्म-उन्नति के उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें प्रस्तुत सभी शिक्षाएँ ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली (28-11-1984) पर आधारित हैं।
इसका उद्देश्य किसी भी संप्रदाय, संस्था या व्यक्ति की धार्मिक मान्यताओं का खंडन करना नहीं है।
कृपया इसे अपने विवेक और आध्यात्मिक समझ के अनुसार आत्मकल्याण हेतु प्रयोग करें।
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