अव्यक्त मुरली-(39)16-12-1985 “राइट हैण्ड कैसे बनें?”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
16-12-1985 “राइट हैण्ड कैसे बनें?”
आज बापदादा अपनी अनेक भुजाओं को देख रहे हैं। 1. भुजायें सदा प्रत्यक्ष कर्म करने का आधार हैं। हर आत्मा अपनी भुजाओं द्वारा ही कर्म करती है। 2. भुजायें सहयोग की निशानी भी कही जातीं। सहयोगी आत्मा को राइटहैण्ड कहा जाता है। तो हाथ भुजा का साधन है। 3. भुजाओं को शक्ति रूप में भी दिखाया जाता है, इसलिए बाहुबल कहा जाता है। भुजाओं की और विशेषता है 4. भुजा अर्थात् हाथ – स्नेह की निशानी है। इसलिए जब भी स्नेह से मिलते हैं तो आपस में हाथ मिलाते हैं। भुजाओं का विशेष स्वरूप पहला सुनाया – संकल्प को कर्म में प्रत्यक्ष करना। आप सभी बाप की भुजायें हो। तो यह चार ही विशेषतायें अपने में दिखाई देती हैं? इन चारों ही विशेषताओं द्वारा अपने आपको जान सकते हो कि मैं कौन-सी भुजा हूँ? भुजा तो सभी हो लेकिन राइट हैं वा लेफ्ट हैं यह इन विशेषताओं से चेक करो।
पहली बात बाप के हर एक श्रेष्ठ संकल्प को, बोल को कर्म में अर्थात् प्रत्यक्ष जीवन में कहाँ तक लाया है? कर्म सभी के प्रत्यक्ष देखने की सहज वस्तु है। कर्म को सभी देख सकते हैं और सहज जान सकते वा कर्म द्वारा अनुभव कर सकते हैं। इसलिए सब लोग भी यही कहते हैं कि कहते तो सब हैं लेकिन करके दिखाओ। प्रत्यक्ष कर्म में देखें तब मानें कि, यह जो कहते हैं वह सत्य है। तो कर्म, संकल्प के साथ बोल को भी प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में स्पष्ट करने वाला है। ऐसे राइट हैण्ड वा राइट भुजा हर कर्म द्वारा बाप को प्रत्यक्ष कर रही है? राइट हैण्ड की विशेषता है – उससे सदा शुभ और श्रेष्ठ कर्म होता है। राइट हैण्ड के कर्म की गति लेफ्ट से तीव्र होती है। तो ऐसे चेक करो। सदा शुभ और श्रेष्ठ कर्म तीव्रगति से हो रहे हैं? श्रेष्ठ कर्मधारी राइट हैण्ड हैं? अगर यह विशेषतायें नहीं तो स्वत: ही लेफ्ट हैण्ड हो गये क्योंकि ऊंचे ते ऊंचे बाप को प्रत्यक्ष करने के निमित्त ऊंचे ते ऊंचे कर्म हैं। चाहे रूहानी दृष्टि द्वारा, चाहे अपने खुशी के रूहानियत के चेहरे द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करते हो। यह भी कर्म ही है। तो ऐसे श्रेष्ठ कर्मधारी बने हो?
इसी प्रकार भुजा अर्थात् सहयोग की निशानी। तो चेक करो हर समय बाप के कर्तव्य में सहयोगी हैं? तन-मन-धन तीनों से सदा सहयोगी हैं? वा कभी-कभी के सहयोगी हैं? जैसे लौकिक कार्य में कोई फुल टाइम कार्य करने वाले होते हैं। कोई थोड़ा समय काम करने वाले हैं। उसमें अन्तर होता है ना। तो कभी-कभी के सहयोगी जो हैं उन्हों की प्राप्ति और सदा के सहयोग की प्राप्ति में अन्तर हो जाता है। जब समय मिला, जब उमंग आया वा जब मूड बनी तब सहयोगी बने। नहीं तो सहयोगी के बदले वियोगी बन जाते हैं। तो चेक करो तीनों रूपों से अर्थात् तन-मन-धन सभी रूप से पूर्ण सहयोगी बने हैं वा अधूरे बने हैं? देह और देह के सम्बन्ध उसमें ज्यादा तन-मन-धन लगाते हो वा बाप के श्रेष्ठ कार्य में लगाते हो? देह के सम्बन्धों की जितनी प्रवृत्ति है उतना ही अपने देह की भी प्रवृत्ति लम्बी चौड़ी है। कई बच्चे सम्बन्ध की प्रवृत्ति से परे हो गये हैं लेकिन देह की प्रवृत्ति में समय, संकल्प, धन ईश्वरीय कार्य से ज्यादा लगाते हैं। अपने देह की प्रवृत्ति की गृहस्थी भी बड़ी जाल है। इस जाल से परे रहना, इसको कहेंगे राइट हैण्ड। सिर्फ ब्राह्मण बन गये, ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारी कहने के अधिकारी बन गये इसको सदा के सहयोगी नहीं कहेंगे। लेकिन दोनों ही प्रवृत्तियों से न्यारे और बाप के कार्य के प्यारे। देह की प्रवृत्ति की परिभाषा बहुत विस्तार की है। इस पर भी फिर कभी स्पष्ट करेंगे। लेकिन सहयोगी कहाँ तक बने हैं यह अपने को चेक करो!
तीसरी बात – भुजा स्नेह की निशानी है। स्नेह अर्थात् मिलन। जैसे देहधारी आत्माओं का देह का मिलन हाथ में हाथ मिलाना होता है। ऐसे जो राइट हैण्ड वा राइट भुजा है उसकी निशानी है – संकल्प में मिलन, बोल में मिलन और संस्कार में मिलन। जो बाप का संकल्प वह राइट हैण्ड का संकल्प होगा। बाप के व्यर्थ संकल्प नहीं होते। सदा समर्थ संकल्प यह निशानी है। जो बाप के बोल, सदा सुखदाई बोल, सदा मधुर बोल, सदा महावाक्य हो, साधारण बोल नहीं। सदा अव्यक्त भाव हो, आत्मिक भाव हो। व्यक्त भाव के बोल नहीं। इसको कहते हैं स्नेह अर्थात् मिलन। ऐसे ही संस्कार मिलन। जो बाप के संस्कार, सदा उदारचित कल्याणकारी, नि:स्वार्थ ऐसे विस्तार तो बहुत है। सार रूप में जो बाप के संस्कार वह राइट हैण्ड के संस्कार होंगे। तो चेक करो ऐसे समान बनना – अर्थात् स्नेही बनना। यह कहाँ तक है?
चौथी बात – भुजा अर्थात् शक्ति। तो यह भी चेक करो कहाँ तक शक्तिशाली बने हैं? संकल्प शक्तिशाली, दृष्टि, वृत्ति शक्तिशाली कहाँ तक बनी है? शक्तिशाली संकल्प, दृष्टि वा वृत्ति की निशानी है – वह शक्तिशाली होने के कारण किसी को भी परिवर्तन कर लेगा। संकल्प से श्रेष्ठ सृष्टि की रचना करेगा। वृत्ति से वायुमण्डल परिवर्तन करेगा। दृष्टि से अशरीरी आत्मा स्वरूप का अनुभव करायेगा। तो ऐसी शक्तिशाली भुजा हो! वा कमजोर हो? अगर कमजोरी है तो लेफ्ट हैं। अभी समझा राइट हैण्ड किसको कहा जाता है! भुजायें तो सभी हो। लेकिन कौन-सी भुजा हो? वह इन विशेषताओं से स्वयं को जानो। अगर दूसरा कोई कहेगा कि तुम राइट हैण्ड नहीं हो तो सिद्ध भी करेंगे और जिद भी करेंगे लेकिन अपने आपको जो हूँ जैसा हूँ वैसे जानो क्योंकि अभी फिर भी स्वयं को परिवर्तन करने का थोड़ा समय है। अलबेलेपन में आ करके चला नहीं दो कि मैं भी ठीक हूँ। मन खाता भी है लेकिन अभिमान वा अलबेलापन परिवर्तन कराए आगे नहीं बढ़ाता है। इसलिए इससे मुक्त हो जाओ। यथार्थ रीति से अपने को चेक करो। इसी में ही स्व कल्याण भरा हुआ है। समझा। अच्छा।
सदा स्व परिवर्तन में, स्व-चिन्तन में रहने वाले, सदा स्वयं में सर्व विशेषताओं को चेक कर सम्पन्न बनने वाले, सदा दोनों प्रवृत्तियों से न्यारे, बाप और बाप के कार्य में प्यारे रहने वाले, अभिमान और अलबेलेपन से सदा मुक्त रहने वाले, ऐसे तीव्र पुरूषार्थी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
पार्टियों से:- 1. सदा अपने को स्वदर्शन चक्रधारी अनुभव करते हो? स्वदर्शन चक्र अनेक प्रकार के माया के चक्करों को समाप्त करने वाला है। माया के अनेक चक्र हैं और बाप उन चक्रों से छुड़ाकर विजयी बना देता। स्वदर्शन चक्र के आगे माया ठहर नहीं सकती – ऐसे अनुभवी हो? बापदादा रोज इसी टाइटिल से यादप्यार भी देते हैं। इसी स्मृति से सदा समर्थ रहो। सदा स्व के दर्शन में रहो तो शक्तिशाली बन जायेंगे। कल्प-कल्प की श्रेष्ठ आत्मायें थे और हैं यह याद रहे तो मायाजीत बने पड़े हैं। सदा ज्ञान को स्मृति में रख, उसकी खुशी में रहो। खुशी अनेक प्रकार के दु:ख भुलाने वाली है। दुनिया दु:खधाम में है और आप सभी संगमयुगी बन गये। यह भी भाग्य है।
2. सदा पवित्रता की शक्ति से स्वयं को पावन बनाए औरों को भी पावन बनने की प्रेरणा देने वाले हो ना? घर-गृहस्थ में रह पवित्र आत्मा बनना, इस विशेषता को दुनिया के आगे प्रत्यक्ष करना है। ऐसे बहादुर बने हो! पावन आत्मायें हैं इसी स्मृति से स्वयं भी परिपक्व और दुनिया को भी यह प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाते चलो। कौन-सी आत्मा हो? असम्भव को सम्भव कर दिखाने के निमित्त, पवित्रता की शक्ति फैलाने वाली आत्मा हूँ। यह सदा स्मृति में रखो।
3. कुमार सदा अपने को मायाजीत कुमार समझते हो? माया से हार खाने वाले नहीं लेकिन सदा माया को हार खिलाने वाले। ऐसे शक्तिशाली बहादुर हो ना! जो बहादुर होता है उससे माया भी स्वयं घबराती है। बहादुर के आगे माया कभी हिम्मत नहीं रख सकती। जब किसी भी प्रकार की कमजोरी देखती है तब माया आती है। बहादुर अर्थात् सदा मायाजीत। माया आ नहीं सकती, ऐसे चैलेन्ज करने वाले हो ना! सभी आगे बढ़ने वाले हो ना! सभी स्वयं को सेवा के निमित्त अर्थात् सदा विश्व कल्याणकारी समझ आगे बढ़ने वाले हो! विश्व कल्याणकारी बेहद में रहते हैं, हद में नहीं आते। हद में आना अर्थात् सच्चे सेवाधारी नहीं। बेहद में रहना अर्थात् जैसा बाप वैसे बच्चे। बाप को फॉलो करने वाले श्रेष्ठ कुमार हैं, सदा इसी स्मृति में रहो। जैसे बाप सम्पन्न है, बेहद का है ऐसे बाप समान सम्पन्न सर्व खजानों से भरपूर आत्मा हूँ – इस स्मृति से व्यर्थ समाप्त हो जायेगा। समर्थ बन जायेंगे।
भूमिका : बापदादा अपनी भुजाओं को देख रहे हैं
आज बापदादा अपनी अनेक भुजाओं को देख रहे हैं।
आप सभी आत्माएँ बाप की भुजाएँ हो।
भुजा अर्थात् —
कर्म की शक्ति
सहयोग की पहचान
स्नेह का प्रतीक
शक्ति का स्वरूप
लेकिन प्रश्न यह है —
हम राइट हैण्ड हैं या लेफ्ट हैण्ड?
भुजाएँ तो सभी हैं,
पर कौन-सी भुजा हैं — यह चार विशेषताओं से पहचानी जाती है।
भुजा की पहली पहचान — संकल्प को कर्म में प्रत्यक्ष करना
भुजाएँ सदा प्रत्यक्ष कर्म करने का आधार हैं।
हर आत्मा अपने कर्मों द्वारा ही पहचानी जाती है।
दुनिया भी यही कहती है —
“कहते तो सब हैं, करके दिखाओ!”
राइट हैण्ड की पहचान
✔ जो बाप के हर श्रेष्ठ संकल्प को
✔ श्रेष्ठ बोल को
✔ प्रत्यक्ष जीवन में उतार देता है
वही राइट हैण्ड है।
विशेषताएँ
-
सदा शुभ कर्म
-
सदा श्रेष्ठ कर्म
-
तीव्र गति से कर्म
-
कर्मों द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करना
उदाहरण
अगर कोई आत्मा
ज्ञान तो सुनाती है,
पर जीवन में क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार चलता है —
तो वह लेफ्ट हैण्ड है।
लेकिन जो
अपने चेहरे से खुशी,
दृष्टि से शांति,
व्यवहार से प्रेम फैलाता है —
वही राइट हैण्ड है।
भुजा की दूसरी पहचान — सहयोग की भावना
भुजा अर्थात् सहयोग की निशानी।
प्रश्न स्वयं से पूछो:
-
क्या मैं तन से सहयोगी हूँ?
-
क्या मैं मन से सहयोगी हूँ?
-
क्या मैं धन से सहयोगी हूँ?
या फिर
जब मन हुआ तब सहयोग,
मूड बना तब सेवा?
उदाहरण
जैसे लौकिक नौकरी में
कोई फुल टाइम कर्मचारी होता है
और कोई पार्ट टाइम —
दोनों की तनख्वाह अलग होती है।
वैसे ही
सदा सहयोगी और कभी-कभी सहयोगी
दोनों की प्राप्ति अलग होती है।
राइट हैण्ड कौन?
जो
देह और सम्बन्धों की प्रवृत्ति से न्यारा
और बाप के कार्य में प्यारा हो —
वही राइट हैण्ड है।
भुजा की तीसरी पहचान — स्नेह और मिलन
भुजा स्नेह की निशानी है।
स्नेह अर्थात् मिलन।
जैसे देहधारी हाथ मिलाते हैं,
वैसे रूहानी आत्माएँ
संकल्प, बोल और संस्कार में मिलन करती हैं।
राइट हैण्ड की पहचान
✔ बाप जैसा संकल्प
✔ बाप जैसे बोल
✔ बाप जैसे संस्कार
उदाहरण
-
बाप का संकल्प = समर्थ संकल्प
-
बाप का बोल = मधुर, सुखदाई, महावाक्य
-
बाप का संस्कार = उदार, कल्याणकारी, निःस्वार्थ
जो आत्मा
व्यर्थ संकल्प, कटु बोल और संकीर्ण संस्कार रखती है —
वह लेफ्ट हैण्ड है।
भुजा की चौथी पहचान — शक्ति
भुजा अर्थात् शक्ति।
राइट हैण्ड की शक्ति
✔ शक्तिशाली संकल्प
✔ शक्तिशाली दृष्टि
✔ शक्तिशाली वृत्ति
शक्ति की निशानी
-
संकल्प से सृष्टि परिवर्तन
-
वृत्ति से वातावरण परिवर्तन
-
दृष्टि से आत्मा को अशरीरी अनुभव
उदाहरण
जहाँ आप जाएँ
वहाँ शांति फैल जाए
वहाँ नकारात्मकता समाप्त हो जाए
लोग प्रेरित हो जाएँ —
तो समझो आप राइट हैण्ड हैं।
आत्म-चेकिंग : मैं कौन-सी भुजा हूँ?
भुजा तो सभी हैं
लेकिन राइट या लेफ्ट —
यह स्वयं को ईमानदारी से चेक करना है।
प्रश्न 1: आज बापदादा क्या देख रहे हैं?
उत्तर:
आज बापदादा अपनी अनेक भुजाओं को देख रहे हैं।
आप सभी आत्माएँ बाप की भुजाएँ हो।
प्रश्न 2: भुजा का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
भुजा केवल शरीर का अंग नहीं है, बल्कि उसका आध्यात्मिक अर्थ है —
कर्म की शक्ति
सहयोग की पहचान
स्नेह का प्रतीक
शक्ति का स्वरूप
अर्थात् जो आत्मा इन चार विशेषताओं को धारण करती है, वही सच्ची भुजा कहलाती है।
प्रश्न 3: मुख्य प्रश्न क्या है — हम कौन-सी भुजा हैं?
उत्तर:
भुजाएँ तो सभी हैं,
लेकिन प्रश्न यह है —
हम राइट हैण्ड हैं या लेफ्ट हैण्ड?
यह पहचान चार विशेषताओं से होती है।
पहली पहचान — संकल्प को कर्म में प्रत्यक्ष करना
प्रश्न 4: भुजा की पहली पहचान क्या है?
उत्तर:
भुजा की पहली पहचान है —
संकल्प को कर्म में प्रत्यक्ष करना।
भुजाएँ सदा प्रत्यक्ष कर्म करने का आधार हैं।
हर आत्मा अपने कर्मों द्वारा ही पहचानी जाती है।
प्रश्न 5: राइट हैण्ड की पहचान क्या है?
उत्तर:
जो आत्मा —
✔ बाप के हर श्रेष्ठ संकल्प को
✔ श्रेष्ठ बोल को
✔ अपने जीवन में उतार देती है
वही राइट हैण्ड है।
प्रश्न 6: राइट हैण्ड की कर्म संबंधी विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
राइट हैण्ड की विशेषताएँ —
-
सदा शुभ कर्म
-
सदा श्रेष्ठ कर्म
-
तीव्र गति से कर्म
-
कर्मों द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करना
प्रश्न 7: लेफ्ट हैण्ड की पहचान कैसे होती है?
उत्तर:
अगर कोई आत्मा
ज्ञान तो सुनाती है
लेकिन जीवन में क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार चलता है —
तो वह लेफ्ट हैण्ड है।
लेकिन जो आत्मा
अपने चेहरे से खुशी,
दृष्टि से शांति,
व्यवहार से प्रेम फैलाती है —
वही राइट हैण्ड है।
दूसरी पहचान — सहयोग की भावना
प्रश्न 8: भुजा को सहयोग की निशानी क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि भुजा अर्थात् सहयोग।
जो आत्मा बाप के कार्य में सहयोगी बनती है — वही सच्ची भुजा है।
प्रश्न 9: हमें स्वयं से कौन-से प्रश्न पूछने चाहिए?
उत्तर:
-
क्या मैं तन से सहयोगी हूँ?
-
क्या मैं मन से सहयोगी हूँ?
-
क्या मैं धन से सहयोगी हूँ?
या फिर —
जब मन हुआ तब सहयोग,
मूड बना तब सेवा?
प्रश्न 10: सदा सहयोगी और कभी-कभी सहयोगी में क्या अंतर है?
उत्तर:
जैसे लौकिक नौकरी में
फुल टाइम कर्मचारी और पार्ट टाइम कर्मचारी की तनख्वाह अलग होती है,
वैसे ही सदा सहयोगी और कभी-कभी सहयोगी की प्राप्ति भी अलग होती है।
प्रश्न 11: राइट हैण्ड कौन कहलाता है?
उत्तर:
जो आत्मा —
देह और सम्बन्धों की प्रवृत्ति से न्यारी हो
और बाप के कार्य में प्यारी हो —
वही राइट हैण्ड है।
तीसरी पहचान — स्नेह और मिलन
प्रश्न 12: भुजा को स्नेह की निशानी क्यों कहा गया है?
उत्तर:
भुजा स्नेह की निशानी है।
स्नेह अर्थात् मिलन।
जैसे देहधारी हाथ मिलाते हैं,
वैसे रूहानी आत्माएँ
संकल्प, बोल और संस्कार में मिलन करती हैं।
प्रश्न 13: राइट हैण्ड का मिलन किससे होता है?
उत्तर:
राइट हैण्ड का मिलन होता है —
✔ बाप जैसे संकल्प से
✔ बाप जैसे बोल से
✔ बाप जैसे संस्कार से
प्रश्न 14: बाप के संकल्प, बोल और संस्कार कैसे होते हैं?
उत्तर:
-
बाप का संकल्प = समर्थ संकल्प
-
बाप का बोल = मधुर, सुखदाई, महावाक्य
-
बाप का संस्कार = उदार, कल्याणकारी, निःस्वार्थ
प्रश्न 15: लेफ्ट हैण्ड की पहचान यहाँ कैसे होती है?
उत्तर:
जो आत्मा
व्यर्थ संकल्प,
कटु बोल
और संकीर्ण संस्कार रखती है —
वह लेफ्ट हैण्ड है।
चौथी पहचान — शक्ति
प्रश्न 16: भुजा को शक्ति का स्वरूप क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि भुजा अर्थात् शक्ति।
राइट हैण्ड शक्तिशाली आत्मा होती है।
प्रश्न 17: राइट हैण्ड की शक्ति कैसी होती है?
उत्तर:
✔ शक्तिशाली संकल्प
✔ शक्तिशाली दृष्टि
✔ शक्तिशाली वृत्ति
प्रश्न 18: शक्तिशाली आत्मा की निशानी क्या है?
उत्तर:
-
संकल्प से सृष्टि परिवर्तन
-
वृत्ति से वातावरण परिवर्तन
-
दृष्टि से आत्मा को अशरीरी अनुभव कराना
प्रश्न 19: राइट हैण्ड आत्मा का व्यावहारिक अनुभव क्या है?
उत्तर:
जहाँ वह आत्मा जाती है —
-
वहाँ शांति फैल जाती है
-
नकारात्मकता समाप्त हो जाती है
-
लोग प्रेरित हो जाते हैं
तो समझो वह आत्मा राइट हैण्ड है।
🪞 आत्म-चेकिंग
प्रश्न 20: अंत में हमें क्या चेक करना चाहिए?
उत्तर:
भुजा तो सभी हैं,
लेकिन राइट या लेफ्ट —
यह स्वयं को ईमानदारी से चेक करना है।
यही आत्म-चिंतन
यही स्व-परिवर्तन
यही सच्चा पुरुषार्थ है।
Disclaimer
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के अव्यक्त मुरली (दिनांक 16-12-1985) पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन और आत्म-चिंतन के उद्देश्य से बनाया गया है। इसका उद्देश्य आत्मा को श्रेष्ठ पुरुषार्थ की प्रेरणा देना है। यह किसी व्यक्ति, संस्था या धर्म के विरुद्ध नहीं है। सभी दर्शकों से निवेदन है कि इसे आध्यात्मिक दृष्टि से समझें।
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