(02)If sex is impure, then why did God create male and female bodies?

बी.के.पति-पत्नी का संबंध(02)अगर सेक्स अशुद्ध है तो भगवान ने मेल-फीमेल शरीर क्यों बनाए?

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

ब्रह्मा कुमारीज में पति-पत्नी का संबंध — पवित्रता का गुप्त आध्यात्मिक रहस्य


भूमिका : आज का सबसे बड़ा प्रश्न

आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है —

अगर सेक्स अशुद्ध है, पाप है, गलत है —
तो भगवान ने मेल-फीमेल शरीर क्यों बनाए?

लोग कहते हैं —
अगर उपयोग ही नहीं करना था,
तो ये अंग बनाए ही क्यों?

यही प्रश्न आज ब्रह्मा कुमारीज़ के ज्ञान के प्रति सबसे बड़ा विरोध भी बनता है।
लेकिन वास्तव में यही प्रश्न पूरे ईश्वरीय ज्ञान का द्वार खोलता है।


अध्याय 1 : परमात्मा मेल-फीमेल शरीर नहीं बनाते

सबसे पहली स्पष्टता —

परमात्मा शरीर नहीं बनाते।
परमात्मा आत्मा भी नहीं बनाते।
 परमात्मा आत्मा को पतित से पावन बनाते हैं।

 मुरली प्रमाण

साकार मुरली – 18 जनवरी 1968

“मैं आत्माओं का पिता हूँ। शरीर मेरा बनाया हुआ नहीं है।”

शरीर प्रकृति के पाँच तत्वों से बना है।
मेल और फीमेल शरीर — यह प्रकृति का विधान है।
कंट्रोलर आत्मा है।


अध्याय 2 : अशुद्ध का असली अर्थ क्या है?

दुनिया में अशुद्ध का अर्थ लिया जाता है —
गंदा, पाप, गलत।

लेकिन मुरली में अशुद्ध का अर्थ अलग है।

 मुरली का सार

जहाँ देह-अभिमान है, वहाँ अशुद्धता है।

अशुद्ध = आत्मा की ऊर्जा का देह में बह जाना


उदाहरण 1 : दूध और गंदा बर्तन

अगर शुद्ध दूध गंदे बर्तन में डाल दो,
तो दूध भी खराब हो जाता है।

वैसे ही —
अगर आत्मा की शक्ति देह-अभिमान में बह जाए,
तो आत्मा कमजोर हो जाती है।


अध्याय 3 : युग और शरीर का उपयोग

चार युग हैं —

युग आत्मा की अवस्था शरीर का उपयोग
सतयुग सतोप्रधान विकार रहित
त्रेता संतुलित सीमित
द्वापर देह प्रधान विकार प्रवेश
कलयुग तमोप्रधान भोग प्रधान

और फिर आता है —

 संगम युग — परिवर्तन का युग

संगम युग आत्मा की सर्विस और मरम्मत का समय है।

 मुरली प्रमाण

साकार मुरली – 10 अप्रैल 1971

“यह संगम युग है, यहाँ विकार त्यागने हैं।”


अध्याय 4 : मशीन और सर्विस का उदाहरण

गाड़ी चलने के लिए बनी है।
लेकिन सर्विस के समय गाड़ी बंद की जाती है।

गाड़ी गलत नहीं हुई —
उसे सुधारा जा रहा है।

वैसे ही —
संगम युग आत्मा की रिपेयरिंग का समय है।

इसलिए ईश्वर कहते हैं —

अब भोग नहीं, योग करो।


अध्याय 5 : पति-पत्नी का संबंध अशुद्ध क्यों कहा गया?

रिश्ता गलत नहीं है।
रिश्ते की चेतना बाधक बन जाती है।

क्यों?

क्योंकि वहाँ होता है —

  • देह स्मृति

  • अपेक्षाएँ

  • अधिकार भाव

  • आकर्षण

  • विकार चेतना

 मुरली प्रमाण

साकार मुरली – 3 मार्च 1970

“काम विकार आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है।”


अध्याय 6 : योग बल बनाम भोग बल

भोग बल

  • ऊर्जा बाहर जाती है

  • मन अशांत होता है

  • स्मृति कमजोर होती है

योग बल

  • ऊर्जा संचित होती है

  • स्मृति ऊँची होती है

  • मन स्थिर होता है

 मुरली प्रमाण

अव्यक्त मुरली – 19 नवम्बर 1983

“योग से आत्मा शक्तिशाली बनती है। शरीर नहीं।”


अध्याय 7 : देवी-देवता का प्रमाण

लक्ष्मी-नारायण पति-पत्नी हैं
लेकिन निर्विकार हैं।

उनके पास शरीर है
ऑर्गन्स हैं
लेकिन भोग की इच्छा नहीं है।

यही प्रमाण है कि —
ऑर्गन होना और भोग होना — अलग बात है।


अंतिम निष्कर्ष

भगवान ने मेल-फीमेल शरीर इसलिए बनाए
क्योंकि आत्मा को पूरा 5000 वर्ष का ड्रामा खेलना है।

लेकिन संगम युग में ईश्वर कहते हैं —

 अब शरीर से नहीं, आत्मा से काम लो।
 अब भोग नहीं, योग करो।


अंतिम पंक्ति (Powerful Conclusion Line)

जो चीज समय पर उपयोग हो — वही पवित्र है।
जो समय के विरुद्ध उपयोग हो — वही अशुद्ध कहलाता है।

प्रश्न 1 : आज का सबसे बड़ा प्रश्न क्या है?

उत्तर :
आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है —

अगर सेक्स अशुद्ध है, पाप है, गलत है —
तो भगवान ने मेल–फीमेल शरीर क्यों बनाए?

लोग कहते हैं —
अगर उपयोग ही नहीं करना था,
तो ये अंग बनाए ही क्यों?

यही प्रश्न आज ब्रह्मा कुमारीज़ के ज्ञान के प्रति सबसे बड़ा विरोध भी बनता है।
लेकिन वास्तव में यही प्रश्न पूरे ईश्वरीय ज्ञान का द्वार खोलता है।


 प्रश्न 2 : क्या परमात्मा मेल–फीमेल शरीर बनाते हैं?

उत्तर :
नहीं। परमात्मा शरीर नहीं बनाते।

सबसे पहली स्पष्टता —

 परमात्मा शरीर नहीं बनाते
 परमात्मा आत्मा भी नहीं बनाते
 परमात्मा आत्मा को पतित से पावन बनाते हैं

मुरली प्रमाण
साकार मुरली – 18 जनवरी 1968

“मैं आत्माओं का पिता हूँ। शरीर मेरा बनाया हुआ नहीं है।”

शरीर प्रकृति के पाँच तत्वों से बना है।
मेल और फीमेल शरीर — यह प्रकृति का विधान है।
कंट्रोलर आत्मा है।


 प्रश्न 3 : फिर शरीर किसने बनाए?

उत्तर :
शरीर प्रकृति के पाँच तत्वों से बनते हैं।
यह क्रिएशन का नियम है।

आत्मा इन शरीरों में अभिनय करने आती है।
आत्मा मेल–फीमेल नहीं होती,
आत्माएँ सब भाई–भाई हैं।


 प्रश्न 4 : मुरली में अशुद्ध का असली अर्थ क्या है?

उत्तर :
दुनिया में अशुद्ध का अर्थ समझा जाता है —
गंदा, पाप, गलत।

लेकिन मुरली में अशुद्ध का अर्थ अलग है।

मुरली का सार

जहाँ देह-अभिमान है, वहाँ अशुद्धता है।

अशुद्ध = आत्मा की ऊर्जा का देह में बह जाना


 प्रश्न 5 : इसे सरल उदाहरण से कैसे समझें?

उत्तर :
जैसे शुद्ध दूध अगर गंदे बर्तन में डाल दो,
तो दूध भी खराब हो जाता है।

वैसे ही —
अगर आत्मा की शक्ति देह-अभिमान में बह जाए,
तो आत्मा कमजोर हो जाती है।


प्रश्न 6 : युगों के अनुसार शरीर का उपयोग कैसे होता है?

उत्तर :

युग आत्मा की अवस्था शरीर का उपयोग
सतयुग सतोप्रधान विकार रहित
त्रेता संतुलित सीमित
द्वापर देह प्रधान विकार प्रवेश
कलयुग तमोप्रधान भोग प्रधान

और फिर आता है —

संगम युग — परिवर्तन का युग

मुरली प्रमाण
साकार मुरली – 10 अप्रैल 1971

“यह संगम युग है, यहाँ विकार त्यागने हैं।”


 प्रश्न 7 : संगम युग में विकार क्यों त्यागने हैं?

उत्तर :
क्योंकि यह आत्मा की सर्विस और मरम्मत का समय है।

जैसे गाड़ी चलने के लिए बनी है,
लेकिन सर्विस के समय गाड़ी बंद की जाती है।

गाड़ी गलत नहीं हुई —
उसे सुधारा जा रहा है।

वैसे ही —
संगम युग आत्मा की रिपेयरिंग का समय है।

इसलिए ईश्वर कहते हैं —

अब भोग नहीं, योग करो।


 प्रश्न 8 : फिर पति–पत्नी का संबंध अशुद्ध क्यों कहा जाता है?

उत्तर :
रिश्ता गलत नहीं है।
रिश्ते की चेतना बाधक बन जाती है।

क्योंकि वहाँ होता है —

▪ देह स्मृति
▪ अपेक्षाएँ
▪ अधिकार भाव
▪ आकर्षण
▪ विकार चेतना

मुरली प्रमाण
साकार मुरली – 3 मार्च 1970

“काम विकार आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है।”


 प्रश्न 9 : योग बल और भोग बल में क्या अंतर है?

उत्तर :

भोग बल

▪ ऊर्जा बाहर जाती है
▪ मन अशांत होता है
▪ स्मृति कमजोर होती है

योग बल

▪ ऊर्जा संचित होती है
▪ स्मृति ऊँची होती है
▪ मन स्थिर होता है

मुरली प्रमाण
अव्यक्त मुरली – 19 नवम्बर 1983

“योग से आत्मा शक्तिशाली बनती है। शरीर नहीं।”


 प्रश्न 10 : क्या देवी–देवताओं के पास शरीर और ऑर्गन्स नहीं होते?

उत्तर :
होते हैं।

लक्ष्मी–नारायण पति–पत्नी हैं
लेकिन निर्विकार हैं।

उनके पास शरीर है
ऑर्गन्स हैं
लेकिन भोग की इच्छा नहीं है।

यही प्रमाण है कि —

ऑर्गन होना और भोग होना — अलग बात है।


 प्रश्न 11 : फिर भगवान ने मेल–फीमेल शरीर क्यों बनाए?

उत्तर :
क्योंकि आत्मा को पूरा 5000 वर्ष का ड्रामा खेलना है।

लेकिन संगम युग में ईश्वर कहते हैं —

 अब शरीर से नहीं, आत्मा से काम लो
 अब भोग नहीं, योग करो


अंतिम निष्कर्ष

जो चीज समय पर उपयोग हो — वही पवित्र है।
जो समय के विरुद्ध उपयोग हो — वही अशुद्ध कहलाता है।

डिस्क्लेमर :
यह वीडियो किसी भी विवाह प्रणाली, दाम्पत्य जीवन, धर्म, समाज या व्यक्ति का विरोध नहीं करता।
यह प्रस्तुति ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरली शिक्षाओं पर आधारित एक आध्यात्मिक व्याख्या है।
यहाँ “अशुद्ध” शब्द का प्रयोग नैतिक आरोप के रूप में नहीं, बल्कि आत्मिक ऊर्जा की स्थिति के रूप में किया गया है।
दर्शक इस विषय को आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में समझें, न कि आलोचना या वैज्ञानिक दावा के रूप में।

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