S.Y.(07)नई दुनिया में जब सब अजनबी होंगे तो राजा-प्रजा की पहचान कैसे होगी?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
एक गहरा और स्वाभाविक प्रश्न
जब हम यह सुनते हैं कि
नई दुनिया के पहले दिन सभी आत्माएँ अजनबी होंगी,
तो मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है —
-
न कोई पिता होगा
-
न माँ
-
न भाई-बहन
-
न वंश
-
न जाति
-
न सामाजिक पहचान
तो फिर प्रश्न है —
राजा कौन होगा?
और प्रजा कौन होगी?
“अजनबी” नहीं — स्वतंत्र आत्माएँ
नई दुनिया में “अजनबी” शब्द ठीक नहीं है।
मुरली में इसका भाव है — स्वतंत्रता।
हर आत्मा —
-
संबंधों के बंधन से मुक्त
-
अपेक्षाओं से मुक्त
-
तुलना से मुक्त
इसलिए सब आत्माएँ स्वतंत्र होंगी।
पुरानी दुनिया बनाम नई दुनिया की सत्ता
मुरली (30 नवंबर 1967)
“यह रावण की दुनिया है। यहाँ पद बाहुबल से मिलता है।”
पुरानी दुनिया में सत्ता आधारित होती है:
-
धन
-
राजनीति
-
हिंसा
-
वंश
-
कानून और सेना
इसलिए वहाँ —
डर, असुरक्षा और संघर्ष होता है।
नई दुनिया में सत्ता — स्थिति का राज्य
मुरली (18 जनवरी 1969)
“सतयुग में राज्य स्वतः प्राप्त होता है।”
नई दुनिया में —
-
न चुनाव
-
न ताजपोशी
-
न घोषणा
-
न प्रतियोगिता
राज्य दिलों से स्वीकार किया जाता है।
वहाँ राजा आत्माओं पर नहीं,
आत्माओं के दिलों पर राज्य करता है।
जब सब अजनबी हैं, पहचान कैसे होगी?
मुरली (21 मार्च 1970)
“सतयुग में आत्माएँ संस्कारों से पहचानी जाती हैं।”
पहचान होती है —
-
नाम से नहीं
-
रूप से नहीं
-
वेश से नहीं
बल्कि —
-
आत्मिक तेज
-
शांति की कंपन
-
पवित्रता की आभा
-
स्थिर और श्रेष्ठ संस्कार
राजा की पहचान — ताज से नहीं, तेज से
मुरली (12 अगस्त 1968)
“जो आत्मा सर्वाधिक सतोप्रधान है, वही प्रथम राजा बनती है।”
राजा आत्मा की विशेषताएँ:
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स्वाभाविक सम्मान
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सहज नेतृत्व
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सुरक्षा की अनुभूति
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मधुर वाणी
-
अधिकार नहीं, अपनापन
राजा और प्रजा का संबंध
मुरली (9 सितंबर 1965)
“सतयुग में राजा और प्रजा में भेद नहीं — केवल पद का अंतर है।”
-
राजा मालिक नहीं
-
प्रजा दास नहीं
राजा — प्रथम सेवक
प्रजा — स्वाभाविक सहयोगी
उदाहरण: शरीर की व्यवस्था
मुरली (5 दिसंबर 1966)
“व्यवस्था के लिए श्रेष्ठ आत्मा का आगे होना आवश्यक है।”
जैसे —
-
शरीर में मस्तिष्क नेतृत्व करता है
-
लेकिन किसी अंग पर अत्याचार नहीं करता
वैसे ही —
नई दुनिया में राजा नेतृत्व करता है,
शोषण नहीं।
पहचान पहले से तय होती है — संगम युग में
मुरली (2 अक्टूबर 1967)
“जो संगम पर जैसा पुरुषार्थ करता है, वही वैसा पद पाता है।”
नई दुनिया में —
-
न परीक्षा होगी
-
न इंटरव्यू
-
न चयन प्रक्रिया
वहाँ केवल —
स्वीकृति होगी।
अंतिम सूत्र
मुरली (25 नवंबर 1965)
“आत्मिक स्थिति ही सच्चा परिचय है।”
नई दुनिया में पहचान —
-
नाम से नहीं
-
संबंध से नहीं
-
घोषणा से नहीं
आत्मिक स्थिति से होगी।
अंतिम संदेश
यदि आज —
आप सम्मान चाहते हैं,
नेतृत्व चाहते हैं,
स्वीकृति चाहते हैं —
तो बाहर नहीं,
अपने मन, बुद्धि और संस्कारों पर राज्य करो।
क्योंकि —
नई दुनिया में
ताज सिर पर नहीं,
आत्मा पर होता है।
प्रश्न 1:
जब नई दुनिया के पहले दिन सभी आत्माएँ अजनबी होंगी, तो यह बात समझ में क्यों नहीं आती?
उत्तर:
क्योंकि आज की दुनिया में हमारी पहचान —
पिता, माता, भाई-बहन, वंश, जाति और समाज से जुड़ी हुई है।
जब हम सुनते हैं कि नई दुनिया में ये सभी पहचानें नहीं होंगी,
तो स्वाभाविक रूप से मन पूछता है —
“फिर व्यवस्था कैसे चलेगी?”
प्रश्न 2:
क्या सच में नई दुनिया में सब आत्माएँ अजनबी होंगी?
उत्तर:
“अजनबी” शब्द यहाँ उपयुक्त नहीं है।
मुरली में इसका भाव है — स्वतंत्रता।
हर आत्मा —
-
संबंधों के बंधन से मुक्त
-
अपेक्षाओं से मुक्त
-
तुलना से मुक्त
इसलिए नई दुनिया में सब आत्माएँ स्वतंत्र आत्माएँ होंगी।
प्रश्न 3:
आज की दुनिया में राजा की पहचान किस आधार पर होती है?
उत्तर:
आज की दुनिया में सत्ता आधारित होती है —
-
धन
-
राजनीति
-
हिंसा
-
वंश
-
कानून और सेना
मुरली (30 नवंबर 1967):
“यह रावण की दुनिया है। यहाँ पद बाहुबल से मिलता है।”
इसी कारण आज सत्ता में —
डर, असुरक्षा और संघर्ष दिखाई देता है।
प्रश्न 4:
नई दुनिया में सत्ता किस आधार पर होती है?
उत्तर:
नई दुनिया में सत्ता स्थिति का राज्य होती है।
मुरली (18 जनवरी 1969):
“सतयुग में राज्य स्वतः प्राप्त होता है।”
वहाँ —
-
न चुनाव होता है
-
न ताजपोशी
-
न घोषणा
-
न प्रतियोगिता
राजा को दिलों से स्वीकार किया जाता है।
प्रश्न 5:
जब कोई चुनाव या घोषणा नहीं होगी, तो राजा की पहचान कैसे होगी?
उत्तर:
राजा की पहचान संस्कारों और आत्मिक स्थिति से होती है।
मुरली (21 मार्च 1970):
“सतयुग में आत्माएँ संस्कारों से पहचानी जाती हैं।”
पहचान होती है —
-
नाम से नहीं
-
रूप से नहीं
-
वेश से नहीं
बल्कि —
-
आत्मिक तेज
-
शांति की कंपन
-
पवित्रता की आभा
-
स्थिर और श्रेष्ठ संस्कार
प्रश्न 6:
राजा की पहचान ताज से नहीं तो किससे होगी?
उत्तर:
राजा की पहचान तेज से होगी, ताज से नहीं।
मुरली (12 अगस्त 1968):
“जो आत्मा सर्वाधिक सतोप्रधान है, वही प्रथम राजा बनती है।”
राजा आत्मा में स्वाभाविक रूप से —
-
सम्मान होता है
-
नेतृत्व होता है
-
सुरक्षा की अनुभूति होती है
-
अधिकार नहीं, अपनापन होता है
प्रश्न 7:
क्या सतयुग में राजा और प्रजा के बीच भेद होगा?
उत्तर:
नहीं, वहाँ भेद नहीं — केवल पद का अंतर होगा।
मुरली (9 सितंबर 1965):
“सतयुग में राजा और प्रजा में भेद नहीं — केवल पद का अंतर है।”
-
राजा मालिक नहीं
-
प्रजा दास नहीं
राजा — प्रथम सेवक
प्रजा — स्वाभाविक सहयोगी
प्रश्न 8:
नई दुनिया की व्यवस्था कैसे संतुलित रहेगी?
उत्तर:
जैसे शरीर में मस्तिष्क नेतृत्व करता है,
लेकिन किसी अंग पर अत्याचार नहीं करता।
मुरली (5 दिसंबर 1966):
“व्यवस्था के लिए श्रेष्ठ आत्मा का आगे होना आवश्यक है।”
वैसे ही —
नई दुनिया में राजा नेतृत्व करता है,
शोषण नहीं करता।
प्रश्न 9:
राजा-प्रजा की पहचान पहले से तय कब होती है?
उत्तर:
संगम युग में।
मुरली (2 अक्टूबर 1967):
“जो संगम पर जैसा पुरुषार्थ करता है, वही वैसा पद पाता है।”
नई दुनिया में —
-
न परीक्षा
-
न इंटरव्यू
-
न चयन प्रक्रिया
वहाँ केवल —
स्वीकृति होती है।
प्रश्न 10:
नई दुनिया में आत्मा का सच्चा परिचय क्या है?
उत्तर:
मुरली (25 नवंबर 1965):
“आत्मिक स्थिति ही सच्चा परिचय है।”
नई दुनिया में पहचान —
-
नाम से नहीं
-
संबंध से नहीं
-
घोषणा से नहीं
आत्मिक स्थिति से होती है।
अंतिम संदेश
यदि आज आप —
सम्मान चाहते हैं,
नेतृत्व चाहते हैं,
स्वीकृति चाहते हैं —
तो बाहर नहीं,
अपने मन, बुद्धि और संस्कारों पर राज्य करें।
क्योंकि —
नई दुनिया में
ताज सिर पर नहीं,
आत्मा पर होता है।
Disclaimer (वीडियो के प्रारम्भ या विवरण हेतु)
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की
मुरली शिक्षाओं, आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक चिंतन पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक व्यवस्था, सामाजिक वर्ग,
या ऐतिहासिक मान्यता का खंडन करना नहीं है।
यह प्रस्तुति केवल आध्यात्मिक दृष्टि से नई दुनिया (सतयुग)
की व्यवस्था को समझाने हेतु है।
दर्शक इसे आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में ग्रहण करें।
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