S.Y.(16)संगम युग का सबसे बड़ा रहस्य।
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
भूमिका : संगम युग – नई दुनिया की नींव
संगम युग वह महान समय है जब पुरानी दुनिया समाप्त होकर नई दुनिया की स्थापना होती है। यही वह दिव्य काल है जब परमात्मा स्वयं आकर आत्माओं को पतित से पावन बनाते हैं।
आज हम संगम युग के सबसे बड़े रहस्य को समझने जा रहे हैं — वह रहस्य जो आत्म अभिमान से स्वर्ग तक पहुंचने का मार्ग बताता है।
संगम युग का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?
गीता का महान वाक्य —
“देह सहित देह के सब धर्म छोड़, मुझ एक बाप को याद करो।”
यह केवल एक श्लोक नहीं बल्कि संपूर्ण आध्यात्मिक परिवर्तन की कुंजी है।
यह आदेश हमें संसार छोड़ने का नहीं बल्कि चेतना बदलने का संदेश देता है।
संगम युग का रहस्य है —
➡️ देह अभिमान से निकलकर आत्म अभिमानी बनना
➡️ आत्म अभिमानी बनकर नई दुनिया का अधिकारी बनना
गीता का गलत और सही अर्थ
सदियों से लोगों ने इस वाक्य का अर्थ लिया —
घर-परिवार छोड़ दो
संसार त्याग दो
लेकिन परमात्मा संसार छोड़ने की शिक्षा नहीं देते।
परमात्मा संसार को बदलने का ज्ञान देते हैं।
संगम युग ही वह समय है जब कलयुग से सतयुग की परिवर्तन प्रक्रिया शुरू होती है।
देह सहित देह के धर्म छोड़ने का वास्तविक अर्थ
मुरली 30 नवंबर 1967
“देह सहित देह के धर्म छोड़ो, अपने को आत्मा समझो।”
देह के धर्म क्या हैं?
-
मैं पुरुष हूं
-
मैं स्त्री हूं
-
मैं हिंदू हूं
-
मैं मुस्लिम हूं
-
मैं अमीर या गरीब हूं
आत्मा का धर्म क्या है?
शांति
पवित्रता
सुख
प्रेम
देह अभिमान – दुख का मूल कारण
मुरली 7 फरवरी 1971
देह भान से ही राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं।
जहां “मेरा” शुरू होता है वहीं संघर्ष शुरू होता है।
देह अभिमान बंधन है, आत्म अभिमान मुक्ति है।
यह आदेश केवल संगम युग में ही क्यों लागू होता है?
मुरली 18 जनवरी 1969
“मैं संगम पर आता हूं क्योंकि यही आत्माएं बदलती हैं।”
सतयुग में देह अभिमान होता ही नहीं।
कलयुग में देह अभिमान छोड़ना संभव नहीं।
लेकिन संगम युग में परमात्मा स्वयं आकर आत्मा की पहचान कराते हैं।
“छोड़ो” का अर्थ क्या है?
मुरली 5 दिसंबर 1966
घर गृहस्थ छोड़ने की बात नहीं, देह अभिमान छोड़ने की बात है।
उदाहरण:
जैसे अभिनेता रोल निभाता है लेकिन जानता है कि वह रोल उसका वास्तविक स्वरूप नहीं है।
वैसे ही आत्मा शरीर में रहते हुए शरीर नहीं है।
संगम युग में आत्म अभिमान का अभ्यास कैसे करें?
मुरली 21 मार्च 1970
तीन मुख्य अभ्यास —
✔️ बार-बार स्मृति — मैं आत्मा हूं
✔️ बाप की याद — राजयोग द्वारा शक्ति प्राप्त करना
✔️ ड्रामा ज्ञान — प्रतिक्रिया समाप्त करना
यदि कोई दुख दे तो बदले में सुख देना — यही राजयोग है।
नई दुनिया से इसका संबंध
मुरली 14 अप्रैल 1972
“जैसी स्थिति संगम पर, वैसी प्राप्ति सतयुग में।”
जो आत्मा देह अभिमान छोड़ती है वही सतोप्रधान बनती है और स्वर्ग की अधिकारी बनती है।
आत्मिक स्थिति से जीवन में परिवर्तन
मुरली 9 सितंबर 1965
आत्मिक स्थिति से —
भय समाप्त
क्रो काम विकार समाप्त
जीवन हल्का और सुखमय बन जाता है
निष्कर्ष
गीता का यह आदेश किसी युग के लिए नहीं बल्कि आज के संगम युग की पढ़ाई है।
आज आत्मा बनना है
कल देवता बनना है
यदि यह अभ्यास कठिन लगता है तो अभ्यास जारी रखें।
यदि सहज लगने लगे तो समझ लें कि हम संगम पर पास विद ऑनर पढ़ाई पास कर रहे हैं।
प्रश्न 1 : संगम युग क्या है और इसे विशेष समय क्यों कहा जाता है?
उत्तर :
संगम युग वह दिव्य समय है जब पुरानी दुनिया समाप्त होकर नई दुनिया की स्थापना होती है। इसी काल में परमात्मा स्वयं धरती पर आकर आत्माओं को पतित से पावन बनाते हैं। यह आत्म परिवर्तन का काल है, इसलिए इसे सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण समय कहा जाता है।
❖ प्रश्न 2 : संगम युग का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?
उत्तर :
संगम युग का सबसे बड़ा रहस्य है — देह अभिमान से निकलकर आत्म अभिमानी बनना।
गीता का महान वाक्य —
“देह सहित देह के सब धर्म छोड़, मुझ एक बाप को याद करो।”
यह संपूर्ण आध्यात्मिक परिवर्तन की कुंजी है, जो आत्मा को स्वर्ग का अधिकारी बनाती है।
❖ प्रश्न 3 : गीता के इस वाक्य का लोगों ने गलत अर्थ कैसे लिया है?
उत्तर :
सदियों से लोगों ने इसका अर्थ लगाया कि घर-परिवार और संसार छोड़ देना चाहिए। लेकिन परमात्मा संसार छोड़ने की शिक्षा नहीं देते, बल्कि संसार को बदलने का ज्ञान देते हैं। यह शिक्षा चेतना बदलने की है, स्थान बदलने की नहीं।
❖ प्रश्न 4 : “देह सहित देह के धर्म छोड़ने” का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर :
इसका अर्थ है शरीर से जुड़ी पहचान को छोड़ना और आत्मा स्वरूप को पहचानना।
देह के धर्म हैं —
-
मैं पुरुष या स्त्री हूँ
-
मैं किसी धर्म या जाति से हूँ
-
मैं अमीर या गरीब हूँ
आत्मा का धर्म है —
-
शांति
-
पवित्रता
-
सुख
-
प्रेम
❖ प्रश्न 5 : देह अभिमान को दुख का मूल कारण क्यों कहा गया है?
उत्तर :
देह अभिमान से राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं। जहां “मेरा” की भावना आती है, वहीं संघर्ष शुरू हो जाता है। देह अभिमान बंधन पैदा करता है, जबकि आत्म अभिमान मुक्ति और शांति देता है।
❖ प्रश्न 6 : यह आदेश केवल संगम युग में ही क्यों लागू होता है?
उत्तर :
सतयुग में देह अभिमान होता ही नहीं और कलयुग में इसे छोड़ना संभव नहीं होता। केवल संगम युग में परमात्मा स्वयं आकर आत्मा की पहचान कराते हैं और परिवर्तन की शक्ति देते हैं। इसलिए यह समय आत्म जागृति का विशेष काल है।
❖ प्रश्न 7 : “छोड़ो” शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर :
“छोड़ो” का अर्थ घर-गृहस्थ त्यागना नहीं है, बल्कि देह अभिमान त्यागना है।
जैसे अभिनेता रोल निभाता है लेकिन जानता है कि वह रोल उसका असली स्वरूप नहीं है, वैसे ही आत्मा शरीर में रहते हुए भी शरीर नहीं है।
❖ प्रश्न 8 : संगम युग में आत्म अभिमान का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?
उत्तर :
आत्म अभिमान का अभ्यास तीन मुख्य तरीकों से किया जा सकता है —
✔️ बार-बार स्मृति रखना — मैं आत्मा हूँ
✔️ परमात्मा की याद करना — राजयोग द्वारा शक्ति प्राप्त करना
✔️ ड्रामा ज्ञान समझना — परिस्थितियों में प्रतिक्रिया समाप्त करना
❖ प्रश्न 9 : आत्म अभिमान का नई दुनिया से क्या संबंध है?
उत्तर :
संगम युग में जैसी आत्मिक स्थिति बनती है, वैसी ही प्राप्ति सतयुग में होती है। जो आत्मा देह अभिमान छोड़ती है, वही सतोप्रधान बनकर स्वर्ग की अधिकारी बनती है।
❖ प्रश्न 10 : आत्मिक स्थिति से जीवन में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं?
उत्तर :
आत्मिक स्थिति से —
-
भय समाप्त हो जाता है
-
क्रोध और काम विकार समाप्त होते हैं
-
जीवन हल्का, शांत और सुखमय बन जाता है
❖ निष्कर्ष
संगम युग का यह ज्ञान आत्मा को देवता बनाने की पढ़ाई है।
आज आत्म अभिमान का अभ्यास करना ही भविष्य में स्वर्ग का अधिकार प्राप्त करना है।
यदि अभ्यास कठिन लगे तो निरंतर प्रयास करें, और यदि सहज लगे तो समझें कि आत्मा संगम युग की पढ़ाई में सफलता की ओर बढ़ रही है।
Disclaimer (डिस्क्लेमर)
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरली ज्ञान, आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक चिंतन पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, शास्त्र, परंपरा या मान्यता का खंडन करना नहीं है। यह प्रस्तुति केवल गीता के आध्यात्मिक अर्थ और संगम युग की शिक्षा को स्पष्ट करने के लिए बनाई गई है। दर्शक इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ग्रहण करें।
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