इसका आज हम 15वां विषय करने जा रहे हैं। अति इंद्रिय सुख में पवित्रता का गुप्त रहस्य डिस्क्लेमर यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरली शिक्षाओं पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान को सरल रूप में समझाना है। यह किसी भी धर्म, परंपरा या व्यक्ति की आलोचना नहीं है। सभी संदर्भ ब्रह्मा कुमारी मुरलियों के अध्ययन और आध्यात्मिक अनुभव पर आधारित हैं। पवित्रता का गुप्त रहस्य क्यों पवित्र आत्मा ही अनुभव करती है अति इंद्रिय सुख प्रश्न खड़ा होता है कि क्यों पवित्र आत्मा ही अति इंद्रिय सुख का अनुभव करती है? दूसरी आत्माएं क्यों नहीं कर सकती? ऐसी क्या विशेषता है पवित्रता में कि जो पवित्र आत्माएं हैं वही अति इंद्रिय सुख का अनुभव करती हैं। आज हम मुरली आधारित गहन समझ के द्वारा यह समझने का प्रयास करेंगे कि पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का क्या संबंध है। 1. हर आत्मा सुख क्यों चाहती है? दुनिया में हर मनुष्य एक ही चीज चाहता है — सुख। कोई धन में सुख ढूंढता है, कोई पद में सुख ढूंढता है, कोई रिश्तों में सुख ढूंढता है। लेकिन एक सच्चाई है कि इन सब में मिलने वाला सुख सीमित है, अस्थायी है, टेंपरेरी है — थोड़ी देर का सुख है। जैसे चीनी जब तक जीभ पर रहती है तब तक मीठा लगता है। थोड़ी देर बाद वह स्वाद समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार संसार के सुख भी क्षणिक हैं। इसलिए आज संसार में इतना धन, तकनीकी और साधन होने के बाद भी मनुष्य के मन में शांति और संतोष नहीं है। क्यों? क्योंकि मनुष्य अति इंद्रिय सुख के स्रोत को भूल गया है। अति इंद्रिय सुख क्या है? जो सुख परमात्मा से मिलता है वही अति इंद्रिय सुख है। अति इंद्रिय सुख वह सुख है जो इंद्रियों से प्राप्त नहीं होता। आंखों से देखने से, कानों से सुनने से, या शरीर के अनुभव से जो सुख मिलता है वह इंद्रिय सुख है। लेकिन आत्मा जिस सुख को इन इंद्रियों के बिना अनुभव करती है, वही अति इंद्रिय सुख कहलाता है। अर्थात वह सुख जो इंद्रियों से परे है। यह सुख आत्मा के भीतर से उत्पन्न होता है। मुरली संदर्भ मुरली – 24 जनवरी 1968 “बच्चे, तुम अति इंद्रिय सुख में रहते हो, वह कोई समझ नहीं सकते।” यह सुख आत्मा को परमात्मा की याद से मिलता है। जब आत्मा परमात्मा से जुड़ती है तो वह ऐसा सुख अनुभव करती है जो इंद्रियों के सुख से बहुत ऊंचा है। अति इंद्रिय सुख का अनुभव कौन कर सकता है? अति इंद्रिय सुख का अनुभव हर आत्मा नहीं कर सकती। यह अनुभव वही आत्मा कर सकती है जो पवित्र है। आत्मा पतित कैसे बनती है? आत्मा विकारों में जाने से पतित बनती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के प्रभाव से आत्मा अपनी मूल पवित्रता खो देती है। जब आत्मा देह के प्रभाव से मुक्त हो जाती है और आत्मस्वरूप में स्थित हो जाती है, तब वह पवित्र बनती है। मुरली संदर्भ मुरली – 10 मई 1973 “पवित्रता ही सुख और शांति का आधार है। अपवित्रता में कभी सच्चा सुख नहीं मिल सकता।” जहां पवित्रता है वहां शांति है, आनंद है और संतोष है। पवित्रता क्या है? अक्सर लोग पवित्रता को केवल ब्रह्मचर्य तक सीमित समझ लेते हैं। लेकिन वास्तविक पवित्रता उससे कहीं गहरी है। पवित्रता का अर्थ है — विचारों की पवित्रता दृष्टि की पवित्रता भावनाओं की पवित्रता संबंधों की पवित्रता जब आत्मा का मन, बुद्धि और संस्कार शुद्ध हो जाते हैं, तब आत्मा वास्तव में पवित्र बनती है। आत्मा अपने साथ शरीर नहीं ले जाती, वह अपने साथ संस्कार ले जाती है। बुद्धि उन्हीं संस्कारों के आधार पर निर्णय करती है। मन भी उन्हीं संस्कारों के आधार पर कार्य करता है। अपवित्रता सुख क्यों छीन लेती है? जब आत्मा अपवित्र बनती है तो उसके अंदर कई विकार उत्पन्न होते हैं — काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। ये पांच विकार आत्मा की ऊर्जा को नष्ट कर देते हैं। उदाहरण के लिए — यदि किसी व्यक्ति के पास बहुत धन है लेकिन उसके मन में क्रोध और ईर्ष्या भरी हुई है, तो क्या वह वास्तव में सुखी रहेगा? नहीं। क्योंकि विकार आत्मा की शांति को समाप्त कर देते हैं। स्वर्ग में अति इंद्रिय सुख क्यों है? स्वर्ग को सुखधाम कहा जाता है। वहां दुख का नाम भी नहीं होता। क्यों? क्योंकि वहां की आत्माएं पूर्ण पवित्र होती हैं। मुरली – 22 मार्च 1969 “सतयुग में सब पवित्र होते हैं, इसलिए वहां अति इंद्रिय सुख ही सुख है।” वहां संबंध पवित्र हैं, विचार पवित्र हैं और प्रकृति भी पवित्र है। इसलिए वहां हर आत्मा सहज सुख में रहती है। संगम युग – पवित्रता की पुनः स्थापना पूरे कल्प में संगम युग एक ऐसा समय है जब परमात्मा स्वयं आकर पवित्रता की पुनः स्थापना करते हैं। आज का समय संगम युग है। मुरली – 18 जनवरी 1969 “बच्चे, पवित्र बनेंगे तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे।” इसलिए परमात्मा का पहला आदेश है — पवित्र बनो। पवित्रता से आत्मा को शक्ति क्यों मिलती है? जब आत्मा पवित्र बनती है तो उसकी ऊर्जा बढ़ जाती है। उसका मन स्थिर हो जाता है। तब आत्मा सहज रूप से शांति, प्रेम और आनंद का अनुभव करती है। उदाहरण: जैसे साफ पानी में सूर्य का प्रतिबिंब साफ दिखाई देता है, लेकिन गंदे पानी में प्रतिबिंब टूट जाता है। उसी प्रकार जब आत्मा पवित्र होती है, तब उसमें परमात्मा की शक्ति स्पष्ट अनुभव होती है। अति इंद्रिय सुख का अनुभव कैसे करें? अति इंद्रिय सुख प्राप्त करने का तरीका बहुत सरल है। आत्म स्मृति में रहना परमात्मा की याद करना परमात्मा की श्रीमत पर चलना पवित्र जीवन जीना मुरली – 12 अगस्त 1971 “बच्चे, बाप की याद में रहो तो अति इंद्रिय सुख का अनुभव होगा।” जब आत्मा बार-बार परमात्मा को याद करती है, तो उसकी आध्यात्मिक बैटरी चार्ज हो जाती है और भीतर से आनंद की लहर उठती है। आज संसार में सुख क्यों नहीं है? आज संसार में दुख का मुख्य कारण है अपवित्रता। विचारों में अपवित्रता, संबंधों में अपवित्रता और वातावरण में भी अपवित्रता। इसलिए मनुष्य बाहरी वस्तुओं में सुख खोज रहा है। लेकिन वह सुख अस्थायी है। सच्चा सुख मिलेगा — आत्मा की पवित्रता में परमात्मा की याद में राजयोग के अभ्यास में उदाहरण कई ब्रह्मा कुमारी भाई-बहन बताते हैं कि जब वे मुरली सुनते हैं और योग में बैठते हैं, तो उन्हें ऐसा अनुभव होता है जैसे आत्मा हल्की हो गई हो। यह अनुभव ही अति इंद्रिय सुख है। निष्कर्ष पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का संबंध बहुत गहरा है। जहां पवित्रता है वहां आत्मिक शक्ति है। जहां आत्मिक शक्ति है वहां शांति है। जहां शांति है वहां अति इंद्रिय सुख है। इसलिए परमात्मा का संदेश है — “पवित्र बनो और अति इंद्रिय सुख के अधिकारी बनो।”

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