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वाले देवता और द्वैत वाले असुर क्यों
अद्वैत वाले देवता और द्वैत वाले असुर क्यों
यह प्रश्न खड़ा हुआ। क्यों प्रश्न खड़ा हुआ कि यह मुरली का गहरा महावाक्य है।
प्रातः मुरली में एक बहुत गहरा वाक्य आता है।
मुरली संदर्भ है प्रातः मुरली 6 मार्च 26
आज की मुरली में यह लाइन आई और जो बहुत ही गूढ़ है।
भारत में एक धर्म था।
उनको कहा जाता अद्वैत मत वाले देवताएं।
द्वैत माना दैत्य।
यह लाइन है 6 मार्च 2026 की मुरली की। भारत में एक धर्म था।
उनको कहा जाता अद्वैत मत वाले देवताएं।
द्वैत माना दैत्य। जब दूसरा मत आता है तो दैत्य बनते हैं। एक से दूसरा मत आएगा तो क्या बन जाएंगे? दैत्य बन जाएंगे। द्वापर से।
यह वाक्य बहुत गहरा है। यह हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि देवता अद्वैत क्यों कहलाते हैं? और द्वैत को दैत्य क्यों कहा गया है।
अद्वैत का वास्तविक अर्थ है।
अद्वैत शब्द का अर्थ है जहां दोपन नहीं।
दोपन का मतलब किसको समझ में आया है या नहीं आया बताओ।
दोपन क्या होता है?
दो मत।
हां, दोपन का मतलब दो अलग-अलग विचार आ जाएं। एक विचार कुछ कहे दूसरा विचार कुछ कहे।
जब दो मत आते हैं, दो विचार आते हैं तो उसे दोपन कहा जाता है। अर्थात कोई आंतरिक संघर्ष नहीं, कोई विरोध नहीं, कोई अलगाव की भावना नहीं।
अद्वैत का अर्थ है पूर्ण एकता की चेतना।
पूर्ण एकता की चेतना मतलब सबके अंदर आपस में एक साथ एक मत, एकता की भावना रहे। चेतना मतलब भावना।
परंतु अंदर से सबके अंदर यह रहता है कि हम एक होकर के रहेंगे।
उदाहरण — जैसे एक परिवार में यदि सब लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं तो वहां शांति रहती है।
यदि सब एक दूसरे से प्रेम नहीं करते तो वहां शांति नहीं रह सकती।
लेकिन यदि वहां अहंकार और विरोध आ जाए तो संघर्ष शुरू हो जाता है।
अद्वैत का अर्थ है एकता और समरसता।
तीसरा — देवताओं को अद्वैत क्यों कहा जाता है?
देवताओं का जीवन पूर्णता, संतुलित और शुद्ध होता है। उनमें अहंकार नहीं, ईर्ष्या नहीं, संघर्ष नहीं।
देवता उसे कहा जाता है जिसमें अहंकार न हो, ईर्ष्या न हो, संघर्ष न हो।
दुनिया के ग्रंथों में देवताओं को अलग तरीके से बताया गया है। शास्त्रों में देवताओं के युद्ध का वर्णन मिलता है।
लेकिन वास्तविक अर्थ में देवता वह हैं जिनमें विकार नहीं होते।
इसलिए उनके जीवन में एकता रहती है।
साकार मुरली 18 जनवरी 1973
देवताओं में विकार नहीं होते इसलिए वहां झगड़ा नहीं होता।
देह-अभिमान के कारण विकार आते हैं।
इसका अर्थ है कि देवताओं की चेतना अद्वैत है।
अब द्वैत का अर्थ क्या है?
द्वैत का अर्थ है दो मत।
एक से अधिक मत।
जहां मैं और तुम, मेरा और तेरा, श्रेष्ठ और हीन ऐसी भावना उत्पन्न होती है।
द्वैत का परिणाम है संघर्ष।
जहां दो आएंगे वहां संघर्ष होगा।
अहंकार आएगा।
प्रतिस्पर्धा आएगी।
उदाहरण — जब मनुष्य कहता है “मैं ही सही हूं, बाकी सब गलत हैं”, तब वहां द्वैत उत्पन्न हो जाता है।
द्वैत से असुरता कैसे आती है?
जब मनुष्य आत्म चेतना से दूर हो जाता है तब उसमें विकार उत्पन्न होते हैं।
जैसे —
काम
क्रोध
लोभ
मोह
अहंकार
ये विकार मनुष्य को असुर बना देते हैं।
साकार मुरली 24 मार्च 1968
काम, क्रोध आदि विकारों के कारण मनुष्य असुर बन जाते हैं।
इसका अर्थ है कि असुरता कोई बाहरी पहचान नहीं है।
यह चेतना की स्थिति है।
देवता और असुर चेतना का अंतर
देवता और असुर का अंतर शरीर का नहीं बल्कि संस्कारों का होता है।
शरीर वही होता है, मनुष्य वही होता है, लेकिन संस्कार अलग होते हैं।
देवताओं के संस्कार होते हैं —
शुद्ध
शांत
दयालु
सहयोगी
और असुरों के संस्कार होते हैं —
क्रोधी
स्वार्थी
अहंकारी
हिंसक
उदाहरण —
एक ही व्यक्ति दो स्थितियों में अलग-अलग व्यवहार कर सकता है।
जब वह प्रेम में होता है तो देवतुल्य बन जाता है।
जब वह क्रोध में होता है तो असुर जैसा व्यवहार करता है।
अद्वैत और द्वैत का विश्व पर प्रभाव
जब दुनिया में अद्वैत की चेतना होती है तो दुनिया स्वर्ग बन जाती है।
लेकिन जब द्वैत की चेतना बढ़ती है तो दुनिया संघर्ष का मैदान बन जाती है।
उदाहरण —
आज दुनिया में राष्ट्रों के बीच संघर्ष, समाज में विभाजन, परिवारों में विवाद — यह सब द्वैत की चेतना के उदाहरण हैं।
संगम युग का महत्व
संगम युग वह समय है जब मनुष्य को फिर से अद्वैत की चेतना सिखाई जाती है।
साकार मुरली 19 जनवरी 1969
अभी तुम बच्चों को फिर से देवता बनना है।
इसका अर्थ है कि मनुष्य को फिर से पवित्र, शांत और सहयोगी बनना है।
राजयोग कैसे मार्ग दिखाता है?
राजयोग हमें सिखाता है —
आत्म चेतना
परमात्म स्मृति
समान दृष्टि
जब आत्मा परमात्मा से जुड़ती है तो उसमें शुद्ध संस्कार जागृत होते हैं।
जैसे सूर्य की रोशनी से अंधकार समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्म स्मृति में विकार समाप्त हो जाते हैं।
सबसे बड़ा संदेश
अद्वैत और द्वैत का रहस्य हमें यह सिखाता है कि मनुष्य की चेतना ही दुनिया को स्वर्ग या नर्क बनाती है।
जब चेतना शुद्ध होती है तो मनुष्य देवता बन जाता है।
जब चेतना विकारी होती है तो मनुष्य असुर बन जाता है।
निष्कर्ष
मुरली का यह वाक्य हमें गहरा संदेश देता है —
अद्वैत की चेतना देवत्व लाती है।
द्वैत की चेतना असुरता लाती है।
और इस समय हमारा पुरुषार्थ है फिर से अद्वैत की चेतना को अपनाना।
अंतिम संदेश
यदि हम सचमुच देवता बनना चाहते हैं तो हमें आत्म चेतना में रहना होगा।
परमात्मा की याद में रहना होगा।
और प्रेम व योग के संस्कार धारण करने होंगे।
तभी हम इस दुनिया को फिर से स्वर्ग बना सकते हैं।
