AV-07/01-10-1987-ईश्वरीय स्नेह -जीवन परिवर्तन का फाउण्डेशन है
“ईश्वरीय स्नेह – जीवन परिवर्तन का फाउण्डेशन है”
आज स्नेह के सागर अपने स्नेही बच्चों से मिलने आये हैं। बाप और बच्चों का स्नेह विश्व को स्नेह सूत्र में बांध रहा है। जब स्नेह के सागर और स्नेह सम्पन्न नदियों का मेल होता है तो स्नेह-भरी नदी भी बाप समान मास्टर स्नेह का सागर बन जाती है। इसलिए विश्व की आत्मायें स्नेह के अनुभव से स्वत: ही समीप आती जा रही हैं। पवित्र प्यार वा ईश्वरीय परिवार के प्यार से कितनी भी अन्जान आत्मायें हों, बहुत समय से परिवार के प्यार से वंचित पत्थर समान बनने वाली आत्मा हो लेकिन ऐसे पत्थर समान आत्मायें भी ईश्वरीय परिवार के स्नेह से पिघल पानी बन जाती है। यह है ईश्वरीय परिवार के प्यार की कमाल। कितना भी स्वयं को किनारे करे लेकिन ईश्वरीय प्यार चुम्बक के समान स्वत: ही समीप ले आता है। इसको कहते हैं ईश्वरीय स्नेह का प्रत्यक्षफल। कितना भी कोई स्वयं को अलग रास्ते वाले मानें लेकिन ईश्वरीय स्नेह सहयोगी बनाए ‘आपस में एक हो’ आगे बढ़ने के सूत्र में बांध देता है। ऐसा अनुभव किया ना।
स्नेह पहले सहयोगी बनाता है, सहयोगी बनाते-बनाते स्वत: ही समय पर सर्व को सहजयोगी भी बना देता है। सहयोगी बनने की निशानी है – आज सहयोगी हैं, कल सहज-योगी बन जायेंगे। ईश्वरीय स्नेह परिवर्तन का फाउण्डेशन (नींव) है अथवा जीवन-परिवर्तन का बीजस्वरूप है। जिन आत्माओं में ईश्वरीय स्नेह की अनुभूति का बीज पड़ जाता है, तो यह बीज सहयोगी बनने का वृक्ष स्वत: ही पैदा करता रहेगा और समय पर सहजयोगी बनने का फल दिखाई देगा क्योंकि परिवर्तन का बीज फल जरूर दिखाता है। सिर्फ कोई फल जल्दी निकलता है, कोई फल समय पर निकलता है। चारों ओर देखो, आप सभी मास्टर स्नेह के सागर, विश्व-सेवाधारी बच्चे क्या कार्य कर रहे हो? विश्व में ईश्वरीय परिवार के स्नेह का बीज बो रहे हो। जहाँ भी जाते हो चाहे कोई नास्तिक हो वा आस्तिक हो, बाप को न भी जानते हों, न भी मानते हों लेकिन इतना अवश्य अनुभव करते हैं कि ऐसा ईश्वरीय परिवार का प्यार जो आप शिव वंशी ब्रह्माकुमार/ब्रह्माकुमारियों से मिलता है, यह कहीं भी नहीं मिलता और यह भी मानते हैं कि यह स्नेह वा प्यार साधारण नहीं है, यह अलौकिक प्यार है वा ईश्वरीय स्नेह है। तो इन्डायरेक्ट नास्तिक से आस्तिक हो गया ना। ईश्वरीय प्यार है, तो वह कहाँ से आया? किरणें सूर्य को स्वत: ही सिद्ध करती हैं। ईश्वरीय प्यार, अलौकिक स्नेह, नि:स्वार्थ स्नेह स्वत: ही दाता बाप को सिद्ध करता ही है। इन्डायरेक्ट ईश्वरीय स्नेह के प्यार द्वारा स्नेह के सागर बाप से सम्बन्ध जुट जाता है लेकिन जानते नहीं हैं क्योंकि बीज पहले गुप्त रहता है, वृक्ष स्पष्ट दिखाई देता है। तो ईश्वरीय स्नेह का बीज सर्व को सहयोगी सो सहजयोगी, प्रत्यक्षरूप में समय प्रमाण प्रत्यक्ष कर रहा है और करता रहेगा। तो सभी ने ईश्वरीय स्नेह के बीज डालने की सेवा की। सहयोगी बनाने की शुभ भावना और शुभ कामना के विशेष दो पत्ते भी प्रत्यक्ष देखे। अभी यह तना वृद्धि को प्राप्त करते प्रत्यक्षफल दिखायेगा।
बापदादा सर्व बच्चों के वैराइटी (भिन्न-भिन्न) प्रकार की सेवा को देख हर्षित होते हैं। चाहे भाषण करने वाले बच्चे, चाहे स्थूल सेवा करने वाले बच्चे – सर्व के सहयोग की सेवा से सफलता का फल प्राप्त होता है। चाहे पहरा देने वाले हों, चाहे बर्तन सम्भालने वाले हों लेकिन जैसे पांच अंगुलियों के सहयोग से कितना भी श्रेष्ठ कार्य, बड़ा कार्य सहज हो जाता है, ऐसे हर एक ब्राह्मण बच्चों के सहयोग से जितना सोचा था कि ऐसा होगा, उस सोचने से हजार गुणा ज्यादा सहज कार्य हो गया। यह किसकी कमाल है? सभी की। जो भी कार्य में सहयोगी बने – चाहे स्वच्छता भी रखी, चाहे टेबल (मेज) साफ किया लेकिन सर्व के सहयोग की रिजल्ट (परिणाम) सफलता है। यह संगठन की शक्ति महान् है। बापदादा देख रहे थे – न सिर्फ मधुबन में आने वाले बच्चे लेकिन जो साकार में भी नहीं थे, चारों ओर के ब्राह्मण बच्चों की, चाहे देश, चाहे विदेश – सबके मन की शुभ भावना और शुभ कामना का सहयोग रहा। यह सर्व आत्माओं की शुभ भावना, शुभ कामना का किला आत्माओं को परिवर्तन कर लेता है। चाहे निमित्त शक्तियाँ भी रहीं, पाण्डव भी रहे। निमित्त सेवाधारी विशेष हर कार्य में बनते ही हैं लेकिन वायुमण्डल का किला सर्व के सहयोग से ही बनता है। निमित्त बनने वाले बच्चों को भी बापदादा मुबारक देते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा मुबारक सभी बच्चों को। बाप को बच्चे मुबारक क्या देंगे क्योंकि बाप तो अव्यक्त हो गया। व्यक्त में तो बच्चों को निमित्त बनाया। इसलिए, बापदादा सदा बच्चों के ही गीत गाते हैं। आप बाप के गीत गाओ, बाप आपके गीत गाये।
जो भी किया, बहुत अच्छा किया। भाषण करने वालों ने भाषण अच्छे किये, स्टेज सजाने वालों ने स्टेज अच्छी सजाई और विशेष योगयुक्त भोजन बनाने वाले, खिलाने वाले, सब्जी काटने वाले रहे। पहले फाउण्डेशन तो सब्जी कटती है। सब्जी नहीं कटे तो भोजन क्या बनेगा? सब डिपार्टमेन्ट वाले आलराउन्ड (सर्व प्रकार की) सेवा के निमित्त रहे। सुनाया ना अगर सफाई वाले सफाई नहीं करते तो भी प्रभाव नहीं पड़ता। हर एक का चेहरा ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न नहीं होता तो सेवा की सफलता कैसे होती। सभी ने जो भी कार्य किया, स्नेह भरकर के किया। इसलिए, उन्हों में भी स्नेह का बीज पड़ा। उमंग-उत्साह से किया, इसलिए उन्हों में भी उमंग-उत्साह रहा। अनेकता होते भी स्नेह के सूत्र के कारण एकता की ही बातें करते रहे। यह वायुमण्डल के छत्रछाया की विशेषता रही। वायुमण्डल छत्रछाया बन जाता है। तो छत्रछाया के अन्दर होने के कारण कैसे भी संस्कार वाले स्नेह के प्रभाव में समाये हुए थे। समझा? सभी की बड़े ते बड़ी ड्यूटी (जिम्मेवारी) थी। सभी ने सेवा की। कितना भी वो और कुछ बोलने चाहें, तो भी बोल नहीं सकते वायुमण्डल के कारण। मन में कुछ सोचें भी लेकिन मुख से निकल नहीं सकता क्योंकि प्रत्यक्ष आप सबकी जीवन के परिवर्तन को देख उन्हों में भी परिवर्तन की प्रेरणा स्वत: ही आती रही। प्रत्यक्ष प्रमाण देखा ना। शास्त्र प्रमाण से भी, सबसे बड़ा प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रत्यक्ष प्रमाण के आगे और सब प्रमाण समा जाते हैं। यह रही सेवा की रिजल्ट। अभी भी उसी स्नेह के सहयोग की विशेषता से और समीप लाते रहेंगे तो और भी सहयोग में आगे बढ़ते जायेंगे। फिर भी प्रत्यक्षता का आवाज बुलन्द तभी होगा, जब सब सत्ताओं का सहयोग होगा।
विशेष सर्व सत्तायें जब मिलकर एक आवाज बुलन्द करें, तब ही प्रत्यक्षता का पर्दा विश्व के आगे खुलेगा। वर्तमान समय जो सेवा का प्लान बनाया है, वह इसलिए ही बनाया है ना। सभी वर्ग वाले अर्थात् सत्ता वाले सम्पर्क में, सहयोग में आयें, स्नेह में आयें तो फिर सम्बन्ध में आकर सहजयोगी बन जायेंगे। अगर कोई भी सत्ता सहयोग में नहीं आती है तो सर्व के सहयोग का जो कार्य रखा है, वह सफल कैसे होगा?
अभी फाउण्डेशन पड़ा विशेष सत्ता का। धर्म सत्ता सबसे बड़े ते बड़ी सत्ता है ना। उस विशेष सत्ता द्वारा फाउण्डेशन आरम्भ हुआ। स्नेह का प्रभाव देखा ना। वैसे लोग क्या कहते थे कि यह इतने सब इकट्ठे कैसे बुला रहे हो? यह लोग भी सोचते रहे ना। लेकिन ईश्वरीय स्नेह का सूत्र एक था, इसलिए, अनेकता के विचार होते हुए भी सहयोगी बनने का विचार एक ही रहा। ऐसे अभी सर्व सत्ताओं को सहयोगी बनाओ। बन भी रहे हैं लेकिन और भी समीप, सहयोगी बनाते चलो क्योंकि अभी गोल्डन जुबली (स्वर्ण जयन्ती) समाप्त हुई, तो अभी से, और प्रत्यक्षता के समीप आ गये। डायमन्ड जुबली अर्थात् प्रत्यक्षता का नारा बुलन्द करना। तो इस वर्ष से प्रत्यक्षता का पर्दा अभी खुलने आरम्भ हुआ है। एक तरफ विदेश द्वारा भारत में प्रत्यक्षता हुई, दूसरे तरफ निमित्त महामण्डलेश्वरों द्वारा कार्य की श्रेष्ठता की सफलता। विदेश में यू.एन. वाले निमित्त बने, वे भी विशेष नामीग्रामी और भारत में भी नामीग्रामी धर्म सत्ता है। तो धर्म सत्ता वालों द्वारा धर्म-आत्माओं की प्रत्यक्षता हो – यह है प्रत्यक्षता का पर्दा खुलना आरम्भ होना। अजुन खुलना आरम्भ हुआ है। अभी खुलने वाला है। पूरा नहीं खुला है, आरम्भ हुआ है। विदेश के बच्चे जो कार्य के निमित्त बने, यह भी विशेष कार्य रहा। प्रत्यक्षता के विशेष कार्य में इस कार्य के कारण निमित्त बन गये। तो बापदादा विदेश के बच्चों को इस अन्तिम प्रत्यक्षता के हीरो पार्ट में निमित्त बनने के सेवा की भी विशेष मुबारक दे रहे हैं। भारत में हलचल तो मचा ली ना। सबके कानों तक आवाज गया। यह विदेश का बुलन्द आवाज भारत के कुम्भकरणों को जगाने के निमित्त तो बन गया। लेकिन अभी सिर्फ आवाज गया है, अभी और जगाना है, उठाना है। अभी सिर्फ कानों तक आवाज पहुँचा है। सोये हुए को अगर कान में आवाज जाता है तो थोड़ा हिलता है ना, हलचल तो करता है ना। तो हलचल पैदा हुई। हलचल में थोड़े जागे हैं, समझते कि यह भी कुछ हैं। अभी जागेंगे तब जब और जोर से आवाज करेंगे। अभी पहले भी थोड़ा जोर से हुआ। ऐसे ही कमाल तब हो जब सब सत्ता वाले इकट्ठे स्टेज पर स्नेह मिलन करें। सब सत्ता की आत्माओं द्वारा ईश्वरीय कार्य की प्रत्यक्षता आरम्भ हो, तब प्रत्यक्षता का पर्दा पूरा खुलेगा। इसलिए, अभी जो प्रोग्राम बना रहे हो उसमें यह लक्ष्य रखना कि सब सत्ताओं का स्नेह मिलन हो। सब वर्गों का स्नेह मिलन तो हो सकता है। जैसे साधारण साधुओं को बुलाते तो कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन यह महामण्डलेश्वरों को बुलाया ना। ऐसे तो शंकराचार्य की भी इस संगठन में और ही शोभा होती। लेकिन अब उसका भी भाग्य खुल जायेगा। अन्दर से तो फिर भी सहयोगी है। बच्चों ने मेहनत भी अच्छी की। लेकिन फिर भी लोकलाज तो रखनी पड़ती है। वह भी दिन आयेगा जब सभी सत्ता वाले मिल करके कहेंगे कि श्रेष्ठ सत्ता, ईश्वरीय सत्ता, आध्यात्मिक सत्ता है तो एक परमात्म-सत्ता ही है। इसलिए लम्बे समय का प्लान बनाया है ना। इतना समय इसलिए मिला है कि सभी को स्नेह के सूत्र में बांध समीप लाओ। यह स्नेह चुम्बक बनेगा जो सब एक साथ संगठन रूप में बाप की स्टेज पर पहुँच जाए। ऐसा प्लान बनाया है ना? अच्छा।
सेवाधारियों को सेवा का प्रत्यक्षफल भी मिल गया। नहीं तो, अभी नम्बर नये बच्चों का है ना। आप लोग तो मिलन मनाते-मनाते अब वानप्रस्थ अवस्था तक पहुँचे हो। अभी अपने छोटे भाई-बहिनों को टर्न दे रहे हो। स्वयं वानप्रस्थी बने तब औरों को चांस दिया। इच्छा तो सबकी बढ़ती ही जायेगी। सब कहेंगे – अभी भी मिलने का चांस मिलना चाहिए। जितना मिलेंगे, उतना और इच्छा बढ़ती जायेगी। फिर क्या करेंगे? औरों को चांस देना भी स्वयं तृप्ति का अनुभव करना है। क्योंकि पुराने तो अनुभवी हैं, प्राप्ति-स्वरूप हैं। तो प्राप्ति-स्वरूप आत्मायें सर्व पर शुभ भावना रखने वाले, औरों को आगे रखने वाले हो। या समझते हो हम तो मिल लेवें? इसमें भी नि:स्वार्थी बनना है। समझदार हो। आदि, मध्य, अन्त को समझने वाले हो। समय को भी समझते हो। प्रकृति के प्रभाव को भी समझते हो। पार्ट को भी समझते हो। बापदादा भी सदा ही बच्चों से मिलने चाहते हैं। अगर बच्चे मिलने चाहते तो पहले बाप चाहता, तब बच्चे भी चाहते। लेकिन बाप को भी समय को, प्रकृति को देखना तो पड़ता है ना। जब इस दुनिया में आते हैं तो दुनिया की सब बातों को देखना पड़ता है। जब इनसे दूर अव्यक्त वतन में हैं तो वहाँ तो पानी की, समय की, रहने आदि की प्रॉब्लम (समस्या) ही नहीं। गुजरात वाले समीप रहते हैं। तो इसका भी फल मिला है ना। यह भी गुजरात वालों की विशेषता है, सदैव एवररेडी रहते हैं। ‘हाँ जी’ का पाठ पक्का है और जहाँ भी रहने का स्थान मिले, तो रह भी जाते हैं। हर परिस्थिति में खुश रहने की भी विशेषता है। गुजरात में वृद्धि भी अच्छी हो रही है। सेवा का उमंग-उत्साह स्वयं को भी निर्विघ्न बनाता, दूसरों का भी कल्याण करता है। सेवाभाव की भी सफलता है। सेवा-भाव में अगर अहम्-भाव आ गया तो उसको सेवा-भाव नहीं कहेंगे। सेवा-भाव सफलता दिलाता है। अहम्-भाव अगर मिक्स होता है तो मेहनत भी ज्यादा, समय भी ज्यादा, फिर भी स्वयं की सन्तुष्टी नहीं होती। सेवाभाव वाले बच्चे सदा स्वयं भी आगे बढ़ते और दूसरों को भी आगे बढ़ाते हैं। सदा उड़ती कला का अनुभव करते हैं। अच्छी हिम्मत वाले हैं। जहाँ हिम्मत है वहाँ बापदादा भी हर समय कार्य में मददगार हैं।
महारथी तो हैं ही महादानी। जो भी महारथी सेवा के प्रति आये हैं, महादानी वरदानी हो ना? औरों को चांस देना – यह भी महादान, वरदान है। जैसा समय, वैसा पार्ट बजाने में भी सब सिकीलधे बच्चे सदा ही सहयोगी रहे हैं और रहेंगे। इच्छा तो होगी क्योंकि यह शुभ इच्छा है। लेकिन इसको समाने भी जानते हैं। इसलिए सभी सदा सन्तुष्ट है।
बापदादा भी चाहते हैं कि एक-एक बच्चे से मिलन मनावें और समय की सीमा भी नहीं होनी चाहिए। लेकिन आप लोगों की दुनिया में यह सभी सीमाएं देखनी पड़ती है। नहीं तो, एक-एक विशेष रतन की महिमा अगर गायें तो कितनी बड़ी है। कम से कम एक-एक बच्चे की विशेषता का एक-एक गीत तो बना सकते हैं। लेकिन… इसलिए कहते हैं वतन में आओ जहाँ कोई सीमा नहीं। अच्छा।
सदा ईश्वरीय स्नेह में समाये हुए, सदा हर सेकेण्ड सर्व के सहयोगी बनने वाले, सदा प्रत्यक्षता के पर्दे को हटाए बाप को विश्व के आगे प्रत्यक्ष करने वाले, सदा सर्व आत्माओं को प्रत्यक्ष-प्रमाण-स्वरूप बन आकर्षित करने वाले, सदा बाप और सर्व के हर कार्य में सहयोगी बन एक का नाम बाला करने वाले – ऐसे विश्व के इष्ट बच्चों को, विश्व के विशेष बच्चों को बापदादा का अति स्नेह सम्पन्न यादप्यार। साथ-साथ सर्व देश-विदेश के स्नेह से बाप के सामने पहुँचने वाले सर्व समीप बच्चों को सेवा की मुबारक के साथ-साथ बापदादा का विशेष यादप्यार स्वीकार हो।
मुख्य भाईयों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-
पाण्डव की विजय सदा गाई हुई है। पाण्डवों के मस्तक पर सदा विजय का तिलक है ही है। पाण्डवों को ही विजयी पाण्डव कहते हैं। स्व पर विजय, सेवा में विजय। तो डबल विजय का तिलक है ना। बापदादा जब महावीर पाण्डवों को देखते हैं तो सदैव मस्तक पर डबल विजय का तिलक देखते हैं। यही पाण्डवों की विशेषता हर कल्प की गाई हुई है। यह अमिट यादगार है। तो यादगार से प्रसिद्ध हुई आत्मायें हो। शक्तियां अपनी सेवा की स्टेज पर हैं लेकिन पाण्डवों की विशेषता अपनी है। पाण्डवों की विशेषता – सदा ही सेवा में उन्नति का सूर्य उदय करना। सेवा की विशेषता का श्रृंगार पाण्डव हैं। शक्तियां सहयोगी है लेकिन निमित्त उन्नति के आधार पाण्डव है। इसलिए पाण्डवों की विशेषता वर्णन करने बैठें तो पूरी मुरली चल जाए। पाण्डव सदा ही प्रसिद्ध हैं। भक्ति में भी कोई पूजा होती है तो पहले गणेश की पूजा करते हैं ना। साकार में बापदादा ने इसको (जगदीश भाई को) यह टाइटल दिया। तो टाइटल कम नहीं है, बिना गणेश के यानि पाण्डवों के पूजा शुरु नहीं होती। शक्तियों के सहयोग के बिना पाण्डव नहीं, पाण्डवों के सेवा की उन्नति के पुरुषार्थ के बिना शक्तियों के सेवा की विजय नहीं। दोनों ही एक दो के साथी हैं। पाण्डवों को सदैव दिल से ब्रह्मा के हमशरीक साथी कहते हैं। तो ब्रह्मा बाप के हम साथी है! कितनी कमाल है! शक्तियों को आगे रखना – यह भी पाण्डवों की कमाल है। अगर पाण्डव शक्तियों को आगे न रखें तो शक्तियां क्या करेंगी? यह पाण्डवों की विशेषता है। समय प्रमाण शक्तियों को आगे रखना ही पड़ता है। पाण्डव सहयोगी बन आगे रखते हैं, तब शक्तियों की महिमा होती है। पाण्डव कोई कम नहीं है। सिर्फ कहीं-कहीं शक्तियों का नाम प्रत्यक्ष हो जाता है, पाण्डवों का गुप्त हो जाता है। वैसे बाप भी गुप्त है। नाम तो बच्चों का होता, बाप का कहाँ होता है। तो पाण्डव सदा विजय के तिलकधारी हो। पाण्डवों के आगे टाइटल है – ‘विजयी पाण्डव’। सभी ने बहुत अच्छा किया। जैसे बापदादा चाहते हैं – प्यार-प्यार से फूंक भी लगाओ और अपना कार्य भी कर लो, ऐसे किया। अच्छी सेवा हुई। अच्छा।
आंध्र प्रदेश ग्रुप से बापदादा की मुलाकात
सभी अपने को श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मा समझते हो? सदा हर कदम में आगे बढ़ते जा रहे हो? क्योंकि जब बाप के बन गये तो पूरा अधिकार प्राप्त करना बच्चों का पहला कर्तव्य है। सम्पन्न बनना अर्थात् सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त करना। ऐसे स्वयं को सम्पन्न अनुभव करते हो? जब भाग्यविधाता भाग्य बांट रहे हैं, तो पूरा भाग्य लेना चाहिए ना। तो थोड़े में राजी होने वाले हो या पूरा लेने वाले वाले हो? बच्चे अर्थात् पूरा अधिकार लेने वाले। हम कल्प-कल्प के अधिकारी हैं – यह स्मृति सदा समर्थ बनाते हुए आगे बढ़ाती रहेगी। यह नई बात नहीं कर रहे हो, यह प्राप्त हुआ अधिकार फिर से प्राप्त कर रहे हो। नई बात नहीं। कई बार मिले हैं और अनेक बार आगे भी मिलते रहेंगे। आदि, मध्य, अन्त तीनों कालों को जानने वाले हैं – यह नशा सदा रहता है? जो भी प्राप्ति हो रही है वह सदा है, अविनाशी है – यह निश्चय और नशा हो तो इसी आधार से उड़ती कला में उड़ते रहेंगे। अच्छा।
जैसे बाप ज्ञान का सागर है, ऐसे मास्टर ज्ञान के सागर बन सदा औरों को भी ज्ञान दान देते रहते हो ना। ज्ञान का कितना श्रेष्ठ खज़ाना मिला है। ऐसा श्रेष्ठ खज़ाना इस समय और किसी आत्माओं के पास है नहीं। तो आप भाग्यवान बन गये ना। सदा अपने इस श्रेष्ठ भाग्य को स्मृति में रख आगे बढ़ते चलो। याद के अनुभव से औरों की भी सेवा कर औरों को भी आप समान भाग्यवान बनाते चलो। क्योंकि ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य ही है सेवाधारी बन सेवा करना। जितनी सेवा करेंगे उतनी खुशी बढ़ती जायेगी। कभी कोई दु:ख की लहर आ नहीं सकती। सदैव यह याद रखो कि हम सुख के सागर के बच्चे हैं। सुख के सागर के बच्चों के पास दु:ख आ नहीं सकता। सदा महादानी बन जो भी खज़ाने मिले हैं, उसका दान करते रहो। क्योंकि यह खज़ाने जितना दान करेंगे उतना और भी बढ़ते जायेंगे। वो खज़ाने दान करने से कम होते हैं, लेकिन यह बढ़ते हैं तो महादानी बनना अर्थात् देना नहीं बल्कि और भी भरना। तो सदा अपने को ऐसे पद्मों की कमाई जमा करने वाली विशेष आत्मा समझकर चलो।
ईश्वरीय स्नेह — जीवन परिवर्तन का फाउण्डेशन
1. स्नेह के सागर और स्नेही आत्माओं का दिव्य मिलन
आज स्नेह के सागर अपने स्नेही बच्चों से मिलने आए हैं। बाप और बच्चों का स्नेह पूरे विश्व को स्नेह-सूत्र में बाँध रहा है।
जब स्नेह के सागर और स्नेह सम्पन्न नदियों का मिलन होता है, तब स्नेह-भरी नदी भी बाप समान मास्टर स्नेह का सागर बन जाती है।
उदाहरण:
जैसे छोटी नदियाँ सागर में मिलकर सागर का रूप धारण कर लेती हैं, वैसे ही आत्मा जब परमात्म प्रेम में समा जाती है तो उसका व्यक्तित्व दिव्यता से भर जाता है।
2. ईश्वरीय स्नेह — पत्थर दिलों को भी पिघला देता है
कितनी भी अंजान आत्माएँ हों… कितनी भी समय से परिवार के प्यार से वंचित हों… पत्थर समान कठोर संस्कार वाली आत्माएँ भी…
ईश्वरीय परिवार के स्नेह से पिघलकर प्रेममयी बन जाती हैं।
उदाहरण:
जैसे बर्फ सूर्य की गर्मी से स्वतः पिघलती है, वैसे ही कठोर हृदय ईश्वरीय प्रेम से द्रवित हो जाते हैं।
यह है ईश्वरीय प्यार का चुम्बकीय प्रभाव।
3. स्नेह पहले सहयोगी बनाता है, फिर सहजयोगी
ईश्वरीय स्नेह आत्माओं को पहले सहयोगी बनाता है, और सहयोगी बनाते‑बनाते समय पर सहजयोगी बना देता है।
🔹 सहयोगी बनने की निशानी:
आज सहयोगी हैं — कल सहजयोगी बन जायेंगे
4. स्नेह — जीवन परिवर्तन का बीजस्वरूप
ईश्वरीय स्नेह परिवर्तन की नींव है। यह जीवन‑परिवर्तन का बीज है।
जिस आत्मा में स्नेह का बीज पड़ता है — वहाँ सहयोग का वृक्ष उगता है, और समय पर सहजयोग का फल मिलता है।
उदाहरण:
बीज तुरंत वृक्ष नहीं बनता, परंतु सही वातावरण मिलने पर अवश्य फल देता है।
5. विश्व सेवा — स्नेह के बीज बोने की सेवा
आप सभी मास्टर स्नेह के सागर विश्व में क्या कर रहे हो?
आप जहाँ भी जाते हो:
- कोई आस्तिक हो या नास्तिक
- बाप को मानते हों या न मानते हों
वे एक बात अवश्य अनुभव करते हैं — ऐसा अलौकिक प्यार कहीं नहीं मिलता।
यही अनुभव उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से आस्तिक बना देता है।
उदाहरण:
किरणें स्वयं सिद्ध करती हैं कि सूर्य है। वैसे ही ईश्वरीय स्नेह, दाता बाप के अस्तित्व को सिद्ध करता है।
6. संगठन की शक्ति — सफलता का आधार
बापदादा सर्व बच्चों की सेवा देखकर हर्षित होते हैं:
- भाषण देने वाले
- स्थूल सेवा करने वाले
- सफाई रखने वाले
- भोजन बनाने वाले
- व्यवस्था संभालने वाले
सभी के सहयोग से सफलता मिलती है।
उदाहरण:
पाँचों उँगलियाँ मिलकर ही बड़ा कार्य सहज होता है।
7. छोटी सेवा भी महान है
अगर सब्ज़ी न कटे तो भोजन कैसे बनेगा? अगर सफाई न हो तो प्रभाव कैसे पड़ेगा?
हर सेवा ईश्वरीय कार्य की नींव है।
संदेश:
कोई सेवा छोटी नहीं — भावना बड़ी है।
8. वायुमण्डल की शक्ति — परिवर्तन का अदृश्य किला
सर्व आत्माओं की शुभ भावना और शुभकामना मिलकर ऐसा वायुमण्डल बनाती है, जो आत्माओं को स्वतः परिवर्तन की प्रेरणा देता है।
प्रत्यक्ष जीवन परिवर्तन — सबसे बड़ा प्रमाण है।
9. प्रत्यक्षता का समय — सामूहिक सहयोग आवश्यक
जब सभी सत्ताएँ मिलकर एक स्वर में बोलेंगी, तभी विश्व के सामने प्रत्यक्षता का पर्दा खुलेगा।
लक्ष्य:
- सभी वर्गों का स्नेह मिलन
- सहयोग से सम्बन्ध
- सम्बन्ध से सहजयोग
10. सेवा का रहस्य — सेवाभाव बनाम अहम्‑भाव
सेवाभाव सफलता दिलाता है। अहम्‑भाव मेहनत बढ़ाता है, संतुष्टि घटाता है।
उदाहरण:
निस्वार्थ सेवा उड़ती कला देती है। अहंकार सेवा को बोझ बना देता है।
11. महादानी आत्माएँ — आगे बढ़ाने का आनंद
सच्चे सेवाधारी:
- स्वयं आगे बढ़ते हैं
- दूसरों को आगे बढ़ाते हैं
- अवसर बाँटते हैं
- संतुष्टि अनुभव करते हैं
पुराने अनुभवी — नये बच्चों को अवसर देते हैं।
यही निस्वार्थता है।
12. पाण्डवों की विशेषता — डबल विजय का तिलक
- स्व पर विजय
- सेवा में विजय
यही डबल विजय है।
पाण्डव सेवा उन्नति के आधार हैं। शक्तियाँ सहयोगी हैं — दोनों एक-दूसरे के साथी हैं।
13. श्रेष्ठ भाग्यवान आत्माएँ — पूर्ण अधिकार का जीवन
जब बाप मिल गया तो पूरा अधिकार लेना बच्चों का कर्तव्य है।
हम कल्प‑कल्प के अधिकारी हैं — यह स्मृति उड़ती कला देती है।
जो मिला है वह अविनाशी है।
14. महादान — ज्ञान और सुख का वितरण
- ज्ञान का दान
- याद का अनुभव
- सुख का प्रसार
ये खज़ाने देने से बढ़ते हैं।
महादानी बनना अर्थात् भरपूर बनना।
मुख्य मुरली बिंदु (Murli Notes)
तिथि: 14 जनवरी 1982 (अव्यक्त बापदादा मुरली संदर्भित)
- ईश्वरीय स्नेह जीवन परिवर्तन की नींव है
- स्नेह सहयोगी से सहजयोगी बनाता है
- संगठन की शक्ति सफलता का आधार है
- सेवाभाव सफलता देता है, अहम्‑भाव रुकावट
- प्रत्यक्ष प्रमाण सबसे बड़ा प्रमाण है
- सामूहिक सहयोग से प्रत्यक्षता का पर्दा खुलता है
- महादानी आत्माएँ सेवा से विश्व कल्याण करती हैं
समापन संदेश
सदा ईश्वरीय स्नेह में समाये रहो, हर सेकण्ड सहयोगी बनो, जीवन को प्रत्यक्ष प्रमाण बनाओ, और विश्व के सामने बाप की महिमा प्रकट करो।
बापदादा का अति स्नेह सम्पन्न यादप्यार।
प्रश्न 1: “स्नेह के सागर और स्नेही आत्माओं का दिव्य मिलन” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब परमात्मा रूपी स्नेह का सागर अपने बच्चों से मिलता है, तब आत्मा उस दिव्य प्रेम में डूब जाती है। यह मिलन आत्मा को साधारण से असाधारण बना देता है और विश्व को एकता के सूत्र में बाँधता है।
प्रश्न 2: आत्मा “मास्टर स्नेह का सागर” कैसे बनती है?
उत्तर:
जब आत्मा परमात्म प्रेम को अपनाती है और उसे जीवन में धारण करती है, तो वह स्वयं भी प्रेम, शांति और करुणा का स्रोत बन जाती है।
उदाहरण:
जैसे छोटी नदियाँ सागर में मिलकर सागर समान बन जाती हैं।
प्रश्न 3: ईश्वरीय स्नेह का हृदय पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
ईश्वरीय स्नेह कठोर से कठोर हृदय को भी पिघला देता है। उपेक्षित, दुःखी और प्रेम से वंचित आत्माएँ भी प्रेममयी बन जाती हैं।
उदाहरण:
जैसे बर्फ सूर्य की गर्मी से पिघल जाती है।
प्रश्न 4: ईश्वरीय प्यार को “चुम्बकीय प्रभाव” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि यह प्यार आत्माओं को स्वतः अपनी ओर आकर्षित करता है, चाहे वे स्वयं को कितना भी दूर समझें।
प्रश्न 5: स्नेह आत्मा को पहले क्या बनाता है?
उत्तर:
ईश्वरीय स्नेह आत्मा को पहले सहयोगी बनाता है।
प्रश्न 6: सहयोगी से सहजयोगी बनने की प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
जब आत्मा प्रेम से सेवा में सहयोग करती है, तो धीरे-धीरे उसका योग स्वाभाविक हो जाता है।
निशानी:
आज सहयोगी — कल सहजयोगी।
प्रश्न 7: स्नेह को “जीवन परिवर्तन का बीज” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि जहाँ ईश्वरीय प्रेम का बीज पड़ता है, वहाँ सहयोग, सेवा और योग का वृक्ष स्वतः विकसित होता है।
उदाहरण:
बीज समय लेकर भी निश्चित रूप से फल देता है।
प्रश्न 8: विश्व सेवा में स्नेह की क्या भूमिका है?
उत्तर:
स्नेह के माध्यम से आत्माएँ दिव्य अनुभव करती हैं। यह अनुभव उन्हें सत्य के मार्ग की ओर ले जाता है, चाहे वे आस्तिक हों या नास्तिक।
प्रश्न 9: ईश्वरीय स्नेह परमात्मा के अस्तित्व को कैसे सिद्ध करता है?
उत्तर:
दिव्य प्रेम का अनुभव आत्मा को यह अहसास कराता है कि कोई अलौकिक शक्ति है जो प्रेम दे रही है।
उदाहरण:
जैसे किरणें सूर्य के अस्तित्व का प्रमाण हैं।
प्रश्न 10: संगठन की शक्ति सफलता का आधार क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि हर आत्मा का सहयोग मिलकर बड़े से बड़ा कार्य सहज बना देता है।
उदाहरण:
पाँचों उँगलियाँ मिलकर ही हाथ की शक्ति बनती हैं।
प्रश्न 11: क्या छोटी सेवा भी महत्वपूर्ण है?
उत्तर:
हाँ, हर छोटी सेवा ईश्वरीय कार्य की नींव है।
उदाहरण:
सब्ज़ी न कटे तो भोजन नहीं बन सकता।
प्रश्न 12: वायुमण्डल परिवर्तन में कैसे सहायक होता है?
उत्तर:
सामूहिक शुभभावना और शुभकामनाएँ ऐसा सकारात्मक वातावरण बनाती हैं, जो आत्माओं में स्वतः परिवर्तन लाता है।
प्रश्न 13: प्रत्यक्षता का पर्दा कब खुलता है?
उत्तर:
जब सभी शक्तियाँ और वर्ग एकता में मिलकर ईश्वरीय कार्य का समर्थन करते हैं।
प्रश्न 14: सेवाभाव और अहम्-भाव में क्या अंतर है?
उत्तर:
-
सेवाभाव सफलता और संतुष्टि देता है।
-
अहम्-भाव थकान और असंतोष देता है।
उदाहरण:
निस्वार्थ सेवा उड़ती कला देती है।
प्रश्न 15: महादानी आत्माओं की पहचान क्या है?
उत्तर:
वे स्वयं भी आगे बढ़ती हैं और दूसरों को भी आगे बढ़ाती हैं। अवसर बाँटना ही उनका आनंद है।
प्रश्न 16: पाण्डवों की “डबल विजय” क्या है?
उत्तर:
-
स्व पर विजय
-
सेवा में विजय
प्रश्न 17: श्रेष्ठ भाग्यवान आत्माएँ किसे कहा गया है?
उत्तर:
जो परमात्म प्राप्ति के बाद अपने सम्पूर्ण अधिकार को पहचानकर जीवन में धारण करती हैं।
प्रश्न 18: “महादान” का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
ज्ञान, सुख और दिव्य अनुभवों को बाँटना — क्योंकि ये देने से बढ़ते हैं।
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