RAJYOG(01)-स्वमान को जानना पर्याप्त नहीं है स्वमान स्वरूप बनना क्यों आवश्यक है।

यहाँ आपका टेक्स्ट बिना टाइमलाइन नंबरों के साफ़ करके दिया गया है:
स्वमान
को जानना
पर्याप्त नहीं है। कोई कहे मैं स्वमान को
जानता हूं।
मैंने पढ़ा है। मुझे याद है।
इतना काफी नहीं। स्वमान
स्वरूप बनना
आवश्यक है।
क्यों?
दुनिया वाले कहते हैं मैं जानता हूं मैं
आत्मा हूं। मैं शांत स्वरूप आत्मा हूं।
मैं अजर अमर आत्मा हूं। मैं शांति का सागर
हूं।
मैं आत्मा हूं। यह अनुभूति
सदा स्थिर है।
मैं आत्मा हूं। यह अनुभूति क्या सदा स्थिर
है?
हर स्थिति में शांति और सुख की अनुभूति
होती है।
स्वाभाविक
शक्ति और समर्थता
है।
निर्भय, निर्विकारी
और मुक्त जीवन है।
संबंधों में प्रेम, सम्मान और एकता है।
यह चेक करना है। यह नहीं है तो जरूर कहीं
ना कहीं मेरे पास स्वमान नहीं है। स्वमान
के अंदर स्थिति नहीं है।
यहां नीचे हमें दो चार्ट भी सामने दिए
हैं। स्वमान को जानना
यह बौद्धिक ज्ञान है।
और स्वमान स्वरूप बनना
यह अनुभव में स्थिरता है।
स्वमान स्वरूप बनना यह अनुभव में स्थिरता
है।
सिर्फ जानकारी तक सीमित। यह जानना क्या
होता है? स्वमान को जानने में क्या आता
है? सिर्फ जानकारी तक सीमित जानकारी है
मुझे। मैं शांत स्वरूप आत्मा हूं।
स्थितियां बदले तो अनुभव भी बदल जाता है।
वातावरण बदला, परिस्थिति बदली और हमारा
अनुभव भी बदल जाता है। अहंकार,
क्रोध, राग, द्वेष आते हैं। तो स्वमान को
जानना है। स्वमान को हमने अपने जीवन में
अप्लाई नहीं किया है।
शक्ति का अनुभव स्थिर नहीं।
जीवन में पूर्ण परिवर्तन नहीं आता। कब तक?
जब तक हम सिर्फ जानते हैं परंतु स्वरूप
नहीं बने।
जब हम स्वरूप बनते हैं तो हर स्थिति में
स्थिर और शांत रहेंगे।
कोई भी परिस्थिति, पराई स्थिति हमें विचलित
नहीं कर सकती।
स्वाभाविक रूप से
शक्ति का अनुभव होता है।
अहंकार,
क्रोध, राग, द्वेष इन सब से हम मुक्त हो
जाते हैं।
जीवन दिव्य और सफल बन जाता है।
सिर्फ स्वमान को जानना नहीं, हमें स्वमान
स्वरूप बनना है।
सिर्फ जानने से परिवर्तन नहीं होता।
जानने से बनने की ही यात्रा
सच्चे राजयोग की कुंजी है।
स्वमान स्वरूप बनो।
जीवन को दिव्य बनाओ।
स्वमान का स्वरूप बनो और जीवन को दिव्य
बनाओ। इतना क्लियर यह चित्र हमें समझाता
है।
अब हम इसे गहराई से समझेंगे।
डिस्क्लेमर है महत्वपूर्ण — यह स्पीच
ब्रह्मा कुमारीज की मुरलियों के आधार पर
आध्यात्मिक ज्ञान को सरल, सहज और समझाने
योग्य भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास
है। इसमें दिए गए उदाहरण केवल समझ को आसान
बनाने के लिए हैं। कुछ बिंदुओं में
व्याख्या भी सम्मिलित है। श्रोता स्वयं
मुरलियों का अध्ययन करें और अपने विवेक से
सत्य को समझें।
स्वमान को जानना पर्याप्त नहीं कि हम
स्वमान को जान लें कि ये-ये स्वमान है।
मेरे पास लिस्ट है उसकी। स्वमान स्वरूप
बनना क्यों आवश्यक है?
अध्याय का मूल प्रश्न:
क्या मैं केवल स्वमान को जानता और सोचता
हूं?
या वास्तव में स्वमान स्वरूप और अनुभवी
मूरत बन गया हूं?
आज की सबसे बड़ी आध्यात्मिक समस्या —
आज अनेक आत्माएं
ज्ञान सुनती हैं, स्वमान पढ़ती हैं,
योग पर चर्चा करती हैं।
लेकिन फिर भी छोटी बातों में हिल जाती हैं।
परिस्थितियों में तनाव में आ जाती हैं।
देहभान में भी आ जाती हैं।
क्यों?
क्योंकि जानना
और बन जाना — यह दोनों अलग बातें हैं।
बापदादा का सीधा संकेत।
बापदादा कहते हैं (अव्यक्त मुरली, 30 जनवरी 2010):
स्वमान याद है, सोच रहे हैं लेकिन स्वमान
स्वरूप बन अनुभवी मूरत बनने में कमी है।
ज्ञान और अनुभव में अंतर।
ज्ञान क्या है?
केवल सुनना।
बस सुन लिया, ज्ञान को जान लिया।
परंतु
अनुभव का मतलब है बन जाना।
ज्ञान को सुनकर सोचेंगे,
परंतु हमें जीना है।
अनुभव का मतलब है उसी अनुसार जीना।
केवल सुनना नहीं, केवल सोचना नहीं, उसको
अपने जीवन में जीना है।
ज्ञान में क्या है?
जानकारी।
परंतु अनुभव में क्या है?
जीवन में परिवर्तन।
जानने में तो सिर्फ जानकारी तक रहेंगे,
परंतु अनुभव करेंगे तो
जीवन परिवर्तन हो जाएगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को पता है कि
क्रोध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कहते हैं — हां भाई, पता है।
क्रोध से बहुत नुकसान होता है।
नुकसान गिनवा भी देंगे।
यह ज्ञान है।
लेकिन यदि परिस्थिति आने पर भी
वह शांत रहता है —
यह अनुभव है।
यदि नुकसान का अनुभवी होता
तो अपना नुकसान नहीं करता।
न्यूरो साइंस क्या कहती है?
आधुनिक विज्ञान बताता है कि बार-बार की
अवेयरनेस,
बार-बार अपने आप को जागृत करना,
अपने आपको स्मृति दिलाना,
Repeated Inner State,
Emotional Reinforcement
मस्तिष्क में नए Neural Pathways बनाते हैं,
जिससे हमारे मस्तिष्क में नए रास्ते
बनते हैं।
यही कारण है कि देहभान नेचुरल लगने लगता
है।
हम अपने आप को शरीर समझते हैं।
यह हमारी आदत बन गई है।
और अभ्यास से स्वमान भी नेचुरल बन सकता
है।
देहभान इतना नेचुरल क्यों है?
अव्यक्त मुरली 30 जनवरी 2010:
देहभान इतना नेचुरल हो गया है कि
नाम सुनते ही अटेंशन चला जाता है।
इसका अर्थ — हमने वर्षों तक स्वयं को
शरीर माना है,
स्वयं को इस नाम से जिया है।
इसलिए वह Automatic Identity
बन गई।
अब क्या करना है?
अब केवल “मैं आत्मा हूं”
दोहराना नहीं।
21 बार कहना नहीं।
108 बार लिखना नहीं।
यह भक्ति बन जाएगी।
आत्मा की स्थिति का अनुभव करना है।
अनुभव कैसे बने?
जब बार-बार
Awareness आती है,
देह से न्यारा अनुभव होता है,
परमात्म संबंध जुड़ता है,
तब स्वमान
Thought नहीं रहता,
State बन जाता है।
अनुभव की अथॉरिटी सबसे बड़ी क्यों?
बापदादा कहते हैं:
अनुभव की अथॉरिटी है।
उदाहरण:
यदि आपने चीनी का स्वाद चख लिया है,
तो हजार लोग मना करें फिर भी
आप नहीं बदलेंगे।
क्योंकि अनुभव अधिक शक्तिशाली होता है।
जब आत्मा
स्वमान स्वरूप बनती है:
- परिस्थिति नहीं हिलाती
- देहभान स्वतः कम होता है
- याद सहज हो जाती है
- मन स्थिर रहने लगता है
कर्मयोगी स्थिति क्या है?
योग केवल बैठने का नाम नहीं।
बापदादा कहते हैं:
चलते-फिरते, कर्म करते योगी हैं।
कर्मयोगी बनने का तरीका:
हम बाबा की श्रीमत पर हर कर्म कर रहे हैं।
काम करते हुए भी स्मृति बनी रहे।
Action और Awareness साथ-साथ चलें।
स्वयं को चेक करने के प्रश्न:
- क्या मेरा स्वमान परिस्थिति में भी बना रहता है?
- क्या मैं Reaction के बजाय Response देता हूं?
- क्या मैं काम करते हुए भीतर शांत रहता हूं?
- क्या मेरा योग Effort है या Natural State?
यदि योग नेचुरल नहीं है और मेहनत करनी पड़ती है,
तो बाबा कहते हैं — बच्चे, तुम्हें मेरे से
मोहब्बत नहीं है।
अनुभव विकसित करने की सहज विधि:
Step 1: Pause
कुछ सेकंड अनुभव करें कि मैं आत्मा हूं।
अब Awareness लाएं।
अपने अंदर बोलना नहीं है।
Feeling:
मुझे शांति का अनुभव हो रहा है।
मैं स्थिर हूं।
मुझमें स्थिरता आ रही है।
हल्कापन है।
कोई शब्द बोलना नहीं पड़े।
केवल अनुभव करें।
अब उसी स्थिति में कर्म करें।
यही Living Rajyog है।
बापदादा का अंतिम संदेश
(अव्यक्त मुरली 30 जनवरी 2010):
स्मृति करने वाला नहीं,
स्मृति स्वरूप बनना है।
अध्याय निष्कर्ष:
राजयोग
केवल सोच नहीं,
केवल शब्द नहीं,
अनुभव, सिद्धि और जीवन शैली है।
जब स्वमान अनुभव बन जाता है
तब योग सहज हो जाता है।
अभ्यास:
आज पूरे दिन
केवल एक बात चेक करें —
क्या मैं
स्वमान को सोच रहा हूं
या वास्तव में
उसमें स्थित हूं?
अध्याय सूत्र:
स्वमान को जानना शुरुआत है।
परंतु
स्वमान स्वरूप बनना
हमारी मंजिल है।
