05/26-02-1995–“The Confluence Age is the age of celebration; to celebrate means to remain in imperishable zeal and enthusiasm.”

05/26-02-1995-“संगमयुग उत्सव का युग है – उत्सव मनाना अर्थात् अविनाशी उमंग-उत्साह में रहना”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“संगमयुग उत्सव का युग है – उत्सव मनाना अर्थात् अविनाशी उमंग-उत्साह में रहना”

आज त्रिदेव रचता त्रिमूर्ति शिव बाप अपने रुहानी डायमण्ड्स के साथ डायमण्ड जुबली वा डायमण्ड जयन्ती मनाने आये हैं। इसी विचित्र जयन्ती को डायमण्ड जयन्ती कहते हो। क्योंकि बाप अवतरित होते ही हैं कौड़ी समान आत्माओं को हीरे तुल्य बनाने। यही एक वण्डरफुल जयन्ती है जो सारे कल्प में, सारे विश्व में सबसे न्यारी और प्यारी है। कोई भी जयन्ती मनाते हैं तो आत्माओं की, देहधारियों की जयन्ती मनाते हैं। लेकिन यह शिव जयन्ती शरीरधारी आत्मा की नहीं है, निराकार बिन्दु रूप की जयन्ती है। शिव जयन्ती कहने से ज्योतिबिन्दु रूप ही सामने आता है। तो सारे कल्प में अशरीरी परम आत्मा की जयन्ती नहीं मनाई जाती। एक ही त्रिमूर्ति शिव बाप की विचित्र जयन्ती है, जो अशरीरी है। और यही एक शिव जयन्ती है जो बाप और बच्चों की साथ-साथ जयन्ती है। आज सिर्फ बाप की जयन्ती मनाने आये हो वा ब्राह्मण आत्माओं की भी जयन्ती मनाने आये हो? सभी को बताते हो ना कि शिव जयन्ती सो त्रिमूर्ति जयन्ती, ब्राह्मण जयन्ती, तो इतनी आत्माओं की परमात्मा बाप के साथ-साथ की जयन्ती – यह विचित्र है ना। लौकिक रीति से बाप का जन्म दिन और बच्चे का जन्म दिन एक नहीं होगा। दिन चाहे एक हो लेकिन वर्ष में अन्तर पड़ जायेगा। तो ऐसी विचित्र जयन्ती, न्यारी और प्यारी जयन्ती मनाने कहाँ-कहाँ से पहुँच गये हो! विश्व के कोने-कोने से किसलिए आये हो? अपनी जयन्ती मनाने या बाप की? या दोनों की? तो आप बाप को मुबारक देंगे या बाप आपको देंगे? आप बाप को कहते हो मुबारक हो और बाप आपको कहते हैं पद्म-पद्म गुणा मुबारक हो। एक-एक ब्राह्मण आत्मा हीरे से भी मूल्यवान हो। यह स्थूल हीरा तो आपके आगे कुछ भी नहीं है। इस दुनिया में हीरे का मूल्य है इसलिये हीरे-जैसा कहा जाता है। लेकिन आपके मूल्य के आगे हीरा क्या है! कुछ भी नहीं। यही हीरे तो आपके महलों में, दीवारों में होंगे। हीरे से भी ज्यादा एक-एक ब्राह्मण आत्मा हो। बापदादा चारों ओर के बच्चों को जो हीरे से भी अमूल्य हैं, सबको सामने देख रहे हैं। बापदादा के आगे सिर्फ मधुबन की सभा नहीं है लेकिन विश्व के चारों ओर के ब्राह्मण बच्चों की सभा है। सबके दिल की मुबारक के स्नेह भरे गीत कहो, बोल कहो बाप समीप से सुन रहे हैं। दिल का आवाज़ दिलाराम के पास पहले पहुँचता है। तो बापदादा देख रहे हैं कि बच्चों के सेवा का प्रत्यक्ष प्रमाण चारों ओर से मधुबन, बाप के स्वीट होम तक पहुँच रहा है। वैसे भी शिव जयन्ती को उत्सव कहते हैं। यथार्थ रीति से उत्सव आप ब्राह्मण ही मनाते हो। क्योंकि उत्सव का अर्थ ही है – सर्व उत्साह-उमंग में रहें। तो आप जो भी बैठे हो, सभी के दिल में उत्साह और उमंग कितना है? अविनाशी है या आज के लिये है? अविनाशी है ना? इसलिये बापदादा इस श्रेष्ठ संगमयुग को उत्सव का युग कहते हैं। हर दिन आपके लिये उत्साह सम्पन्न है। हर दिन उत्सव है।

जो गायन है, आप लोग टॉपिक रखते हो ‘अनेकता में एकता’ तो प्रैक्टिकल में अनेक देश, अनेक भाषायें, अनेक रूप-रंग लेकिन अनेकता में भी सबके दिल में एकता है ना! क्योंकि एक बाप है। चाहे अमेरिका से आये हो, चाहे अफ्रीका से आये हो लेकिन दिल में एक बाप है। एक श्रीमत पर चलने वाले हो। तो बापदादा को अच्छा लगता है कि अनेक भाषाओं में होते हुए भी मन का गीत, मन की भाषा एक है। चाहे किसी भी भाषा वाले हो, काला ताज तो मिला है (सभी हेडफोन से अपनी-अपनी भाषा में सुन रहे हैं), अभी यही काला ताज बदलकर गोल्डन हो जायेगा। लेकिन सबके मन की भाषा एक है और एक ही शब्द है, ‘मेरा बाबा’। सभी भाषा वाले बोलो ‘मेरा बाबा’। हाँ, यह एक ही है। तो अनेकता में एकता है ना!

तो उत्साह में रहने वाले अर्थात् सदा उत्सव मनाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। कभी भी उत्साह कम नहीं होना चाहिये। पहले भी सुनाया था – ब्राह्मण जीवन का सांस है उमंग-उत्साह। अगर सांस चला जाये तो जीवन सेकेण्ड में खत्म हो जायेगी ना! तो ब्राह्मण जीवन में यदि उमंग-उत्साह का सांस नहीं तो ब्राह्मण जीवन नहीं। जो सदा उमंग-उत्साह में होगा, वो फ़लक से कहेगा कि ब्राह्मण हैं ही उत्साह-उमंग के लिये। और जिसका उमंग-उत्साह कम हो जाता है उसके बोल ही बदल जाते हैं। वो कहेगा – हैं तो सही…, होना तो चाहिये…, हो जायेगा… तो ये भाषा और उस भाषा में कितना अन्तर है! उसके हर बोल में ‘तो’ जरूर होगा – होना तो चाहिये… तो ये जो ‘तो-तो’ होता है ना, ये उमंग-उत्साह का प्रेशर कम होने से ही ऐसे बोल, कमजोरी के बोल निकलते हैं। तो उमंग-उत्साह कभी कम नहीं होना चाहिये। उमंग-उत्साह कम क्यों होता है? बापदादा कहते हैं सदा वाह-वाह कहो और कहते हैं व्हाई-व्हाई (क्यों, क्यों)। अगर कोई भी परिस्थिति में व्हाई शब्द आ जाता है तो उमंग-उत्साह का प्रेशर कम हो जाता है। बापदादा ने अगले साल भी विशेष डबल फारेनर्स को कहा था कि व्हाई शब्द को ब्राह्मण डिक्शनरी में चेंज करो, जब व्हाई शब्द आये तो फ्लाय शब्द याद रखो तो व्हाई खत्म हो जायेगा। कोई भी परिस्थिति छोटी भी जब बड़ी लगती है तो व्हाई शब्द आता है – ये क्यों, ये क्या… और फ्लाय कर लो तो परिस्थिति क्या होगी? छोटा-सा खिलौना। तो जब भी व्हाई शब्द मन में आवे तो कहो ब्राह्मण डिक्शनरी में व्हाई शब्द नहीं है, फ्लाय है। क्योंकि व्हाई-व्हाई, हाय-हाय करा देता है। बापदादा को हंसी भी आती है, एक तरफ कहेंगे – नहीं, हमारे जैसा श्रेष्ठ भाग्य किसका नहीं है। अभी-अभी यह कहेंगे और अभी-अभी उत्साह कम हुआ तो कहेंगे – पता नहीं मेरा भाग्य ही ऐसा है! मेरे भाग्य में इतना ही है! तो हाय-हाय हो गया ना! तो जब भी हाय-हाय का नज़ारा आवे तो वाह-वाह कर लो तो नज़ारा भी बदल जायेगा और आप भी बदल जायेंगे।

डबल विदेशी आजकल ‘पॉजिटिव थिंकिंग’ का कोर्स कराते हो ना। सभी विदेश में विशेष कोर्स यह कराते हो? तो अपने को भी कराते हो या दूसरों को कराते हो? जिस समय कोई ऐसी परिस्थिति आ जाये तो अपने को ही स्टूडेण्ड बनाकर, खुद ही टीचर बन करके अपने को यह कोर्स कराओ। अपने को करा सकते हो या सिर्फ दूसरे को करा सकते हो? दूसरे को कराना सहज है। जब यह नेचुरल स्थिति हो जाये कि हर व्यक्ति को, बात को पॉजिटिव वृत्ति से देखो, सुनो या सोचो तो कैसी स्थिति रहेगी? आजकल के साइन्स द्वारा भी ऐसे साधन निकले हैं जो ऱफ माल को भी बहुत सुन्दर रूप में बदल देते हैं। देखा है ना – क्या से क्या बना देते हैं! तो आपकी वृत्ति क्या ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकती? आवे नेगेटिव रूप में लेकिन आप नेगेटिव को पॉजिटिव वृत्ति से बदल दो। अगर हलचल में आते हैं तो उसका कारण है – नेगेटिव सुनना, सोचना वा बोलना या करना। ये मॉडल बनाते हो ना – न सोचो, न देखो, न बोलो, न करो। साइलेन्स की पॉवर क्या नेगेटिव को पॉजिटिव में नहीं बदल सकती! आपका मन और बुद्धि ऐसा बन जाये जो नेगेटिव टच नहीं करे, सेकेण्ड में परिवर्तन हो जाये। ऐसे तीव्र गति की अनुभूति कर सकते हो? मन और बुद्धि ऐसा तीव्र गति का यन्‍त्र बन जाये। बन सकता है कि टाइम लगेगा? कि नेगेटिव बात आयेगी तो कहेंगे कि थोड़ा सोचने तो दो, देखें तो सही क्या है! क्विक स्पीड से परिवर्तन हो जाये – इसको कहा जाता है ब्राह्मण जीवन का मज़ा, मौज़। अगर जीना है तो मौज़ से जीयें। सोच-सोचकर जीना वो जीना नहीं है। आप लोग औरों को कहते हो कि राजयोग जीने की कला है। तो आप लोग राजयोगी जीवन वाले हो ना! कि कहने वाले हो? जब राजयोग जीने की कला है तो राजयोगियों की कला क्या है? यही है ना? तो उत्सव मनाना अर्थात् मौज में रहना। मन भी मौज में, तन भी मौज में, सम्बन्ध-सम्पर्क भी मौज में।

कई बच्चे कहते हैं अपने रीति से तो ठीक रहते हैं, अपने मौज में रहते हैं लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में मौज में रहें, यह कभी-कभी होता है। लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क ही आपके स्थिति का पेपर है। यदि स्टूडेण्ट कहे वैसे तो मैं पास विद् ऑनर हूँ लेकिन पेपर के टाइम मार्क्स कम हो जाती है तो ऐसे को क्या कहेंगे? तो ऐसे तो नहीं हो ना! फुल पास होने वाले हो ना? बापदादा ने सुनाया है कि जो सदा बाप के पास रहते हैं वो पास हैं। पास नहीं रहते तो पास नहीं हैं। तो सदा कहाँ रहते हो? दूर रहते हो, पास नहीं रहते हो! डबल विदेशियों को तो डबल पास होना चाहिये ना! अच्छा।

तो डबल विदेशियों ने इस बारी हाई जम्प लगा दी है। मधुबन में हाई जम्प लगाकर पहुँच गये हैं। (इस बार हर वर्ष से ज्यादा संख्या में डबल विदेशी मधुबन पहुँचे हुए हैं) अच्छा, डबल विदेशियों को भी कइयों को पटरानी बनने का चांस तो अच्छा मिला है। पटरानी बनने में मज़ा है कि नहीं? आप लोगों की तो अटैची इतनी है जो उस पर ही सो सकते हैं। क्योंकि एक बड़ी लाते हैं, एक छोटी लाते हैं, तो छोटी को तकिया बनाओ। जगह बच जायेगी ना! अच्छा लगता है बापदादा सीन देखते हैं कैसे भारी-भारी अटैचियाँ घसीट कर ला रहे हैं! अच्छी सीन लगती है ना! संगम पर ये मेहनत भी थोड़े समय की है फिर तो प्रकृति भी आपकी दासी होगी तो दासियाँ भी बहुत होंगी। फिर आपको सामान उठाने की जरूरत नहीं। अभी अपना राज्य स्थापन हो रहा है, इस समय गुप्त वेश में हो, सेवाधारी हो फिर राज्य अधिकारी बनेंगे। तो सेवाधारियों को तो सब प्रकार की सेवा करनी पड़ती है। जितनी अभी तन, मन, धन और सम्पर्क से सेवा करते हो उतना ही वहाँ सेवाधारी मिलेंगे। सबसे पहले तो ये प्रकृति के पांच ही तत्व आपके सेवाधारी बनेंगे। अपना राज्य-भाग्य स्मृति में है ना! कितने बारी राज्य अधिकारी बने हैं! अनगिनत बार बने हैं और बनते ही रहेंगे। लेकिन राज्य अधिकारी से भी अब का सेवाधारी जीवन श्रेष्ठ है। क्योंकि अभी बाप और बच्चों का साथ है। चाहे किसी भी प्रकार की सेवा है लेकिन सेवा का प्रत्यक्षफल अभी मिलता है। बाप का स्नेह, सहयोग और बाप द्वारा मिले हुए खजाने प्रत्यक्षफल के रूप में मिलते हैं। जब भी कोई विशेष सेवा करते हो और युक्तियुक्त सेवा करते हो तो कितनी खुशी होती है! उस समय के चेहरे का फ़ोटो निकालो तो कैसा होता है! तो एक तरफ सेवा करते हो, दूसरे तरफ प्रत्यक्षफल आपके लिये सदा तैयार है ही है। एक हाथ से सेवा करो, दूसरे हाथ से फल खाओ – ऐसे अनुभव होता है? कि सेवा में बड़ी मेहनत है? सेवा में हलचल होती है या नहीं? कभी-कभी होती है। ये हलचल ही परिपक्व बनाती है, अनुभवी बनाती है। हलचल में इसीलिये आते हो जो सिर्फ वर्तमान को देखते हो। लेकिन वर्तमान में छिपा हुआ भविष्य जो है वो स्पष्ट नहीं दिखाई देता है, इसलिये हलचल में आ जाते हैं। कोई भी बड़े ते बड़ी नाज़ुक परिस्थिति वास्तव में आगे के लिये बहुत बड़ा पाठ पढ़ाती है, परिस्थिति नहीं है लेकिन वह आपकी टीचर है। उस नज़र से देखो कि इस परिस्थिति ने क्या पाठ पढ़ाया? इसको कहा जाता है नेगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तन करना। सिर्फ परिस्थिति को देखते हो तो घबरा जाते हो। और परिस्थिति माया द्वारा सदा नये-नये रूप से आयेगी। वैसे ही नहीं आयेगी, जिस रूप में आ चुकी है, उस रूप में नहीं आयेगी। नये रूप में आयेगी। तो उसमें घबरा जाते हैं – ये तो नई बात है, ये तो होता नहीं है, ये तो होना नहीं चाहिये…। लेकिन समझ लो कि माया अन्त तक बहुरूपी बन बहुरूप दिखायेगी। माया को बहुरूपी बनना बहुत जल्दी और अच्छा आता है। जैसे आपकी स्थिति होगी ना वैसी परिस्थिति बनाकर आयेगी। आज मानो आप थोड़ा-सा अलबेले जीवन में हो तो माया भी उसी अलबेले परिस्थिति के रूप में आयेगी। आज मूड थोड़ी ऑफ है, जैसे होनी चाहिये वैसे नहीं है, तो मूड ऑफ की परिस्थिति के रूप में ही आयेगी। फिर सोचते हैं कि पहले ही मैं सोच रही थी फिर ये क्या हुआ? इसलिये माया को देखने के लिये, जानने के लिये त्रिकालदर्शी और त्रिनेत्री बनो। आगे, पीछे, सामने त्रिनेत्री बनो।

आप सभी त्रिनेत्री और त्रिकालदर्शी हो ना? डबल फॉरेनर्स त्रिकालदर्शी हैं – यस या नो? सब बोलो – हाँ जी या ना जी। (हाँ जी) अपनी भाषा से तो ये अच्छा बोलते हो। सब खुश हो? (हाँ जी) इतने बड़े संगठन में मज़ा आ रहा है? (हाँ जी) कोई-कोई यह तो नहीं सोच रहे हैं कि अगले वर्ष रश में नहीं आयेंगे, थोड़ा पीछे आयेंगे? संगठन का मज़ा भी प्यारा है। वैसे आना तो प्रोग्राम प्रमाण ही, ज्यादा नहीं आना लेकिन आदत ऐसी होनी चाहिये जो सबमें एडजेस्ट कर सके। एडजेस्ट करने की पॉवर सदा विजयी बना देती है। ब्रह्मा बाप को देखा तो बच्चों से बच्चा बनकर एडजेस्ट हो जाता, बड़ों से बड़ा बनकर एडजेस्ट हो जाता। चाहे बेगरी लाइफ, चाहे साधनों की लाइफ, दोनों में एडजेस्ट होना और खुशी-खुशी से होना, सोचकर नहीं। यहाँ दु:खी तो नहीं होते हो लेकिन खुशी के बजाय थोड़ा सोच में पड़ जाते हो – ये क्या हुआ, कैसे हुआ…। तो सोचने वाले को एडजेस्ट होने के मजे में कुछ समय लग जाता है। अपने को चेक करो कि कैसी भी परिस्थिति हो, चाहे अच्छी हो, चाहे हिलाने वाली हो लेकिन हर समय, हर सरकमस्टांस के अन्दर अपने को एडजेस्ट कर सकते हैं? डबल फॉरेनर्स को अकेलापन भी अच्छा लगता है और कम्पैनियन भी बहुत अच्छे लगते हैं। लेकिन कम्पनी में हो या अकेले हो, दोनों में एडजेस्ट होना – ये है ब्राह्मण जीवन। ऐसे नहीं, संगठन हो और माथा भारी हो जाये – नहीं, मुझे एकान्त चाहिये, ये घमसान में नहीं, मुझे अकेला चाहिये…। मन अकेला अर्थात् बाहरमुखता से अन्तर्मुख में चले जाओ तो अकेलापन है। कोई-कोई कहते हैं ना – अकेला कमरा चाहिये, दो भी नहीं चाहिये। अकेला मिले तो भी मौज़ से सोओ और दस के बीच में भी सोना हो तो मौज़ से सोओ। फॉरेनर्स दस के बीच में सो सकते हैं कि मुश्किल है? सो सकते हैं? (हाँ जी) अच्छा, अभी अगले वर्ष 20-20 को सुलायेंगे। देखो समय बदलता रहता है और बदलता रहेगा। दुनिया की हालतें नाज़ुक हो रही हैं और भी होंगी। होनी ही है। अभी सिर्फ एक स्थान पर अलग-अलग होती हैं, आखिर में सब तरफ इकट्ठी होगी। तो नाज़ुक समय तो आना ही है। समय नाज़ुक हो लेकिन आपकी नेचर नाज़ुक नहीं हो। कइयों की नेचर बहुत नाज़ुक होती है ना, थोड़ा-सा आवाज़ हुआ, थोड़ा-सा कुछ हुआ तो डिस्टर्ब हो गये। इसको कहते हैं नाज़ुक स्थिति, नाजुक नेचर। तो नाज़ुक नेचर नहीं हो। जैसा समय वैसा अपने को एडजेस्ट कर सको। ये अभ्यास आगे चलकर आपको बहुत काम में आयेगा। क्योंकि हालतें सदा एक जैसी नहीं रहनी है। और फाइनल पेपर आपका नाज़ुक समय पर होना है। आराम के समय पर नहीं होना है। नाजुक समय पर होना है। तो जितना अभी से अपने को एडजेस्ट करने की शक्ति होगी तो नाजुक समय पर पास विद् ऑनर हो सकेंगे। पेपर बहुत टाइम का नहीं है, पेपर तो बहुत थोड़े समय का है लेकिन चारों ओर की नाजुक परिस्थितियाँ, उनके बीच में पेपर देना है। इसलिये अपने को नेचर में भी शक्तिशाली बनाओ। क्या करें, मेरी नेचर ये है, मेरी आदत ही ऐसी है, ये नहीं। इसको नाज़ुक नेचर कहा जाता है। देखो, बापदादा ने स्थापना के आदि में सब अनुभव करा लिया। जब आदि हुई तो राजकुमार और राजकुमारियों से भी ज्यादा पालना, साधन, सब अनुभव कराया और आगे चलकर बेगरी लाइफ का भी पूरा अनुभव कराया। तो जिन्होंने दोनों अनुभव किया उनकी आदत बन गई। तो आप लोगों के आगे तो ऐसा समय आया नहीं है लेकिन आना है। जहाँ भी रहते हो, सभी हिलने हैं, सब आधार टूटने हैं। तो ऐसे टाइम पर क्या चाहिये? एक ही बाप का आधार। आप लोग तो बहुत-बहुत-बहुत लक्की हो, जो आने का समय आपका सहज साधनों का है। सहज साधनों के साथ-साथ आपका ब्राह्मण जन्म है। लेकिन साधन और साधना – साधनों को देखते साधना को नहीं भूल जाना। क्योंकि आखिर में साधना ही काम में आनी है। समझा?

बापदादा खुश होते हैं कि डबल फॉरेनर्स सन्देश देने में बहुत अच्छा पार्ट बजा रहे हैं। सेन्टर्स भी अच्छे उमंग-उत्साह से खोल रहे हैं। तो बापदादा आज आप सबको उत्सव मनाने की मुबारक भी दे रहे हैं और साथ-साथ सेवा की भी मुबारक दे रहे हैं। सिर्फ और अण्डरलाइन करा रहे हैं कि सेवा और स्व-स्थिति दोनों में तीव्र गति हो। स्व-स्थिति और सेवा दोनों का बैलेन्स सदा स्मृति में रहे। कभी-कभी बापदादा सुनते हैं, देखते भी हैं, जब कोई सेवा का बहुत बड़ा भागदौड़ का कार्य करते हैं ना, तो कार्य के उमंग में कार्य तो कर लेते हैं लेकिन कभी-कभी कोई कहते हैं – सेवा में गये ना तो अपनी स्थिति थोड़ी ढीली हो गई। वो नहीं होना चाहिये। बस, अभी योग में बैठे, सेवा नहीं करेंगे, योग में ही बैठेंगे! योग और सेवा इकट्ठा-इकट्ठा होना चाहिये।

बापदादा आप सबके पत्र समाचार पढ़ते हैं! कई बच्चे कहते हैं 6-6 पेज़ लिखा, उत्तर तो आया ही नहीं। इतने कार्ड भेजे, उत्तर तो आया नहीं। लेकिन बापदादा सभी को रेसपाण्ड जरूर करते हैं। आपको लिखने का संकल्प चलता है और बाप के पास वहाँ पहुँच जाता है। लेकिन अच्छा करते हो, सिर्फ लम्बा नहीं लिखो, शॉर्ट में लिखो। क्योंकि लिखने से जो मन में चलता रहता है वो खत्म हो जाता है, हल्का हो जाता है। इसलिये लिखो जरूर लेकिन शॉर्ट में लिखो। आप सबके कार्ड वगैरह की सब एग्जीबिशन वतन में भी लगती है। (सभी के कार्ड स्टेज पर बहुत सुन्दर ढंग से सजाकर रखे गये हैं) यहाँ भी एग्जीबिशन लगाई है ना। तो पहुँचा या नहीं पहुँचा, ऐसे नहीं सोचो। पहुँचता ही है। और बापदादा एक-एक के समाचार को, चाहे सेवा का, चाहे स्थिति का, देखते हैं और देखकर शक्तियों का वायब्रेशन देते हैं। अच्छा!

(बापदादा ने सभी देशों के भाई-बहिनों से अलग-अलग ग्रुप में हाथ उठवाये)

साउथ और नार्थ अमेरिका हाथ उठाओ। अमेरिका क्या जलवा दिखायेगी? कोई नई बात करेंगे ना! क्या करेंगे? आज शिवरात्रि का झण्डा लहरायेंगे ना तो प्रत्यक्षता का झण्डा पहले देखें अमेरिका में लहराते हैं या आफ्रिका में, या भारत में? पहले कहाँ लहरायेगा? अमेरिका में? यू.एन. की बिल्डिंग पर शिव बाबा का झण्डा लहराना। जैसे भारत वाले समझते हैं ना लाल किले पर झण्डा लहरायेंगे तो सबकी नज़र होगी ना, तो यू.एन. की बिल्डिंग पर झण्डा लहरायेंगे तो सब क्या बोलेंगे? वन्स मोर, वन्स मोर। वह भी दिन आना ही है। और यूरोप कहाँ झण्डा लहरायेगा? लण्डन के महल में। जैसे वहाँ की परेड देखने आते हैं ना तो ऐसे इस झण्डे को देखने आवे। होना है ना! और ही आपको अर्जियाँ करके ले जायेंगे – आओ। थोड़ा-सा हलचल होने दो, उन्हों की हलचल होगी, अपना झण्डा लहरायेंगे और अफ्रीका कहाँ झण्डा लहरायेगा? अफ्रीका में जो नामीग्रामी स्थान हो वहाँ झण्डा लहराना। अभी उस मिलेट्री की परेड निकालते हैं और फिर ब्रह्माकुमारियों की यात्रा निकले। ऑस्ट्रेलिया वाले क्या करेंगे? अच्छा! इस बारी ऑस्ट्रेलिया कम आया है। नहीं तो सबसे नम्बर तो ऑस्ट्रेलिया लेते हैं। इस बारी किसको ज्यादा चांस दिया है? यू.के. को। यू.के. वाले बहुत आये हैं। यू.के. तो लक्की हुआ। शिवरात्रि का चांस यू.के. को मिला है। यू.के. वालों ने मेहनत भी अच्छी की है। मलेशिया की सेवा भी अच्छी वृद्धि को प्राप्त कर रही है। अच्छे हैं। यू.के. तो है ही फाउण्डेशन और अमेरिका है सर्विस के वृद्धि की आवाज़ फैलाने का बड़ा माइक। अमेरिका की यह विशेषता है। और अफ्रीका की विशेषता क्या है? अफ्रीका वालों की कमाल है जो दुनिया भय में है और ये निर्भय हैं। रीयल में श्याम से सुन्दर बनाने वाला तो अफ्रीका है ना! निर्भयता की कमाल इन्हों की है। देखो, दो-दो बहनें रहती हैं लेकिन निर्भय होकर रहती हैं। हिम्मत रखते हैं ना तो बाप की मदद है। अफ्रीका की भी सेवा अच्छी वृद्धि को पा रही है। वैसे विदेश में भी इस समय सब तरफ सेवा का उमंग-उत्साह और वृद्धि अच्छी है। अभी तरीका, विधि आ गई है। धरनी भी बदली है और विधि भी आ गई है। देखो सबसे पीछे रशिया खुला है, वहाँ की भी सेवा देखो कितनी है! रशिया वाले भी आये हैं ना! ये तो एक ही तरफ बैठते हैं। इन्हों की युनिटी बहुत अच्छी है, जहाँ एक जायेगा ना वहाँ सब जायेंगे। अच्छा है, लास्ट सो फर्स्ट हो रहे हैं। अच्छी रिजल्ट है। देखो, अभी तो स्थान भी मिल रहे हैं। अभी गवर्मेन्ट को और अपना बनाते जाओ। अच्छा उमंग-उत्साह है। और ऑस्ट्रेलिया में बापदादा की बहुत-बहुत-बहुत श्रेष्ठ आशाओं के दीपक जग रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ऐसी कमाल करेंगे जो कोई ने नहीं की। क्यों कमाल करेंगे? कारण बताओ? क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में सब प्रकार की बुद्धि वाले हैं। इन्वेन्टर भी हैं, कार्य को, प्लैन को प्रैक्टिकल में लाने वाली बुद्धि भी है, इसलिये आदि में भी ऑस्ट्रेलिया ने बहुत अपनी कमाल दिखाई। अभी बीच में थोड़ा प्लैन बना रहे थे। और आगे चलकर प्रैक्टिकल में आना ही है। तो ऑस्ट्रेलिया की तरफ बापदादा की विशेष श्रेष्ठ सेवा के आशाओं की नज़र है। समझा? इस बारी कम आये हैं लेकिन सभी सुनेंगे। अच्छा, जो डायलॉग में आये थे वो हाथ उठाओ। (आबू डायलॉग में आये हुए कुछ मेहमान भी बापदादा की मुरली सुन रहे हैं) ये थोड़ी-सी आत्मायें महान् भाग्यवान हैं। तो डायलॉग में आये और बहुत अच्छे श्रेष्ठ माइक बनकर जा रहे हैं। मैसेन्जर बनकर जा रहे हैं। सभी के मन में, सारे ग्रुप के मन में ये उमंग है कि ज्यादा से ज्यादा मैसेज देकर अनेक आत्माओं को परिचय दें और स्वीट होम में पहुँचाये। ऐसा उमंग है? जिन्होंने हाथ उठाया उन्हों को उमंग है? अच्छा, सभी ने देखा है कौन-सी भाग्यवान आत्मायें हैं? रीयल में तो इन्हों का बर्थ डे हो गया। तो मैसेन्जर बनने के बर्थ डे की मुबारक।

अच्छा, यूरोप क्या करेगा? यूरोप अपनी अंचली यू.के. में डालता है, ऐसे! लेकिन अच्छा है, कोई भी ऐसा विशेष देश रहना नहीं चाहिये जो उलहना दे कि हमारे देश में तो आपका मैसेज पहुँचा ही नहीं। तो जो भी विशेष देश है, पहुँचना तो कोने-कोने में है, लेकिन कोने-कोने में मैसेज जरूर देना। उलहना नहीं सुनना पड़े। अच्छा! मॉरीशियस देश के हिसाब से जितना ही छोटा है उतना ही सेवा में बड़ा है। मॉरीशियस की ये विशेषता है कि आई.पी. भी होमली हैं। चाहे प्राइम मिनिस्टर है या मिनिस्टर हैं लेकिन होमली रूप से मिलते भी हैं और सहयोगी भी बनते हैं। श्रीलंका वाले हाथ उठाओ। ये भाषा के कारण इकट्ठे बैठे हैं। श्रीलंका तो नाम ही श्री है। श्री का अर्थ ही महान् है। तो श्रीलंका में जहाँ अशान्ति है वहाँ शान्ति स्थापन करना और शान्ति का सन्देश देना ये कितना श्रेष्ठ कार्य है तो श्रीलंका सन्देश देने का श्री-कार्य कर रहे हैं। मिडिल ईस्ट भी आया है। दुबई के भी आये हैं। हैं थोड़े लेकिन महावीर हैं। अच्छा है श्रीलंका तो कल्प पहले भी लंका जीत ब्राह्मण कहलाते हैं। तो श्रीलंका पर तो विजय होनी ही है। मिडिल ईस्ट भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। क्योंकि गुप्त में भी गुप्त वेश धारण करके सेवा करनी पड़ती है ना तो डबल सेवा करने की मुबारक। फिर भी बापदादा मुबारक देते हैं जो वायुमण्डल कैसा भी हो अचल-अडोल-अविनाशी रत्न हैं। एक-एक रत्न अमूल्य हैं। और जगह सेवा करना सहज है लेकिन यहाँ सेवा डबल गुप्त रूप में करना पड़ता है। फिर भी हिम्मत वाले हैं। हिम्मत छोड़ने वाले नहीं। अचल-अडोल आत्मायें हैं। इसलिये बापदादा हिम्मतवान बच्चों को पद्मगुणा मदद की मुबारक देते हैं। अच्छा। करेबियन में फाउण्डेशन तो अच्छा पड़ा। अभी कितने सेन्टर हो गये करेबियन में। (10-12) फिर भी हिम्मत अच्छी रखी है। भक्ति के विस्तार में ज्ञानी तू आत्मा बनाना इसमें हिम्मत अच्छी रखी है और ब्राह्मण भी अच्छे वृद्धि को पा रहे हैं। शुरू से जो आदि से आये हैं वो बहुत अच्छे चल रहे हैं। ज्यादा हलचल में नहीं आये हैं। यह भी अच्छा रिकॉर्ड है। कैरेबियन भी कम नहीं है, कमाल करने वाला है। अच्छा! जहाँ के भी हो, सभी बाप के समीप और सिकीलधे हो। बापदादा अमृतवेले चारों ओर के अमूल्य रत्नों को देख-देख हर्षित होते हैं। जिसको देखते हैं सब एक-दो से आगे हैं। क्यों? हर एक की अपनी-अपनी विशेषता है।

चारों ओर के अमूल्य विशेष रत्नों को, सदा हर दिन उत्साह से उत्सव मनाने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा स्व-स्थिति और सेवा के उन्नति में बैलेन्स रखने वाली ब्लेसिंग के अधिकारी आत्माओं को, सदा परिस्थिति को सहज पार करने वाली ऐसे अचल, अडोल, महावीर आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

टीचर्स से:- टीचर्स को विशेष बापदादा मुबारक दे रहे हैं। क्योंकि हर वर्ष सेवा की रिज़ल्ट में टीचर्स ने मेहनत अच्छी की है। इसलिये प्रत्यक्षफल बाप की दुआएं हैं। समझा! टीचर्स से पूछने की आवश्यकता नहीं है कि खुश हैं? खुश हैं और खुश बनाने के निमित्त हैं। तो जो औरों को खुश बनाते हैं वो स्वयं तो जरूर होंगे। टीचर का अर्थ ही अचल-अमर। तो अमर भी हैं और अचल भी हैं। ऐसे है! कि कभी-कभी खुशी थोड़ी कम होती है? नहीं, हो ही नहीं सकती। इतना निश्चय है।

दादी जानकी से:- प्रकृतिजीत है ना! प्रकृति का काम है हिलाना और आपका काम है प्रकृति को हिलाना। अच्छा है, प्यार से रेस्ट नहीं करते तो मजबूरी से कराते हैं। क्या है, इनकी सेवा से बहुत मोहब्बत है। उमंग है, कोई रह नहीं जाये, कोई रह नहीं जाये। ऐसे है ना! (बाबा ने अपने पास बिठाया) साथ रहती है ना तो साथ ही बिठायेंगे। अच्छा है, नई-नई इन्वेन्शन निकलेगी। कोई बात नहीं। रेस्ट भी मिलती है तो कोई नया प्लैन बनाने के लिये। इसलिये आपको कोई नया माल मिलेगा। दादियों को देख करके सभी को बहुत खुशी होती है ना। सभी का स्नेह भी सेवा का प्रत्यक्षफल है। तो सारे दिन में कितने फल मिलते हैं! जो भी देखते हैं वो किस नज़र से देखते हैं? सबके दिल से वाह दादी वाह, वाह दादी वाह निकलता है। ये भी सेवा का फल है। जितना जो स्नेह से, निस्वार्थ सेवा करते हैं उनको प्रत्यक्षफल सदा ही मिलता है और सर्व से मिलता है। सबके दिल से निकलता है – हमारी दादी, या कहेंगे कि ये लन्दन की दादी है, ये मधुबन की दादी है? सबकी दादियाँ है। जो विश्व अधिकारी बनते हैं उसको अभी से सर्व, उसमें भी विशेष ब्राह्मण अपना मानेंगे। अच्छा, ठीक है? सब बहुत अच्छा! खराब तो होना ही नहीं है। अभी सिर्फ बीच-बीच में थोड़ी रेस्ट ले लो, बाकी अच्छा है। उमंग-उत्साह रखने से औरों का भी उमंग-उत्साह बढ़ता रहता है। सिर्फ उड़ने वाले नहीं हो लेकिन उड़ाने वाले हो। सप्ताह में आधा दिन या एक दिन रेस्ट का रखो फिर आपका शरीर बहुत मदद देगा। कुछ समय अभी रेस्ट चाहिये। इतने राइट हैण्ड तैयार हुए हैं, सभी देशों में राइट हैण्ड हैं। तो राइट हैण्ड को करने दो। सिर्फ बैक बोन रहो। पुराने-पुराने आदि रत्न भी बहुत आये हैं। 20 साल वाले हाथ उठाओ। जो पहली बार आये हैं वो हाथ उठाओ। फर्स्ट टाइम वालों को विशेष मुबारक है। अच्छे-अच्छे आये हैं। अभी अमर भव के वरदान को सदा साथ रखना। ओम् शान्ति।

(बच्चों ने बापदादा के साथ शिव जयन्ती मनाई, गीत गाये, मोमबत्तियां जलाई, केक काटी। बापदादा ने स्टेज पर खड़े होकर अपने हस्तों से झण्डा लहराया और सबको बधाइयाँ दी)

इस झण्डे को लहराने के पहले सबके दिलों में जो स्नेह का झण्डा लहरा रहे हैं वह देख-देख हर्षित हो रहे हैं। पहले सबके दिलों में स्नेह का, सेवा का झण्डा है फिर यह निशानी है आप सबकी। सबके खुशनुमा चेहरे सारे विश्व में खुशियाँ लहरा रहे हैं। खुशियों के वायब्रेशन चारों ओर विश्व में जा रहे हैं। ऐसे ही सदा खुशियों के वायब्रेशन देते रहना और बाप का प्रैक्टिकल प्रत्यक्षता का झण्डा लहराते रहना।

अध्याय 1 : संगमयुग – उत्सव का युग

मुरली तिथि: शिवरात्रि / डायमण्ड जुबली अव्यक्त बापदादा महावाक्य

भूमिका

बापदादा कहते हैं कि संगमयुग केवल परिवर्तन का युग नहीं, बल्कि उत्सव का युग है। यहाँ प्रत्येक दिन आत्मा के लिए नया उत्सव है क्योंकि परमात्मा स्वयं आत्माओं को कौड़ी से हीरा बनाने आते हैं।


1. उत्सव का वास्तविक अर्थ

मुरली पॉइंट

उत्सव मनाना अर्थात् सदा अविनाशी उमंग-उत्साह में रहना।

समझें

दुनिया के उत्सव कुछ घंटों या दिनों तक चलते हैं।

लेकिन संगमयुग का उत्सव…

  • हर दिन
  • हर कर्म
  • हर सेवा
  • हर याद

को उत्सव बना देता है।


उदाहरण

जैसे एक बच्चा नया खिलौना मिलने पर दिनभर खुश रहता है।

वैसे ही परमात्मा का बच्चा हर समय इस अनुभूति में रहता है—

“मेरा बाबा मेरे साथ है।”


मुरली नोट्स

संगमयुग = उत्सव का युग

 उत्सव = अविनाशी उमंग

 ब्राह्मण जीवन = हर दिन खुशी


अध्याय 2 : शिव जयन्ती क्यों है सबसे अद्भुत?

मुरली पॉइंट

दुनिया में सभी जन्म शरीर का मनाते हैं,

लेकिन शिव जयन्ती निराकार परमात्मा की है।

इसलिए यह सबसे न्यारी जयन्ती है।


विशेषता

✔ बाप की जयन्ती

✔ बच्चों की भी जयन्ती

✔ ब्राह्मण जन्म का उत्सव


उदाहरण

जैसे माता-पिता और बच्चे का जन्मदिन अलग-अलग होता है।

लेकिन शिवबाबा के अवतरण से ही आत्माओं का ब्राह्मण जन्म होता है।

इसलिए दोनों का उत्सव साथ मनाया जाता है।


मुरली नोट्स

  • शिव जयन्ती = ब्राह्मण जयन्ती
  • परमात्मा का अवतरण
  • आत्माओं का दिव्य जन्म

अध्याय 3 : ब्राह्मण जीवन की साँस क्या है?

मुरली पॉइंट

ब्राह्मण जीवन की साँस है — उमंग-उत्साह।


यदि सांस रुक जाए

तो जीवन समाप्त।

इसी प्रकार

यदि उमंग समाप्त

तो ब्राह्मण जीवन कमजोर।


उदाहरण

दो सेवाधारी हैं—

पहला—

“देखेंगे…”

“हो जायेगा…”

दूसरा—

“बाबा करा रहे हैं।”

“वाह बाबा!”

पहला थकता है।

दूसरा उड़ता है।


मुरली नोट्स

✔ उमंग = आध्यात्मिक ऊर्जा

✔ उत्साह = सफलता की शक्ति

✔ निराशा = माया का प्रवेश द्वार


अध्याय 4 : WHY नहीं, FLY

मुरली पॉइंट

जब भी “WHY” आये,

उसे “FLY” में बदल दो।


इसका अर्थ

“ऐसा क्यों हुआ?”

“मेरे साथ ही क्यों?”

ये प्रश्न ऊर्जा कम करते हैं।

लेकिन

उड़ती कला

हर परिस्थिति के ऊपर ले जाती है।


उदाहरण

यदि सेवा में किसी ने आपकी प्रशंसा नहीं की।

WHY—

“मेरे साथ ऐसा क्यों?”

FLY—

“बाबा देख रहे हैं।”


मुरली नोट्स

WHY → हाय-हाय

FLY → वाह-वाह


अध्याय 5 : Negative को Positive कैसे बनायें?

मुरली पॉइंट

हर परिस्थिति को पॉजिटिव दृष्टि से देखो।


उदाहरण

किसी ने आलोचना की।

साधारण व्यक्ति—

दुखी।

योगी—

“इससे मैं और अच्छा बनूँगा।”


मुरली नोट्स

Negative मत पकड़ो

Positive दृष्टि अपनाओ

साइलेन्स की शक्ति उपयोग करो


अध्याय 6 : संबंध ही असली परीक्षा है

मुरली पॉइंट

अकेले योग करना आसान है।

लेकिन संबंधों में स्थिर रहना ही असली परीक्षा है।


उदाहरण

ध्यान में शान्त रहना सरल है।

लेकिन

घर में,

ऑफिस में,

सेवा में,

मधुर रहना—

यही पास विद ऑनर है।


मुरली नोट्स

✔ संबंध = पेपर

✔ सहयोग = सफलता

✔ पास = बाप के पास


अध्याय 7 : सेवा और स्व-स्थिति का बैलेंस

मुरली पॉइंट

सेवा करते समय

अपनी स्थिति कमजोर नहीं होनी चाहिए।

योग और सेवा साथ-साथ चलें।


उदाहरण

मोबाइल चार्ज भी हो

और उपयोग भी हो।

इसी प्रकार

आत्मा योग से चार्ज होती रहे

और सेवा करती रहे।


मुरली नोट्स

✔ सेवा

✔ योग

✔ बैलेंस


अध्याय 8 : हर परिस्थिति शिक्षक है

मुरली पॉइंट

कोई भी कठिन परिस्थिति

भविष्य के लिए शिक्षा लेकर आती है।


उदाहरण

यदि सेवा में विरोध मिला,

तो समझो—

बाबा सहनशक्ति सिखा रहे हैं।


मुरली नोट्स

परिस्थिति = शिक्षक

माया = परीक्षा

योग = समाधान


 इस अध्याय का सार

✔ संगमयुग उत्सव का युग है।

✔ हर दिन उमंग-उत्साह में रहना ही सच्चा उत्सव है।

✔ WHY को FLY में बदलना है।

✔ Negative को Positive दृष्टि से देखना है।

✔ संबंधों में पास होना ही वास्तविक योग है।

✔ सेवा और स्व-स्थिति का संतुलन बनाए रखना है।

✔ हर परिस्थिति हमें आगे बढ़ाने वाली शिक्षक है।

शीर्षक: संगमयुग – उत्सव का युग | महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Murli Questions & Answers)

प्रश्न 1: संगमयुग को उत्सव का युग क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि संगमयुग में प्रत्येक दिन आत्मा के लिए नया उत्सव है। परमात्मा स्वयं आकर आत्माओं को कौड़ी समान से हीरे तुल्य बनाते हैं और सदा अविनाशी उमंग-उत्साह में रहने की प्रेरणा देते हैं।


प्रश्न 2: वास्तविक उत्सव मनाने का अर्थ क्या है?
उत्तर: वास्तविक उत्सव मनाने का अर्थ है सदा अविनाशी उमंग-उत्साह में रहना। संगमयुग में हर दिन, हर कर्म, हर सेवा और हर याद को उत्सव बना देना ही सच्चा उत्सव है।


प्रश्न 3: शिव जयन्ती को सबसे न्यारी और अद्भुत जयन्ती क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि यह किसी शरीरधारी का जन्मोत्सव नहीं, बल्कि निराकार परमात्मा शिव का अवतरण दिवस है। इसी दिन आत्माओं का ब्राह्मण जन्म भी होता है, इसलिए यह बाप और बच्चों दोनों की जयन्ती है।


प्रश्न 4: शिव जयन्ती के साथ कौन-सा आध्यात्मिक उत्सव भी मनाया जाता है?
उत्तर: शिव जयन्ती के साथ ब्राह्मण जयन्ती अर्थात् आत्माओं के दिव्य जन्म का उत्सव भी मनाया जाता है।


प्रश्न 5: ब्राह्मण जीवन की वास्तविक साँस क्या है?
उत्तर: ब्राह्मण जीवन की वास्तविक साँस उमंग और उत्साह है। जैसे सांस के बिना शरीर जीवित नहीं रह सकता, वैसे ही उमंग-उत्साह के बिना ब्राह्मण जीवन शक्तिशाली नहीं रह सकता।


प्रश्न 6: निराशा को माया का प्रवेश द्वार क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि जब उमंग-उत्साह समाप्त हो जाता है, तब निराशा प्रवेश करती है और आत्मा की आध्यात्मिक शक्ति कमजोर होने लगती है।


प्रश्न 7: “WHY” को “FLY” में बदलने का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि “ऐसा क्यों हुआ?” या “मेरे साथ ही क्यों?” सोचने के बजाय उड़ती कला अपनाकर हर परिस्थिति से ऊपर उठ जाना और बाबा पर विश्वास रखना।


प्रश्न 8: WHY से हाय-हाय और FLY से वाह-वाह कैसे बनती है?
उत्तर: WHY अर्थात शिकायत और प्रश्न मन की शक्ति को कम कर देते हैं, जबकि FLY अर्थात उड़ती कला आत्मा को प्रसन्न, हल्का और विजयी बना देती है।


प्रश्न 9: नेगेटिव को पॉजिटिव में बदलने की श्रेष्ठ विधि क्या है?
उत्तर: हर परिस्थिति को सकारात्मक दृष्टि से देखना, आलोचना को सुधार का अवसर समझना तथा साइलेन्स और योग की शक्ति का प्रयोग करना।


प्रश्न 10: योगी व्यक्ति आलोचना को किस प्रकार स्वीकार करता है?
उत्तर: योगी आलोचना से दुखी नहीं होता, बल्कि सोचता है कि इससे मैं और श्रेष्ठ बनूँगा तथा अपनी कमियों को सुधारने का अवसर मिला है।


प्रश्न 11: संबंधों को ब्राह्मण जीवन की वास्तविक परीक्षा क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि अकेले योग करना आसान है, लेकिन परिवार, सेवा और संबंधों में मधुरता, धैर्य और स्थिरता बनाए रखना ही वास्तविक योग की परीक्षा है।


प्रश्न 12: बाप के पास रहने का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: हर परिस्थिति में बाबा की याद, श्रीमत और आत्मिक स्थिति में रहना ही बाप के पास रहना है। यही सच्ची सफलता है।


प्रश्न 13: सेवा और स्व-स्थिति का संतुलन क्यों आवश्यक है?
उत्तर: क्योंकि केवल सेवा करने से नहीं, बल्कि सेवा करते हुए योगयुक्त और शक्तिशाली स्थिति बनाए रखने से ही सच्ची सफलता प्राप्त होती है।


प्रश्न 14: सेवा करते समय आत्मा को कैसे चार्ज रखना चाहिए?
उत्तर: जैसे मोबाइल उपयोग के साथ-साथ चार्ज भी होता है, वैसे ही आत्मा को योग से निरंतर शक्ति लेकर सेवा करते रहना चाहिए।


प्रश्न 15: कठिन परिस्थितियों को शिक्षक क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि प्रत्येक कठिन परिस्थिति आत्मा को सहनशक्ति, धैर्य, विवेक और आगे बढ़ने की शिक्षा देती है तथा भविष्य के लिए योग्य बनाती है।


प्रश्न 16: सेवा में विरोध मिलने पर ब्राह्मण को क्या समझना चाहिए?
उत्तर: यह समझना चाहिए कि बाबा हमें सहनशक्ति, धैर्य और विजय का पाठ पढ़ा रहे हैं। परिस्थिति परीक्षा नहीं, बल्कि शिक्षक है।


प्रश्न 17: संगमयुग का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
उत्तर: सदा उमंग-उत्साह में रहना, WHY को FLY में बदलना, हर परिस्थिति को सकारात्मक दृष्टि से देखना, संबंधों में पास होना तथा सेवा और स्व-स्थिति का संतुलन बनाए रखना ही संगमयुग का श्रेष्ठ संदेश है।


प्रश्न 18: इस मुरली का मुख्य सार क्या है?
उत्तर: संगमयुग उत्सव का युग है। प्रत्येक दिन को उत्सव बनाकर, बाबा की याद में रहते हुए, उमंग-उत्साह, सकारात्मक दृष्टिकोण, मधुर संबंध, योगयुक्त सेवा और हर परिस्थिति को शिक्षक मानकर जीवन जीना ही श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन है।

Disclaimer:यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की मुरली एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं के अध्ययन, चिंतन और आत्म-कल्याण के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या धर्म की आलोचना करना नहीं है। दर्शकों से निवेदन है कि वे इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ग्रहण करें।

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