राज योग के वैज्ञानिक सिद्धांत
इस विषय पर हम आज चर्चा कर रहे हैं। आज इसके चौथे भाग के जो राज योग का उच्च विज्ञान—
एक होता है हाईएस्ट, उच्च विज्ञान, सबसे ऊंचा विज्ञान।
राजयोग का अध्याय 23
वरिष्ठा सिद्धि और उच्च चेतना
और उच्च चेतना, उच्च और उच्चतम।
एक शब्द होता है उच्च, एक शब्द होता है उच्चतर और एक शब्द होता है उच्चतम। तीनों शब्दों को आप समझ गए होंगे।
उच्चतर, उच्चतर, उच्च, उच्चतर और उच्चतर।
हर एक आत्मा की अपनी जो स्थिति होती है, जिसे हम अब तक चरम सीमा कहते आए हैं।
हर आत्मा की पीक कॉन्शियस। यह आज का वैज्ञानिक सिद्धांत है। पीक कॉन्शियस। हर आत्मा की अपनी जो ऊंची अवस्था है, चोटी है। पीक माना चोटी। चोटी का जो अवस्था है, वैज्ञानिक सिद्धांत आज हम इस पर, इसके आधार पर मंथन करेंगे।
आज के हमारे छोटे-छोटे विषय रहेंगे।
फरिश्ता स्थिति क्या है?
उच्च चेतना के लक्षण क्या हैं?
आत्मिक अनुभव की गहराई।
एकाग्रता और स्थिरता।
देवी गुणों की अभिव्यक्ति।
देवी गुणों की अभिव्यक्ति।
भाग चार — राज योग का उच्च विज्ञान
अध्याय 23
फरिश्ता स्थिति और उच्च चेतना
परिस्ता स्थिति और उच्च चेतना।
वैज्ञानिक सिद्धांत — पीक कॉन्शियसनेस।
पीक कॉन्शियसनेस।
डिस्क्लेमर है। इस वीडियो का उद्देश्य शिक्षा, आत्म चिंतन और आध्यात्मिक अध्ययन है। इस अध्याय में ब्रह्मा कुमारी राजयोग की परिषा सिद्धि को अनुभव आधुनिक मनोविज्ञान में चर्चा किए जाने वाले पिग कॉन्शियसनेस, ऑप्टिमल फंक्शनिंग और उच्च जागरूकता जैसे विचारों के संदर्भ में समझाया गया है। यह ध्यान रखना आवश्यक है।
[खांसने की आवाज़]
कि फरिश्ता स्थिति एक आध्यात्मिक अवधारणा है। जबकि पीक कॉन्शियसनेस आधुनिक मनोविज्ञान और चेतना अध्ययन में प्रयुक्त एक व्यापक अवधारणा है। दोनों को सही समझने के लिए तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है। इन्हें वैज्ञानिक रूप से पूर्णतः समान सिद्ध करने का दावा नहीं किया जा रहा। यह वीडियो किसी चिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक या वैज्ञानिक उपचार का विकल्प नहीं है।
आइए अब समझते हैं फरिश्ता बनना वास्तव में क्या है? उच्च चेतना की पहचान क्या हो सकती है?
फरिश्ता कौन है?
क्या फरिश्ता बनने का अर्थ है?
फरिश्ता बनने का क्या अर्थ है या फरिश्ता कौन है?
अब तक हम समझते थे या विचार करेंगे — पंख लग जाना, आकाश में उड़ना, जिसको पंख लगे हुए हो, जो आकाश में उड़ता हो या कुछ असाधारण चमत्कार करना, जो आम व्यक्ति ना कर सके वह करके दिखाना।
राजयोग कहता है फरिश्ता बनने का सबसे बड़ा रहस्य बाहर नहीं, भीतर है। बाहर नहीं, भीतर है।
जब आत्मा परिस्थितियों के नीचे दबने के बजाय परिस्थितियों से ऊपर उठती है।
परिस्थितियों से ऊपर उठती है।
जब कोई दुख दे और आत्मा फिर भी सुख का अनुभव करे।
आत्मा फिर भी सुख का अनुभव करे।
जब कोई कमजोरी दिखाए और हम उसकी कमजोरी देखने के बजाय उसकी विशेषता देखें।
उसकी विशेषता देखें।
जब जिम्मेदारियां बहुत हों, फिर भी मन हल्का रहे।
फिर भी मन हल्का रहे।
और जब जीवन की हर परिस्थिति में हमारी स्थिति शक्तिशाली रहे।
हमारी स्थिति क्या रहे? शक्तिशाली रहे।
तब परिशस्ता स्थिति का अनुभव होने लगता है।
तब परिशस्ता स्थिति का अनुभव होने लगता है।
फरिश्ता शब्द का आध्यात्मिक अर्थ है।
राजयोग में फरिश्ता कोई अलग प्रजाति नहीं है। यह कोई अलग से कोई हमारे जैसे मनुष्यों की प्रजाति हो, ऐसा नहीं है।
फरिश्ता वह आत्मिक अवस्था है। मतलब ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होता जिसके पंख लग जाते हों, जो उड़ता हो, जो दूसरों के ऐसे काम कर दे जो साधारण नहीं कर दे। ऐसी कोई प्रजाति नहीं होती है। ऐसे कोई फरिश्ते लोग नहीं होते हैं।
यह वास्तव में आत्मा की एक अवस्था है। फरिश्ता वह आत्मिक अवस्था है।
बाकी कोई ऐसी औरत जैसे फिर परियां उड़ते हुए दिखाते हैं, फरिश्ते उड़ते हुए दिखाते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं होता है।
जहां आत्मा देह अभिमान के भारीपन से ऊपर उठकर
[गला साफ़ करने की आवाज़]
अपने मूल गुणों में स्थित होने लगती है — शांति, प्रेम, शक्ति, पवित्रता, आनंद।
परिस्ता।
यह आत्मा के अपने मूल गुण हैं। इन गुणों में स्थित होना ही फरिश्ता बनना।
जब आत्मा अपने इन मूल गुणों में स्थित होती है, शांत होती है, प्रेम से भरी हुई होती है, शक्ति संपन्न होती है, पवित्रता होती है, आनंद होता है। यह सारी अवस्थाएं जिस आत्मा में होती हैं,
[गला साफ़ करने की आवाज़]
उस स्थिति को परिश कहा जाता है।
शरीर में रहते हुए भी अपने को केवल शरीर नहीं मानता।
अपने को केवल शरीर नहीं मानता।
वह भूमिका निभाता है लेकिन भूमिका में फंसता नहीं।
भूमिका निभाता है लेकिन भूमिका में फंसता नहीं।
डबल लाइट से परिश्ता स्थिति तक।
डबल लाइट से परिश्ता स्थिति तक।
हमने पहले किया था डबल लाइट क्या होता है? पहले हम डबल लाइट बनेंगे और फिर हम फरिश्ता स्थिति में आएंगे।
फरिश्ता बनने के से पहले डबल लाइट होना बहुत ही जरूरी है।
[गला साफ़ करने की आवाज़] [खांसने की आवाज़]
हम पिछले अध्याय में समझ चुके हैं।
डबल लाइट का अर्थ है मन और आत्मिक स्थिति दोनों में हल्कापन।
दोनों में हल्कापन।
मन और आत्मिक स्थिति दोनों में हल्कापन।
अब एक कदम आगे बढ़िए।
लाइन समझ में आई है?
डबल लाइट का अर्थ—
पिछले अध्याय में हमने किया ना। कौन बता सकता है डबल लाइट के बारे में?
मन और आत्मिक स्थिति में हल्कापन।
एक हल्कापन होता है कि किसी भी प्रकार का जीवन में बोझ नहीं, चिंता नहीं, भय नहीं, दुख नहीं।
किसी प्रकार का बोझ नहीं।
दूसरा होता है — मैं आत्मा लाइट हूं, प्रकाश।
इसे कहते हैं डबल लाइट।
मन और आत्मिक स्थिति दोनों में हल्कापन।
मन भारी नहीं हो। बोझ वाला मन नहीं हो। दुखी होकर के हम कोई काम ना कर रहे हों।
अब एक कदम आगे बढ़िए।
अब एक कदम आगे बढ़िए।
जब आत्मा हल्की होने के साथ-साथ परिस्थितियों से ऊपर उड़ने की कला सीखती है।
कैसी भी परिस्थिति आ जाए, उस परिस्थिति से वह ऊपर उठ सकती है। उड़ सकती है। वह समस्या उसके आगे कुछ नहीं। वह उस समस्या को डोंट केयर कर सकती।
तो इस राजयोग की भाषा में फरिश्ता स्थिति कहा जाता है। जब वो उड़ सकती है, उस उड़ने वाली स्टेज को फरिश्ता कहा जाता है।
जिसके ऊपर उठना मतलब क्या होता है? कैसे उठना है?
परिस्थितियां—
[गला साफ़ करने की आवाज़]
तो रहेंगी ना।
अब कोई सोचे, भाई यह मुसीबत आ गई है हमारे घर में। जब यह मुसीबत खत्म हो जाएगी ना तब मुरली शुरू करेंगे। क्या करें? मेहमान भी इतने आ रहे हैं। सब कुछ होना।
अब ऐसे टाइम पर मैं मुरली सुनने जाऊं। जब यह ठीक हो जाएगा ना, फिर मुरली सुनने जाओ।
तो यह क्या है कि मैं परिस्थिति के आगे रुक गया। परिस्थिति आई, मुझे रोक दिया। परंतु उड़ जाना माना आपने—
जो काम करने हैं, वह अपने समय पर किए, उनको अरेंज किया और मुरली के टाइम पर जो भी जिस समय मैं निकल सकती हूं। यह जिद नहीं कि इस टाइम मुझे जाना है चाहे घर में सारे परेशान रहें। परंतु उस समस्या का समाधान भी करना है और उसके बाद बाबा की मुरली भी पढ़नी।
तब तो आपने क्या किया? परिस्थिति पर विजय पाई। आपने अभी अपनी अवस्था को जरा भी दुखी नहीं होने दिया।
वरना दुखी होते रहो — मेरी किस्मत खराब है। मैं मुरली पढ़ने नहीं जा सकती। इनको भी ऐसे टाइम पर ऐसे होना था। क्या करूं? मेरे भाग्य मेरा खराब है।
आप अपने आप को कोसते रहो। व्हाई? आप वहां खुशी-खुशी उनकी सेवा करो। बाबा की श्रीमत के अनुसार आप अपनी सेवा करते रहो। सेवा करने के लिए तो किसी ने रोका नहीं ना।
तो जब आप ऐसे रहेंगे तो आप उड़ती कला वाले हैं। और आप यदि रुक गए तो आप रुक गए।
परिस्थिति के आगे रुक गए।
फरिश्ता अर्थात हल्का मन। सबसे पहली बात क्या है? उसका मन हल्का होगा। मन से कोई भारीपन नहीं।
ऊंची दृष्टि।
उसकी दृष्टि ऊंची होगी। आत्मिक दृष्टि होगी और वह कर्म जो करेगा वो बाबा की डायरेक्शन के अनुसार करेगा।
श्रेष्ठ कर्म।
जहां ये तीनों अवस्थाएं आ गईं — मन हल्का है, दृष्टि ऊंची है और कर्म श्रेष्ठ कर रहे हैं, तो आप आगे बढ़ रहे।
आपने उस काम को भी किया। वो उन परिवार की भी सेवा की और आप आगे बढ़ भी गए। रुके भी नहीं। वो भी काम हुआ और आगे भी काम होगा।
इसे कहते हैं उड़ना।
उच्च चेतना क्या है?
उच्च चेतना क्या है?
अब इसे विज्ञान की भाषा में समझेंगे। इसको कहते हैं पीक कॉन्शियसनेस।
चेतना की ऊंचाई।
चेतना की पीक, टॉप।
शब्द का प्रयोग उन अवस्थाओं के लिए किया जाता है जहां व्यक्ति असाधारण स्पष्टता, गहरी एकाग्रता, आत्म जागरूकता या ऑप्टिमल फंक्शनिंग होता है। जहां तक वे कर्म करता है।
जहां तक वे कर्म करता है।
जहां व्यक्ति असाधारण स्पष्टता, गहरी एकाग्रता, आत्म जागरूकता या ऑप्टिमल फंक्शनिंग—
ऑप्टिमल होता है के जो कमी है उसको पूरा कर देना, भर देना, पूरा-पूरा करना।
ऑप्टिमल जितना उसमें आ सकता है, फंक्शनिंग उतना करना।
क्योंकि हर एक आत्मा कितना अपने आप को फरिश्ता बनाएगी, जिस परसेंटेज पर वो आत्मा आई थी।
का अनुभव कर सकता है।
ऐसी अवस्थाओं में व्यक्ति वर्तमान से अधिक उपस्थित हो सकता है।
इस अवस्था में व्यक्ति वर्तमान
[गला साफ़ करने की आवाज़]
में अधिक उपस्थिति हो सकता है। अधिक उपस्थित हो सकता है।
कि किसी को कोई चोट लग गई है, कुछ हो गया है। ऐसा उसको कहीं ले जाना पड़ा है तो उसमें वह काफी टाइम तक ठीक कंट्रोल में अवस्था रह सकती है।
अपने विचारों को अधिक स्पष्ट रूप से देख सकता है।
भावनाओं के साथ बेहतर ढंग से काम कर सकता है और अपने उद्देश्य के अनुरूप कार्य कर सकता है।
लेकिन राजयोग का प्रश्न इससे भी गहरा है।
राजयोग का प्रश्न इससे भी गहरा है।
सबसे ऊंची चेतना में मैं स्वयं को क्या अनुभव करता हूं?
सबसे ऊंची चेतना में मैं स्वयं को क्या अनुभव करता हूं?
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
उत्तर — मैं आत्मा हूं।
क्या अनुभव करना है हमें? मैं आत्मा हूं।
साधारण चेतना और उच्च चेतना — इसमें क्या अंतर होगा?
साधारण अवस्था में परिस्थिति आती है। कोई ना कोई समस्या, प्रॉब्लम आई।
विचार आता है।
फिर भावना आती है।
भावना माना बुद्धि के द्वारा निर्णय आता है और हम प्रतिक्रिया कर देते हैं।
[गला साफ़ करने की आवाज़]
समझ में आई है बात? क्योंकि हमने पहले कर चुके हैं — प्रतिक्रिया और रिस्पांस।
यहां पर उसको फिर से उपयोग करेंगे कि प्रतिक्रिया कर देते हैं। यह एक साधारण अवस्था होती है।
अब दूसरा है हमारा — हम प्रतिक्रिया दे देते हैं।
परिस्थिति, फिर विचार आया।
परिस्थिति को देखा।
भावना बनी और हमने क्या कर दिया? रिएक्शन कर दिया।
यह है चार्ट।
लेकिन उच्च चेतना में क्या होता है?
परिस्थिति।
फिर आत्म स्मृति।
सजग बुद्धि।
फिर क्या आएगा? सजग बुद्धि। जागृत बुद्धि।
सजग बुद्धि, फिर श्रेष्ठ निर्णय।
फिर श्रेष्ठ निर्णय। फिर जब निर्णय श्रेष्ठ होगा तो रिस्पांस होगा।
जवाब होगा।
यही चेतना की ऊंचाई है।
फिर से देख लो।
उच्च चेतना में क्या होता है? परिस्थिति आई।
मैंने अपने आप को आत्मिक स्थिति में स्थित किया।
आत्म स्मृति आई।
लेकिन उच्च चेतना—
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
लेकिन उच्च चेतना में भावना, रिएक्शन।
परिस्थिति, विचार। पहले परिस्थिति आएगी, फिर विचार आएगा, फिर हम प्रतिक्रिया कर देते।
यह हम बैक चले गए।
उच्च चेतना में परिस्थिति, आत्म स्मृति में आएंगे, सजग बुद्धि एकदम जागरूक होकर के श्रेष्ठ निर्णय।
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
रिस्पांस। इसे कहते रिस्पांस।
जब हम सही निर्णय देंगे, यह चेतना की ऊंचाई है।
फरिश्ता परिस्थितियों से ऊपर कैसे उठता है?
फरिश्ता परिस्थिति से ऊपर कैसे उठता है?
किसी ने आपकी आलोचना की, मान लो।
साधारण चेतना कहती है — इसने मेरा अपमान किया।
अहंकार सक्रिय हो जाता है। मन प्रतिक्रिया देता है।
लेकिन वरिष्ठा सिद्धि कहती है—
[गला साफ़ करने की आवाज़]
लेकिन फरिश्ता सिद्धि कहती है — मैं आत्मा हूं।
हर परिस्थिति से मुझे क्या सीखना है?
फिर बुद्धि श्रेष्ठ रिस्पांस देती है।
बुद्धि क्या करती है? श्रेष्ठ रिस्पांस देती है।
बुद्धि श्रेष्ठ चुनती है। परिस्थिति वही रहती है। वही रही लेकिन चेतना बदल गई।
लेकिन क्या हुआ? चेतना बदल गई।
फरिश्ता कमजोरी क्यों नहीं देखता?
फरिश्ता कमजोरी क्यों नहीं देखता?
क्योंकि वह व्यक्ति को केवल उसके वर्तमान व्यवहार से नहीं देखता।
वह समझता है हर आत्मा में कोई ना कोई विशेषता है।
यदि किसी में कमजोरी दिखाई दे।
यदि किसी में कमजोरी दिखाई दे तो फरिश्ता उस कमजोरी को पकड़ नहीं बैठता। पकड़ कर नहीं बैठता। वह सोचता है इस आत्मा की विशेषता क्या है?
यही दृष्टि संबंध बदल देती है। याद रखिए — जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।
परिस्ता सिद्धि की पहली पहचान — उड़ती कला।
फरिश्ता स्थिति की पहली पहचान क्या है?
उड़ती कला।
उड़ना यहां शरीर का उड़ना नहीं है।
उड़ना है स्थिति से ऊपर उठना। स्थिति छोटी हो जाए।
अपमान आया।
किसी ने आपका अपमान किया।
आप उड़ जाओ। कैसे उड़ेंगे?
कोई बात नहीं। मैंने किया होगा इसका कभी अपमान। इसने कर दिया। ओम शांति।
आप उड़ गए।
यदि आप ज्ञान नहीं है तो — आपने मेरी बेइज्जती कर दी। उसने मेरा तो जीना हराम है। मुझे तो मर जाना चाहिए।
किसी ने अपमान किया। उड़ गए। कोई बात नहीं।
हानि हुई, उड़ गए। कोई बात नहीं। यह कोई बात नहीं ही मतलब ये नहीं कि बाद में दुखी होते रहे। नहीं, हमने दुखी नहीं होना। उड़ के आगे चले जाओ।
बस प्रशंसा मिली, फूल के कुप्पा नहीं हो जाओ। ओके। ओम शांति। आगे उड़ जाओ।
सफलता मिली, उड़ गए।
असफलता मिली, उड़ गए।
अर्थात किसी भी परिस्थिति को अपनी आत्मिक स्थिति पर हावी नहीं होने देना।
यही है उड़ती कला।
दूसरी पहचान — डबल लाइट।
फरिश्ता जिम्मेदारियों से भागता नहीं। फरिश्ता जिम्मेदारियों से भागता नहीं।
वह जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी मन को हल्का रखता है।
मन को हल्का रखता है।
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
मन को हल्का रखता है। घर है, सेवा है, कार्य है, परिवार है, समाज है।
लेकिन यह सब कुछ अंदर—
समाज है लेकिन अंदर उसके अंदर क्या है?
शांति।
यही डबल लाइट है।
तीसरी पहचान — प्रतिक्रिया से मुक्ति।
तीसरी पहचान प्रतिक्रिया से मुक्त।
[खांसने की आवाज़]
फरिश्ता दूसरों की हर बात का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं होता।
[गला साफ़ करने की आवाज़]
मजबूर नहीं होता है।
वह जानता है हर बात का उत्तर देना आवश्यक नहीं।
सबसे शक्तिशाली रिस्पांस होता है।
कभी मुस्कान सबसे ऊंचा उत्तर होता है।
सबसे ऊंचा, कभी मुस्कान सबसे ऊंचा उत्तर होता है।
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
सबसे ऊंचा उत्तर होता है कभी क्षमा।
चौथी पहचान — परिस्थितियों में भी मुस्कान।
कैसी भी परिस्थिति आए, मैंने उसे खुशी से पार करना।
चौथी पहचान क्या है? परिस्थिति में मुस्कान।
कैसी भी परिस्थिति हो। क्या इसका अर्थ यह है कि फरिश्ते को कभी दुख नहीं होता?
क्या इसका अर्थ यह है कि फरिश्ते को कभी दुख नहीं होता?
नहीं। भावनाएं मनुष्य के अनुभव का हिस्सा हैं।
लेकिन आध्यात्मिक अभ्यास—
उद्देश्य यह है कि भावनाएं आएं।
लेकिन वह हमारी पूरी चेतना पर कब्जा ना कर कर लें।
भावनाएं आएं, पर तो हमें अपने अधीन ना करें।
फरिश्ता कहता है — परिस्थिति कठिन है लेकिन मेरी स्थिति उससे बड़ी है।
मेरी स्थिति उससे बड़ी है।
परिस्थिति कठिन है लेकिन मेरी स्थिति उससे बड़ी है।
यही अंतर है कमजोरी और आत्मिक शक्ति में।
पांचवीं पहचान — परमात्म समृद्धि।
फरिश्ता स्थिति का सबसे बड़ा आधार है परमात्मा की याद। अर्थात परमात्मा की श्रीमत पर चलना।
जब आत्मा स्वयं को अकेला समझती है तो परिस्थितियां भारी लग सकती हैं।
और जब बाबा को साथी बना लेती है, अर्थात बाबा की श्रीमत पर चलती है, तो हल्की हो जाती है।
लेकिन जब अनुभव करती है कि मैं परमपिता परम आत्मा शिव की संतान हूं, तो भीतर से शक्ति का अनुभव होता है।
शक्ति का अनुभव होता है।
राजयोग की दृष्टि से—
आत्म स्मृति
प्लस
परम आत्मा, परमात्म समृद्धि
शक्तिशाली सिद्धि।
फरिश्ता बनने का पूरा चक्र।
इसे एक सरल सूत्र में समझेंगे।
मैं आत्मा हूं।
आत्म स्मृति।
फिर परमात्म स्मृति।
फिर शक्तिशाली विचार।
फिर मिलेंगे हमें शक्तिशाली विचार।
परमात्म स्मृति और शक्तिशाली विचार। फिर आएगा श्रेष्ठ निर्णय। जब निर्णय श्रेष्ठ हो गया, सब कुछ श्रेष्ठ हो गया तो कर्म भी श्रेष्ठ हो जाएंगे।
श्रेष्ठ संस्कार।
हल्की और ऊंची स्थिति।
हल्की और ऊंची स्थिति।
फरिश्ता सिद्धि।
सबसे ऊंची स्थिति क्या है? फरिश्ता सिद्धि।
पीक कॉन्शियसनेस और परिस्ता स्थिति।
पीक मतलब चोटी।
हर एक आत्मा की चोटी अलग-अलग है ना।
पीक कॉन्शियसनेस, विज्ञान की भाषा में—
जब व्यक्ति उच्च स्तर की जागरूकता, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन का समस्त—
जब व्यक्ति उच्च स्तर की जागरूकता, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन का अनुभव करता है तो उसकी कार्य क्षमता बेहतर हो सकती है।
तो उस कार्य क्षमता, उसकी कार्य क्षमता बेहतर हो सकती है।
राजयोग की भाषा में जब आत्मा अपने मूल स्वरूप और परमात्मा की स्मृति में स्थित होती है तो वह अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों को अधिक सजगता से संभाल सकती है।
तो वह अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों को अधिक सजगता से संभाल सकती है।
कब? जब आत्मा अपने मूल स्वरूप और परमात्मा की स्मृति में स्थित होती है।
इसलिए दोनों दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण जीवन संदेश—
महत्वपूर्ण जीवन संदेश लिया जा सकता है।
चेतना की गुणवत्ता हमारे अनुभव, व्यवहार को प्रभावित करती है।
लेकिन आध्यात्मिक परिस्ता स्थिति को केवल वैज्ञानिक पीक कॉन्शियसनेस का—
[खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़]
पीक कॉन्शियसनेस का दूसरा नाम नहीं समझना चाहिए।
वरिष्ठा सिद्धि की अंतिम परीक्षा।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है — क्या आप तब भी फरिश्ता हैं जब कोई आपको दुख दे रहा हो?
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
जब कोई आपको दुख दे,
जब कोई आपकी बात ना माने,
जब कोई आपका अपमान करे,
जब कोई आपका अपमान करे,
जब आपकी योजना असफल हो जाए,
[गला साफ़ करने की आवाज़]
जब आपको अपेक्षित जितना आप चाहते थे उतना प्यार ना मिले।
जब आपको अपेक्षित जितना आप चाहते थे उतना सम्मान ना मिले, तब यदि आप कहें — मैं अपनी स्थिति नहीं गिराऊंगा।
मैं अपनी स्थिति नहीं गिराऊंगा। यदि आप कह सकें, यह आपको फिर कहना होगा। रोजाना वही स्थिति रहेगी।
अब—
मैं अपनी स्थिति नहीं गिराऊंगा। यदि आप कहें — मैं अपनी स्थिति नहीं गिराऊंगा।
यदि आप कह सकें — मैं अपनी स्थिति नहीं गिराऊंगा, तो यह आपकी परीक्षा है।
15वां विषय टॉपिक है — 30 सेकंड का फरिश्ता अभ्यास।
जहां हैं वहीं एक क्षण रुकिए। जहां हैं अपने आप को रोक दो। धीरे से अनुभव करें।
मैं आत्मा हूं।
मैं आत्मा हूं।
एक ज्योति बिंदु, भ्रकुटी के मध्य स्थित।
भ्रकुटी के मध्य स्थित।
मैं शांत स्वरूप हूं।
मैं परमपिता शिव की संतान हूं।
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
मेरे ऊपर परिस्थितियों का भार नहीं।
मेरे ऊपर परिस्थितियों का भार नहीं।
मैं हल्का हूं।
मैं हल्का हूं।
मैं स्वतंत्र हूं।
मैं श्रेष्ठ दृष्टि से हर आत्मा को देखता हूं।
और अब मैं अपनी श्रेष्ठ स्थिति में रहकर कर्म करूंगा।
कर्म करूंगा।
16वां पॉइंट है — स्वयं को चेक करें।
आज अपने आप से पूछिए—
क्या परिस्थितियां मेरी स्थिति तय करती हैं?
परिस्थितियां मेरी स्थिति तय करती हैं। उन्होंने खुशी दी तो मैं खुश हो गया। उन्होंने तो रोना दिया तो मैं रोने लग गया। नहीं।
क्या परिस्थिति मेरी स्थिति तय करती है?
क्या मैं दूसरों की कमजोरी जल्दी देख लेता हूं?
क्या मैं आलोचना के समय भी हल्का रह सकता हूं? कि कोई मेरी कितनी आलोचना करे, बेइज्जती करे, परंतु मैं क्या हल्का रह सकता हूं? मेरा बोझ भारी तो नहीं होगा?
क्या मैं अपनी आत्मिक पहचान को याद रखता हूं कि मैं यह देह नहीं हूं। मैं इस आत्मा को भेजने के निमित्त—
क्या मैं अपनी आत्मिक पहचान को याद रखता हूं?
क्या मेरी परम आत्म समृद्धि मेरे व्यवहार में दिखाई देती है?
[गला साफ़ करने की आवाज़]
क्या मैं जिम्मेदारियों के बीच भी डबल लाइट रह सकता हूं?
अंतिम निष्कर्ष।
फरिश्ता बनने का अर्थ क्या है?
दुनिया छोड़ना नहीं।
जिम्मेदारियों से भागना नहीं।
समस्याओं से बचना नहीं।
फरिश्ता बनने का अर्थ है दुनिया में रहते हुए भी अपनी चेतना को ऊंचा रखना।
परिस्थिति में रहते हुए परिस्थिति से ऊपर रहना।
परिस्थितियों में रहते हुए परिस्थितियों से ऊपर रहना।
जिम्मेदारी निभाते हुए मन को हल्का रखना।
दूसरों की कमजोरी देखते हुए उनकी विशेषता देखना।
दुख मिलने पर सुख का स्रोत भीतर और परमात्मा की याद—
परमात्मा की याद में खोजना।
सुख का स्रोत भीतर और परमात्मा की याद में खोजना।
और हर परिस्थिति में कहना—
मैं आत्मा हूं।
मैं हल्का हूं।
मैं शक्तिशाली आत्मा हूं।
मैं फरिश्ता हूं।
समाप्त।
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और आज का स्मृति मंत्र—
परिस्थिति मुझे नीचे खींच सकती है।
परिस्थिति मुझे नीचे खींच सकती है। लेकिन मेरी चेतना को नीचे जाना आवश्यक नहीं।
मेरी चेतना को नीचे जाना आवश्यक नहीं।
मैं आत्मा, शांत स्वरूप, पवित्र स्वरूप और शक्तिशाली स्वरूप हूं।
परमात्मा की याद में रहकर मैं हर परिस्थिति से ऊपर उड़ने की कला सीखता हूं।
यही फरिश्ता स्थिति है।
अच्छा, ओम शांति।
और विश्वास से जानने के लिए प्रजापिता को—
जो अंदर होगा वही बाहर का दरवाजा।
अच्छा, ओम शांति।
और विस्तार से जानने के लिए प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के किसी भी सेवा केंद्र पर संपर्क करें।
और यदि कोई प्रश्न है तो 9213106986 पर केवल टेलीग्राम करें।
965 56 क्या है?
भाई जी।
हां जी।
सब बैंक में बैंक की ईएमआई आई हुई है। बैंक भरने पे ना, बैंक में समझो कुछ लिया हुआ है, उसकी ईएमआई भरनी है।
हां हां।
और भर नहीं पा रहे हैं। पेनल्टी भी लग रही है।
अब इसमें फरिश्ता कैसे बने?
बहुत अच्छा एग्जांपल आपने दिया कि हमारे पास बैंक का लोन है। हमारा बिजनेस कमजोर है। हम वो दे नहीं पा रहे। दिन प्रतिदिन लोन बढ़ता जा रहा है।
पेनल्टी लग रही है।
पेनल्टी लग रही है। क्रेडिट स्कोर भी गिरता जा रहा है।
अच्छा। अब क्या होता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वो होना है। आप उसे बदल तो सकते नहीं।
आप अपनी भावना शुभ रख सकते हैं।
आप अपने आप को निश्चित कर सकते हैं कि मुझे जो होना है वह निश्चित है और वह होकर ही रहेगा।
वह होकर ही रहेगा।
कोई उसे बदल नहीं सकता।
ठीक है कि नहीं? मुझे यदि देना है तो देने के लिए भी मेरे पास पैसा आएगा, तब मैं उसे दूंगा।
