MURLI 20-08-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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20-08-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – बाप आये हैं तुम्हें इस पाप की दुनिया से निकाल चैन की दुनिया में ले जाने, बाप द्वारा तुम्हें सुख-शान्ति की दो सौगातें मिलती हैं”
प्रश्नः- सारी दुनिया में सच्ची-सच्ची नन्स तुम हो, सच्ची नन्स किसे कहेंगे?
उत्तर:- सच्ची नन्स वह जिनकी बुद्धि में एक की याद हो अर्थात् नन बट वन। वे अपने को भल नन्स कहलाती हैं लेकिन उनकी बुद्धि में सिर्फ एक क्राइस्ट की याद नहीं, क्राइस्ट को भी गॉड का बच्चा कहेंगे। तो उनकी बुद्धि में दो हैं और तुम्हारी बुद्धि में एक बाप है इसलिए तुम सच्ची-सच्ची नन्स हो। तुम्हें बाप का फरमान है पवित्र रहना है।
गीत:- इस पाप की दुनिया से…

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। किसने सुना? आत्माओं ने। आत्मा को परमात्मा नहीं कहा जा सकता। मनुष्य को भगवान नहीं कह सकते। अच्छा अभी तुम हो ब्राह्मण। तुमको अभी देवता नहीं कहा जाता। ब्रह्मा को भी देवता नहीं कहा जा सकता। भल कहते हैं ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम:.. परन्तु ब्रह्मा और विष्णु में तो बहुत फ़र्क है। विष्णु को देवता कहा जाता है, ब्रह्मा को देवता नहीं कह सकते क्योंकि वह है ब्राह्मणों का बाप। ब्राह्मणों को देवता नहीं कहा जा सकता। अब यह बातें कोई मनुष्य, मनुष्य को नहीं समझा सकते, भगवान ही समझाते हैं। मनुष्य तो अन्धश्रद्धा में जो आता है सो बोल देते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो – रूहानी बाप हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं। अपने को आत्मा समझना चाहिए। अहम् आत्मा यह शरीर लेती हैं। अहम् आत्मा ने 84 जन्म लिए हैं। जैसे-जैसे कर्म करते हैं वैसे शरीर मिलता है। शरीर से आत्मा अलग हो जाती है तो फिर शरीर से प्यार नहीं रहता। आत्मा से प्यार रहता है। आत्मा में भी प्यार तब है जबकि आत्मा शरीर में है। पित्रों को मनुष्य बुलाते हैं, शरीर तो उनका खत्म हो गया फिर भी उनकी आत्मा को याद करते हैं इसलिए ब्राह्मण में बुलाते हैं। कहते हैं फलाने की आत्मा आओ, यह भोजन आकर खाओ। गोया आत्मा में मोह रहता है। परन्तु पहले शरीर में मोह था, वह शरीर याद आता था। ऐसे नहीं समझते कि हम आत्मा को बुलाते हैं। आत्मा ही सब कुछ करती है। आत्मा में अच्छे वा बुरे संस्कार रहते हैं। पहले-पहले है देह-अभिमान फिर उसके बाद और विकार आते हैं। सबको मिलाकर कहा जाता है विकारी। जिसमें यह विकार नहीं हैं उनको कहा जाता है निर्विकारी। यह तो समझते हो बरोबर भारत में जब देवी-देवता थे तो उनमें दैवीगुण थे। इन लक्ष्मी-नारायण का है ही देवी-देवता धर्म। जैसे क्रिश्चियन धर्म में मेल अथवा फीमेल सब क्रिश्चियन हैं। यह भी कहा जाता है देवी-देवता। राजा-रानी, प्रजा सब देवी-देवता धर्म के हैं। यह बहुत ऊंच सुख देने वाला धर्म है। बच्चों ने गीत भी सुना, यह आत्मा ने कहा कि बाबा ऐसी जगह ले चलो जहाँ मुझे चैन-शान्ति हो। वह तो है सुखधाम और शान्तिधाम। यहाँ बड़े बेचैन हैं। सतयुग में बेचैनी होती नहीं। आत्मा जानती है बाबा बिगर कोई चैन की दुनिया में ले जा नहीं सकते हैं। बाप कहते हैं – मुक्ति और जीवनमुक्ति यह दो सौगातें मैं कल्प-कल्प लाता हूँ। परन्तु तुम भूल जाते हो, ड्रामा में भूलना ही है। सब भूल जाएं तब तो मैं आऊं। अभी तुम ब्राह्मण बने हो, तुमको निश्चय है हमने 84 जन्म लिए हैं। जो पूरा ज्ञान नहीं उठायेंगे वह पहले नई दुनिया में भी नहीं आयेंगे। त्रेता वा त्रेता के अन्त में आ जाएं। सारा मदार है पुरुषार्थ पर। सतयुग में सुख था, इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। अच्छा इसके अगले जन्म में यह कौन थे, किसको पता नहीं है। अगले जन्म में यह ब्राह्मण थे। उससे पहले शूद्र थे। वर्णों पर तुम अच्छी रीति समझा सकते हो।

अभी तुम समझते हो हम 21 जन्म के लिए चैन पायेंगे। बाबा हमको वह रास्ता बता रहे हैं। हम अभी पतित हैं इसलिए बेचैन हैं, दु:खी हैं। जहाँ चैन हो उसको सुख-शान्ति कहेंगे। तो अब तुम बच्चों की बुद्धि में आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान है। समझते हो बरोबर सतयुग में भारत कितना सुखी था। दु:ख अथवा बेचैनी का नाम नहीं था। अभी तुम पुरुषार्थ कर रहे हो स्वर्ग में जाने लिए। अभी तुम बने हो ईश्वरीय सम्प्रदाय के और वह हैं आसुरी सम्प्रदाय के। कहते हैं ना – पाप आत्मा। आत्मायें अनेक हैं, परमात्मा एक है। सब ब्रदर्स हैं, सब परमात्मा हो नहीं सकते। इतनी थोड़ी सी बात भी मनुष्यों की बुद्धि में नहीं है। बाबा ने समझाया है यह सारी दुनिया बड़ा बेहद का टापू है, वह छोटे-छोटे टापू होते हैं। इस बेहद टापू पर रावण का राज्य है। इन बातों को मनुष्य नहीं समझते हैं। वह तो सिर्फ कहानियां सुनाते रहते हैं। कहानी को ज्ञान नहीं कहा जाता। उनसे मनुष्य सद्गति को पा नहीं सकते। ज्ञान से सद्गति मिलती है। ज्ञान देने वाला है एक बाप, दूसरा न कोई। भक्तों की भगवान ही आकर रक्षा करते हैं। मनुष्य, मनुष्य की रक्षा नहीं कर सकते। शिवबाबा सभी बच्चों को वर्सा देते हैं। वह बाप भी है, शिक्षक भी है, सतगुरू भी है। वकील, बैरिस्टर भी है क्योंकि जमघटों की सजा से छुड़ाने वाला है। सतयुग में कोई भी जेल में नहीं जायेंगे। बाप सबको जेल से छुड़ाते हैं। बच्चों की सर्वश्रेष्ठ सब मनोकामनायें पूरी होती हैं। रावण द्वारा अशुद्ध कामनायें पूरी होती है। बाप द्वारा शुद्ध कामनायें पूरी होती हैं। शुद्ध कामनायें पूरी होने से तुम सदा सुखी बन जाते हो। अशुद्ध कामना है – पतित विकारी बनना। पावन रहने वाले को ब्रह्मचारी कहा जाता है। तुमको भी पवित्र रहना है। पवित्र बन और पवित्र दुनिया का मालिक बनना है। पतित से पावन एक बाप ही बनाते हैं। साधू-सन्त आदि तो विकार से पैदा होते हैं, देवताओं के लिए ऐसे थोड़ेही कहेंगे। वहाँ विकार होते ही नहीं। वह है ही पावन दुनिया। लक्ष्मी-नारायण सम्पूर्ण निर्विकारी थे, भारत पवित्र था। यह अभी तुम समझते हो। सतयुग में प्योरिटी थी तो पीस प्रासपर्टी थी, सब सुखी थे, रावण राज्य जब से हुआ है तो गिरते आये हैं। अभी तो कोई काम के नहीं रहे हैं। एकदम कौड़ी मिसल बन गये हैं। अब फिर हीरे मिसल बाप द्वारा बनते हो। भारत जब सतयुग था तो हीरे जैसा था। अब तो कौड़ी मिसल भी नहीं है। अपने धर्म का ही किसको पता नहीं पड़ता है। पाप करते रहते हैं। वहाँ तो पाप का नाम नहीं। तुम देवी-देवता धर्म के नामीग्रामी हो, देवताओं के ढेर चित्र हैं। और धर्मों में देखेंगे एक ही चित्र रहता है, क्रिश्चियन पास एक ही क्राइस्ट का चित्र होगा। बौद्धियों के पास एक ही बुद्ध का। क्रिश्चियन, क्राइस्ट को ही याद करते हैं, उनको नन्स कहा जाता है। नन्स माना सिवाए एक क्राइस्ट के और कोई नहीं इसलिए कहते हैं नन बट क्राइस्ट, ब्रह्मचारी रहते हैं। तुम भी नन्स हो। तुम अपने गृहस्थ व्यवहार में रहते नन्स बनती हो। एक ही बाप को याद करती हो। नन बट वन, एक शिवबाबा दूसरा न कोई। उन्हों की बुद्धि में फिर भी दो आ जाते हैं। क्राइस्ट के लिए भी समझेंगे वह गॉड का बच्चा था। परन्तु उनको गॉड की नॉलेज नहीं। तुम बच्चों को नॉलेज है, सारी दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिसको परमात्मा की नॉलेज हो। परमात्मा कहाँ रहते हैं, कब आते हैं, उनका क्या पार्ट चलता है, यह कोई नहीं जानते। भगवान को जानी जानन-हार कहते हैं। समझते हैं वह हमारे दिल की बात को जानते हैं। बाप कहते हैं – मैं नहीं जानता, हमको क्या पड़ी है – जो हर एक की दिल को बैठ रीड करुँगा, हम आये ही हैं पतितों को पावन बनाने। अगर कोई पवित्र नहीं रहते हैं, झूठ बोलते हैं तो नुकसान अपने को पहुँचायेंगे। गाया हुआ है – देवताओं की सभा में असुर जाकर बैठते थे। वहाँ अमृत बांटा जाता था, कोई विकार में जाकर फिर छिपकर आए बैठते तो वह असुर हुए ना। आपेही अपना पद भ्रष्ट कर देंगे। हर एक को अपना पुरुषार्थ करना है। नहीं तो अपनी ही सत्यानाश करते हैं। बहुत ऐसे हैं जो छिपकर बैठ जाते हैं। कहते हैं हम विकार में थोड़ेही जाते, परन्तु विकार में जाते रहते हैं। यह गोया अपने को ठगते हैं। अपनी ही सत्यानाश करते हैं। परमपिता परमात्मा, जिसका राइट हैण्ड धर्मराज है उनके आगे झूठ बोलते हैं तो खुद ही दण्ड के भागी बन पड़ते हैं। बहुत सेन्टर्स में भी ऐसे होते हैं। बाबा जब पहली बार देहली में गया था तो रोज एक आता था और विकार में जाता रहता था। पूछा जाता था जबकि पवित्र नहीं रहते हो तो आते क्यों हो? कहता था – आऊंगा नहीं तो निर्विकारी कैसे बनूँगा। पवित्रता अच्छी लगती है परन्तु रह भी नहीं सकता हूँ। आखरीन तो सुधर जाऊंगा। नहीं आऊंगा तो बेड़ा गर्क हो जायेगा। और कोई रास्ता ही नहीं है इसलिए हमको यहाँ आना पड़ता है।

बाप समझाते हैं तुम वायुमण्डल खराब करते हो, कहाँ तक ऐसे आते रहेंगे। पावन जो बनते हैं उनको पतित से जैसे घृणा आती है। कहते हैं बाबा इनके हाथ का खाना भी अच्छा नहीं लगता। बाप ने युक्ति भी बताई है, खान-पान की खिटपिट होती है, ऐसे तो नहीं नौकरी छोड़ देंगे, फिर युक्ति से चलाना होता है। कोई को समझाओ तो बिगड़ पड़ते हैं, पवित्र कैसे रहेंगे। यह तो कब सुना नहीं। संन्यासी भी रह नहीं सकते। जब घरबार छोड़ जाते हैं तब पवित्र रह सकते हैं। परन्तु यह किसको पता नहीं कि यहाँ पतित-पावन परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं। नहीं मानते इसलिए विरोध करते हैं। शिवबाबा ब्रह्मा तन में आते हैं, कोई शास्त्र दिखाओ। यह तो गीता में लिखा हुआ है मैं साधारण बूढ़े तन में आता हूँ। वह अपने जन्मों को नहीं जानते। यह तो लिखा हुआ है फिर तुम कैसे कहते हो कि परमात्मा कैसे मनुष्य तन में आयेंगे। पतित तन में ही आकर रास्ता बतायेंगे ना। आगे भी आये थे और कहा था – मामेकम् याद करो। वही परमधाम में रहते हैं और कहते हैं मामेकम् याद करो। श्रीकृष्ण का शरीर तो मूलवतन में नहीं होगा – जो कहे मामेकम् याद करो। एक परमपिता परमात्मा ही साधारण तन में प्रवेश कर तुम बच्चों को कहते हैं मामेकम् याद करो तो इस योग अग्नि से तुम्हारे पाप कट जायेंगे इसलिए ही मुझे पतित-पावन कहते हैं। पतित-पावन जरूर आत्माओं का होगा ना। पतित भी आत्मा ही बनती है।

बाप कहते हैं – तुम पवित्र आत्मा 16 कला सम्पूर्ण थी। अभी नो कला, बिल्कुल ही पतित बन गये हो। मैं कल्प-कल्प आकर तुमको समझाता हूँ। तुम जो काम चिता पर बैठ पतित बन जाते हो फिर ज्ञान चिता पर बिठाकर तुमको पावन बनाता हूँ। भारत में पवित्र प्रवृत्तिमार्ग था, अभी अपवित्र प्रवृत्तिमार्ग है। किसको भी चैन नहीं। अब बाप कहते हैं दोनों ज्ञान चिता पर बैठो। हर आत्मा को अपने-अपने कर्मों अनुसार शरीर मिलता है। ऐसे नहीं कि दूसरे जन्म में वही पति-पत्नी आपस में मिलेंगे। नहीं, इतनी रेस कर न सके। यह तो पढ़ाई की बात है ना। अज्ञान काल में हो सकता है, आपस में बहुत प्रेम है – तो उनकी मनोकामनायें पूरी हो सकती हैं, वह तो है पतित विकारी मार्ग। पति के पीछे पत्नी चिता पर बैठती है। दूसरे जन्म में भी जाकर उनसे मिलती है। परन्तु दूसरे जन्म में उनको थोड़ेही मालूम पड़ेगा। तुम भी बाबा के साथ ज्ञान चिता पर चढ़ते हो। यह छी-छी शरीर छोड़ चले जायेंगे। तुमको यह अभी मालूम है, उनको तो नहीं रहता कि हम आगे जन्म में ऐसे साथी थे। तुमको भी बाद में वहाँ यह बातें याद नहीं रहेंगी। अभी तुम्हारी बुद्धि में एम ऑब्जेक्ट है। मम्मा बाबा, लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। विष्णु है देवता। प्रजापिता ब्रह्मा को देवता नहीं कह सकते। ब्रह्मा सो देवता बनते हैं। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा कैसे बनते हैं – यह अभी तुमने समझ लिया है। अभी तुम जानते हो – चैन सिर्फ स्वर्ग में ही होता है। कोई मरते हैं तो कहते हैं स्वर्ग गया अर्थात् चैन में गया। बेचैनी में पतित रहते हैं। बाप फिर भी कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। बाकी हैं डीटेल में समझने की बातें। बाप नॉलेजफुल है तो तुमको भी अपने जैसा नॉलेजफुल बनायेंगे। बाप की याद से तुम सतोप्रधान बनेंगे, यह आत्माओं की रेस है। जो जास्ती याद करेंगे वह जल्दी बनेंगे। यह है योग और पढ़ाई की रेस। स्कूल में भी रेस होती है ना। ढेर स्टूडेन्ट्स होते हैं, उनमें से जो नम्बरवन निकलते हैं उनको स्कॉलरशिप मिलती है। एक ही पढ़ाई लाखों, करोड़ों आत्माओं के लिए होती है, तो इतने स्कूल भी होंगे ना। अब तुमको यह पढ़ाई पढ़नी है। सबको रास्ता बताओ, अंधों की लाठी बनो। घर-घर में पैगाम पहुँचाना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अब अशुद्ध कामनाओं का त्याग कर शुद्ध कामनायें रखनी हैं। सबसे शुद्ध कामना है पवित्र बनकर पवित्र दुनिया का मालिक बनें…। कोई भी भूल को छिपाकर अपने आपको ठगना नहीं है। धर्मराज बाप से सदा सच्चा रहना है।

2) ज्ञान चिता पर बैठ इस पढ़ाई में रेस कर भविष्य नई दुनिया में ऊंच पद पाना है। योग अग्नि से विकर्मों के खाते को दग्ध करना है।

वरदान:- बुद्धि की प्रीत एक प्रीतम से लगाकर सदा सम्मुख की अनुभूति करने वाले विजयी रत्न भव
प्रीत बुद्धि अर्थात् बुद्धि की लगन एक प्रीतम के साथ लगी हुई हो। जिसकी एक के साथ प्रीत है उनकी अन्य किसी भी व्यक्ति वा वैभव के साथ प्रीत जुट नहीं सकती। वे सदा बापदादा को अपने सम्मुख अनुभव करेंगे। उन्हें मन्सा में भी श्रीमत के विपरीत व्यर्थ संकल्प वा विकल्प नहीं आ सकते। उनके मुख से वा दिल से यही बोल निकलते – तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से बैठूँ….तुम्हीं से सर्व संबंध निभाऊं..ऐसे सदा प्रीत बुद्धि रहने वाले ही विजयी रत्न बनते हैं।
स्लोगन:- चाहिए-चाहिए का संकल्प आना भी रॉयल रूप का मांगना है।

 

ये अव्यक्त इशारे – अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

संगमयुग पर बापदादा ने सभी बच्चों को पहला व्रत दिया है – “सम्पूर्ण पवित्र भव”। यह पवित्रता का व्रत सिर्फ ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं है लेकिन ब्रह्मा बाप समान हर बोल में पवित्रता का वायब्रेशन समाया हुआ हो। हर संकल्प में पवित्रता का महत्व हो। हर कर्म में, कर्मयोगी जीवन का अनुभव हो – इसको कहा जाता है ब्रह्मचारी सो ब्रह्माचरी।

पवित्रता • एक बाप की याद • सुख-शान्ति • योग और ज्ञान — प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: सच्ची-सच्ची नन्स किसे कहा जाता है?

उत्तर: सच्ची नन्स वे हैं जिनकी बुद्धि में एक की याद हो—अर्थात् “नन बट वन”, एक परमपिता परमात्मा के सिवाय दूसरा कोई नहीं। वे गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए भी पवित्र जीवन धारण करती हैं और एक बाप को याद करती हैं।

प्रश्न 2: “नन बट वन” का क्या अर्थ है?

उत्तर: “नन बट वन” का अर्थ है—एक परमपिता परमात्मा के सिवाय दूसरा कोई नहीं। बुद्धि की प्रीत और लगन एक बाप से जुड़ी रहे, यही सच्ची पवित्रता है।

प्रश्न 3: आत्मा और परमात्मा में क्या अन्तर है?

उत्तर: आत्मायें अनेक हैं, जबकि परमात्मा एक है। आत्मा को परमात्मा नहीं कहा जा सकता और मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। परमात्मा आत्माओं का पिता, शिक्षक और सतगुरु है।

प्रश्न 4: आत्मा शरीर क्यों धारण करती है?

उत्तर: आत्मा शरीर के माध्यम से कर्म करती है और अपने संस्कारों के अनुसार शरीर प्राप्त करती है। शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा अपने संस्कारों और कर्मों का हिसाब साथ लेकर आगे बढ़ती है।

प्रश्न 5: देह-अभिमान से विकार कैसे उत्पन्न होते हैं?

उत्तर: सबसे पहले देह-अभिमान आता है। इसके बाद अन्य विकार और कमजोरियां जन्म लेती हैं। इसलिए आत्म-अभिमानी बनना अर्थात् स्वयं को आत्मा समझना पवित्र जीवन की पहली सीढ़ी है।

प्रश्न 6: सतयुग को सुख और शान्ति की दुनिया क्यों कहा जाता है?

उत्तर: सतयुग में पवित्रता, शान्ति, समृद्धि और दैवी गुण होते हैं। वहाँ विकार, पाप और बेचैनी नहीं होती। इसलिए उसे सुखधाम और चैन की दुनिया कहा जाता है।

प्रश्न 7: परमात्मा द्वारा मिलने वाली दो सौगातें कौन-सी हैं?

उत्तर: परमात्मा द्वारा मिलने वाली दो सौगातें हैं—मुक्ति और जीवनमुक्ति। आत्मा शान्तिधाम की मुक्ति और नई दुनिया में सुखमय जीवन की जीवनमुक्ति प्राप्त करती है।

प्रश्न 8: पवित्रता और सुख-शान्ति का क्या सम्बन्ध है?

उत्तर: जहाँ पवित्रता होती है वहाँ शान्ति और सुख भी होते हैं। सतयुग की विशेषता ही प्योरिटी, पीस और प्रासपर्टी थी। इसलिए पवित्र बनना ही सुख-शान्ति की दुनिया का अधिकारी बनने का आधार है।

प्रश्न 9: “पवित्र बनो और पवित्र दुनिया के मालिक बनो” का क्या अर्थ है?

उत्तर: वर्तमान संगमयुग में विकारों और अशुद्ध कामनाओं का त्याग करके पवित्र जीवन धारण करना है। पवित्रता के पुरुषार्थ से आत्मा भविष्य की पवित्र दुनिया में श्रेष्ठ पद की अधिकारी बनती है।

प्रश्न 10: शुद्ध कामना और अशुद्ध कामना में क्या अन्तर है?

उत्तर: पवित्रता, आत्मिक उन्नति और श्रेष्ठ जीवन की इच्छा शुद्ध कामना है। विकारों और अशुद्ध प्रवृत्तियों की ओर ले जाने वाली इच्छा अशुद्ध कामना है। बाप हमें अशुद्ध कामनाओं का त्याग कर शुद्ध कामनायें धारण करने की शिक्षा देते हैं।

प्रश्न 11: “मामेकम् याद करो” का क्या महत्व है?

उत्तर: “मामेकम् याद करो” अर्थात् एक परमपिता परमात्मा को याद करो। इस योग की अग्नि से विकर्मों का विनाश होता है और आत्मा सतोप्रधान बनने की ओर बढ़ती है।

प्रश्न 12: योग अग्नि को क्यों महत्वपूर्ण बताया गया है?

उत्तर: योग अग्नि आत्मा के विकर्मों को समाप्त करने का साधन है। जितना अधिक एक बाप की याद में रहेंगे, उतना ही आत्मा पवित्र और शक्तिशाली बनती जाएगी।

प्रश्न 13: अपनी गलतियों को छिपाना क्यों नहीं चाहिए?

उत्तर: गलती को छिपाने से आत्मा स्वयं को ही धोखा देती है और पुरुषार्थ कमजोर होता है। इसलिए परमात्मा के सामने सच्चाई रखते हुए अपनी कमी को पहचानना और उसे सुधारना चाहिए।

प्रश्न 14: “ज्ञान और योग की रेस” से क्या समझते हैं?

उत्तर: जैसे विद्यार्थी पढ़ाई में पुरुषार्थ करके आगे बढ़ते हैं, वैसे ही आत्माओं को भी ज्ञान और योग में पुरुषार्थ करना है। जो अधिक याद करेगा, वह जल्दी सतोप्रधान बनेगा। इसलिए निरन्तर अभ्यास और पुरुषार्थ आवश्यक है।

प्रश्न 15: ब्रह्मचारी जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर: ब्रह्मचारी जीवन केवल बाहरी ब्रह्मचर्य तक सीमित नहीं है। सम्पूर्ण पवित्रता का अर्थ है—हर संकल्प, हर बोल और हर कर्म में पवित्रता का वायब्रेशन हो तथा कर्म करते हुए कर्मयोगी स्थिति का अनुभव हो।

प्रश्न 16: सच्ची पवित्रता की पहली निशानी क्या है?

उत्तर: बुद्धि की प्रीत एक परमपिता परमात्मा से जुड़ना और अशुद्ध कामनाओं से मुक्त होना सच्ची पवित्रता की मुख्य निशानी है।

प्रश्न 17: “बुद्धि की प्रीत एक प्रीतम से” का क्या अर्थ है?

उत्तर: इसका अर्थ है कि बुद्धि की लगन और सच्चा स्नेह केवल एक परमपिता परमात्मा से जुड़ा रहे। ऐसी प्रीत बुद्धि अन्य व्यक्ति, वस्तु या वैभव के आकर्षण में नहीं फंसती और सदा बाप को सम्मुख अनुभव करती है।

प्रश्न 18: विजयी रत्न बनने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: एक बाप की याद में रहना, श्रीमत के अनुसार चलना, पवित्रता को जीवन में धारण करना, अशुद्ध कामनाओं का त्याग करना और ज्ञान-योग के पुरुषार्थ में आगे बढ़ना—इन्हीं गुणों से आत्मा विजयी रत्न बनती है।

 आज की मुख्य धारणा

“मैं आत्मा हूँ। परमपिता परमात्मा मेरा एकमात्र प्रीतम, पिता, शिक्षक और सतगुरु है। मैं एक की याद में रहकर सम्पूर्ण पवित्रता को धारण करूंगा और पवित्र दुनिया का अधिकारी बनूंगा।”

 आज का वरदान

“बुद्धि की प्रीत एक प्रीतम से लगाकर सदा सम्मुख की अनुभूति करने वाले विजयी रत्न भव।”

 आज का स्लोगन

“चाहिए-चाहिए का संकल्प आना भी रॉयल रूप का मांगना है।”

Disclaimer

यह वीडियो आध्यात्मिक एवं शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए विचार 20-08-2026 की प्रस्तुत प्रातः मुरली एवं संबंधित आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय, संस्था या मत की आलोचना करना नहीं है।

यह सामग्री आत्मचिंतन, राजयोग अभ्यास और सकारात्मक जीवन-परिवर्तन की प्रेरणा के लिए प्रस्तुत की गई है। मुरली के मूल एवं प्रमाणित पाठ के लिए संबंधित आधिकारिक स्रोत को प्राथमिकता दें।

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