AW.(21)25-06-1970/“त्रिमूर्ति लाइट्स का साक्षात्कार”
“त्रिमूर्ति लाइट्स का साक्षात्कार”
ब्राह्मणों को त्रिमूर्ति शिव वंशी कहते हो ना। त्रिमूर्ति बाप के बच्चे स्वयं भी त्रिमूर्ति हैं। बाप भी त्रिमूर्ति है। जैसे बाप त्रिमूर्ति है वैसे आप भी त्रिमूर्ति हो? तीन प्रकार की लाइट्स साक्षात्कार की आती है? वह मालूम है कौन सी है, जो ब्राह्मणों के तीन प्रकार की लाइट्स साक्षात्कार होते रहते हैं? आप लोगों से लाइट का साक्षात्कार होता है, मालूम पड़ता है? त्रिमूर्तिवंशी त्रिमूर्ति बच्चों की तीन प्रकार की लाइट्स का साक्षात्कार होता है। वह कौन सी लाइट्स हैं? एक तो लाइट का साक्षात्कार होता है नयनों से। कहते हैं ना कि नयनों की ज्योति। नयन ऐसे दिखाई पड़ेंगे जैसे नयनों में दो बड़े बल्ब जल रहे हैं। दूसरी होती है मस्तक की लाइट। तीसरी होती है माथे पर लाइट का क्राउन। अभी यह कोशिश करना है जो तीनों ही लाइट्स का साक्षात्कार हो। कोई भी सामने आये तो उनको यह नयन बल्ब दिखाई पड़ें। ज्योति ही ज्योति दिखाई दे। जैसे अंधियारे में सच्चे हीरे चमकते हैं ना। जैसे सर्च लाइट होती है, बहुत फोर्स से और अच्छी रीति फैलाते हैं – इस रीति से मस्तक के लाइट का साक्षात्कार होगा। और माथे पर जो लाइट का क्राउन है वह तो समझते हो। ऐसे त्रिमूर्ति लाइट का साक्षात्कार एक-एक से होना है। तब कहेंगे यह तो जैसे फरिश्ता है। साकार में नयन, मस्तक और माथे के क्राउन के साक्षात्कार स्पष्ट होंगे।
नयनों तरफ देखते-देखते लाइट देखेंगे। तुम्हारी लाइट को देख दूसरे भी जैसे लाइट हो जायेंगे। कितनी भी मन से वा स्थिति में भारीपन हो लेकिन आने से ही हल्का हो जाये। ऐसी स्टेज अब पकड़नी है। क्योंकि आप लोगों को देखकर और सभी भी अपनी स्थिति ऐसी करेंगे। अभी से ही अपना गायन सुनेंगे। द्वापर का गायन कोई बड़ी बात नहीं हैं। लेकिन ऐसे साक्षात्कार-मूर्त और साक्षात् मूर्त बनने से अभी का गायन अपना सुनेंगे। आप के आगे आने से लाइट ही लाइट देखने में आये। ऐसे होना है। मधुबन ही लाइट का घर हो जायेगा। यह दीवे आदि देखते भी जैसे कि नहीं देखेंगे। जैसे वतन में लाइट ही लाइट देखने में आती है, वैसे यह स्थूल वतन लाइट का हाउस हो जायेगा। जब आप चैतन्य लाइट हाउस हो जायेंगे तो फिर यह मधुबन भी लाइट हाउस हो जायेगा। अभी यह है लास्ट पढ़ाई की लास्ट सब्जेक्ट – प्रैक्टिकल में। थ्योरी का कोर्स समाप्त हुआ। प्रैक्टिकल कोर्स की लास्ट सब्जेक्ट है। इस लास्ट सब्जेक्ट में बहुत फास्ट पुरुषार्थ करना पड़ेगा। इसी स्टेज के लिए ही गायन है।
बापदादा से कब विदाई नहीं होती है। माया से विदाई होती है। बापदादा से तो मिलन होता है। यह थोड़े समय का मिलन सदा का मिलन करने के निमित्त बन जाता है। बाप के साथ गुण और कर्तव्य मिलना यही मिलन है। यही प्रयत्न सदैव करते रहना है। अच्छा।
संकल्पों को ब्रेक लगाने का मुख्य साधन कौन सा है? मालूम है? जो भी कार्य करते हो तो करने के पहले सोचकर फिर कार्य शुरू करो। जो कार्य करने जा रहा हूँ वह बापदादा का कार्य है? मैं निमित्त हूँ। जब कार्य समाप्त करते हो तो जैसे यज्ञ रचा जाता है तो समाप्ति समय आहुति दी जाती है। इस रीति जो कर्तव्य किया और जो परिणाम निकला। वह बाप को समर्पण, स्वाहा कर दिया फिर कोई संकल्प नहीं। निमित्त बन कार्य किया और जब कार्य समाप्त हुआ तो स्वाहा किया। फिर संकल्प क्या चलेगा? जैसे आग में चीज़ डाली जाती है तो फिर नाम निशान नहीं रहता वैसे हर चीज़ की समाप्ति में सम्पूर्ण स्वाहा करना है। फिर आपकी ज़िम्मेवारी नहीं। जिसके अर्पण हुए फिर ज़िम्मेवार वह हो जाते हैं। फिर संकल्प काहे का। जैसे घर में कोई बड़ा होता है तो जो भी काम किया जाता है तो बड़े को सुनाकर खाली हो जायेंगे। वैसे ही जो कार्य किया, समाचार दिया, बस। अव्यक्त रूप को सामने रख यह करके देखो। जितना जो सहयोगी बनता है उनको एक्स्ट्रा सहयोग देना पड़ता है। जैसे अपनी आत्मा की उन्नति के लिए सोचते हैं इस रीति शुद्ध भावना, शुभ चिन्तक और शुभ चिन्तन के रूप में एक्स्ट्रा मदद, दोनों रूप से किसी भी आत्मा को विशेष सहयोग दे सकते हो। देना चाहिए, इससे बहुत मदद मिलती है। जैसे कोई गरीब को अचानक बिगर मेहनत प्राप्ति हो जाती है, उस रीति जिस भी आत्मा के प्रति एक्स्ट्रा सहयोग दिया जाता है वह आत्मा भी महसूस करती है हमको विशेष मदद मिली है। साकार रूप में भी एक्स्ट्रा कोई आत्मा को सहयोग देने का सबूत करके दिखाया ना। उस आत्मा को स्वयं भी अनुभव हुआ। यह सर्विस करके दिखानी है। जितना-जितना आप सूक्ष्म होते जायेंगे उतना यह सूक्ष्म सर्विस भी बढ़ती जायेगी। स्थूल के साथ सूक्ष्म का प्रभाव जल्दी पड़ता है और सदा काल के लिए। बापदादा भी विशेष सहयोग देते हैं। एक्स्ट्रा मदद का अनुभव होगा। मेहनत कम प्राप्ति अधिक। अच्छा!
बापदादा बच्चों से जितना अविनाशी स्नेह करते हैं उतना बच्चे अविनाशी स्नेह रखते हैं? यह अविनाशी स्नेह यही एक धागा है जो 21 जन्मों के बन्धन को जोड़ता है। सो भी अटूट स्नेह। जितना पक्का धागा होता है उतना ही ज्यादा समय चलता है। यह संगम का समय 21 जन्मों को जोड़ता है। इस संगम के युग का एक-एक संकल्प एक-एक कर्म 21 जन्म के बैंक में जमा होता है। इतना अटेन्शन रखकर फिर संकल्प भी करना। जो करूंगा वह जमा होगा। तो कितना जमा होगा। एक संकल्प भी व्यर्थ न हो। एक संकल्प भी व्यर्थ हुआ तो जमा में कट जाता है। तो जमा जब करना होता है तो एक भी व्यर्थ न हो। कितना पुरुषार्थ करना है! संकल्प भी व्यर्थ न जाये। समय तो छोड़ो। अब पुरुषार्थ इस सीमा पर पहुंच रहा है। जैसे पढ़ाई दिन प्रतिदिन ऊंची होती जाती है तो यह भी ऐसे है। बड़े क्लास में पढ़ रहे हो ना।
त्रिमूर्ति लाइट्स का साक्षात्कार | नयन, मस्तक और लाइट क्राउन से फरिश्ता स्टेज तक | BapDada Murli
मुरली विषय: त्रिमूर्ति लाइट्स का साक्षात्कार
मुरली नोट्स: बापदादा, मधुबन — अव्यक्त संदेश
मुख्य विषय: लाइट स्वरूप, प्रैक्टिकल पुरुषार्थ, संकल्पों को ब्रेक, सूक्ष्म सेवा और अविनाशी स्नेह
Chapter 1 — त्रिमूर्ति बाप और त्रिमूर्ति बच्चे
बापदादा समझाते हैं कि ब्राह्मण बच्चे त्रिमूर्ति बाप के बच्चे होने के कारण स्वयं भी त्रिमूर्ति हैं।
अब केवल त्रिमूर्ति को जानना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उसकी लाइट का अनुभव कराना है।
मुख्य बात:
ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य ऐसा बनना है कि हमारे स्वरूप से आत्मिक प्रकाश और शक्ति का अनुभव हो।
उदाहरण:
जैसे अंधेरे कमरे में एक दीपक भी वातावरण को बदल देता है, वैसे ही श्रेष्ठ स्थिति वाली आत्मा के संग से दूसरों को भी शान्ति और हल्केपन का अनुभव हो सकता है।
Chapter 2 — तीन प्रकार की लाइट्स का साक्षात्कार
बापदादा तीन प्रकार की लाइट्स का विशेष वर्णन करते हैं:
1. नयनों की लाइट
नयनों में ऐसी आत्मिक ज्योति दिखाई दे जैसे दो बड़े बल्ब जल रहे हों।
2. मस्तक की लाइट
मस्तक से शक्तिशाली सर्च लाइट के समान आत्मिक शक्ति का अनुभव हो।
3. लाइट का क्राउन
माथे पर लाइट का क्राउन अर्थात् दिव्य और फरिश्ता स्वरूप की स्पष्ट झलक दिखाई दे।
मुरली नोट:
लक्ष्य केवल बाहरी रूप दिखाना नहीं, बल्कि ऐसी आत्मिक स्थिति बनाना है जिसका प्रभाव सामने आने वाली आत्मा पर पड़े।
Chapter 3 — ऐसी लाइट बनो कि दूसरों का भारीपन हल्का हो जाए
बापदादा कहते हैं कि हमारी स्थिति ऐसी हो कि सामने आने वाला व्यक्ति हमारी लाइट देखकर स्वयं भी लाइट अनुभव करे।
किसी के मन में कितनी भी परेशानी या भारीपन हो, लेकिन हमारे संग से उसे हल्कापन महसूस हो।
Practical Example:
जब कोई व्यक्ति परेशान होकर आपके पास आए, तो उसकी समस्या में उलझने के बजाय पहले स्वयं शांत और स्थिर स्थिति में रहें। आपकी शान्ति और शुभ भावना उसके मन को भी हल्का करने में सहयोग कर सकती है।
पुरुषार्थ:
“मैं ऐसा चैतन्य लाइट हाउस बनूँ, जिसके संग से आत्माओं को शान्ति और शक्ति मिले।”
Chapter 4 — मधुबन बनेगा लाइट हाउस
जब ब्राह्मण बच्चे स्वयं चैतन्य लाइट हाउस बनेंगे, तब मधुबन भी लाइट का घर अनुभव होगा।
यह केवल बाहरी लाइट की बात नहीं, बल्कि ऐसी आत्मिक अवस्था की बात है जहाँ चारों ओर शान्ति, शक्ति और पवित्रता का अनुभव हो।
मुरली नोट:
यह अवस्था प्रैक्टिकल पुरुषार्थ की लास्ट सब्जेक्ट है।
Chapter 5 — थ्योरी समाप्त, अब प्रैक्टिकल की लास्ट सब्जेक्ट
बापदादा संकेत देते हैं कि अब केवल ज्ञान सुनने और समझने का समय नहीं है।
थ्योरी का कोर्स → प्रैक्टिकल कोर्स
लाइट स्वरूप बनना, फरिश्ता स्टेज बनाना और हर कर्म में श्रेष्ठ स्थिति रखना—अब इसका अभ्यास करना है।
उदाहरण:
ज्ञान में हम कहते हैं “मैं आत्मा हूँ”, लेकिन परिस्थिति आने पर यदि क्रोध, चिंता या तनाव में आ जाते हैं तो प्रैक्टिकल में आत्मिक स्थिति का अभ्यास अभी और बढ़ाना है।
Chapter 6 — संकल्पों को ब्रेक लगाने की युक्ति
संकल्पों को रोकने का मुख्य साधन है:
कार्य करने से पहले सोचो।
कार्य करते समय निमित्त बनो।
कार्य समाप्त होने पर स्वाहा करो।
पहले अपने आप से पूछें:
“जो कार्य मैं करने जा रहा हूँ, क्या यह बापदादा का कार्य है? मैं निमित्त हूँ?”
कार्य पूरा होने के बाद उसके परिणाम को बाप को अर्पण कर दें।
“स्वाहा” का अभ्यास
जैसे यज्ञ में आहुति डालने के बाद उसका नाम-निशान नहीं रहता, वैसे ही कार्य पूरा होने के बाद उसके परिणाम को बाप को समर्पित कर देना है।
Practical Example:
आपने किसी सेवा की। सेवा पूरी होने के बाद बार-बार यह सोचना कि “मैंने इतना किया”, “मेरा नाम क्यों नहीं आया”, “परिणाम ऐसा क्यों हुआ”—यह अतिरिक्त संकल्प पैदा करता है।
इसके बजाय:
“मैं निमित्त था, कार्य बाप का था, परिणाम बाप को अर्पण।”
Chapter 7 — सूक्ष्म सेवा और एक्स्ट्रा सहयोग
केवल स्थूल सेवा ही नहीं, बल्कि शुद्ध भावना, शुभचिन्तक और शुभचिन्तन के द्वारा भी किसी आत्मा को विशेष सहयोग दिया जा सकता है।
जितना हम सूक्ष्म होते जायेंगे, उतनी ही सूक्ष्म सेवा का प्रभाव बढ़ता जायेगा।
उदाहरण:
किसी आत्मा के प्रति आलोचना करने के बजाय उसके लिए शुभ भावना रखना, उसे आत्मिक शक्ति के संकल्प देना और उसकी उन्नति के लिए सच्चे दिल से शुभचिन्तन करना।
मुरली का संकेत:
सूक्ष्म सेवा का प्रभाव जल्दी पड़ता है और उसका प्रभाव स्थायी भी हो सकता है।
सूत्र:
मेहनत कम — प्राप्ति अधिक।
Chapter 8 — बापदादा से विदाई नहीं, मिलन
बापदादा से कभी विदाई नहीं होती।
माया से विदाई और बाप से मिलन।
बाप के गुणों और कर्तव्यों को अपने जीवन में धारण करना ही वास्तविक मिलन है।
पुरुषार्थ:
बाप जैसा बनने की दिशा में आगे बढ़ना—गुणों को धारण करना, सेवा में निमित्त बनना और आत्मिक स्थिति को मजबूत करना।
Chapter 9 — अविनाशी स्नेह का धागा
बापदादा बच्चों से अविनाशी स्नेह करते हैं और यही अविनाशी स्नेह 21 जन्मों के बंधन को जोड़ने वाला धागा बनता है।
जितना धागा मजबूत होगा, उतना ही वह लंबे समय तक टिकेगा।
मुरली नोट:
संगमयुग का समय भविष्य के लिए अत्यन्त मूल्यवान है।
Chapter 10 — एक-एक संकल्प 21 जन्मों के बैंक में जमा
संगमयुग का एक-एक श्रेष्ठ संकल्प और एक-एक श्रेष्ठ कर्म भविष्य की प्राप्ति के लिए जमा होता है।
इसलिए बापदादा विशेष अटेन्शन दिलाते हैं:
एक भी संकल्प व्यर्थ न जाए।
समय की बचत तो करनी ही है, लेकिन अब संकल्पों की बचत भी करनी है।
Practical Example:
यदि किसी ने आपके साथ कुछ गलत किया, तो बार-बार उसी बात को सोचते रहना व्यर्थ संकल्पों का कारण बन सकता है।
श्रेष्ठ विकल्प:
“मैं आत्मा हूँ। मैं शुभचिन्तक हूँ। मैं इस परिस्थिति को बाप को अर्पण करता हूँ और अपनी शक्ति को व्यर्थ नहीं जाने दूँगा।”
Chapter 11 — आज का मुख्य पुरुषार्थ
आज स्वयं से पाँच प्रश्न पूछें:
- क्या मेरे नयनों से आत्मिक लाइट का अनुभव होता है?
- क्या मेरी स्थिति दूसरों का भारीपन हल्का कर सकती है?
- क्या मैं कार्य से पहले स्वयं को निमित्त समझता हूँ?
- क्या कार्य पूरा होने के बाद उसे बाप को स्वाहा कर देता हूँ?
- क्या मेरा एक-एक संकल्प भविष्य के लिए जमा हो रहा है?
चैतन्य लाइट हाउस बनो
अब लक्ष्य केवल ज्ञान सुनना नहीं, बल्कि ज्ञान का साक्षात् स्वरूप बनना है।
नयन बनें ज्योति के स्रोत,
मस्तक बने शक्ति की सर्च लाइट,
माथे पर हो लाइट का क्राउन,
संकल्प हों श्रेष्ठ,
कर्म हों समर्पित,
और जीवन बने चैतन्य लाइट हाउस।
यही है त्रिमूर्ति लाइट्स के साक्षात्कार से फरिश्ता स्टेज की ओर बढ़ने का पुरुषार्थ।
प्रश्न 1. ब्राह्मण बच्चों को त्रिमूर्ति क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि ब्राह्मण बच्चे त्रिमूर्ति बाप के बच्चे हैं, इसलिए उन्हें स्वयं भी त्रिमूर्ति कहा जाता है।
प्रश्न 2. त्रिमूर्ति लाइट्स की तीन प्रकार की लाइट्स कौन-सी हैं?
उत्तर: नयनों की लाइट, मस्तक की लाइट और माथे पर लाइट का क्राउन।
प्रश्न 3. नयनों की लाइट कैसी दिखाई देनी चाहिए?
उत्तर: नयन ऐसे दिखाई दें जैसे उनमें दो बड़े बल्ब जल रहे हों और ज्योति ही ज्योति दिखाई दे।
प्रश्न 4. मस्तक की लाइट की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: मस्तक की लाइट की तुलना शक्तिशाली सर्च लाइट से की गई है, जो अच्छी रीति से प्रकाश फैलाती है।
प्रश्न 5. माथे का लाइट क्राउन किसका प्रतीक है?
उत्तर: माथे का लाइट क्राउन दिव्य और फरिश्ता स्वरूप की पहचान है।
प्रश्न 6. त्रिमूर्ति लाइट्स का साक्षात्कार होने से दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर: हमारी लाइट को देखकर दूसरे भी लाइट अनुभव करेंगे और उनके मन या स्थिति का भारीपन हल्का हो सकता है।
प्रश्न 7. अब ब्राह्मण बच्चों को कैसी स्टेज पकड़नी है?
उत्तर: ऐसी स्टेज पकड़नी है कि जो भी सामने आए, उसे हमारे स्वरूप में लाइट ही लाइट दिखाई दे और हमें फरिश्ते के समान अनुभव करे।
प्रश्न 8. मधुबन को लाइट हाउस कब कहा जाएगा?
उत्तर: जब ब्राह्मण बच्चे स्वयं चैतन्य लाइट हाउस बन जाएंगे, तब मधुबन भी लाइट का हाउस अनुभव होगा।
प्रश्न 9. लास्ट पढ़ाई की लास्ट सब्जेक्ट क्या है?
उत्तर: थ्योरी का कोर्स समाप्त करके अब प्रैक्टिकल में लाइट स्वरूप बनने की लास्ट सब्जेक्ट है।
प्रश्न 10. बापदादा से विदाई क्यों नहीं होती?
उत्तर: बापदादा से विदाई नहीं होती, बल्कि माया से विदाई होती है। बाप के गुण और कर्तव्य अपने जीवन में धारण करना ही बाप से सच्चा मिलन है।
प्रश्न 11. संकल्पों को ब्रेक लगाने का मुख्य साधन क्या है?
उत्तर: कोई भी कार्य करने से पहले सोचें कि “जो कार्य मैं करने जा रहा हूँ, क्या यह बापदादा का कार्य है? मैं निमित्त हूँ?”
प्रश्न 12. कार्य समाप्त होने के बाद क्या करना चाहिए?
उत्तर: कार्य और उसके परिणाम को बाप को समर्पण अर्थात् स्वाहा कर देना चाहिए, ताकि उसके बारे में अनावश्यक संकल्प न चलें।
प्रश्न 13. कार्य को स्वाहा करने की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: यज्ञ में आहुति देने से की गई है। जैसे अग्नि में डाली गई वस्तु का नाम-निशान नहीं रहता, वैसे ही कार्य समाप्त होने पर उसे बाप को अर्पण कर देना है।
प्रश्न 14. सूक्ष्म सेवा कैसे की जा सकती है?
उत्तर: शुद्ध भावना, शुभचिन्तक और शुभचिन्तन के रूप में किसी आत्मा को एक्स्ट्रा सहयोग देकर सूक्ष्म सेवा की जा सकती है।
प्रश्न 15. सूक्ष्म सेवा का क्या लाभ है?
उत्तर: सूक्ष्म सेवा का प्रभाव जल्दी पड़ता है और वह स्थायी रूप से आत्मा की उन्नति में सहयोग कर सकती है।
प्रश्न 16. बापदादा के अनुसार किस प्रकार की सेवा में मेहनत कम और प्राप्ति अधिक होती है?
उत्तर: स्थूल सेवा के साथ-साथ सूक्ष्म सेवा करने में—जहाँ शुद्ध भावना और शुभचिन्तन द्वारा आत्माओं को सहयोग दिया जाता है।
प्रश्न 17. संगमयुग के संकल्पों का क्या महत्व है?
उत्तर: संगमयुग का एक-एक श्रेष्ठ संकल्प और एक-एक श्रेष्ठ कर्म भविष्य के 21 जन्मों के बैंक में जमा होता है।
प्रश्न 18. व्यर्थ संकल्पों के प्रति क्या अटेन्शन रखना है?
उत्तर: एक भी संकल्प व्यर्थ न जाए। क्योंकि व्यर्थ संकल्प भविष्य की जमा में कमी कर सकता है।
प्रश्न 19. अविनाशी स्नेह को किसके समान बताया गया है?
उत्तर: अविनाशी स्नेह को उस मजबूत धागे के समान बताया गया है जो 21 जन्मों के संबंध को जोड़ता है।
प्रश्न 20. इस संदेश का मुख्य पुरुषार्थ क्या है?
उत्तर: स्वयं को चैतन्य लाइट हाउस बनाना, नयनों और मस्तक से आत्मिक लाइट का अनुभव कराना, संकल्पों को व्यर्थ जाने से रोकना, हर कार्य को बाप को स्वाहा करना और शुभ भावना द्वारा सूक्ष्म सेवा करना।

