आज का विषय है
अति इंद्रिय सुख का रहस्य।
कैसे अनुभव करें?
शरीर से न्यारा होकर।
मुरली के अंदर 26 अगस्त 2025 की मुरली में
बाबा कहते –
अती इंद्रिय सुख का
अनुभव कैसे करें?
प्रश्न:
अती्द्रिय सुख क्या है?
और इसका अनुभव कैसे हो सकता है?
उत्तर:
जब आत्मा
इंद्रियों के प्रभाव से परे हो जाती है।
देह भान भूलकर
स्वयं को निराकार रूप में
अनुभव करती है
और परमात्मा से सीधा संबंध जोड़ती है।
वही अवस्था है अति इंद्रिय सुख।
क्या कहा है?
जब आत्मा इंद्रियों के प्रभाव से परे हो जाती है।
कोई भी इंद्रियां आत्मा पर अपना असर नहीं डाल सक रही।
देह भान भूलकर देह का भान भी ना आए।
स्वयं को निराकार रूप में
अनुभव करती है
और परमात्मा से सीधा संबंध जोड़ती है।
वही अवस्था है अति इंद्रिय सुख।
कोई बात डाउट है तो पूछिए।
देह से न्यारा होने का अभ्यास
बाबा कहते –
और कोई भी मुरली नहीं जिसमें यह बात ना हो
कि बच्चे देह से न्यारे होकर अनुभव करो।
हर मुरली में बाबा हमें स्मृति दिलाते हैं –
दे और दे के सब संबंधों को भूल मुझ एक बाप को याद करो।
जब हम समझते हैं कि यह शरीर मेरा नहीं,
ये शरीर भी किसका है? बाबा का है।
तो इंद्रियों का आकर्षण कम होता है।
मुरली है 7 अगस्त 2025:
मीठे बच्चे,
अपनी सतोप्रधान सिद्धि बनाकर
ऐसा अनुभव करो कि तुम इस शरीर से न्यारे आत्मा हो।
एक सेकंड का भी यह अनुभव
तुम्हें अति इंद्रिय सुख का अनुभव कराएगा।
देह से न्यारा आत्मा हूं – यह अनुभव करना है।
और यदि एक सेकंड का भी अनुभव कर लिया,
तो वही तुम्हें अति इंद्रिय सुख का अनुभव कराएगा।
इसमें एक मिनट या एक घंटा नहीं कहा।
एक सेकंड का अनुभव – कई घंटों की शक्ति
14 जनवरी 1982 की मुरली में बाबा कहते हैं:
देश से न्यारा होने का अभ्यास करो।
एक सेकंड का अनुभव भी तुम्हें कई घंटों की शक्ति देगा।
उदाहरण
जैसे आप किसी मित्र के घर जाते हो,
और उनकी चीजों को यूज करते हो,
पर जानते हो कि वह आपकी नहीं है।
वैसे ही इस देह को यूज़ करें
और यह अनुभव करें कि यह मेरी नहीं, यह बाबा की है।
अतीद्रिय सुख की परिभाषा
कोई भी सुख यदि आंख, कान, नाक, मुख या
किसी भी इंद्रिय के माध्यम से प्राप्त होता है
तो वह इंद्रिय सुख है।
अति इंद्रिय सुख वह आनंद है
जो आत्मा को बिना इंद्रियों के प्रयोग के
बाबा की याद में प्राप्त होता है।
बाबा का उदाहरण
बाबा ब्रह्मा की देह में मेहमान के रूप में आते हैं।
पर ना भोजन करते हैं, ना पानी पीते हैं,
ना इंद्रियों से प्रभावित होते हैं।
शरीर को भोगते ही नहीं।
हमें भी
उसी प्रकार मेहमान के रूप में
इस देह का उपयोग करना है।
गूंगे का गुड़ – अनुभव का रहस्य
अती इंद्रिय सुख ऐसा है
जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
22 जून 1970 की मुरली में बाबा ने कहा –
गूंगे का गुड़ चखा तो है,
पर बता नहीं सकता।
अती इंद्रिय सुख भी ऐसा ही है।
इसे केवल अनुभव किया जा सकता है।
वर्णन नहीं।
परिवर्तन का उदाहरण – पवित्रता की धारणा
शुरुआती ब्राह्मण आत्माओं ने
देव आत्माओं का साक्षात्कार किया
और तुरंत पवित्रता की धारणा कर ली।
यह परिवर्तन
गहरे अनुभव से हुआ
जिसमें देह का भान
पूरी तरह समाप्त हो गया।
अभ्यास की कुंजी
बाबा कहते हैं –
एक सेकंड का अनुभव हो जाए,
तो उसे मल्टी सेकंड तक बढ़ा सकते हो।
धीरे-धीरे यह सेकंड
स्थाई अनुभव में बदल जाएगा।
अवगुण मिटाने का राज
अवगुण नासूर जैसा है।
इसे निकालने के लिए
गहरी आत्मिक अवस्था में जाना होगा।
7 जुलाई 1975 की मुरली:
अवगुण नासूर की तरह है।
जितना गहराई में धारण किया है,
उससे अधिक गहराई में जाकर ही उसे निकाला जा सकता है।
12 जनवरी 1971 की मुरली:
साक्षात्कार से आत्मा में पवित्रता की धारणा हो जाती है।
उस सेकंड में लिया गया संकल्प
कभी डगमग नहीं होता।
निष्कर्ष
अति इंद्रिय सुख कोई साधारण ध्यान नहीं,
बल्कि देह से परे परमात्मा की याद में स्थित
आत्मिक अनुभव है।
इसे वर्णन नहीं किया जा सकता।
केवल जिया जा सकता है।
26 अगस्त 2025 की मुरली में बाबा कहते हैं –
बच्चे, देह का भान छोड़
आत्मिक स्थिति में स्थित हो
अति इंद्रिय सुख का अनुभव करो।
अति इंद्रिय सुख कोई कल्पना नहीं,
यह आत्मा का स्वाभाविक आनंद है।
बस हमें देह से न्यारे होकर
आत्मा स्वरूप का अनुभव करना है।
तभी बाबा कहते हैं –
देह में रहते देश से न्यारी बनो।
यही सहज राज योग का रहस्य है।