MURLI 08-12-2025 |BRAHMA KUMARIS

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Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

08-12-2025
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – जब तक जीना है बाप को याद करना है, याद से ही आयु बढ़ेगी, पढ़ाई का तन्त (सार) ही है याद”
प्रश्नः- तुम बच्चों का अतीन्द्रिय सुख गाया हुआ है, क्यों?
उत्तर:- क्योंकि तुम सदा ही बाबा की याद में खुशियाँ मनाते हो, अभी तुम्हारी सदा ही क्रिसमस है। तुम्हें भगवान पढ़ाते हैं, इससे बड़ी खुशी और क्या होगी, यह रोज़ की खुशी है इसलिए तुम्हारा ही अतीन्द्रिय सुख गाया हुआ है।
गीत:- नयन हीन को राह दिखाओ प्रभू……

ओम् शान्ति। ज्ञान का तीसरा नेत्र देने वाला रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझाते हैं। ज्ञान का तीसरा नेत्र सिवाए बाप के कोई दे नहीं सकता। तो अभी बच्चों को ज्ञान का नेत्र मिला है। अभी बाप ने समझाया है कि भक्ति मार्ग है ही अन्धियारा मार्ग। जैसे रात में सोझरा नहीं होता है तो मनुष्य धक्के खाते हैं। गाया भी जाता है ब्रह्मा की रात, ब्रह्मा का दिन। सतयुग में यह नहीं कहेंगे कि हमको राह बताओ क्योंकि अभी तुमको राह मिल रही है। बाप आकरके मुक्तिधाम और जीवनमुक्ति धाम की राह बता रहे हैं। अभी तुम पुरुषार्थ कर रहे हो। अभी जानते हो कि बाकी थोड़ा समय है, दुनिया तो बदलने वाली है। यह तो गीत भी बने हुए हैं दुनिया बदलने वाली है…. परन्तु मनुष्य बिचारे जानते नहीं हैं कि दुनिया कब बदलनी है, कैसे बदलनी है, कौन बदलाते हैं क्योंकि तीसरा नेत्र तो ज्ञान का है नहीं। अभी तुम बच्चों को यह तीसरा नेत्र मिला है जिससे तुम इस सृष्टि चक्र के आदि-मध्य-अन्त को जान गये हो। और यही तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान की सैक्रीन है। जैसे थोड़ी-सी सैक्रीन बहुत मीठी होती है वैसे यह ज्ञान के दो अक्षर ‘मनमनाभव….’ यही सबसे मीठी चीज़ है, बस बाप को याद करो।

बाप आते हैं और आकरके रास्ता बताते हैं। कहाँ का रास्ता बताते हैं? शान्तिधाम और सुखधाम का। तो बच्चों को खुशी होती है। दुनिया नहीं जानती है कि खुशियाँ कब मनाई जाती हैं? खुशियाँ तो नई दुनिया में मनाई जायेंगी ना। यह तो बिल्कुल कॉमन बात है कि पुरानी दुनिया में खुशियाँ कहाँ से आई? पुरानी दुनिया में मनुष्य त्राहि-त्राहि कर रहे हैं क्योंकि तमोप्रधान हैं। तमोप्रधान दुनिया में खुशियाँ कहाँ से आई? सतयुग का ज्ञान तो कोई में भी नहीं है, इसलिए बिचारे यहाँ खुशियां मनाते रहते हैं। देखो, क्रिसमस की खुशियां भी कितनी मनाते हैं। बाबा तो कहते हैं कि अगर खुशियों की बात पूछनी हो तो गोप-गोपियों से (मेरे बच्चों से) पूछो क्योंकि बाप बहुत सहज रास्ता बता रहे हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए, अपने धन्धेधोरी का कर्तव्य करते हुए कमल फूल के समान रहो और मुझे याद करो। जैसे आशिक-माशूक होते हैं ना, वह भी धन्धाधोरी करते एक-दो को याद करते रहते हैं। उनको साक्षात्कार भी होते हैं जैसे लैला-मजनू, हीरा-रांझा, वो विकार के लिए एक-दो के आशिक नहीं होते हैं। उनका प्यार गाया हुआ है। उसमें एक-दो के आशिक होते हैं। लेकिन यहाँ वह बात नहीं है। यहाँ तो तुम जन्म-जन्मान्तर उस माशूक के आशिक ही रहे हो। वह माशूक तुम्हारा आशिक नहीं है। तुम उनको बुलाते हो यहाँ आने के लिए, हे भगवान नयन हीन को आकरके राह बताओ। तुमने आधाकल्प बुलाया है। जब दु:ख ज्यादा होता है तो जास्ती बुलाते हैं। जास्ती दु:ख में जास्ती सिमरण करने वाले भी होते हैं। देखो, अभी कितने याद करने वाले ढेर के ढेर हैं। गाया हुआ है ना – दु:ख में सिमरण सब करें…… जितना देरी होती जाती है, उतना तमोप्रधान ज्यादा होते जाते हैं। तो तुम चढ़ रहे हो, वह और ही उतर रहे हैं क्योंकि जब तक विनाश हो तब तक तमोप्रधानता वृद्धि को पाती रहती है। दिन-प्रतिदिन माया भी तमोप्रधान, वृद्धि को पाती जाती है। इस समय बाप भी सर्वशक्तिमान् है, तो माया भी फिर सर्वशक्तिमान् इस समय में है। वह भी जबरदस्त है।

तुम बच्चे इस समय ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण कुल भूषण हो। तुम्हारा है सर्वोत्तम कुल, इसको कहा जाता है ऊंच ते ऊंच कुल। इस समय तुम्हारा यह जीवन अमूल्य है इसलिए इस जीवन की (शरीर की) सम्भाल भी करनी चाहिए क्योंकि पांच विकारों के कारण शरीर की भी आयु तो कमती होती जाती है ना। तो बाबा कहते हैं इस समय पांच विकारों को छोड़कर योग में रहो तो आयु बढ़ती रहेगी। आयु बढ़ते-बढ़ते भविष्य में तुम्हारी आयु 150 वर्ष की हो जायेगी। अभी नहीं इसलिए बाप कहते हैं कि इस शरीर की भी बहुत सम्भाल रखनी चाहिए। नहीं तो कहते हैं यह शरीर काम का नहीं है, मिट्टी का पुतला है। अभी तुम बच्चों को समझ मिलती है कि जब तक जीना है बाबा को याद करना है। आत्मा बाबा को याद करती है – क्यों? वर्से के लिए। बाप कहते हैं तुम अपने को आत्मा समझकर बाप को याद करो और दैवी गुण धारण करो तो तुम फिर ऐसे बन जायेंगे। तो बच्चों को पढ़ाई अच्छी तरह पढ़नी चाहिए। पढ़ाई में सुस्ती आदि नहीं करनी चाहिए नहीं तो नापास हो जायेंगे। बहुत कम पद पायेंगे। पढ़ाई में भी मुख्य बात यह है जिसको तन्त कहा जाता है कि बाप को याद करो। जब प्रदर्शनी में या सेन्टर पर कोई भी आते हैं तो उनको पहले-पहले यह समझाओ कि बाबा को याद करो क्योंकि वह ऊंच ते ऊंच है। तो ऊंचे ते ऊंचे को ही याद करना चाहिए, उनसे कम को थोड़ेही याद करना चाहिए। कहते हैं ऊंचे से ऊंचा भगवान। भगवान ही तो नई दुनिया की स्थापना करने वाले हैं। देखो, बाप भी कहते हैं नई दुनिया की स्थापना मैं करता हूँ इसलिए तुम मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कट जायें। तो यह पक्का याद कर लो क्योंकि बाप पतित-पावन है ना। वह यही कहते हैं कि जब तुम मुझे पतित-पावन कहते हो तो तुम तमोप्रधान हो, बहुत पतित हो, अभी तुम पावन बनो।

बाप आकरके बच्चों को समझाते हैं कि तुम्हारे अभी सुख के दिन आने वाले हैं, दु:ख के दिन पूरे हुए हैं, पुकारते भी हो – हे दु:ख हर्ता, सुख दाता। तो जानते तो हो ना कि बरोबर सतयुग में सब सुखी ही सुखी हैं। तो बाप बच्चों को कहते हैं कि सभी शान्तिधाम और सुखधाम को याद करते रहो। यह है संगमयुग, खिवैया तुमको पार ले जाते हैं। बाकी इसमें कोई खिवैया या नईया की बात है नहीं। यह तो महिमा कर देते हैं कि नईया को पार लगाओ। अब एक की नईया तो पार नहीं लगनी है ना। सारे दुनिया की नईया को पार लगाना है। यह सारी दुनिया जैसे एक बहुत बड़ा जहाज है इनको पार लगाते हैं। तो तुम बच्चों को बहुत खुशी मनानी चाहिए क्योंकि तुम्हारे लिए सदैव खुशी है, सदैव क्रिसमस है। जब से तुम बच्चों को बाप मिला है तुम्हारी क्रिसमस सदैव है इसलिए अतीन्द्रिय सुख गाया हुआ है। देखो, यह सदैव खुश रहते हैं, क्यों? अरे बेहद का बाप मिला है! वह हमको पढ़ा रहे हैं। तो यह रोज़ की खुशी होनी चाहिए ना। बेहद का बाप पढ़ा रहे हैं वाह! कभी कोई ने सुना? गीता में भी भगवानुवाच है कि मैं तुमको राजयोग सिखलाता हूँ, जैसे वह लोग बैरिस्टरी योग, सर्जनरी योग सिखलाते हैं, मैं तुम रूहानी बच्चों को राजयोग सिखाता हूँ। तुम यहाँ आते हो तो बरोबर राजयोग सीखने आते हो ना। मूंझने की तो दरकार नहीं। तो राजयोग सीखकर पूरा करना चाहिए ना। भागन्ती तो नहीं होना चाहिए। पढ़ना भी है तो धारणा भी अच्छी करनी है। टीचर पढ़ाते हैं धारणा करने के लिए।

हर एक की अपनी-अपनी बुद्धि होती है – किसकी उत्तम, किसकी मध्यम, किसकी कनिष्ट। तो अपने से पूछना चाहिए कि मैं उत्तम हूँ, मध्यम हूँ या कनिष्ट हूँ? अपने को आपेही परखना चाहिए कि मैं ऐसे ऊंचे ते ऊंचा इम्तहान पास करके ऊंच पद पाने के लायक हूँ? मैं सर्विस करता हूँ? बाप कहते हैं – बच्चे, सर्विसएबुल बनो, बाबा को फालो करो क्योंकि मैं भी तो सर्विस करता हूँ ना। आया ही हूँ सर्विस करने के लिए और रोज़-रोज़ सर्विस करता हूँ क्योंकि रथ भी तो लिया है ना। रथ भी मज़बूत, अच्छा है और सर्विस तो इनकी सदैव है। बापदादा तो इनके रथ में सदैव है। भले इनका शरीर बीमार पड़ जाये, मैं तो बैठा हूँ ना। तो मैं इनके अन्दर में बैठ करके लिखता भी हूँ, अगर यह मुख से नहीं भी बोल सके तो मैं लिख सकता हूँ। मुरली नहीं मिस होती है। जब तक बैठ सके, लिख सकें, तो मैं मुरली भी बजाता हूँ, बच्चों को लिखकरके भेज देता हूँ क्योंकि सर्विसएबुल हूँ ना। तो बाप आकरके समझाते हैं कि तुम अपने को आत्मा समझ करके निश्चयबुद्धि होकरके सर्विस में लग जाओ। बाप की सर्विस, ऑन गॉड फादरली सर्विस। जैसे वह लिखते हैं ऑन हिज़ मैजिस्टी सर्विस। तो तुम क्या कहेंगे? यह मैजिस्टी से भी ऊंची सर्विस है क्योंकि मैजिस्टी (महाराजा) बनाते हैं। यह भी तुम समझ सकते हो कि बरोबर हम वर्ल्ड का मालिक बनते हैं।

तुम बच्चों में जो अच्छी रीति पुरुषार्थ करते हैं उनको ही महावीर कहा जाता है। तो यह जांच करनी होती है कि कौन महावीर हैं जो बाबा के डायरेक्शन पर चलते हैं। बाप समझाते हैं कि बच्चे अपने को आत्मा समझो, भाई-भाई को देखो। बाप अपने को भाइयों का बाप समझते हैं और भाइयों को ही देखते हैं। सभी को तो नहीं देखेंगे। यह तो ज्ञान है कि शरीर बिगर तो कोई सुन न सके, बोल न सके। तुम तो जानते हो ना कि मैं भी यहाँ शरीर में आया हूँ। मैंने यह शरीर लोन लिया हुआ है। शरीर तो सबको है, शरीर के साथ ही आत्मा यहाँ पढ़ रही है। तो अभी आत्माओं को समझना चाहिए कि बाबा हमको पढ़ा रहे हैं। बाबा की बैठक कहाँ है? अकाल तख्त पर। बाबा ने समझाया है कि हर एक आत्मा अकाल मूर्त है, वह कभी विनाश नहीं होती है, कभी भी जलती, कटती, डूबती नहीं है। छोटी-बड़ी नहीं होती है। शरीर छोटा-बड़ा होता है। तो दुनिया में जो भी मनुष्य मात्र हैं, उनमें जो आत्मायें हैं उनका तख्त यह भ्रकुटी है। शरीर भिन्न-भिन्न हैं। किसका अकाल तख्त पुरुष का, किसका स्त्री का, किसका बच्चे का। तो जब भी किससे बात करो तो यही समझो कि हम आत्मा हैं, अपने भाई से बात करते हैं। बाप का पैगाम देते हैं कि शिवबाबा को याद करो तो यह जो जंक लगी हुई है वह निकल जाये। जैसे सोने में अलाए पड़ती है तो वैल्यु कम होती है तो तुम्हारी भी वैल्यु कम हो गई है। अभी बिल्कुल ही वैल्यु लेस हो गये हैं। इसको देवाला भी कहा जाता है। भारत कितना धनवान था, अभी कर्जा उठाते रहते हैं। विनाश में तो सबका पैसा खत्म हो जायेगा। देने वाले, लेने वाले सभी खत्म हो जायेंगे बाकी जो अविनाशी ज्ञान रत्न लेने वाले हैं वह फिर आकर अपना भाग्य लेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) ‘बाप को फालो कर बाबा के समान सर्विसएबुल बनना है। अपने को आपेही परखना है कि मैं ऊंचे से ऊंचा इम्तहान पास करके ऊंच पद पाने के लायक हूँ?

2) ‘बाबा के डायरेक्शन पर चलकर महावीर बनना है, जैसे बाबा आत्माओं को देखते हैं, आत्माओं को पढ़ाते हैं, ऐसे आत्मा भाई-भाई को देखकर बात करनी है।

वरदान:- श्रेष्ठता के आधार पर समीपता द्वारा कल्प की श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने वाले विशेष पार्टधारी भव
इस मरजीवा जीवन में श्रेष्ठता का आधार दो बातें हैं-1-सदा परोपकारी रहना। 2-बाल ब्रह्मचारी रहना। जो बच्चे इन दोनों बातों में आदि से अन्त तक अखण्ड रहे हैं, किसी भी प्रकार की पवित्रता अर्थात् स्वच्छता बार-बार खण्डित नहीं हुई है तथा विश्व के प्रति और ब्राह्मण परिवार के प्रति जो सदा उपकारी हैं ऐसे विशेष पार्टधारी बाप-दादा के सदा समीप रहते हैं और उनकी प्रालब्ध सारे कल्प के लिए श्रेष्ठ बन जाती है।
स्लोगन:- संकल्प व्यर्थ हैं तो दूसरे सब खजाने भी व्यर्थ हो जाते हैं।

 

अव्यक्त इशारे – अब सम्पन्न वा कर्मातीत बनने की धुन लगाओ

कर्मातीत स्थिति का अनुभव करने के लिए ज्ञान सुनने सुनाने के साथ अब ब्रह्मा बाप समान न्यारे अशरीरी बनने के अभ्यास पर विशेष अटेन्शन दो। जैसे ब्रह्मा बाप ने साकार जीवन में कर्मातीत होने के पहले न्यारे और प्यारे रहने के अभ्यास का प्रत्यक्ष अनुभव कराया। सेवा को वा कोई कर्म को छोड़ा नहीं लेकिन न्यारे हो लास्ट दिन भी बच्चों की सेवा समाप्त की, ऐसे फालो फादर करो।

प्रश्न 1. तुम बच्चों का अतीन्द्रिय सुख दुनिया में क्यों गाया जाता है?

उत्तर:
क्योंकि तुम सदा ही बाबा की याद में रहते हो और रोज़-रोज़ की खुशी मनाते हो। जबसे बेहद का बाप मिला है, तुम्हारा हर दिन क्रिसमस है। भगवान तुम्हें स्वयं पढ़ा रहे हैं—इससे बड़ा सुख कोई हो ही नहीं सकता। इसलिए तुम्हारा अतीन्द्रिय सुख दुनिया में गाया हुआ है।


प्रश्न 2. बाप बच्चों को कौन-सा नेत्र देते हैं जो कोई और नहीं दे सकता?

उत्तर:
बाबा ज्ञान का तीसरा नेत्र देते हैं। इसी नेत्र से आत्मा सृष्टि चक्र, कर्मों का हिसाब, स्वधर्म और परमधाम का रास्ता जान पाती है। यह नेत्र सिर्फ रूहानी बाप ही दे सकते हैं।


प्रश्न 3. भक्ति मार्ग को ‘अन्धियारा मार्ग’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
क्योंकि भक्ति में सच्चा ज्ञान नहीं होता। जैसे अंधेरे में राह नहीं दिखती, वैसे ही भक्ति में मनुष्य धक्के खाते रहते हैं—ना आत्मा का ज्ञान, ना ईश्वर की पहचान, ना सृष्टि चक्र का बोध। इसलिए इसे अन्धियारा मार्ग कहा गया है।


प्रश्न 4. बाबा को याद करने से आयु क्यों बढ़ती है?

उत्तर:
क्योंकि पाँच विकार आत्मा और शरीर दोनों की शक्ति को कम करते हैं। जब आत्मा बाबा को याद करती है, पाप कटते हैं, मन-इन्द्रियाँ शांत होती हैं और शरीर पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। योगबल से आयु स्वाभाविक रूप से बढ़ती है।


प्रश्न 5. पढ़ाई का ‘तन्त’ या मुख्य सार क्या है?

उत्तर:
मुख्य सार है—“बाबा को याद करना।”
ज्ञान सुनना, सेवा करना—सब तब ही सफल होते हैं जब याद रहती है। याद ही पाप नाश करती है और देवगति बनाती है।


प्रश्न 6. बाबा कहते हैं कि तुम सदा क्रिसमस मनाते हो—इसका क्या अर्थ है?

उत्तर:
दुनिया खुशी त्यौहार पर एक दिन मनाती है, परन्तु तुम बच्चों को रोज़ की खुशी है क्योंकि स्वयं भगवान मिल गए हैं और हर दिन तुम्हें राजयोग सिखाते हैं। इसलिए तुम्हारी खुशी सदैव रहने वाली है।


प्रश्न 7. महावीर कौन कहलाते हैं?

उत्तर:
जो बच्चे बाबा के डायरेक्शन पर पूरा-पूरा चलते हैं, अपने को आत्मा समझकर सेवा में लगते हैं, सर्विसएबुल बनते हैं—वे महावीर कहलाते हैं।


प्रश्न 8. बापदादा बच्चों को क्यों कहते हैं कि ‘अपने को आपेही परखो’?

उत्तर:
क्योंकि हर आत्मा को देखना है कि वह उत्तम है, मध्यम है या कनिष्ठ। क्या मैं ऊंच पद पाने के लायक पुरुषार्थ कर रहा हूँ? क्या मैं बाबा को फॉलो करता हूँ? आत्म-चेकिंग ही प्रगति का आधार है।


प्रश्न 9. बाबा को क्यों कहा जाता है ‘पतित-पावन’?

उत्तर:
क्योंकि वही एक हैं जो आत्माओं का पाप नाश करते हैं। आत्मा तमोप्रधान से सतोप्रधान सिर्फ बाबा की याद से बनती है। इसलिए उन्हें पतित-पावन कहा गया है।


प्रश्न 10. आत्माओं का असली ‘अकाल तख्त’ कहाँ है?

उत्तर:
हर आत्मा का अकाल तख्त भ्रकुटी (दोनों भौंहों के बीच) है। वहीं आत्मा का सीट है, जहाँ से आत्मा शरीर को संचालित करती है। आत्मा अविनाशी है—ना कटती है, ना जलती है।


धारणा के लिए प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 11. ‘बाबा के समान सर्विसएबुल’ कैसे बनें?

उत्तर:
बाप की तरह हर समय सेवा में रहो—सोच, बोल, कर्म से। सेवा में भागन्ती नहीं करनी। स्थिरता, निश्चय और फॉलो-फादर यही सर्विसएबिलिटी है।


प्रश्न 12. आत्मा-भाई-भाई की दृष्टि क्यों रखनी है?

उत्तर:
क्योंकि इससे देह-अभिमान समाप्त होता है, स्मृति रहती है कि हम सभी एक ही परमपिता परमात्मा की संतान हैं। यही विरासत और पवित्रता की बुनियाद है।


वरदान आधारित प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 13. श्रेष्ठ प्रालब्ध का आधार क्या है?

उत्तर:
दो बातें—

  1. सदा परोपकारी रहना।

  2. बाल ब्रह्मचारी रहना (पवित्रता में अखण्डता)।
    जो इन दोनों में स्थिर रहते हैं, वे सदा बाप के समीप रहते हैं और पूरे कल्प के लिए श्रेष्ठ प्रालब्ध प्राप्त करते हैं।


प्रश्न 14. यदि संकल्प व्यर्थ हैं तो नुकसान क्या होता है?

उत्तर:
यदि संकल्प व्यर्थ होते हैं, तो बाकी सभी खजाने—समय, मन, शक्ति, सेवा, ज्ञान—सब व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिए व्यर्थ संकल्प सबसे बड़ा घाटा है।

Disclaimer (डिस्क्लेमर) इस वीडियो का उद्देश्य यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज की साकार/अव्यक्त मुरली के आध्यात्मिक सार, ईश्वरीय शिक्षाओं और आत्म उन्नति पर आधारित मनन-चिंतन प्रस्तुत करता है। यह किसी व्यक्ति, समाज, धर्म या समुदाय की आलोचना नहीं करता।

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