MURLI 11-04-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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11-04-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“ अन्तर्मुखी बच्चेबच्चे – ज्ञान रूप अवस्था में रहकर इन महावाक्यों को धारण करो तब अपना व अन्य आत्माओं का कल्याण कर सकेंगे ” ( दादियों की डायरी से )
प्रश्नः- सर्वोत्तम सच्ची सर्विस कौन सी है? यथार्थ सर्विस का सूक्ष्म और महीन राज़ क्या है?
उत्तर:- जब किसी से कोई भूल होती है तो उसे सावधान करने के साथ सूक्ष्म रीति से अपनी योग शक्ति उन तक पहुंचा-कर उनके अशुद्ध संकल्पों को भस्म करना, यही सर्वोत्तम सच्ची सर्विस है। साथ-साथ अपने ऊपर भी अटेन्शन देना, मन्सा में भी कोई अशुद्ध संकल्प उत्पन्न न हो। इसमें खुद भी सावधान रहना और दूसरों प्रति ऐसी दिव्य सर्विस करना, यही सर्विस का सूक्ष्म और महीन राज़ है।

ओम् शान्ति। हर एक पुरुषार्थी बच्चे को पहले अन्तर्मुख अवस्था अवश्य धारण करनी है। अन्तर्मुखता में बड़ा ही कल्याण समाया हुआ है, इस अवस्था से ही अचल, स्थिर, धैर्यवत, निर्मान-चित्त इत्यादि दैवी गुणों की धारणा हो सकती है तथा सम्पूर्ण ज्ञानमय अवस्था प्राप्त हो सकती है। अन्तर्मुख न होने के कारण वह सम्पूर्ण ज्ञान रूप अवस्था नहीं प्राप्त होती क्योंकि जो भी कुछ “महावाक्य” सम्मुख सुने जाते हैं, अगर उसे गहराई में जाकर ग्रहण नहीं करते सिर्फ उन महावाक्यों को सुनकर रिपीट कर देते हैं तो वह महावाक्य, वाक्य हो जाते हैं। जो ज्ञान रूप अवस्था में रहकर महावाक्य नहीं सुने जाते, उन महावाक्यों पर माया का परछाया पड़ जाता है। अब ऐसी माया के अशुद्ध वायब्रेशन से भरे हुए महावाक्य सुनकर सिर्फ रिपीट करने से खुद सहित औरों का कल्याण होने के बदले अकल्याण हो जाता है इसलिए हे बच्चों एकदम अन्तर्मुखी बन जाओ।

आपका यह मन मन्दिर सदृश्य है। जैसे मन्दिर से सदैव खुशबू आती है ऐसे मन मन्दिर जब पवित्र बनता है तो संकल्प भी पवित्र इमर्ज होते हैं। जैसे मन्दिर में सिर्फ पवित्र देवी देवताओं के ही चित्र रखे जाते हैं, न कि दैत्यों के। ऐसे तुम बच्चे अपने मन व दिल रूपी मन्दिर को सर्व ईश्वरीय गुणों की मूर्तियों से सजा दो, वे गुण हैं – निर्मोह, निर्लोभ, निर्भय, धैर्यवत, निरंहकार इत्यादि क्योंकि यह सब तुम्हारे ही दिव्य लक्षण हैं। आप बच्चों को अपने मन मन्दिर को उजियारा अर्थात् सम्पूर्ण शुद्ध बनाना है। जब मन मन्दिर उजियारा बनें तब ही अपने उजियारे प्यारे वैकुण्ठ देश में चल सकें। तो अब अपने मन को उज्वल बनाने का प्रयत्न करना है तथा मन सहित विकारी कर्मेन्द्रियों को वश करना है। परन्तु न सिर्फ अपना मगर अन्य प्रति भी यही दिव्य सर्विस करनी है।

वास्तव में सर्विस का अर्थ अति सूक्ष्म और महीन है। ऐसा नहीं कि किसकी भूल पर सिर्फ सावधान करना इतने तक सर्विस है। परन्तु नहीं, उनको सूक्ष्म रीति अपनी योग की शक्ति पहुंचाए उनके अशुद्ध संकल्प को भस्म कर देना, यही सर्वोत्तम सच्ची सर्विस है और साथ-साथ अपने ऊपर भी अटेन्शन रखना है। न सिर्फ वाचा अथवा कर्मणा तक मगर मन्सा में भी कोई अशुद्ध संकल्प उत्पन्न होता है तो उनका वायब्रेशन अन्य के पास जाए सूक्ष्म रीति अकल्याण करता है, जिसका बोझ खुद पर आता है और वही बोझ बन्धन बन जाता है इसलिए हे बच्चों खुद सावधान रहो फिर अन्य प्रति वही दिव्य सर्विस करो, यही आप सेवाधारी बच्चों का अलौकिक कर्तव्य है। ऐसी सर्विस करने वालों को फिर अपने प्रति कोई भी सर्विस नहीं लेनी है। भल कभी कोई अनायास भूल हो भी जाए तो उसे अपने बुद्धियोग बल से सदैव के लिए करेक्ट कर देना है। ऐसा तीव्र पुरुषार्थी थोड़ा भी ईशारा मिलने से शीघ्र महसूस करके परिवर्तन कर लेता है और आगे के लिए अच्छी रीति अटेन्शन रख चलता है, यही विशाल बुद्धि बच्चों का कर्तव्य है।

हे मेरे प्राणों, परमात्मा द्वारा रचे हुए इस अविनाशी राजस्व ज्ञान यज्ञ प्रति तन, मन, धन को सम्पूर्ण रीति से स्वाहा करने का राज़ बहुत महीन है। जिस घड़ी आप कहते हो कि मैं तन मन धन सहित यज्ञ में स्वाहा अर्थात् अर्पण हो मर चुका, उस घड़ी से लेकर अपना कुछ भी नहीं रहता। उसमें भी पहले तन, मन को सम्पूर्ण रीति से सर्विस में लगाना है। जब सब कुछ यज्ञ अथवा परमात्मा के प्रति है तो फिर अपने प्रति कुछ रह नहीं सकता, धन भी व्यर्थ नहीं गंवा सकते। मन भी अशुद्ध संकल्प विकल्प तरफ दौड़ नहीं सकता क्योंकि परमात्मा को अर्पण कर दिया। अब परमात्मा तो है ही शुद्ध शान्त स्वरूप। इस कारण अशुद्ध संकल्प स्वत: शान्त हो जाते हैं। अगर मन माया के हाथ में दे देते हो तो माया वैरायटी रूप होने के कारण अनेक प्रकारों के विकल्प उत्पन्न कर मन रूपी घोड़े पर आए सवारी करती है। अगर किसी बच्चे को अभी तक भी संकल्प विकल्प आते हैं तो समझना चाहिए कि अभी मन पूर्ण रीति से स्वाहा नहीं हुआ है अर्थात् ईश्वरीय मन नहीं बना है इसलिए हे सर्व त्यागी बच्चों, इन गुह्य राज़ों को समझ कर्म करते साक्षी हो खुद को देख बहुत खबरदारी से चलना है।

स्वयं गोपी वल्लभ तुम अपने प्रिय गोप गोपियों को समझा रहे हैं कि तुम हर एक का वास्तविक सच्चा प्रेम कौन सा है! हे प्राणों तुम्हें एक दो की प्रेम भरी सावधानी को स्वीकार करना है क्योंकि जितना प्रिय फूल उतना ही श्रेष्ठ परवरिश। फूल को वैल्युबुल बनाने अर्थ माली को कांटों से निकालना ही पड़ता है। वैसे तुम्हें भी जब कोई सावधानी देता है तो समझना चाहिए जैसेकि उसने मेरी परवरिश की अर्थात् मेरी सर्विस की। उस सर्विस अथवा परवरिश को रिगार्ड देना है, यही सम्पूर्ण बनने की युक्ति है। यही ज्ञान सहित आन्तरिक सच्चा प्रेम है। इस दिव्य प्रेम में एक दो के लिए बहुत रिगार्ड होना चाहिए। हर एक बात में पहले खुद को ही सावधान करना है, यही निर्माणचित अति मधुर अवस्था है। ऐसे प्रेम पूर्वक चलने से तुम्हें जैसे यहाँ ही वे सतयुग के सुहावने दिन आन्तरिक महसूस होंगे। वहाँ तो यह प्रेम नेचुरल रहता है परन्तु इस संगम के स्वीटेस्ट समय पर एक दो के लिए सर्विस करने का यह अति मीठा रमणीक प्रेम है, यही शुद्ध प्रेम जग में गाया हुआ है।

तुम हर एक चैतन्य फूलों को हरदम हर्षित मुख हो रहना है क्योंकि निश्चय बुद्धि होने के कारण तुम्हारी नस नस में सम्पूर्ण ईश्वरीय ताकत समाई हुई है। ऐसी आकर्षण शक्ति अपना दिव्य चमत्कार अवश्य निकालती है। जैसे छोटे निर्दोष बच्चे शुद्ध पवित्र होने कारण सदैव हंसते रहते हैं और अपने रमणीक चरित्र से सबको बहुत खींचते हैं। वैसे तुम हर एक की ऐसी ईश्वरीय रमणीक जीवन होनी चाहिए, इसके लिए तुम्हें किसी भी युक्ति से अपने आसुरी स्वभावों पर जीत प्राप्त करनी है। जब कोई को देखो कि यह क्रोध विकार के वश हो मेरे सामने आता है तो उनके सामने ज्ञान रूप हो बचपन की मीठी रीति से मुस्कराते रहो तो वह खुद शान्तचत हो जायेगा अर्थात् विस्मृति स्वरूप से स्मृति में आ जायेगा। भल उनको पता न भी पड़े लेकिन सूक्ष्म रीति से उनके ऊपर जीत पाकर मालिक बन जाना, यही मालिक और बालकपन की सर्वोच्च शिरोमणि विधि है।

ईश्वर जैसे सम्पूर्ण ज्ञान रूप वैसे फिर सम्पूर्ण प्रेम रूप भी है। ईश्वर में दोनों ही क्वालिटीज़ समाई हुई हैं परन्तु फर्स्ट ज्ञान, सेकण्ड प्रेम। अगर कोई पहले ज्ञान रूप बनने बिगर सिर्फ प्रेम रूप बन जाता है तो वह प्रेम अशुद्ध खाते में ले जाता है इसलिए प्रेम को मर्ज कर पहले ज्ञान रूप बन भिन्न-भिन्न रूपों में आई हुई माया पर जीत पाकर पीछे प्रेम रूप बनना है। अगर ज्ञान बिगर प्रेम में आये तो कहाँ विचलित भी हो जायेंगे। जैसे अगर कोई ज्ञान रूप बनने के बिगर ध्यान में जाते हैं तो कई बार माया में फंस जाते हैं, इसलिए बाबा कहते हैं बच्चे, यह ध्यान भी एक सूत की जंजीर है परन्तु ज्ञान रूप बन पीछे ध्यान में जाने से अति मौज का अनुभव होता है। तो पहले है ज्ञान पीछे है ध्यान। ध्यानिष्ट अवस्था से ज्ञानिष्ट अवस्था श्रेष्ठ है इसलिए हे बच्चों, पहले ज्ञान रूप बन फिर प्रेम इमर्ज करना है। ज्ञान बिगर सिर्फ प्रेम इस पुरुषार्थी जीवन में विघ्न डालता है।

साक्षीपन की अवस्था अति मीठी, रमणीक और सुन्दर है। इस अवस्था पर ही आगे की जीवन का सारा मदार है। जैसे कोई के पास कोई शारीरिक भोगना आती है। उस समय अगर वह साक्षी, सुखरूप अवस्था में उपस्थित हो उसे भोगता है तो पास्ट कर्मों को भोग चुक्तू भी करता है और साथ साथ फ्युचर के लिए सुख का हिसाब भी बनाता है। तो यह साक्षीपन की सुखरूप अवस्था पास्ट और फ्युचर दोनों से कनेक्शन रखती है। तो इस राज़ को समझने से कोई भी ऐसे नहीं कहेगा कि मेरा यह सुहावना समय सिर्फ चुक्तू करने में चला गया। नहीं, यही सुहावना पुरुषार्थ का समय है जिस समय दोनों कार्य सम्पूर्ण रीति सिद्ध होते हैं। ऐसे दोनों कार्य को सिद्ध करने वाला तीव्र पुरुषार्थी ही अतीन्द्रिय सुख वा आनंद के अनुभव में रहता है।

इस वैरायटी विराट ड्रामा की हर एक बात में तुम बच्चों को सम्पूर्ण निश्चय होना चाहिए क्योंकि यह बना बनाया ड्रामा बिल्कुल वफादार है। देखो, यह ड्रामा हर एक जीव प्राणी से उनका पार्ट पूर्ण रीति से बजवाता है। भल कोई रांग है, तो वह रांग पार्ट भी पूर्ण रीति से बजाता है। यह भी ड्रामा की नूंध है। जब रांग और राइट दोनों ही प्लैन में नूंधे हुए हैं तो फिर कोई बात में संशय उठाना, यह ज्ञान नहीं है क्योंकि हर एक एक्टर अपना-अपना पार्ट बजा रहा है। जैसे बाइसकोप में अनेक भिन्न-भिन्न नाम रूप-धारी एक्टर्स अपनी-अपनी एक्टिंग करते हैं तो उनको देख, किससे नफरत आवे और किससे हर्षित होवे, ऐसा नहीं होता है। पता है कि यह एक खेल है, जिसमें हर एक को अपना अपना गुड वा बेड पार्ट मिला हुआ है। वैसे ही इस अनादि बने हुए बाइसकोप को भी साक्षी हो एकरस अवस्था से हर्षितमुख हो देखते रहना है। संगठन में यह प्वाइंट बहुत अच्छी रीति धारण करनी है। एक दो को ईश्वरीय रूप से देखना है, महसूसता का ज्ञान उठाए सर्व ईश्वरीय गुणों की धारणा करनी है। अपने लक्ष्य स्वरूप की स्मृति से शान्त चित्त, निर्मान-चित्त, धैर्यवत, मिठास, शीतलता इत्यादि सर्व दैवी गुण इमर्ज करने हैं।

धैर्यवत अवस्था धारण करने का मुख्य फाउण्डेशन – वेट एण्ड सी। हे मेरे प्रिय बच्चों, वेट अर्थात् धैर्य धरना, सी अर्थात् देखना। अपने दिल भीतर पहले धैर्यवत गुण धारण कर उसके बाद फिर बाहर में विराट ड्रामा को साक्षी हो देखना है। जब तक कोई भी राज़ सुनने का समय समीप आवे तब तक धैर्यवत गुण की धारणा करनी है। समय आने पर उस धैर्यता के गुण से राज़ सुनने में कभी भी विचलित नहीं होंगे इसलिए हे पुरुषार्थी प्राणों, जरा ठहरो और आगे बढ़कर राज़ देखते चलो। इस ही धैर्यवत अवस्था से सारा कर्तव्य सम्पूर्ण रीति से सिद्ध होता है। यह गुण निश्चय से बांधा हुआ है। ऐसे निश्चयबुद्धि साक्षी दृष्टा हो हर खेल को हर्षित चेहरे से देखते आन्तरिक धैर्यवत और अडोल-चित्त रहते हैं, यही ज्ञान की परिपक्व अवस्था है जो अन्त में सम्पूर्णता के समय प्रैक्टिकल में रहती है इसलिए बहुत समय से लेकर इस साक्षीपन की अवस्था में स्थित रहने का परिश्रम करना है।

जैसे नाटक में एक्टर को अपना मिला हुआ पार्ट पूर्ण बजाने अर्थ आगे से ही रिहर्सल करनी पड़ती है, वैसे तुम प्रिय फूलों को भी आने वाली भारी परीक्षाओं में योग बल द्वारा पास होने के लिए आगे से ही रिहर्सल अवश्य करनी है। लेकिन बहुत समय से लेकर अगर यह पुरुषार्थ किया हुआ नहीं होगा तो उस समय घबराहट में फेल हो जायेंगे, इसलिए पहला अपना ईश्वरीय फाउण्डेशन पक्का रख दैवीगुणधारी बन जाना है।

ज्ञान स्वरूप स्थिति में स्थित रहने से स्वत: शान्त रूप अवस्था हो जाती है। जब ज्ञानी तू आत्मा बच्चे, इकट्ठे बैठकर मुरली सुनते हैं तो चारों तरफ शान्ति का वायुमण्डल बन जाता है क्योंकि वे कुछ भी महावाक्य सुनते हैं तो आन्तरिक डीप चले जाते हैं। डीप जाने के कारण आन्तरिक उन्हों को शान्ति की मीठी महसूसता होती है। अब इसके लिए कोई खास बैठकर मेहनत नहीं करनी है परन्तु ज्ञान की अवस्था में स्थित रहने से यह गुण अनायास आ जाता है। तुम बच्चे जब सवेरे सवेरे उठकर एकान्त में बैठते हो तो शुद्ध विचारों रूपी लहरें उत्पन्न होती हैं, उस समय बहुत उपराम अवस्था होनी चाहिए। फिर अपने निज़ शुद्ध संकल्प में स्थित होने से अन्य सब संकल्प आपेही शान्त हो जायेंगे और मन अमन हो जायेगा क्योंकि मन को वश करने अर्थ भी कोई ताकत तो अवश्य चाहिए इसलिए पहले अपने लक्ष्य स्वरूप के शुद्ध संकल्प को धारण करो। जब आन्तरिक बुद्धियोग कायदे प्रमाण होगा तो तुम्हारी यह निरसंकल्प अवस्था स्वत: हो जायेगी। अच्छा!

मीठे-मीठे ज्ञान गुल्जारी, ज्ञान सितारों प्रति यादप्यार, गुडमार्निंग और नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपने लक्ष्य स्वरूप की स्मृति से शान्त चित्त, निर्मान चित्त, धैर्यवत, मिठास, शीतलता आदि सर्व दैवी गुण धारण करने है।

2) निश्चयबुद्धि साक्षी दृष्टा हो इस खेल को हर्षित चेहरे से देखते आन्तरिक धैर्यवत और अडोल-चित्त रहना है। बहुत समय से लेकर इस साक्षीपन की अवस्था में स्थित रहने का पुरुषार्थ करना है।

वरदान:- एक ही रास्ता और एक से रिश्ता रखने वाले सम्पूर्ण फरिश्ता भव
निराकार वा साकार रूप से बुद्धि का संग वा रिश्ता एक बाप से पक्का हो तो फरिश्ता बन जायेंगे। जिनके सर्व सम्बन्ध वा सर्व रिश्ते एक के साथ हैं वही सदा फरिश्ते हैं। जैसे गवर्मेन्ट रास्ते में बोर्ड लगा देती है कि यह रास्ता ब्लाक है, ऐसे सब रास्ते ब्लाक (बन्द) कर दो तो बुद्धि का भटकना छूट जायेगा। बापदादा का यही फरमान है – कि पहले सब रास्ते बन्द करो। इससे सहज फरिश्ता बन जायेंगे।
स्लोगन:- सदा सेवा के उमंग-उत्साह में रहना – यही माया से सेफ्टी का साधन है।

ये अव्यक्त इशारे – महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो

आपका बोल और स्वरूप दोनों साथ-साथ हों – बोल स्पष्ट भी हों, उसमें स्नेह भी हो, नम्रता और मधुरता भी हो। सत्यता भी हो लेकिन स्वरूप की नम्रता भी हो, इसी रूप से बाप को प्रत्यक्ष कर सकेंगे। निर्भय हो लेकिन बोल मर्यादा के अन्दर हों – जब इन दोनों बातों का बैलेन्स हो तब कमाल दिखाई देगी। फिर आपके शब्द कड़े नहीं, मीठे लगेंगे।

प्रश्न 1: सर्वोत्तम सच्ची सर्विस कौन सी है?

उत्तर:
जब किसी से कोई भूल होती है, तो उसे केवल सावधान करना ही सर्विस नहीं है, बल्कि सूक्ष्म रीति से अपनी योग शक्ति द्वारा उसके अशुद्ध संकल्पों को भस्म करना – यही सर्वोत्तम सच्ची सर्विस है।
साथ ही स्वयं पर भी अटेन्शन रखना कि मन्सा में कोई भी अशुद्ध संकल्प उत्पन्न न हो।


 प्रश्न 2: यथार्थ सर्विस का सूक्ष्म और महीन राज़ क्या है?

उत्तर:
सच्ची सर्विस का महीन राज़ यह है कि:

  • केवल वाचा या कर्मणा से नहीं, बल्कि मन्सा से भी शुद्धता बनाए रखना
  • दूसरों को सुधारते समय उन्हें योग शक्ति का सहयोग देना
  • स्वयं भी हर समय सावधान और पवित्र संकल्पों में स्थित रहना

 प्रश्न 3: अन्तर्मुखी अवस्था क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
अन्तर्मुखी अवस्था से ही आत्मा:

  • अचल, स्थिर और धैर्यवान बनती है
  • सम्पूर्ण ज्ञानमय अवस्था को प्राप्त करती है
  • दैवी गुणों (निर्मान, निर्भय, निरहंकार आदि) को धारण कर पाती है

बिना अन्तर्मुखता के महावाक्य केवल शब्द बन जाते हैं, उनका गहरा प्रभाव नहीं पड़ता।


 प्रश्न 4: मन को मन्दिर के समान कैसे बनाएं?

उत्तर:
जैसे मन्दिर में केवल पवित्र मूर्तियाँ होती हैं, वैसे ही:

  • मन में केवल शुद्ध और दिव्य संकल्प रखें
  • मन को निर्मोह, निर्लोभ, निर्भय गुणों से सजाएं
  • अशुद्ध विचारों को प्रवेश न दें

तब मन मन्दिर से पवित्रता की “खुशबू” फैलती है।


 प्रश्न 5: सच्चा प्रेम और परवरिश क्या है?

उत्तर:
जब कोई हमें सावधान करता है, तो उसे आलोचना नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम और परवरिश समझना चाहिए।

  • जितना प्रिय फूल होता है, उतनी ही उसकी देखभाल होती है
  • एक-दूसरे को सुधारना ही सच्ची सर्विस और प्रेम है

 प्रश्न 6: ज्ञान और प्रेम का सही क्रम क्या है?

उत्तर:

  • पहले ज्ञान रूप बनना आवश्यक है
  • उसके बाद प्रेम रूप बनना चाहिए

यदि ज्ञान के बिना प्रेम होता है, तो वह कई बार माया के प्रभाव में आकर अशुद्ध हो सकता है


 प्रश्न 7: साक्षी भाव की अवस्था क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर:
साक्षी भाव से:

  • आत्मा भोगनाओं को सहजता से पार कर लेती है
  • पास्ट कर्म समाप्त होते हैं
  • भविष्य के लिए सुख का खाता बनता है

यह अवस्था जीवन को हल्का और आनंदमय बनाती है।


प्रश्न 8: “वेट एंड सी” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर:

  • वेट (Wait) = धैर्य रखना
  • सी (See) = साक्षी बनकर देखना

पहले धैर्य धारण करो, फिर स्थिति को साक्षी होकर देखो — यही सही निर्णय और स्थिरता की कुंजी है।


 प्रश्न 9: सच्चा सेवाधारी बनने का मुख्य कर्तव्य क्या है?

उत्तर:

  • स्वयं को हर समय शुद्ध और सावधान रखना
  • दूसरों को योग शक्ति द्वारा सहयोग देना
  • किसी के प्रति भी अशुद्ध संकल्प न उत्पन्न होने देना

यही सेवाधारी का अलौकिक कर्तव्य है।


 प्रश्न 10: फरिश्ता अवस्था कैसे प्राप्त होती है?

उत्तर:

  • जब बुद्धि का एक ही संबंध एक परमात्मा से हो
  • बाकी सभी रास्ते (आसक्ति, व्यर्थ संबंध) बंद कर दिए जाएं
  • तब आत्मा सहज ही फरिश्ता स्वरूप बन जाती है

 धारणा के लिए मुख्य सार

  1. अपने लक्ष्य स्वरूप की स्मृति से शान्त, निर्मान, धैर्यवान और मधुर बनें।
  2. साक्षी दृष्टा बन हर परिस्थिति को हर्षित होकर देखें।

 वरदान

एक ही रास्ता और एक से रिश्ता रखने वाले सम्पूर्ण फरिश्ता भव।


 स्लोगन

“सदा सेवा के उमंग-उत्साह में रहना – यही माया से सेफ्टी का साधन है।”

धैर्य, साक्षीभाव, निश्चयबुद्धि, ईश्वरीयप्रेम, ज्ञानपहले, ध्यानबाद, माया-विजय, स्वपरिवर्तन, सेवाभाव, मधुरता, नम्रता, धैर्यवत, वेटएण्डसी, निरसंकल्प, शान्तअवस्था, आत्मजागृति, फरिश्तास्थिति, एकबापसेरिश्ता, उमंगउत्साह, माया-सेफ्टी, दिव्यवाइब्रेशन, आन्तरिकशान्ति, कर्मशुद्धि, बुद्धियोग, अचलस्थिति, स्थिरता, आत्मबल, ईश्वरीयशक्ति, प्रेमशुद्ध, सेवा-सूक्ष्म, आत्मनियंत्रण, गुणधारण, उज्ज्वलमन, वैकुण्ठलक्ष्य, जीवनपरिवर्तन, आध्यात्मिकयात्रा, ज्ञानस्थित, शुद्धविचार, मनवश, योगबल, स्वाहा, त्याग, समर्पण, ईश्वरीयज्ञान, आत्मस्वरूप, हर्षितमुख, दिव्यजीवन, श्रेष्ठसंस्कार, स्नेह, मर्यादा, स्पष्टबोल, मधुरबोल, नम्रस्वरूप, बैलेन्स, सत्यता, सेवाधर्म, आत्मस्मृति, ईश्वरीयरास्ता, भटकनमुक्त, पूर्णता, सम्पूर्णता, अन्तर्मुखता, आत्मशुद्धि, सेवा-राज़, सूक्ष्मसेवा, योगद्वारा_सेवा, संकल्पशुद्धि, अडोलचित्त, ईश्वरीयफाउंडेशन, परीक्षातैयारी, पुरुषार्थ, आत्मअनुभव, आनंदअवस्था, अतीन्द्रियसुख, विराटड्रामा, साक्षीदृष्टा, एकरसअवस्था, संगठनधारणा, ईश्वरीयदृष्टि, फूलस्वरूप, ईश्वरीयआकर्षण, रमणीकजीवन, क्रोधविजय, बालकपन, मालिकपन, श्रेष्ठविधि, ज्ञानप्रेमबैलेन्स, ध्यानसावधानी, आत्मजागरूकता, सेवाउमंग, माया-विजयशक्ति, दिव्यसेवा, आत्मज्योति, शुद्धऊर्जा, ब्रह्मज्ञान, ओमशान्ति, Patience, witnessing, determined intellect, divine love, knowledge first, meditation later, victory over Maya, self-transformation, service attitude, sweetness, humility, patience, wait and see, no determination, calm state, self-awareness, angelic state, one-father relationship, zeal and enthusiasm, Maya-safety, divine vibration, inner peace, purity of action, intellect’s yoga, stillness, stability, self-confidence, Divine power, pure love, service-subtle, self-control, virtue-holding, bright mind, Vaikuntha goal, life transformation, spiritual journey, knowledge-based, pure thoughts, willful, yoga power, self-sacrifice, sacrifice, dedication, divine knowledge, self-form, cheerful-faced, divine life, best values, affection, decorum, clear-spoken, sweet-spoken, humble form, balance, truthfulness, service-religion, self-remembering, divine path, free from wandering, completeness, Completeness, introversion, self-purification, Service-Secrets, subtle service, service through Yoga, purification of thoughts, unwavering mind, divine foundation, exam preparation, effort, self-experience, blissful state, extrasensory pleasure, vast drama, witnessing, monotonous state, organized perception, divine vision, flower form, divine attraction, delightful life, victory over anger, childishness, mastery, best method, knowledge, love, balance, meditation, caution, Self-awareness, zeal for service, power to overcome Maya, divine service, self-enlightenment, pure energy, Brahmagyan, Om Shanti, ॥