MURLI 21-12-2025 |BRAHMA KUMARIS

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Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

21-12-25
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 05-03-08 मधुबन

संगम की बैंक में साइलेन्स की शक्ति और श्रेष्ठ कर्म जमा करो, शिवमन्त्र से मैं-पन का परिवर्तन करो

आज बापदादा चारों ओर के बच्चों के स्नेह को देख रहे हैं। आप सभी भी स्नेह के विमान में यहाँ पहुंच गये हो। यह स्नेह का विमान बहुत सहज स्नेही के पास पहुंचा देता है। बापदादा देख रहे हैं कि आज विशेष सभी लवलीन आत्मायें परमात्म प्यार के झूले में झूल रही हैं। बापदादा भी चारों ओर के बच्चों के स्नेह में समाये हुए हैं। यह परमात्म स्नेह बाप समान अशरीरी सहज बना देता है। व्यक्त भाव से परे अव्यक्त स्थिति में अव्यक्त स्वरूप में स्थित कर देता है। बापदादा भी हर बच्चे को समान स्थिति में देख हर्षित हो रहे हैं।

आज के दिन सभी बच्चे शिवरात्रि, शिवजयन्ती बाप और अपना जन्मदिन मनाने आये हैं। बाप और दादा दोनों अपने-अपने वतन से आप सभी बच्चों का जन्म दिन मनाने पहुंच गये हैं। सारे कल्प में यह जन्म दिन बाप का वा आपका न्यारा और अति प्यारा है। भक्त लोग भी इस उत्सव को बड़ी भावना और प्यार से मनाते हैं। आपने जो इस दिव्य जन्म में श्रेष्ठ अलौकिक कर्म किया है, अभी भी कर रहे हो। वह यादगार रूप में चाहे अल्पकाल के लिए अल्प समय के लिए मनाते हैं लेकिन भक्तों की भी कमाल है। यादगार मनाने वालों, यादगार बनाने वालों की भी देखो कितनी कमाल है। जो कापी करने में होशियार तो निकले हैं क्योंकि आपके ही भक्त हैं ना। तो आपकी श्रेष्ठता का फल उन यादगार बनाने वालों को वरदान रूप में मिला है। आप एक जन्म के लिए एक बार व्रत लेते हो, सम्पूर्ण पवित्रता का। कापी तो की है एक दिन के लिए पवित्रता का व्रत भी रखते हैं। आपका पूरा जन्म पवित्र अन्न का व्रत है और वह एक दिन रखते हैं। तो बापदादा आज अमृतवेले देख रहे थे कि आप सबके भक्त भी कम नहीं हैं। उन्हों की भी विशेषता अच्छी रही है। तो आप सभी ने पूरे जन्म के लिए पक्का व्रत चाहे खान-पान का, चाहे मन के संकल्प की पवित्रता का, वचन का, कर्म का, सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हुए कर्म का पूरे जन्म के लिए पक्का व्रत लिया है? लिया है या थोड़ा-थोड़ा लिया है? पवित्रता ब्राह्मण जीवन का आधार है। पूज्य बनने का आधार है। श्रेष्ठ प्राप्ति का आधार है। तो जो भी भाग्यवान आत्मायें यहाँ पहुंच गये हैं वह चेक करो कि यह जन्म का उत्सव पवित्र बनने का चारों प्रकार से, सिर्फ ब्रह्मचर्य की पवित्रता नहीं, लेकिन मन-वचन-कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क में भी पवित्रता। यह पक्का व्रत लिया है? लिया है? जिन्होंने लिया है पक्का, थोड़ा-थोड़ा कच्चा नहीं, वह हाथ उठाओ। पक्का, पक्का? पक्का? कितना पक्का? कोई हिलावे तो, हिलेंगे? हिलेंगे? नहीं हिलेंगे? कभी-कभी तो माया आ जाती है ना, कि नहीं, माया को विदाई दे दी है? या कभी कभी छुट्टी दे देते हो, आ जाती है! चेक करो – तो पक्का व्रत लिया है? सदा का व्रत लिया है? वा कभी कभी का? कभी थोड़ा, कभी बहुत, कभी पक्का, कभी कच्चा – ऐसे तो नहीं हो ना! क्योंकि बापदादा से प्यार में सभी 100 परसेन्ट से भी ज्यादा मानते हैं। अगर बापदादा पूछते हैं कि बाप से प्यार कितना है? तो सब बहुत उमंग-उत्साह से हाथ उठाते हैं। प्यार में परसेन्टेज कम ही की होती है, मैजारिटी का प्यार है। तो जैसे प्यार में पास हो, बापदादा भी मानते हैं कि मैजारिटी प्यार में पास हैं, लेकिन पवित्रता के व्रत में चारों रूप में मन्सा-वाचा-कर्मणा, सम्बन्ध-सम्पर्क चारों ही रूप में सम्पूर्ण पवित्रता का व्रत निभाने में परसेन्टेज आ जाती है। अभी बापदादा क्या चाहते हैं? बापदादा यही चाहते कि जो प्रतिज्ञा की है, समान बनने की, तो हर एक बच्चे की सूरत में बाप की मूर्त दिखाई दे। हर एक बोल में बाप समान बोल हो, बापदादा के बोल वरदान रूप बन जाते हैं। तो आप सब यह चेक करो, हमारी सूरत में बाप की मूर्त दिखाई देती है? बाप की मूर्त क्या है? सम्पन्न, सब बात में सम्पन्न। ऐसे हर एक बच्चे के नयन, हर एक बच्चे का मुखड़ा बाप समान है? सदा मुस्कराता हुआ चेहरा है? कि कभी सोच वाला, कभी व्यर्थ संकल्पों की छाया वाला, कभी उदास, कभी बहुत मेहनत वाला, ऐसा चेहरा तो नहीं है? सदा गुलाब, कभी गुलाब जैसा खिला हुआ चेहरा, कभी और नहीं बन जाये क्योंकि बापदादा ने यह भी जन्मते ही बता दिया है कि माया आपके इस श्रेष्ठ जीवन का सामना करेगी। लेकिन माया का काम है आना, आप सदा पवित्रता के व्रत लेने वाली आत्माओं का काम है दूर से ही माया को भगाना।

बापदादा ने देखा है कई बच्चे माया को दूर से भगाते नहीं, माया आ जाती, आ जाने दे देते हैं अर्थात् माया के प्रभाव में आ जाते हैं। अगर दूर से नहीं भगाते तो माया की भी आदत पड़ जाती है क्योंकि वह जान जाती है कि यहाँ हमको बैठने देंगे, बैठने देने की निशानी है माया आती है, सोचते हैं कि माया है, लेकिन फिर भी क्या सोचते? अभी सम्पूर्ण थोड़ेही बने हैं, कोई नहीं सम्पूर्ण बना है। अभी तो बन रहे हैं, बन जायेंगे, गें गें करने लग जाते हैं तो माया को बैठने की आदत पड़ जाती है। तो आज जन्मदिन तो मना रहे हैं, बाप भी दुआयें, मुबारक तो दे रहे हैं लेकिन बाप हर एक बच्चे को, लास्ट नम्बर वाले बच्चे को भी किस रूप में देखने चाहते हैं? लास्ट नम्बर भी बाप का प्यारा तो है ना! तो बाप लास्ट नम्बर वाले बच्चे को भी सदा गुलाब देखने चाहते हैं, खिला हुआ। मुरझाया हुआ नहीं। मुरझाने का कारण है थोड़ा सा अलबेलापन। हो जायेगा, देख लेंगे, कर ही लेंगे, पहुंच ही जायेंगे…. तो यह गें गें की भाषा नीचे गिरा देती है। तो चेक करो – कितना समय बीत गया, अभी समय की समीपता का और अचानक होने का इशारा तो बापदादा ने दे ही दिया है, दे रहा है नहीं, दे ही दिया है। ऐसे समय के लिए एवररेडी, अलर्ट आवश्यक है। अलर्ट रहने के लिए चेक करो – हमारा मन और बुद्धि सदा क्लीन और क्लियर है? क्लीन भी चाहिए, क्लियर भी चाहिए। इसके लिए समय पर विजय प्राप्त करने के लिए मन में, बुद्धि में कैचिंग पावर और टचिंग पावर दोनों बहुत आवश्यक हैं। ऐसे सरकमस्टांश आने हैं जो कहाँ दूर भी बैठे हो लेकिन क्लीन और क्लियर मन और बुद्धि होगा तो बाप का इशारा, डायरेक्शन, श्रीमत जो मिलनी है, वह कैच कर सकेंगे। टच होगा यह करना है, यह नहीं करना है इसीलिए बापदादा ने पहले भी सुनाया है तो वर्तमान समय साइलेन्स की शक्ति अपने पास जितनी हो सके जमा करो। जब चाहो, जैसे चाहो वैसे मन और बुद्धि को कन्ट्रोल कर सको। व्यर्थ संकल्प स्वप्न में भी टच नहीं करे, ऐसा माइन्ड कन्ट्रोल चाहिएइसीलिए कहावत है मन जीते जगतजीत। जैसे स्थूल कर्मेन्द्रिय हाथ है, जहाँ चाहो जब तक चाहो तब तक आर्डर से चला सकते हो। ऐसे मन और बुद्धि की कन्ट्रोलिंग पॉवर आत्मा में हर समय इमर्ज हो। ऐसे नहीं योग के समय अनुभव होता है लेकिन कर्म के समय, व्यवहार के समय, सम्बन्ध के समय अनुभव कम हो। अचानक पेपर आने हैं क्योंकि फाइनल रिजल्ट के पहले भी बीच-बीच में पेपर लिये जाते हैं।

तो इस बर्थ डे पर विशेषता क्या करेंगे? साइलेन्स की शक्ति जितना जमा कर सको, एक सेकण्ड में स्वीट साइलेन्स की अनुभूति में खो जाओ क्योंकि साइन्स और साइलेन्स, साइंस भी अति में जा रही है। तो साइंस पर साइलेन्स के शक्ति की विजय परिवर्तन करेगी। साइलेन्स की शक्ति से दूर बैठे किस आत्मा को सहयोग भी दे सकते हो, सकाश दे सकते हो। भटका हुआ मन शान्त कर सकते हो। ब्रह्मा बाबा को देखा जब भी कोई अनन्य बच्चा थोड़ा हलचल में वा शारीरिक हिसाब-किताब में रहा तो सवेरे-सवेरे उठकर बच्चे को साइलेन्स के शक्ति की सकाश दिया और वह अनुभव करते थे। तो अन्त में इस साइलेन्स की सेवा का सहयोग देना पड़ेगा। सरकमस्टांश अनुसार यह बहुत ध्यान में रखो, साइलेन्स की शक्ति या अपने श्रेष्ठ कर्मो की शक्ति जमा करने की बैंक सिर्फ अभी खुलती है और कोई जन्म में जमा करने की बैंक नहीं है। अभी अगर जमा नहीं किया फिर बैंक ही नहीं होगी तो किसमें जमा करेंगे! इसलिए जमा की शक्ति को जितना इकट्ठा करने चाहो उतना कर सकते हो। वैसे लोग भी कहते हैं जो करना है वह अब कर लो। जो सोचना है अब सोच लो। अभी जो भी सोचेंगे वह सोच, सोच रहेगा और कुछ समय के बाद जब समय की सीमा नजदीक आयेगी तो सोच पश्चाताप के रूप में बदल जायेगा। यह करते थे, यह करना था… तो सोच नहीं रहेगा, पश्चाताप में बदल जायेगा इसीलिए बापदादा पहले से ही इशारा दे रहा है। साइलेन्स की शक्ति, एक सेकण्ड में कुछ भी हो, साइलेन्स में खो जाओ। यह नहीं पुरुषार्थ कर रहे हैं! जमा का पुरुषार्थ अभी कर सकते हो।

तो बापदादा का बच्चों से स्नेह है, बापदादा एक-एक बच्चे को साथ ले जाना चाहते हैं। जो वायदा है साथ रहेंगे, साथ चलेंगे… वह वायदा निभाने के लिए समान साथ चलेगा। सुनाया था ना – डबल फारेनर्स को हाथ में हाथ देके चलना अच्छा लगता है, तो श्रीमत का हाथ में हाथ हो, बाप की श्रीमत वह आपकी मत इसको कहते हैं हाथ में हाथ। तो ठीक है – आज बर्थ डे उत्सव मनाने आये हो ना! बापदादा को भी खुशी है कि मेरे बच्चे, फ़खुर है बाप को कि मेरे बच्चे सदा उत्साह में रहते उत्सव मनाते रहते हैं। हर रोज़ उत्सव मनाते हो या विशेष दिन पर? संगमयुग ही उत्सव है। युग ही उत्सव का है। और कोई युग संगमयुग जैसा नहीं है। तो सबको उमंग-उत्साह है ना कि हमें समान बनना ही है। है? बनना ही है, या देखेंगे, बनेंगे, करेंगे, गें गें तो नहीं है? जो समझते हैं बनना ही है, वह हाथ उठाओ। बनना ही है, त्याग करना पड़ेगा, तपस्या करनी पड़ेगी। तैयार हैं कुछ भी त्याग करना पड़े। सबसे बड़ा त्याग क्या है? त्याग करने में सबसे बड़े ते बड़ा एक शब्द विघ्न डालता है। त्याग, तपस्या, वैराग्य, बेहद का वैराग्य, इसमें एक ही शब्द विघ्न डालता है, जानते तो हो। कौन सा एक शब्द है? ‘मैं’, बॉडी कॉन्सेस की मैं। इसलिए बापदादा ने कहा जैसे अभी जब भी मेरा कहते हो तो पहले क्या याद आता? मेरा बाबा। मेरा बाबा आता है ना! भले मेरा और कुछ भी करो लेकिन मेरा कहने से आदत पड़ गई है पहले बाबा आता है। ऐसे ही जब मैं कहते हैं, तो जैसे मेरा बाबा भूलता नहीं है, कभी किसको मेरा कहो ना तो बाबा शब्द आता ही है, ऐसे ही जब मैं कहो तो पहले आत्मा याद आवे। मैं कौन? आत्मा। मैं आत्मा यह कर रही हूँ। मैं और मेरा, हद का बदल बेहद का हो जाए। हो सकता है? हो सकता है? कांध तो हिलाओ। आदत डालो, मैं कहो तो फौरन आवे आत्मा। और जब मैं-पन आता है तो एक शब्द याद आवे – करावनहार कौन? बाप करावनहार करा रहा है। करावनहार शब्द करने के समय सदा याद रहे। मैं-पन नहीं आयेगा। मेरा विचार, मेरी ड्युटी, ड्युटी का भी बहुत नशा होता है। मेरी ड्युटी… लेकिन देने वाला दाता कौन! यह ड्युटीज़ प्रभु की देन हैं। प्रभु की देन को मैं मानना, सोचो अच्छा है?

बापदादा हर एक स्थान से अभी रिजल्ट चाहते हैं। यह एक मास ऐसा नेचुरल नेचर बनाओ क्योंकि नेचुरल नेचर जल्दी में बदलती नहीं है। तो नेचुरल नेचर बनाओ जो बताया ना – सदा आपके चेहरे से बाप के गुण दिखाई दें, चलन से बाप की श्रीमत दिखाई दे। सदा मुस्कराता हुआ चेहरा हो। सदा सन्तुष्ट रहने और सन्तुष्ट करने की चाल हो। हर कर्म में, कर्म और योग का बैलेन्स हो। कई बच्चे बापदादा को बहुत अच्छी-अच्छी बातें सुनाते हैं, बतायें क्या कहते हैं? कहते हैं बाबा आप समझ लो ना मेरी यह नेचर है, और कुछ नहीं है, मेरी नेचर ही यह है। अभी बापदादा क्या कहे? मेरी नेचर है? मेरा बोल ऐसा है, कई ऐसे कहते हैं, क्रोध थोड़ेही किया, मेरा बोल थोड़ा बड़ा है, थोड़ा तेज बोला, क्रोध थोड़ेही किया सिर्फ तेज बोला। देखो, कितनी मीठी-मीठी बातें हैं। बापदादा कहते हैं जिसको आप मेरी नेचर कहते हो, यह मेरा कहना ही रांग है। मेरी नेचर यह रावण की नेचर है या आपकी नेचर है? आपकी नेचर अनादिकाल आदि काल, पूज्य काल यह ओरीज्नल नेचर है। रावण की चीज़ को मेरा-मेरा कहते हो ना इसीलिए जाती नहीं है। पराई चीज़ को अपना बनाकर रखा है ना, कोई पराई चीज़ को अपने पास सम्भालकर रखे, छिपाकर रखे, अच्छा माना जाता है? तो रावण की नेचर, पराई नेचर उसको मेरा क्यों कहते हो? बड़े फखुर से कहते हैं मेरा दोष नहीं है, मेरी नेचर है। बापदादा को भी रिझाने की कोशिश करते हैं। अभी यह समाप्ति समारोह करेंगे! करेंगे? करेंगे? देखो, दिल से कहो, मन से करो, जहाँ मन होगा ना, वहाँ सब कुछ हो जायेगा। मन से मानो कि यह मेरी नेचर नहीं है। यह दूसरे की चीज़ है, वह नहीं रखनी है। आप तो मरजीवा बन गये ना। आपकी ब्राह्मण नेचर है या पुरानी नेचर है? तो समझा बापदादा क्या चाहते हैं? भले मनोरंजन मनाओ, डांस करो, खेल करो लेकिन… लेकिन है। सब कुछ करते भी समान बनना ही है। समान बनने के बिना साथ चलेंगे कैसे! कस्टम में, धर्मराजपुरी में ठहरना पड़ेगा, साथ नहीं चलेंगे। तो क्या, बताओ दादियां, एक मास रिजल्ट देखें! देखें? बोलो, देखें? एक मास अटेन्शन रखेंगे? एक मास अगर अटेन्शन रखा तो नेचुरल हो जायेगा। मास का एक दिन भी छोड़ना नहीं। अच्छा जिम्मेवारी उठाती हैं दादियां। सभी इकट्ठे होके एक दो के प्रति शुभ भावना शुभ कामना का हाथ फैलाओ। जैसे कोई गिरता है ना तो उसको हाथ से प्यार से उठाते हैं तो शुभ भावना और शुभ कामना का हाथ, एक दो को सहयोग देके आगे बढ़ाते चलो। ठीक है? सिर्फ आप चेक कम करते हो, करके पीछे चेक करते हो, हो गया ना! पहले सोचो, पीछे करो। पहले करो पीछे सोचो नहीं। करना ही है।

अच्छा। अभी बापदादा कौन सी ड्रिल कराने चाहते हैं? एक सेकण्ड में शान्ति की शक्ति स्वरूप बन जाओ। एकाग्र बुद्धि, एकाग्र मन। सारे दिन में एक सेकण्ड बीच-बीच में निकाल अभ्यास करो। साइलेन्स का संकल्प किया और स्वरूप हुआ। इसके लिए समय की आवश्यकता नहीं। एक सेकण्ड का अभ्यास करो, साइलेन्स। अच्छा।

चारों ओर के जन्म उत्सव मनाने वाले भाग्यवान आत्माओं को सदा उत्साह में रहने वाले संगमयुग के उत्सव को मनाने वाले, ऐसे सर्व उमंग उत्साह के पंखों से उड़ने वाले बच्चों को, सदा मन और बुद्धि को एकाग्रता के अनुभवी बनाने वाले महावीर बच्चों को, सदा समान बनने के उमंग को साकार रूप में लाने वाले फॉलो फादर करने वाले बच्चों को, सदा एक दो के स्नेही सहयोगी हिम्मत दिलाने वाले बाप से मदद का वरदान दिलाने वाले वरदानी बच्चों को, महादानी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और पदम पदम पदम पदमगुणा मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।

वरदान:- सदा एकान्त और सिमरण में व्यस्त रहने वाले बेहद के वानप्रस्थी भव
वर्तमान समय के प्रमाण आप सब वानप्रस्थ अवस्था के समीप हो। वानप्रस्थी कभी गुड़ियों का खेल नहीं करते हैं। वे सदा एकान्त और सिमरण में रहते हैं। आप सब बेहद के वानप्रस्थी सदा एक के अन्त में अर्थात् निरन्तर एकान्त में रहो साथ-साथ एक का सिमरण करते हुए स्मृति स्वरूप बनो। सभी बच्चों प्रति बापदादा की यही शुभ आश है कि अब बाप और बच्चे समान हो जाएं। सदा याद में समाये रहें। समान बनना ही समाना है – यही वानप्रस्थ स्थिति की निशानी है।
स्लोगन:- आप हिम्मत का एक कदम बढ़ाओ तो बाप मदद के हजार कदम बढ़ायेंगे।

 

अव्यक्त इशारे – अब सम्पन्न वा कर्मातीत बनने की धुन लगाओ

जैसे बाप के लिए सबके मुख से एक ही आवाज निकलती है-“मेरा बाबा”। ऐसे आप हर श्रेष्ठ आत्मा के प्रति यह भावना हो, महसूसता हो। हरेक से मेरे-पन की भासना आये। हरेक समझे कि यह मेरे शुभचिन्तक सहयोगी सेवा के साथी हैं, इसको कहा जाता है – बाप समान, कर्मातीत स्टेज के तख्तनशीन।

सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी राजयोगी तपस्वी भाई बहिनें सायं 6.30 से 7.30 बजे तक, विशेष योग अभ्यास के समय अपने लाइट माइट स्वरूप में स्थित हो, भ्रकुटी के मध्य बापदादा का आह्वान करते हुए, कम्बाइण्ड स्वरूप का अनुभव करें और चारों ओर लाइट माइट की किरणें फैलाने की सेवा करें।

प्रश्न 1: बापदादा आज बच्चों को किस स्थिति में देख रहे हैं?
उत्तर: बापदादा आज बच्चों को परमात्म प्यार के झूले में झूलती हुई लवलीन आत्माओं के रूप में देख रहे हैं। यह स्नेह आत्मा को सहज ही अशरीरी और अव्यक्त स्थिति में ले जाता है।


प्रश्न 2: शिवरात्रि/शिवजयन्ती का विशेष महत्व क्या है?
उत्तर: यह दिन बाप और बच्चों दोनों का अलौकिक जन्मदिन है, जो सारे कल्प में एक बार आता है। यह पवित्र बनने और श्रेष्ठ कर्म करने का अनमोल अवसर है।


प्रश्न 3: ब्राह्मण जीवन की नींव क्या है?
उत्तर: पवित्रता। मन, वचन, कर्म और सम्बन्ध-सम्पर्क—चारों रूपों में पवित्रता ही ब्राह्मण जीवन का आधार, पूज्यता और श्रेष्ठ प्राप्ति का साधन है।


प्रश्न 4: बापदादा बच्चों से किस प्रकार का पवित्रता का व्रत चाहते हैं?
उत्तर: थोड़ा-थोड़ा या कभी-कभी का नहीं, बल्कि पूरे जन्म के लिए पक्का और अटल पवित्रता का व्रत।


प्रश्न 5: माया का सबसे बड़ा अवसर कब बनता है?
उत्तर: जब आत्मा सोचती है—“अभी सम्पूर्ण थोड़े ही बने हैं”, “हो जायेगा”—यह अलबेलापन माया को बैठने की अनुमति देता है।


प्रश्न 6: बापदादा हर बच्चे के चेहरे पर क्या देखना चाहते हैं?
उत्तर: सदा गुलाब जैसा खिला हुआ, मुस्कराता हुआ चेहरा—जिसमें बाप समान सम्पन्नता और सन्तुष्टता झलके।


प्रश्न 7: वर्तमान समय में सबसे आवश्यक शक्ति कौन-सी है?
उत्तर: साइलेन्स की शक्ति।
जिससे मन-बुद्धि क्लीन और क्लियर रहें, और बाप की श्रीमत को तुरंत कैच और टच कर सकें।


प्रश्न 8: साइलेन्स की शक्ति कैसे बढ़ाई जा सकती है?
उत्तर: एक सेकण्ड में स्वीट साइलेन्स में स्थित होने का अभ्यास करके, दिन में बार-बार मन-बुद्धि को कंट्रोल में लाकर।


प्रश्न 9: ‘मन जीते जगत जीते’ का व्यावहारिक अर्थ क्या है?
उत्तर: जैसे हाथ-पैर हमारे आदेश से चलते हैं, वैसे ही मन और बुद्धि भी आत्मा के आदेश में हों—यह सच्ची विजय है।


प्रश्न 10: संगमयुग को “बैंक” क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि श्रेष्ठ कर्मों और साइलेन्स की शक्ति को जमा करने की बैंक केवल इसी जन्म में खुली है; आगे कोई और अवसर नहीं।


प्रश्न 11: सबसे बड़ा त्याग कौन-सा है?
उत्तर: “मैं” का त्याग।
बॉडी-कॉन्शस “मैं” को बदलकर आत्म-अभिमानी “मैं आत्मा” की स्थिति बनाना।


प्रश्न 12: ‘शिवमन्त्र’ द्वारा मैं-पन का परिवर्तन कैसे होता है?
उत्तर:

  • “मैं आत्मा हूँ”

  • “करावनहार बाप है”
    इन स्मृतियों से मेरा-पन और अहंकार समाप्त होता है।


प्रश्न 13: ‘मेरी नेचर’ कहना क्यों गलत है?
उत्तर: क्योंकि दोष या विकार हमारी असली (ओरिजिनल) नेचर नहीं, बल्कि रावण की पराई नेचर है। पराई चीज़ को अपना कहना ही बाधा बनता है।


प्रश्न 14: समान बनने का व्यावहारिक संकेत क्या है?
उत्तर:

  • सदा मुस्कराता चेहरा

  • सन्तुष्ट रहने और सन्तुष्ट करने की चाल

  • कर्म और योग का बैलेन्स

  • हर बोल और चलन में बाप की झलक


प्रश्न 15: बापदादा बच्चों से अंतिम संकल्प क्या कराना चाहते हैं?
उत्तर:
बनना ही है”—देखेंगे, करेंगे, गें-गें नहीं; बल्कि पूर्ण पुरुषार्थ से समान बनकर साथ चलना।

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