शंकर पूजनीय है
परंतु
शिव बाबा पूजनीय नहीं।
क्यों?
शंकर पूजनीय है परंतु शिव बाबा पूजनीय नहीं।
क्यों?
विषय है परमात्मा का गायन क्यों होता है लेकिन पूजा क्यों नहीं होती?
परमात्मा का गायन है लेकिन पूजा नहीं।
क्यों?
परमात्मा का गायन होता है लेकिन पूजा नहीं। क्यों?
शंकर पूजनीय है।
परंतु शिव बाबा पूजनीय नहीं। क्यों?
मुरली बेस डीप सीक्रेट
मुरली पर आधारित आज हम डीप सीक्रेट को समझेंगे।
डिस्क्लेमर
यह भाषण प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरली शिक्षाओं के अध्ययन पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान को सरल और गहन रूप में प्रस्तुत करना है। यह किसी धर्म, देवी-देवता या परंपरा की आलोचना नहीं है। सभी संदर्भ मुरली ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं।
विषय
परमात्मा भी गायन योग्य है परंतु पूजनीय क्यों नहीं?
यह आज का हमारा विषय है।
1. संसार में भगवान का गायन और पूजा
संसार में भगवान का गायन और पूजा — इस पर हम पहले चर्चा करेंगे।
दुनिया के हर धर्म में भगवान का सिमरन होता है।
सब परमात्मा को याद करते हैं।
लोग कहते हैं—
हे प्रभु
आप ज्ञान के सागर हैं।
आप पतित पावन हैं।
आप शांति के सागर हैं।
आप सुख के दाता हैं।
अब तक जो कुछ भी हमने बोला यह सब क्या है?
यह भगवान का गायन है।
लेकिन यहां एक बहुत गहरा प्रश्न उठता है।
क्या परमात्मा पूजनीय है?
मंदिरों में हम देखते हैं कि—
कृष्ण की पूजा होती है
राम की पूजा होती है
देवी-देवताओं की पूजा होती है।
लेकिन मुरली में एक विशेष बात समझाई गई है—
परमात्मा का गायन होता है, पूजा नहीं।
2. गायन और पूजन का अंतर
पहले यह समझना आवश्यक है कि गायन और पूजन में क्या अंतर है।
गायन क्या है?
किसी आत्मा के गुणों की प्रशंसा करना।
जैसे—
ज्ञान का सागर
शांति का सागर
पतित पावन
यह सब गायन है।
पूजन क्या है?
जब किसी की मूर्ति बनाकर
फूल चढ़ाकर
आरती करके पूजा की जाती है।
यह पूजा है।
3. शिव और शंकर में अंतर
हम आज तक शिव और शंकर को एक ही समझते थे।
लेकिन परमात्मा ने आकर समझाया कि दोनों में अंतर है।
पहला अंतर — रूप अलग
एक अज्ञानी आत्मा भी कहेगी कि दोनों का रूप अलग है।
दूसरा अंतर — नाम अलग
शिवलिंग को शंकर नहीं कहते।
शंकर लिंग नहीं कहते।
हम कहते हैं—
शिवालय
शिवरात्रि
शिव जयंती
शंकर जयंती नहीं कहते।
पहले बाप का नाम आता है, फिर बच्चे का नाम।
इसलिए शिव-शंकर कहा जाता है।
4. शंकर भी शिव को नमस्कार करते हैं
यदि आप ध्यान से देखें—
शंकर के आगे भी शिवलिंग रखा होता है।
शंकर जी माला फेरते हुए क्या कहते हैं?
ओम नमः शिवाय
इसका अर्थ है—
मैं आत्मा शिव को नमस्कार करती हूं।
जब शंकर ही शिव को नमस्कार कर रहे हैं तो दोनों एक कैसे हो सकते हैं?
5. शिवलिंग क्या है?
शिवलिंग उस निराकार परमपिता परमात्मा शिव का यादगार है
जिसे हम इन आँखों से नहीं देख सकते।
आत्मा और परमात्मा दोनों सूक्ष्म बिंदु स्वरूप हैं।
इसलिए मुरली में कहा गया है—
परमात्मा और आत्मा का पूजन नहीं हो सकता, उनका गायन होता है।
भक्ति मार्ग में परमात्मा के लिए शिवलिंग बनाया गया।
लेकिन
शिवलिंग परमात्मा नहीं है।
जैसे—
देवी-देवताओं का चित्र
देवी-देवता नहीं होता।
वैसे ही
शिवलिंग परमात्मा का प्रतीक है, परमात्मा नहीं।
6. ज्योतिर्लिंग का रहस्य
पहले सोमनाथ में हीरे का डायमंड रखा गया था
जो परमात्मा की ज्योति का प्रतीक था।
बाद में पत्थर रखे जाने लगे।
इसलिए उन्हें ज्योतिर्लिंग कहा गया।
7. माना हुआ और वास्तविक
जिसे मानना पड़ता है वह वास्तविक नहीं होता।
उदाहरण —
यदि कोई कहे
इस बूढ़ी माता को अपनी मां मान लो।
तो हम कहेंगे — ठीक है मान लेते हैं।
लेकिन अपनी असली मां को मानना नहीं पड़ता।
इसलिए
जिसे माना जाता है वह वास्तविक नहीं होता।
8. परमात्मा का गायन क्यों होता है?
परमात्मा के गुण इतने महान हैं कि उनका गायन स्वतः होता है।
जैसे—
ज्ञान का सागर
प्रेम का सागर
शांति का सागर
सुख का सागर
पतित पावन
इसलिए परमात्मा का गायन होता है।
9. परमात्मा पूजनीय क्यों नहीं?
क्योंकि पूजा हमेशा शरीरधारी की होती है।
मंदिरों में जिनकी पूजा होती है—
श्री कृष्ण
श्री राम
देवी देवता
ये सभी शरीरधारी आत्माएं हैं।
लेकिन
परमात्मा निराकार है।
इसलिए
उनकी मूर्ति नहीं बन सकती।
जहाँ मूर्ति नहीं वहाँ पूजा कैसे?
10. पूजा कब शुरू हुई?
सतयुग और त्रेता में पूजा नहीं होती।
जब मनुष्य पतित हो जाते हैं
द्वापर और कलियुग में
तब देवताओं की मूर्तियां बनाकर पूजा शुरू होती है।
11. परमात्मा का संदेश
मुरली में परमात्मा कहते हैं—
बच्चे, मेरी पूजा मत करो।
मुझे याद करो।
याद करने का अर्थ है —
श्रीमत पर चलना।
12. परमात्मा का उद्देश्य
परमात्मा तीन कार्य करते हैं—
आत्माओं को ज्ञान देना
आत्माओं को पवित्र बनाना
आत्माओं को देवता बनाना
इसलिए परमात्मा चाहते हैं कि
आत्माएं उन्हें याद करें, पूजा नहीं।
13. परमात्मा से संबंध
परमात्मा के साथ तीन मुख्य संबंध हैं—
पिता
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सतगुरु
क्या कोई बेटा अपने पिता की पूजा करता है?
नहीं।
वह उनसे संबंध रखता है, प्रेम रखता है।
इसी तरह
परमात्मा से भी संबंध याद और प्रेम का है।
निष्कर्ष
इस पूरे विषय का सार यह है—
परमात्मा निराकार हैं।
सर्वश्रेष्ठ हैं।
ज्ञान के सागर हैं।
इसलिए
उनका गायन होता है।
लेकिन
पूजा उन आत्माओं की होती है जो देवता बनती हैं।
इसलिए परमात्मा का संदेश है—
बच्चे
मेरी पूजा मत करो।
मुझे याद करो।
