अव्यक्त मुरली-(23)“सर्वप्रथम त्याग है – देह-भान का त्याग”रिवाइज:03-04-1982
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“त्याग की गुह्य परिभाषा: बापदादा ने कौन से बच्चों को नम्बरवन कहा?”
1. त्यागमूर्त आत्माओं को बापदादा देख रहे हैं
बापदादा आज अपने उन बच्चों को देख रहे हैं जो त्यागमूर्त बने हैं। हर ब्राह्मण आत्मा त्याग का संकल्प लेकर इस रास्ते पर आई है। लेकिन… त्याग भी नम्बरवार होता है। सभी ने त्याग तो किया, लेकिन क्या त्याग की परिभाषा पूरी तरह समझी?
2. त्याग की सच्ची परिभाषा क्या है?
त्याग केवल यह कहना नहीं है कि “मैंने तन-मन-धन का त्याग कर दिया।”
सच्चा त्याग तब होता है जब जिस वस्तु या बात का त्याग किया है, उसमें मेरापन भी न रहे।
“जिसका त्याग किया, उसका संकल्प में भी स्मरण नहीं आना चाहिए।”
अगर देह का त्याग किया, लेकिन देह की कोई कर्मेन्द्रिय हमें अभी भी आकर्षित करती है – तो क्या वह सम्पूर्ण त्याग कहलाएगा?
3. रावण के सिर और ब्रह्मा की भुजाएं – कौन से स्वरूप में हैं आप?
बापदादा ने आज बड़े प्यार से एक गहरी बात कही –
“शक्ति रूप भुजाओं वाली आत्मा बनो, ना कि रावण के 10 सिर वाली।”
रावण के सिर क्या हैं? – “क्यों, क्या, कैसे, ऐसे, वैसे…”
हर परिस्थिति में प्रश्न उठाना, सहयोगी बनने के बजाय अपोज़ीशन में आ जाना – यह रावण स्वरूप है।
वहीं, शक्ति स्वरूप आत्मा – सर्व परिस्थिति में सहयोगी बनती है। वही सच्ची ब्राह्मण आत्मा है।
4. पुराने घर और पुराने सामान का सम्पूर्ण त्याग
यह शरीर, यह देह, एक पुराना घर है। और इसकी इन्द्रियाँ – पुराना सामान।
अगर आपने घर छोड़ा लेकिन सामान में मोह रह गया – तो वह त्याग नहीं, धोखा है।
जैसे एक मिट्टी का बर्तन भी अगर प्रिय है – तो वह बार-बार बुद्धि को भटका देगा।
सम्पूर्ण त्याग = पुराना शरीर + उसका आकर्षण + कर्मेन्द्रियों का मोह = सबका त्याग।
5. त्याग का पहला कदम – “मैं मेहमान हूँ”
बापदादा कहते हैं –
“यह तन बाप की अमानत है, सेवा के लिए दिया गया है।
इसमें मेहमान बनकर रहो, मालिक मत बनो।”
जब आप मेहमान हैं, तो घर में फँसते नहीं। हमेशा असली घर की याद रहती है।
यह स्मृति ही आपको फरिश्ता स्वरूप में स्थित करती है।
6. मनमत या श्रीमत? कर्मेन्द्रियों पर किसका नियंत्रण?
क्या आपकी आँखें, वाणी, कर्मेन्द्रियाँ – श्रीमत पर चल रही हैं या मनमत पर?
ब्रह्मा बाप ने भी तन बाप को दिया – आपने भी दिया, है ना?
“आँख को मैं चलाऊँ, बाकी सब बाप चलाये” – यह त्याग नहीं, मनमत है।
7. स्वमान की सीट पर बैठकर मायाजीत बनो
बापदादा कहते हैं –
“स्वमान की सीट ही आत्मा का असली आसन है।
इस पर बैठते ही माया पास नहीं आ सकती।”
हर आत्मा को स्वमान की याद में रहना है:
“मैं पुण्य आत्मा हूँ, मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ, महान कर्म करने वाली हूँ।”
8. त्याग से सेवा, सेवा से भाग्य – जीवन का समीकरण
सच्चा त्याग आपको सच्चा सेवाधारी बनाता है।
सेवा से सच्चा मनोरंजन होता है, भाग-दौड़ नहीं।
“सेवा = मेला कराना = आत्माओं को बाबा से मिलाना।”
जितनी सेवा, उतना मेवा।
सच्चे सेवाधारी = खुशमुख, भरपूर आत्मा।
9. बाप समान बनो – समीप आत्मा की पहचान
बाप समीप आत्मा वही है, जो बाप समान हो।
बाप विश्व कल्याणकारी – तो बच्चे भी।
बाप समर्थ – तो बच्चे भी मास्टर समर्थ।
“समीप आत्मा की पहचान है – समानता।”
10. आखिरी सौगात – अधमरे नहीं, डबल लाइट बनो!
बापदादा स्पष्ट करते हैं –
“पुराना नहीं छोड़ा तो अधमरे हो जाते हो।”
लेकिन अगर अभी-अभी पुराना त्याग कर दिया, तो उसी पल बन जाओगे फरिश्ता, डबल लाइट, मायाजीत।
प्रश्नोत्तरी: त्याग की गहराई समझने हेतु 10 सटीक प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1:बापदादा किन बच्चों को “त्यागमूर्त” कहते हैं?
उत्तर:जो आत्माएं देह, देह के संबंधों और ममता से सम्पूर्ण रूप से मुक्त होकर, बाप को तन-मन-धन समर्पित कर देती हैं — वे सच्ची त्यागमूर्त आत्माएं हैं। लेकिन त्याग भी नम्बरवार होता है, क्योंकि हर आत्मा की समर्पण भावना एक जैसी नहीं होती।
प्रश्न 2:सच्चा त्याग किसे कहा जाता है?
उत्तर:त्याग वह है जिसमें मेरा-पन समाप्त हो गया हो। जिस वस्तु या व्यक्ति का त्याग किया है, उसका फिर संकल्प में भी स्मरण न हो। देह या इन्द्रियों की आकर्षण यदि बनी हुई है, तो त्याग अपूर्ण है।
प्रश्न 3:रावण के 10 सिर और शक्ति स्वरूप भुजाओं में क्या अंतर है?
उत्तर:रावण के सिर “क्यों, क्या, कैसे…” जैसे अनेक प्रश्न हैं जो सहयोग के स्थान पर विरोध उत्पन्न करते हैं।
शक्ति स्वरूप आत्मा हर परिस्थिति में सहयोगी बनती है – वह भुजाओं वाली आत्मा है, जो सर्व परिस्थिति में समाधान देती है।
प्रश्न 4:“पुराने घर” और “पुराने सामान” का त्याग क्या दर्शाता है?
उत्तर:पुराना घर = यह शरीर;
सामान = इन्द्रियाँ और उनकी इच्छाएँ।
अगर तन का त्याग किया लेकिन इन्द्रियों में मोह रह गया तो वह आधा त्याग कहलाता है। सम्पूर्ण त्याग वही है जिसमें देह, देह का भान, और इन्द्रिय-असक्तियाँ सभी छोड़ी जाएं।
प्रश्न 5:“मैं मेहमान हूँ” – यह भावना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:इस शरीर को बाप की अमानत समझ सेवा में लगाने से आत्मा मालिकपन से मुक्त होकर फरिश्ता स्वरूप बनती है। मेहमान कभी घर में फँसते नहीं, बल्कि असली घर की स्मृति में रहते हैं।
प्रश्न 6:कर्मेन्द्रियों पर श्रीमत या मनमत – इसका क्या महत्व है?
उत्तर:त्याग तब सम्पूर्ण है जब हर इन्द्रिय श्रीमत पर चलती है, मनमत पर नहीं।
यदि आत्मा कहे – “आँखें मैं चलाऊँ, बाकी बाबा चलाये” – तो यह मिलाजुला त्याग है, जो सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता।
प्रश्न 7:स्वमान की सीट पर बैठने से क्या फल मिलता है?
उत्तर:स्वमान की सीट आत्मा की शक्ति का आसन है।
जब आत्मा “मैं पुण्य आत्मा हूँ, मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ” इस स्मृति में रहती है, तो माया पास भी नहीं आ सकती – यही स्थिति मायाजीत बनाती है।
प्रश्न 8:त्याग से सेवा और सेवा से भाग्य – इसका क्या संबंध है?
उत्तर:सच्चा त्याग आत्मा को सेवा के लिए योग्य पात्र बनाता है।
और सेवा करने से आत्मा को न सिर्फ खुशी मिलती है, बल्कि भाग्य भी बनता है।
सेवा = आत्माओं को बाबा से मिलाना = सच्चा मेला।
प्रश्न 9:समीप आत्मा की असली पहचान क्या है?
उत्तर:समीप आत्मा वह है जो गुण, कर्म और स्वभाव में बाप समान हो।
जैसे बाप विश्व कल्याणकारी, सम्पन्न, न्यारे-प्यारे हैं – वैसे ही समीप आत्माएं भी विश्व सेवा में सदा अग्रणी और स्थिर रहती हैं।
प्रश्न 10:“अधमरे नहीं, डबल लाइट बनो” – इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:जो आत्मा न पूरी तरह त्याग करती है, न पूरी तरह लेती है – वह अधमरी कहलाती है।
बापदादा कहते हैं: “पुराना पूरा छोड़ो तो उसी क्षण फरिश्ता और डबल लाइट बन जाओगे।”
जो हिम्मत करते हैं, उन्हें बाबा पदम कदमों का सहयोग देते हैं।
DISCLAIMER:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा दिए गए आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है। इसमें प्रस्तुत विचार ब्रह्मा बाबा व अव्यक्त बापदादा के आध्यात्मिक संदेशों का सरल एवं YouTube-अनुकूल प्रस्तुतीकरण है। यह किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं बनाया गया है, बल्कि आत्मिक उन्नति व वास्तविक त्याग की गहराई को समझने हेतु है।
Official BK Affidavit Dated: 13 June 2025 – द्वारा समर्थित।
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