तीसरा विश्व युद्ध(07)प्रकृति क्यों बदल रही है?
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सृष्टि परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन या विश्व ड्रामा
मुरली से गहरा रहस्य
क्लाइमेट चेंज या वर्ल्ड ड्रामा — यह क्लाइमेट में चेंज आ रहा है या यह वर्ल्ड ड्रामा है?
दोनों में से क्या है?
यह प्रकृति क्यों बदल रही है?
मुरली क्या बताती है — प्रकृति में परिवर्तन क्यों आ रहा है?
परमात्मा क्या कहते हैं?
डिस्क्लेमर
यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन और चिंतन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।
इसमें व्यक्त विचार ब्रह्मा कुमारी शिक्षाओं, मुरली बिंदुओं तथा वक्ता की आध्यात्मिक समझ पर आधारित हैं।
इस वीडियो का उद्देश्य वैज्ञानिक शोध या जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक कारणों को नकारना नहीं है।
यह चर्चा केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विश्व ड्रामा, मानव कर्म और प्रकृति के संबंध को समझाने के लिए की गई है।
क्या यह जलवायु परिवर्तन है या विश्व ड्रामा का हिस्सा?
आज का वैश्विक प्रश्न यही है।
पूरे विश्व में लोग पूछ रहे हैं —
यह परिवर्तन क्यों हो रहा है?
विश्व के क्लाइमेट में यह परिवर्तन क्यों हो रहा है?
आज पूरी दुनिया एक बड़े विषय पर चर्चा कर रही है —
जलवायु परिवर्तन (Climate Change)।
हम देखते हैं तापमान लगातार बढ़ रहा है।
बाढ़ और सूखा बढ़ रहे हैं।
हिमनद (ग्लेशियर) पिघल रहे हैं।
मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है।
इसलिए लोग पूछते हैं —
क्या यह केवल जलवायु परिवर्तन है?
या यह विश्व ड्रामा का हिस्सा है?
क्या विश्व ड्रामा में ऐसा होना ही था?
आज हम इस विषय को आध्यात्मिक दृष्टि से समझने का प्रयास करेंगे।
विश्व ड्रामा का सिद्धांत
ब्रह्मा कुमारी ज्ञान के अनुसार यह संसार एक नियत नाटक (World Drama) है।
नियत का अर्थ क्या है?
बना बनाया
रेडीमेड
ऑटोमेटिक
निश्चित
निर्धारित
फिक्स्ड
यह नाटक एक निश्चित चक्र में चलता है।
5000 वर्ष का चक्र।
इसमें एक सेकंड भी कम या ज्यादा नहीं हो सकता।
सृष्टि चक्र
चार युगों का चक्र है —
सतयुग
त्रेतायुग
द्वापरयुग
कलियुग
और इनके बीच में आता है —
संगम युग
संगम युग क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यह कलियुग और सतयुग का मिलन है।
यह प्रश्न उठता है —
क्या यह युगों का मिलन है?
या कल्प का मिलन है?
मुरली में कहा है —
“कल्प-कल्प के संगम पर मैं आता हूँ।”
इसका अर्थ है —
परमात्मा हर 5000 वर्ष बाद,
कल्प के अंत और नए कल्प के आरंभ के बीच आते हैं।
जब कलियुग समाप्त होता है
और सतयुग प्रारंभ होता है।
प्रकृति और मनुष्य का संबंध
आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकृति और मनुष्य का गहरा संबंध है।
जब मनुष्य की चेतना शुद्ध होती है
तो प्रकृति भी संतुलित रहती है।
लेकिन जब मनुष्य विकारों में चला जाता है
तो प्रकृति भी असंतुलित हो जाती है।
साकार मुरली में कहा है —
“मनुष्य जब विकारी बनते हैं तो दुनिया दुखमय बन जाती है।”
जब आत्मा पवित्र होती है
तो प्रकृति भी पवित्र होती है।
लेकिन जब आत्मा तमोप्रधान हो जाती है
तो प्रकृति भी तमोप्रधान हो जाती है।
जलवायु परिवर्तन के भौतिक कारण
वैज्ञानिक दृष्टि से भी जलवायु परिवर्तन के कई कारण बताए जाते हैं —
औद्योगिक प्रदूषण
जंगलों की कटाई
कार्बन उत्सर्जन
प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग
यह सब मानव गतिविधियों का परिणाम है।
उदाहरण:
जब जंगल काटे जाते हैं
तो वर्षा का संतुलन बिगड़ जाता है।
तापमान बढ़ता है।
बाढ़ और सूखा बढ़ जाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से जलवायु परिवर्तन
आध्यात्मिक दृष्टि से यह केवल पर्यावरण का विषय नहीं है।
यह मानव चेतना का विषय भी है।
जब मनुष्य —
लालच
अहंकार
स्वार्थ
इन भावनाओं में जीता है
तो उसके कर्म प्रकृति पर दूषित प्रभाव डालते हैं।
संगम युग का परिवर्तन
संगम युग वह समय है जब —
पुरानी दुनिया समाप्त होती है
और नई दुनिया की स्थापना होती है।
इस समय दुनिया में कई प्रकार के परिवर्तन दिखाई देते हैं।
साकार मुरली
3 फरवरी 1968
“विनाश के कई साधन बनेंगे।
प्राकृतिक आपदाएँ भी होंगी।
और आपस की लड़ाई भी होगी।”
क्या यह ड्रामा का हिस्सा है?
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो हर घटना ड्रामा का हिस्सा है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य जिम्मेदार नहीं है।
ड्रामा में मनुष्य के कर्म भी शामिल होते हैं।
जैसे एक नाटक में हर कलाकार अपनी भूमिका निभाता है।
वैसे ही विश्व ड्रामा में भी हर आत्मा की भूमिका होती है।
बीके ज्ञान का समाधान
ब्रह्मा कुमारी ज्ञान केवल समस्या नहीं बताता।
यह समाधान भी देता है।
समाधान है —
आत्म चेतना
आज दुनिया में कोई भी अपने आप को आत्मा नहीं समझता।
लेकिन परमात्मा आकर कहते हैं —
तुम आत्माएँ मेरे बच्चे हो।
मैं तुम आत्माओं का पिता हूँ।
शरीर का पिता हर जन्म में बदलता है।
लेकिन परमात्मा आत्माओं का सदा का पिता है।
अंतिम संदेश
यदि हम दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं तो —
हमें प्रकृति का सम्मान करना होगा।
हमें अपने जीवन को शुद्ध बनाना होगा।
जब मनुष्य बदलता है
तो दुनिया बदलती है।
परमात्मा का सरल निर्देश है —
ना दुख लो
ना दुख दो
सुख लो
सुख दो
