अव्यक्त मुरली-(03)12-01-1985 “सर्वोत्तम स्नेह, सम्बन्ध और सेवा”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
12-01-1985 “सर्वोत्तम स्नेह, सम्बन्ध और सेवा”
आज बापदादा सभी बच्चों की स्नेह भरी सौगातें देख रहे थे। हर एक बच्चे की स्नेह सम्पन्न याद सौगात भिन्न-भिन्न प्रकार की थी। एक बापदादा को, अनेक बच्चों की सौगातें अनेक संख्या में मिलीं। ऐसी सौगातें और इतनी सौगातें विश्व में किसी को भी मिल नहीं सकतीं। यह थी दिल की सौगातें दिलाराम को। और सभी मनुष्य आत्मायें स्थूल सौगात देते हैं। लेकिन संगमयुग में यह विचित्र बाप और विचित्र सौगातें हैं। तो बापदादा सभी के स्नेह की सौगात देख हर्षित हो रहे थे। ऐसा कोई भी बच्चा नहीं था – जिसकी सौगात नहीं पहुँची हो। भिन्न-भिन्न मूल्य की जरूर थीं। किसी की ज्यादा मूल्य की थी। किसी की कम। जितना अटूट और सर्व सम्बन्ध का स्नेह था उतने वैल्यु की सौगात थी। नम्बरवार स्नेह और सम्बन्ध के आधार से दिल की सौगात थी। दोनों ही बाप सौगातों में से नम्बरवार मूल्यवान की माला बना रहे थे, और माला को देख चेक कर रहे थे कि मूल्य का अन्तर विशेष किस बात से है। तो क्या देखा? स्नेह सभी का है, सम्बन्ध भी सभी का है, सेवा भी सभी की है लेकिन स्नेह में आदि से अब तक संकल्प द्वारा वा स्वप्न में भी और कोई व्यक्ति या वैभव की तरफ बुद्धि आकर्षित नहीं हुई हो। एक बाप के एकरस अटूट स्नेह में सदा समाये हुए हों। सदा स्नेह के अनुभवों के सागर में ऐसा समाया हुआ हो जो सिवाए उस संसार के और कोई व्यक्ति वा वस्तु दिखाई न दे। बेहद के स्नेह का आकाश और बेहद के अनुभवों का सागर। इस आकाश और सागर के सिवाए और कोई आकर्षण न हो। ऐसे अटूट स्नेह की सौगात नम्बरवार वैल्युएबल थी। जितने वर्ष बीते हैं उतने वर्षों के स्नेह की वैल्यु आटोमेटिक जमा होती रहती है और उतनी वैल्यु की सौगात बापदादा के सामने प्रत्यक्ष हुई। तीन बातों की विशेषता सभी की देखी –
1. स्नेह अटूट है – दिल का स्नेह है वा समय प्रमाण आवश्यकता के कारण, अपने मतलब को सिद्ध करने के कारण है – ऐसा स्नेह तो नहीं है? 2. सदा स्नेह स्वरूप इमर्ज रूप में है वा समय पर इमर्ज होता बाकी समय मर्ज रहता है? 3. दिल खुश करने का स्नेह है वा जिगरी दिल का स्नेह है? तो स्नेह में यह सब बातें चेक की।
2. सम्बन्ध में – पहली बात सर्व सम्बन्ध है वा कोई-कोई विशेष सम्बन्ध है? एक भी सम्बन्ध की अनुभूति अगर कम है तो सम्पन्नता में कमी है और समय प्रति समय वह रहा हुआ एक सम्बन्ध भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है। जैसे बाप शिक्षक सतगुरू यह विशेष सम्बन्ध तो जोड़ लिया लेकिन छोटा सा सम्बन्ध पोत्रा धोत्रा भी नहीं बनाया तो वह भी सम्बन्ध अपने तरफ खींच लेगा। तो सम्बन्ध में सर्व सम्बन्ध है?
दूसरी बात, बाप से हर सम्बन्ध 100 प्रतिशत है वा कोई सम्बन्ध 100 प्रतिशत है, कोई 50 प्रतिशत है वा नम्बरवार है? परसेन्टेज में भी फुल है वा थोड़ा अलौकिक, थोड़ा लौकिक, दोनों में परसेन्टेज में बांटा हुआ है?
तीसरा, सर्व सम्बन्ध की अनुभूति का रूहानी रस सदा अनुभव करते वा जब आवश्यकता होती है तब अनुभव करते? सदा सर्व सम्बन्धों का रस लेने वाले हैं वा कभी-कभी?
3. सेवा में – सेवा में विशेष क्या चेक किया होगा? पहली बात – जो मोटे रूप में चेकिंग है – मन, वाणी, कर्म वा तन-मन-धन सब प्रकार की सेवा का खाता जमा है? दूसरी बात – तन-मन-धन, मन-वाणी-कर्म इन 6 बातों में जितना कर सकते हैं उतना किया है वा जितना कर सकते हैं, उतना न कर यथा शक्ति स्थिति के प्रमाण किया है? आज स्थिति बहुत अच्छी है तो सेवा की परसेन्टेज भी अच्छी, कल कारण अकारण स्थिति कमजोर है तो सेवा की परसेन्टेज भी कमजोर रही है। जितना और उतना नहीं हुआ। इस कारण यथा शक्ति नम्बरवार बन जाते हैं।
तीसरी बात – जो बापदादा द्वारा ज्ञान का खजाना, शक्तियों का खजाना, गुणों का खजाना, खुशियों का खजाना, श्रेष्ठ समय का खजाना, शुद्ध संकल्पों का खजाना मिला है, उन सब खजानों द्वारा सेवा की है वा कोई-कोई खजाने द्वारा सेवा की है? अगर एक खजाने में भी सेवा करने में कमी की है वा फराखदिल हो खजानों को कार्य में नहीं लगाया है, थोड़ा बहुत कर लिया अर्थात् कन्जूसी की तो इसका भी रिजल्ट में अन्तर पड़ जाता है!
चौथी बात – दिल से की है वा ड्युटी प्रमाण की है सेवा की सदा बहती गंगा है वा सेवा में कभी बहना कभी रूकना। मूड है तो सेवा की, मूड नहीं तो नहीं की। ऐसे रूकने वाले तालाब तो नहीं है।
ऐसे तीनों बातों की चेकिंग प्रमाण हरेक की वैल्यु चेक की। तो ऐसे-ऐसे विधिपूर्वक हर एक अपने आपको चेक करो। और इस नये वर्ष में यही दृढ़ संकल्प करो कि कमी को सदा के लिए समाप्त कर सम्पन्न बन, नम्बरवन मूल्यवान सौगात बाप के आगे रखेंगे। चेक करना और फिर चेन्ज करना आयेगा ना। रिजल्ट प्रमाण अभी किसी न किसी बात में मैजारिटी यथाशक्ति है। सम्पन्न शक्ति स्वरुप नहीं है। इसलिए अब बीती को बीती कर वर्तमान और भविष्य सम्पन्न, शक्तिशाली बनो।
आप लोगों के पास भी सौगातें इकट्ठी होती हैं तो चेक करते हो ना, कौन-सी कौन-सी वैल्युएबल है। बापदादा भी बच्चों का यही खेल कर रहे थे। सौगातें तो अथाह थीं। हर एक ने अपने अनुसार अच्छे ते अच्छा उमंग उत्साह भरा संकल्प, शक्तिशाली संकल्प बाप के आगे किया है। अब सिर्फ यथाशक्ति के बजाए सदा शक्तिशाली – यह परिवर्तन करना। समझा। अच्छा।
सभी सदा के स्नेही, दिल के स्नेही, सर्व सम्बन्धों के स्नेही, रूहानी रस के अनुभवी आत्मायें, सर्व खजानों द्वारा शक्तिशाली, सदा सेवाधारी, सर्व बातों में यथाशक्ति को सदा शक्तिशाली में परिवर्तन करने वाले, विशेष स्नेही और समीप सम्बन्धी आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
दादी जानकी जी से:- मधुबन का श्रृंगार मधुबन में पहुंच गया। भले पधारे। बापदादा और मधुबन का विशेष श्रृंगार हो, विशेष श्रृंगार से क्या होता है? चमक हो जाती है ना। तो बापदादा और मधुबन विशेष श्रृंगार को देख हर्षित हो रहे हैं। विशेष सेवा में बाप के स्नेह और सम्बन्ध को प्रत्यक्ष किया, यह विशेष सेवा सबके दिलों को समीप लाने वाली है। रिजल्ट तो सदा अच्छी है। फिर भी समय-समय की अपनी विशेषता की रिजल्ट होती है तो बाप के स्नेह को अपनी स्नेही सूरत से नयनों से प्रत्यक्ष किया यह विशेष सेवा की। सुनने वाला बनाना, यह कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन स्नेही बनाना यह है विशेष सेवा। जो सदा होती रहेगी। कितने पतंगे देखे, शमा पर फिदा होने की इच्छा वाले कितने परवाने देखे? अभी नयनों की नजर से परवानों को शमा की ओर इशारा करने का ही विशेष समय है। इशारा मिला और चलते रहेंगे। उड़ते-उड़ते पहुँच जायेंगे। तो यह विशेष सेवा आवश्यक भी है और की भी है। ऐसी रिजल्ट है ना। अच्छा है हर कदम में अनेक आत्माओं की सेवा समाई हुई है, कितने कदम उठाये? तो जितने कदम उतने ही आत्माओं की सेवा। अच्छा चक्र रहा। उन्हों के भी उमंग उत्साह की अभी सीजन है। जो होता है वह अच्छे से अच्छा होता है। बापदादा के मुरब्बी बच्चों के हर कर्म की रेखा से अनेकों के कर्मों की रेखा बदलती है। तो हर कर्म की रेखा से अनेकों की तकदीर की लकीर खींची। चलना अर्थात् तकदीर खींचना। तो जहाँ-जहाँ जाते हैं अपने कर्मों की कलम से अनेकों की तकदीर की लकीरें खींचते जाते। तो कदम अर्थात् कर्म ही मुरब्बी बच्चों के तकदीर की लकीर खींचने की सेवा के निमित्त बनें। तो अभी बाकी लास्ट आवाज है – “यही हैं, यही हैं” जिसको ढूँढते हैं वे यही हैं। अभी सोचते हैं – यह हैं वा वह हैं। लेकिन सिर्फ एक ही आवाज निकले यही हैं। अभी वह समय समीप आ रहा है। तकदीर की लकीर लम्बी होते-होते यह भी बुद्धि का जो थोड़ा सा ताला रहा हुआ है वह खुल जायेगा। चाबी तो लगाई है, खुला भी है लेकिन अभी थोड़ा सा अटका हुआ है, वह भी दिन आ जायेगा।
अध्याय : सर्वोत्तम स्नेह, सम्बन्ध और सेवा
(अव्यक्त मुरली – 12-01-1985)
भूमिका : दिल की सौगातें और दिलाराम
मुरली नोट – 12 जनवरी 1985
आज बापदादा सभी बच्चों की स्नेह भरी सौगातें देख रहे थे।
यह सौगातें कोई स्थूल वस्तु नहीं थीं,
बल्कि दिल की सौगातें थीं —
जो केवल संगमयुग में ही सम्भव हैं।
उदाहरण:
दुनिया में लोग गिफ्ट, धन, फूल देते हैं
लेकिन यहाँ आत्माएँ
याद, स्नेह और भावनाओं की सौगात देती हैं।
अध्याय 1 : स्नेह की सच्ची परख
“स्नेह है या आवश्यकता?”
बापदादा ने स्नेह को तीन बातों में चेक किया —
1️⃣ स्नेह अटूट है या स्वार्थ आधारित?
क्या हमारा स्नेह
-
सिर्फ समय-समय पर है?
-
या आवश्यकता पड़ने पर है?
-
या एक बाप के प्रति एकरस है?
उदाहरण:
जैसे मोबाइल नेटवर्क —
कभी आता, कभी जाता —
ऐसा स्नेह अटूट नहीं कहलाता।
2️⃣ स्नेह इमर्ज है या मर्ज?
क्या स्नेह
-
सदा दिखाई देता है
या -
सिर्फ प्रोग्राम, सम्मेलन, मधुबन में?
मुरली भाव:
सच्चा स्नेह स्वप्न में भी बाप के सिवाय कुछ न देखे।
3️⃣ दिल खुश करने वाला या जिगरी स्नेह?
-
सिर्फ अच्छा-अच्छा बोलना
या -
दिल से जुड़ाव?
उदाहरण:
जैसे रिश्तों में
औपचारिक मुस्कान और
माँ का स्नेह —
दोनों अलग होते हैं।
🔷 अध्याय 2 : सर्व सम्बन्धों की सम्पूर्णता
“एक भी सम्बन्ध की कमी, सम्पन्नता की कमी”
मुरली नोट – 12-01-1985
बाप से सर्व सम्बन्ध —
बाप, शिक्षक, सतगुरु, मित्र, सहारा —
सबका अनुभव होना आवश्यक है।
तीन गहरी चेकिंग —
1️⃣ सर्व सम्बन्ध या कुछ ही?
अगर एक सम्बन्ध भी कम है,
तो वही आकर्षण बन जाता है।
उदाहरण:
अगर बाप को शिक्षक तो मान लिया
लेकिन सहारा नहीं माना,
तो संकट में बुद्धि इधर-उधर जाएगी।
2️⃣ 100% सम्बन्ध या प्रतिशत में बंटा हुआ?
-
थोड़ा बाप
-
थोड़ा लौकिक सहारा
→ यह मिलावट है।
3️⃣ रस सदा है या जरूरत पर?
क्या हम
हर समय सम्बन्धों का रस लेते हैं
या
सिर्फ परेशानी में?
🔷 अध्याय 3 : सेवा की गहराई और सच्चाई
“ड्यूटी नहीं, दिल की बहती गंगा”
मुरली नोट – 12-01-1985
सेवा में चार विशेष चेकिंग हुई —
1️⃣ सेवा का खाता पूरा है?
मन, वाणी, कर्म, तन, मन, धन —
छहों प्रकार की सेवा।
उदाहरण:
सिर्फ बोलना सेवा नहीं,
वायब्रेशन देना भी सेवा है।
2️⃣ यथाशक्ति या शक्तिशाली?
-
मूड है तो सेवा
-
मूड नहीं तो ब्रेक
➡️ इसे तालाब सेवा कहा।
3️⃣ सभी खजानों से सेवा या कुछ से?
ज्ञान, शक्ति, गुण, खुशी, समय, शुद्ध संकल्प —
सबका उपयोग हुआ?
कंजूसी = रिजल्ट में कमी
4️⃣ दिल से सेवा या ड्यूटी से?
मुरली भाव:
सच्ची सेवा सदा बहती गंगा है।
अध्याय 4 : बापदादा का खेल – सौगातों की माला
बापदादा
सभी बच्चों की सौगातों की
मूल्यवान माला बना रहे थे।
उदाहरण:
जैसे घर में उपहार खोलते समय
देखते हैं —
कौन-सा अमूल्य है।
अध्याय 5 : इस वर्ष का दृढ़ संकल्प
“यथाशक्ति से शक्तिशाली”
मुरली नोट – 12-01-1985
अब समय है —
-
बीती को बीती करने का
-
वर्तमान और भविष्य को सम्पन्न बनाने का
मंत्र:
“चेक करो और चेन्ज करो”
विशेष मुरली अंश : दादी जानकी जी
मुरली नोट – 12-01-1985
🔹 स्नेह से स्नेही बनाना — सबसे बड़ी सेवा
🔹 नयनों की दृष्टि से आत्माओं को समीप लाना
🔹 हर कदम = अनेक आत्माओं की तकदीर की रेखा
उदाहरण:
मुरब्बी आत्मा का
एक कर्म
सैकड़ों की तकदीर बदल देता है।
निष्कर्ष : सबसे मूल्यवान सौगात कौन-सी?
न धन
न साधन
न पद
बल्कि —
✔ अटूट स्नेह
✔ सर्व सम्बन्धों का रस
✔ सदा बहती सेवा
यही है
बापदादा को प्रिय सौगात।
प्रश्न 1 :
बापदादा आज किस बात को देखकर हर्षित हो रहे थे?
उत्तर :
बापदादा सभी बच्चों की स्नेह भरी दिल की सौगातों को देखकर हर्षित हो रहे थे। यह सौगातें स्थूल नहीं, बल्कि आत्मिक स्नेह, सम्बन्ध और सेवा की थीं।
प्रश्न 2 :
संगमयुग की सौगातें और लौकिक सौगातों में क्या अंतर है?
उत्तर :
लौकिक सौगातें स्थूल होती हैं, जबकि संगमयुग की सौगातें दिल की, आत्मिक और भावनात्मक होती हैं, जो सीधे दिलाराम बाप तक पहुँचती हैं।
प्रश्न 3 :
स्नेह की सौगात की वैल्यु किस आधार पर तय होती है?
उत्तर :
जितना अटूट, एकरस और सर्व सम्बन्धों का स्नेह होता है, उतनी ही उस सौगात की वैल्यु होती है। यह नम्बरवार स्नेह और सम्बन्ध के आधार पर होती है।
प्रश्न 4 :
बापदादा ने स्नेह में किन तीन बातों की विशेष चेकिंग की?
उत्तर :
-
स्नेह अटूट है या स्वार्थ अथवा आवश्यकता आधारित है।
-
स्नेह सदा इमर्ज रहता है या समय-समय पर।
-
स्नेह दिल खुश करने वाला है या जिगरी दिल का सच्चा स्नेह है।
प्रश्न 5 :
सम्बन्ध में कमी क्यों आकर्षण का कारण बनती है?
उत्तर :
यदि बाप से सर्व सम्बन्धों की अनुभूति नहीं है और कोई एक भी सम्बन्ध कम है, तो वही अधूरा सम्बन्ध बुद्धि को अपनी ओर खींच लेता है।
प्रश्न 6 :
बाप से सम्बन्धों में सम्पूर्णता कैसे जानी जाती है?
उत्तर :
जब बाप से हर सम्बन्ध 100 प्रतिशत अनुभव में हो और कोई सम्बन्ध अलौकिक–लौकिक में विभाजित न हो।
प्रश्न 7 :
सेवा में बापदादा ने पहली मुख्य चेकिंग क्या की?
उत्तर :
यह देखा कि तन–मन–धन तथा मन–वाणी–कर्म—इन सभी प्रकार की सेवाओं का खाता जमा है या नहीं।
प्रश्न 8 :
“यथाशक्ति” और “सदा शक्तिशाली” सेवा में क्या अंतर है?
उत्तर :
यथाशक्ति सेवा स्थिति पर निर्भर होती है, जबकि सदा शक्तिशाली सेवा परिस्थिति से स्वतंत्र, निरन्तर और स्थिर होती है।
प्रश्न 9 :
सेवा में खजानों का उपयोग क्यों आवश्यक है?
उत्तर :
क्योंकि बाप द्वारा दिए गए ज्ञान, शक्ति, गुण, खुशी, श्रेष्ठ समय और शुद्ध संकल्प—इन सभी खजानों से सेवा करने पर ही सेवा सम्पूर्ण और प्रभावशाली बनती है।
प्रश्न 10 :
ड्युटी प्रमाण सेवा और दिल से की गई सेवा में क्या अंतर है?
उत्तर :
ड्युटी प्रमाण सेवा सीमित और रुक-रुक कर होती है, जबकि दिल से की गई सेवा सदा बहती गंगा समान निरन्तर चलती रहती है।
प्रश्न 11 :
नये वर्ष के लिए बापदादा ने कौन-सा संकल्प करने को कहा?
उत्तर :
कमी को सदा के लिए समाप्त कर, सम्पन्न बनकर, नम्बरवन मूल्यवान सौगात बापदादा के सामने रखने का दृढ़ संकल्प।
प्रश्न 12 :
दादी जानकी जी के माध्यम से बापदादा ने विशेष सेवा को कैसे बताया?
उत्तर :
सिर्फ सुनने वाला नहीं, बल्कि स्नेही बनाने की सेवा को विशेष सेवा बताया, जो आत्माओं को स्वतः समीप लाने वाली है।
प्रश्न 13 :
“कदम अर्थात् कर्म” का क्या अर्थ बताया गया?
उत्तर :
हर कदम, हर कर्म के द्वारा अनेक आत्माओं की तकदीर की लकीर खिंचती है। चलना अर्थात् सेवा द्वारा भाग्य रचना।
प्रश्न 14 :
अन्त में बापदादा का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर :
यथाशक्ति को सदा शक्तिशाली में परिवर्तन करना और स्नेह, सम्बन्ध व सेवा—तीनों में सम्पूर्णता लाना।
Disclaimer:
यह वीडियो ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त मुरली (12 जनवरी 1985) पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन और आत्मचिंतन हेतु बनाया गया है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, व्यक्ति या विचारधारा की आलोचना नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और ईश्वरीय ज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करना है।
सभी विचार मुरली के मूल भावों पर आधारित हैं।
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