AV-07/18-11-1993-“संगमयुग के राजदुलारे सो भविष्य के राज्य अधिकारी”
“संगमयुग के राजदुलारे सो भविष्य के राज्य अधिकारी”
आज सर्व बच्चों के दिलाराम बाप अपने चारों ओर के सर्व राजदुलारे बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चा दिलाराम के दुलार का पात्र है। यह दिव्य दुलार, परमात्म दुलार कोटों में कोई भाग्यवान आत्माओं को ही प्राप्त होता है। अनेक जन्म आत्माओं वा महान् आत्माओं द्वारा दुलार अनुभव किया। अब इस एक अलौकिक जन्म में परमात्म प्यार वा दुलार अनुभव कर रहे हो। इस दिव्य दुलार द्वारा राज दुलारे बन गये हो। इसलिये दिलाराम बाप को भी अलौकिक फ़खर है कि मेरा हर एक बच्चा राजा बच्चा है। राजा हो ना? प्रजा तो नहीं? सभी अपना टाइटल क्या बताते हो? राजयोगी। सभी राजयोगी हो वा कोई प्रजायोगी भी है? सब राजयोगी हो तो प्रजा कहाँ से आयेगी? राज्य किस पर करेंगे? प्रजा तो चाहिये ना? तो वो प्रजायोगी कब आयेंगे? राजदुलारे अर्थात् अब के भी राजे और भविष्य के भी राजे। डबल राज्य है। स़िर्फ भविष्य का राज्य नहीं। भविष्य से पहले अब स्वराज्य अधिकारी बने हो। अपने स्वराज्य के राज्य कारोबार को चेक करते हो? जैसे भविष्य राज्य की महिमा करते हो – एक राज्य, एक धर्म, सुख, शान्ति, सम्पत्ति सम्पन्न राज्य है, ऐसे हे स्वराज्य अधिकारी राजे, स्वराज्य के राज कारोबार में यह सब बातें सदा हैं?
एक राज्य है अर्थात् सदा मुझ आत्मा का राज्य इन सर्व राज्य कारोबारी कर्मेन्द्रियों पर है वा बीच-बीच में स्वराज्य के बजाय पर-राज्य अपना अधिकार तो नहीं करते? पर-राज्य है – माया का राज्य। पर-राज्य की निशानी है पर-अधीन बन जायेंगे। स्वराज्य की निशानी है सदा श्रेष्ठ अधिकारी अनुभव करेंगे। पर-राज्य, पर-अधीन वा परवश बनाता है। जब भी कोई अन्य राजा किसी राज्य पर अधिकार प्राप्त करता है तो पहले राजा को ही कैदी बनाता है अर्थात् पर-अधीन बनाता है। तो चेक करो कि एक राज्य है? कि बीच-बीच में माया के राज्य अधिकारी, आप स्वराज्य अधिकारी राजाओं को वा आपके कोई भी कर्मेन्द्रियों रूपी राज कारोबारी को परवश तो नहीं बना देते हैं? तो एक राज्य है वा दो राज्य है? आप स्वराज्य अधिकारी का लॉ और ऑर्डर चलता है वा बीच-बीच में माया का भी ऑर्डर चलता है?
साथ-साथ एक धर्म, धर्म अर्थात् धारणा। तो स्वराज्य का धर्म वा धारणा एक कौन-सी है? ‘पवित्रता’। मन, वचन, कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क सब प्रकार की पवित्रता इसको कहा जाता है – एक धर्म अर्थात् एक धारणा। स्वप्न मात्र, संकल्प मात्र भी अपवित्रता अर्थात् दूसरा धर्म न हो। क्योंकि जहाँ पवित्रता है वहाँ अपवित्रता अर्थात् व्यर्थ वा विकल्प का नाम-निशान नहीं होगा। ऐसे समर्थ सम्राट बने हो? वा ढीलेढाले राजे हो? वा कभी ढीले, कभी सम्राट? कौन से राजे हो? अगर अभी छोटा-सा एक जन्म का राज्य नहीं चला सकते तो 21 जन्म का राज्य अधिकार कैसे प्राप्त करेंगे? संस्कार अब भर रहे हैं। अभी के श्रेष्ठ संस्कार से भविष्य संसार बनेगा। तो अभी से एक राज्य, एक धर्म के संस्कार भविष्य संसार का फाउण्डेशन है।
तो चेक करो – सुख, शान्ति, सम्पत्ति अर्थात् सदा हद की प्राप्तियों के आधार पर सुख है वा आत्मिक अतीन्द्रिय सुख परमात्म सुखमय राज्य है? साधन वा सैलवेशन वा प्रशंसा के आधार पर सुख की अनुभूति है वा परमात्म आधार पर अतीन्द्रिय सुखमय राज्य है? इसी प्रकार से अखण्ड शान्ति – किसी भी प्रकार की अशान्ति की परिस्थिति अखण्ड शान्ति को खण्डित तो नहीं करती है? अशान्ति का त़ूफान चाहे छोटा हो, चाहे बड़ा हो लेकिन स्वराज्य अधिकारी के लिये त़ूफान अनुभवी बनाने की उड़ती कला का तोह़फा बन जाये, लिफ्ट की गिफ्ट बन जाये। इसको कहा जाता है अखण्ड शान्ति। तो चेक करो अखण्ड शान्तिमय स्वराज्य है?
ऐसे ही सम्पत्ति अर्थात् स्वराज्य की सम्पत्ति ज्ञान, गुण और शक्तियां हैं। इन सर्व सम्पत्तियों से सम्पन्न स्वराज्य अधिकारी हैं? सम्पन्नता की निशानी है – सम्पन्नता अर्थात् सदा सन्तुष्टता, अप्राप्ति का नाम-निशान नहीं। हद के इच्छाओं की अविद्या इसको कहा जाता है सम्पत्तिवान। और राजा का अर्थ ही है दाता। अगर हद की इच्छा वा प्राप्ति की उत्पत्ति है तो वो राजा के बजाय मंगता (मांगने वाला) बन जाता है। इसलिये अपने स्वराज्य अधिकार को अच्छी तरह से चेक करो कि मेरा स्वराज्य एक राज्य, एक धर्म, सुख-शान्ति सम्पन्न बना है? कि अभी तक बन रहे हैं? अगर राजा बन रहे हैं तो जब राज्य अधिकारी स्थिति नहीं है तो उस समय क्या हो? प्रजा बन जाते हो वा न राजा, न प्रजा। बीच में हो? अभी बीच में नहीं रहो। यह भी नहीं सोचना कि अन्त में बन जायेंगे। अगर बहुतकाल का राज्य-भाग्य प्राप्त करना ही है तो बहुतकाल के स्वराज्य का फल है बहुतकाल का राज्य। फुल समय के राज्य अधिकार का आधार वर्तमान सदाकाल का स्वराज्य है। समझा? कभी अलबेले नहीं रह जाना। हो जायेगा, हो जायेगा नहीं करते रहना। बापदादा को बहुत मीठी बातों से बहलाते हैं। राजा के बजाय बहुत बढ़िया वकील बन जाते हैं। ऐसी-ऐसी लॉ प्वॉइन्ट्स सुनाते हैं जो बाप भी मुस्कराते रहते हैं। वकील अच्छा या राजा अच्छा? बहुत होशियारी से वकालत करते हैं। इसलिये अब वकालत करना छोड़ दो, राज दुलारे बनो। बाप का बच्चों से स्नेह है इसलिये सुनते-देखते भी मुस्कराते रहते हैं। अभी धर्मराज से काम नहीं लेते।
स्नेह सभी को चला रहा है। स्नेह के कारण ही पहुँच गये हो ना। तो स्नेह के रेसपान्स में बापदादा भी पद्मगुणा स्नेह का रिटर्न दे रहे हैं। देश-विदेश के सभी बच्चे स्नेह के विमान द्वारा मधुबन में पहुँचे हो। बापदादा साकार रूप में आप सबको और स्नेह स्वरूप में सर्व बच्चों को देख रहे हैं। अच्छा!
सर्व स्नेह में समाये हुए समीप बच्चों को, सर्व स्वराज्य अधिकारी सो विश्व राज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व प्राप्तियों सम्पन्न श्रेष्ठ सम्पत्तिवान विशेष आत्माओं को, सदा एक धर्म, एक राज्य सम्पन्न स्वराज्य अधिकारी बाप समान भाग्यवान आत्माओं को भाग्यविधाता बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात:-
सभी कार्य अच्छे चल रहे हैं ना? अच्छे उमंग-उत्साह से कार्य हो रहा है। करावनहार करा रहे हैं और निमित्त बन करने वाले कर रहे हैं। ऐसे अनुभव होता है ना? सर्व के सहयोग की अंगुली से हर कार्य सहज और सफल होता है। कैसे हो रहा है ये जादू लगता है ना। दुनिया वाले तो देखते और सोचते रह जाते हैं। और आप निमित्त आत्मायें सदा आगे बढ़ते जायेंगे। क्योंकि बेफिक्र बादशाह हो। दुनिया वालों को तो हर कदम में चिन्ता है और आप सबके हर संकल्प में परमात्म चिन्तन है इसलिये बेफिक्र हैं। बेफिक्र हैं ना? अच्छा है, अविनाशी सम्बन्ध है। अच्छा, तो सब ठीक चल रहा है और चलना ही है। निश्चय है और निश्चिन्त हैं। क्या होगा, कैसे होगा यह चिन्ता नहीं है।
टीचर्स को कोई चिन्ता है? सेन्टर्स कैसे बढ़ेंगे यह चिन्ता है? सेवा कैसे बढ़ेगी यह चिन्ता है? नहीं है? बेफिक्र हो? चिन्तन करना अलग चीज़ है, चिन्ता करना अलग चीज़ है। सेवा बढ़ाने का चिन्तन अर्थात् प्लैन भले बनाओ। लेकिन चिन्ता से कभी सफलता नहीं होगी। चलाने वाला चला रहा है, कराने वाला करा रहा है इसलिये सब सहज होना ही है, स़िर्फ निमित्त बन संकल्प, तन, मन, धन सफल करते चलो। जिस समय जो कार्य होता है वो कार्य हमारा कार्य है। जब हमारा कार्य है, मेरा कार्य है तो जहाँ मेरापन होता है वहाँ सब कुछ स्वत: ही लग जाता है। तो अभी ब्राह्मण परिवार का विशेष कार्य कौन-सा है? टीचर्स बताओ। ब्राह्मण परिवार का अभी विशेष कार्य कौन सा है, किसमें सफल करेंगे? (ज्ञान सरोवर में) सरोवर में सब स्वाहा करेंगे। परिवार में जो विशेष कार्य होता है तो सबका अटेन्शन कहाँ होता है? उसी विशेष कार्य के तरफ अटेन्शन होता है। ब्राह्मण परिवार में बड़े से बड़ा कार्य वर्तमान समय यही है ना। हर समय का अपना-अपना है, वर्तमान समय देश-विदेश सर्व ब्राह्मण परिवार का सहयोग इस विशेष कार्य में है ना कि अपने-अपने सेन्टर में है? जितना बड़ा कार्य उतनी बड़ा दिल। और जितनी बड़ा दिल होता है ना उतनी स्वत: ही सम्पन्नता होती है। अगर छोटा दिल होता है तो जो आना होता है वह भी रुक जाता है, जो होना होता है वह भी रुक जाता है। और बड़े दिल से असम्भव भी सम्भव हो जाता है। मधुबन का ज्ञान सरोवर है वा आपका है? किसका है? मधुबन का है ना? गुजरात का तो नहीं है, मधुबन का है? महाराष्ट्र का है? विदेश का है? सभी का है। बेहद की सेवा का बेहद का स्थान अनेक आत्माओं को बेहद का वर्सा दिलाने वाला है। ठीक है ना। अच्छा!
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात
ग्रुप नं. 1 स्व-परिवर्तन का वायब्रेशन ही विश्व परिवर्तन करायेगा
सभी अपने को खुशनसीब आत्मायें अनुभव करते हो? खुशी का भाग्य जो स्वप्न में भी नहीं था वो प्राप्त कर लिया। तो सभी की दिल सदा यह गीत गाती है कि सबसे खुशनसीब हूँ तो मैं हूँ। यह है मन का गीत। मुख का गीत गाने के लिये मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन मन का गीत सब गा सकते हैं। सबसे बड़े से बड़ा ख़ज़ाना है खुशी का ख़ज़ाना। क्योंकि खुशी तब होती है जब प्राप्ति होती है। अगर अप्राप्ति होगी तो कितना भी कोई किसी को खुश रहने के लिये कहे, कितना भी आर्टीफिशयल खुश रहने की कोशिश करे लेकिन रह नहीं सकते। तो आप सदा खुश रहते हो या कभी-कभी रहते हो? जब चैलेन्ज करते हो कि हम भगवान के बच्चे हैं, तो जहाँ भगवान् है वहाँ कोई अप्राप्ति हो सकती है? तो खुशी भी सदा है क्योंकि सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप हैं। ब्रह्मा बाप का क्या गीत था? पा लिया – जो था पाना। तो यह स़िर्फ ब्रह्मा बाप का गीत है या आप सबका? कभी-कभी थोड़ी दु:ख की लहर आ जाती है? कब तक आयेगी? अभी थोड़ा समय भी दु:ख की लहर नहीं आये। जब विश्व परिवर्तन करने के निमित्त हो तो अपना ये परिवर्तन नहीं कर सकते हो? अभी भी टाइम चाहिये, फुलस्टॉप लगाओ। ऐसा श्रेष्ठ समय, श्रेष्ठ प्राप्तियाँ, श्रेष्ठ सम्बन्ध सारे कल्प में नहीं मिलेगा। तो पहले स्व-परिवर्तन करो। यह स्व-परिवर्तन का वायब्रेशन ही विश्व परिवर्तन करायेगा।
डबल विदेशी आत्माओं की विशेषता है फ़ास्ट लाइफ़। तो परिवर्तन में फ़ास्ट हैं? फ़ारेन में कोई ढीला-ढाला चलता है तो अच्छा नहीं लगता है ना। तो इसी विशेषता को परिवर्तन में लाओ। अच्छा है। आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ते ही रहेंगे। पहचानने की दृष्टि अच्छी तेज़ है जो बाप को पहचान लिया। अभी पुरुषार्थ में भी तीव्र, सेवा में भी तीव्र और मंज़िल पर सम्पूर्ण बन पहुँचने में भी तीव्र। फ़र्स्ट नम्बर आना है ना? जैसे ब्रह्मा बाप फर्स्ट हुआ ना तो ब्रह्मा बाप के साथी बन फर्स्ट के साथ फर्स्ट में आयेंगे। ब्रह्मा बाप से प्यार है ना। अच्छा, मातायें कमाल करेंगी ना। जो दुनिया असम्भव समझती है वो आपने सहज करके दिखा दिया। ऐसा कमाल कर रही हो ना। दुनिया वाले समझते हैं कि मातायें निर्बल हैं, कुछ नहीं कर सकतीं आप असम्भव को सम्भव करके विश्व परिवर्तन में सबसे आगे बढ़ रही हो। पाण्डव क्या कर रहे हो? असम्भव को सम्भव तो कर रहे हो ना। पवित्रता का झण्डा लहराया है ना। हाथ में अच्छी तरह से झण्डा पकड़ा है या कभी नीचे हो जाता है? सदा पवित्रता के चैलेन्ज का झण्डा लहराते रहो।
ग्रुप नं. 2 रोज़ अमृतवेले कम्बाइण्ड स्वरूप की स्मृति का तिलक लगाओ
सदा अपने को सहज योगी अनुभव करते हो? कितनी भी परिस्थितियां मुश्किल अनुभव कराने वाली हों लेकिन मुश्किल को भी सहज करने वाले सहजयोगी हैं, ऐसे हो या मुश्किल के समय मुश्किल का अनुभव होता है? सदा सहज है? मुश्किल होने का कारण है बाप का साथ छोड़ देते हो। जब अकेले बन जाते हो तो कमजोर पड़ जाते हो और कमजोर को तो सहज बात भी मुश्किल लगती है। इसलिये बापदादा ने पहले भी सुनाया है कि सदा कम्बाइण्ड रूप में रहो। कम्बाइण्ड को कोई अलग नहीं कर सकता। जैसे इस समय आत्मा और शरीर कम्बाइण्ड है ऐसे बाप और आप कम्बाइण्ड रहो। मातायें क्या समझती हो? कम्बाइण्ड हो या कभी अलग, कभी कम्बाइण्ड? ऐसा साथ फिर कभी मिलना है? फिर क्यों साथ छोड़ देती हो? काम ही क्या दिया है? स़िर्फ यह याद रखो कि ‘मेरा बाबा’। इससे सहज काम क्या होगा? मुश्किल है? (63 जन्मों का संस्कार है) अभी तो नया जन्म हो गया ना। नया जन्म, नये संस्कार। अभी पुराने जन्म में हो या नये जन्म में? या आधा-आधा है? तो नये जन्म में स्मृति के संस्कार हैं या विस्मृति के? फिर नये को छोड़कर पुराने में क्यों जाते हो? नई चीज़ अच्छी लगती है या पुरानी चीज़ अच्छी लगती है? फिर पुराने में क्यों चले जाते हो? रोज़ अमृतवेले स्वयं को ब्राह्मण जीवन के स्मृति का तिलक लगाओ। जैसे भक्त लोग तिलक ज़रूर लगाते हैं तो आप स्मृति का तिलक लगाओ। वैसे भी देखो मातायें जो तिलक लगाती है वो साथ का तिलक लगाती हैं। तो सदा स्मृति रखो कि हम कम्बाइण्ड हैं तो इस साथ का तिलक सदा लगाओ। अगर युगल होगा तो तिलक लगायेंगे, अगर युगल नहीं होगा तो तिलक नहीं लगायेंगे। यह साथ का तिलक है। तो रोज़ स्मृति का तिलक लगाती हो या भूल जाता है? कभी लगाना भूल जाता, कभी मिट जाता! जो सुहाग होता है, साथ होता है वह कभी भूलता नहीं। तो साथी को सदा साथ रखो।
यह ग्रुप सुन्दर गुलदस्ता है। वैराइटी फूलों का गुलदस्ता शोभनीक लगता है। तो सभी जो भी, जहाँ से भी आये हैं, सभी एक-दो से प्यारे हैं। सभी सन्तुष्ट हो ना? सदा साथ हैं और सदा सन्तुष्ट हैं। बस, यही एक शब्द याद रखना कि कम्बाइण्ड हैं और सदा ही कम्बाइण्ड रह साथ जायेंगे। लेकिन साथ रहेंगे तो साथ चलेंगे। साथ रहना है, साथ चलना है। जिससे प्यार होता है उससे अलग हो नहीं सकते। हर सेकेण्ड, हर संकल्प में साथ है ही। अच्छा!
ग्रुप नं. 3 समय अमूल्य है, समय को बचाना ही तीव्र पुरुषार्थ है
सदा यह नशा रहता है कि हम अभी भी श्रेष्ठ आत्मायें हैं और आगे भी अनेक जन्म देव आत्मा रहेंगे? वर्तमान और भविष्य दोनों का नशा है ना। वर्तमान का नशा भविष्य को प्रत्यक्ष कर रहा है। अभी श्रेष्ठ हो तभी भविष्य देवात्मा बनेंगे। वर्तमान का फल भविष्य में मिलेगा। महत्व वर्तमान का है। तो वर्तमान समय के महत्व को सदा याद रखते हो? इस समय का एक-एक सेकेण्ड कितना श्रेष्ठ है? सेकेण्ड भी गंवाया तो सेकेण्ड नहीं गंवाया लेकिन बहुत कुछ गंवाया। संगमयुग का सेकेण्ड और युगों के एक वर्ष से भी ज्यादा है। तो इतना महत्व सदा याद रहता है या कभी-कभी याद रहता है? सदा याद रहे तो हर सेकेण्ड परमात्म दुआयें प्राप्त करते रहेंगे। भक्त लोग तो दुआ लेने के लिये कितना पुरुषार्थ करते हैं। कितनी तकलीफ लेते हैं। और आपको बाप की दुआयें हर समय मिलती रहती हैं। तो दुआयें जमा करते हो या खर्च हो जाती हैं? जिसकी झोली परमात्म दुआओं से सदा भरपूर है उसके पास कभी माया आ नहीं सकती। माया आती है या दूर से ही भाग जाती है? या नज़दीक आकर फिर भागती है? क्योंकि आयेगी तो फिर भगाना भी पड़ेगा। लेकिन दूर से ही भाग जायेगी तो भगाने में भी समय नहीं लगेगा। ऐसे शक्तिशाली बनो जो दूर से ही माया आने की हिम्मत नहीं रखे। जैसे कितने भी ख़ौफनाक जानवर होते हैं लेकिन अगर आपके पास लाइट है, रोशनी है तो वो आगे नहीं आते। ऐसे सर्वशक्तियों की लाइट सदा आपके साथ है तो माया दूर से ही भाग जायेगी। तो दूर से भगाने वाले हो या नज़दीक से भगाने वाले हो? क्योंकि समय अमूल्य है। समय को बचाना यही तीव्र पुरुषार्थ है। तो तीव्र पुरुषार्थी हो या पुरुषार्थी हो? तीव्र पुरुषार्थी अर्थात् मायाजीत। तीव्र पुरुषार्थी अर्थात् सदा विजयी। युद्ध करने वाले नहीं। तो सदा विजयी हो कभी हार नहीं होती? देखो गाया हुआ भी है कि जहाँ बाप है वहाँ विजय है ही। बाप सदा साथ है तो विजय है ही। थोड़ा भी किनारा किया तो युद्ध करनी पड़ेगी। तो युद्ध करने वाले नहीं, विजयी रत्न हो। कब तक युद्ध करेंगे? युद्ध करते-करते क्या बनना पड़ेगा? चन्द्रवंशी। तो चन्द्रवंशी हो या सूर्यवंशी हो? सूर्यवंशी अर्थात् सदा विजयी। तो विजय जन्म-सिद्ध अधिकार है ये अनुभव हो, कहना नहीं, अनुभव हो। अधिकार कभी रहे, कभी नहीं रहे, यह नहीं होता है। अधिकार सदा साथ होता है। अच्छा!
तीव्र पुरुषार्थ करने वाले हो ना? सेवा करना अर्थात् खाता जमा करना। सेवा नहीं है, मेवा है। नाम सेवा है लेकिन है मेवा। तो सब जगह सेवा अच्छी चल रही है। सेवा और सम्पूर्णता दोनों में आगे हो ना। निर्विघ्न सेवा में आगे हो? निर्विघ्न सेवा यही संगमयुग की विशेषता है। तो निर्विघ्न सेवा है या विघ्न आते हैं? समाचार तो बाप को पता पड़ता है ना कि विघ्न आते हैं। गुजरात को जितना समीपता का वरदान है और धरनी भी सात्विकता के वरदान की है, ऐसे ही सदा निर्विघ्न रहने के वरदान में भी सदा आगे रहना चाहिये। एग्ज़ाम्पल बनना चाहिये कि जितनी ज्यादा सेवा उतना ही निर्विघ्न। तो निर्विघ्न सेवा में नम्बरवन लेना है। कोई भी सेन्टर पर कोई खिटपिट नहीं है या अन्दर थोड़ी-थोड़ी होती है? आत्मायें बहुत अच्छी हो स़िर्फ थोड़ा हरेक निर्विघ्न बन आगे बढ़ने का संकल्प दृढ़ करो। संख्या भी अच्छी है, सेवा भी अच्छी है। यह विशेषता है। लेकिन अब यह विशेषता एड (शामिल) करो कि गुजरात निर्विघ्न सेवा में नम्बरवन हो। हिम्मत है? बाप को अच्छे लगे तभी तो अपना बनाया ना। तो अच्छे तो हो ही। अब विघ्न आने नहीं पायें। विजय का अधिकार सदा प्रत्यक्ष स्वरूप में हो। अच्छा, विजयी भव।
ग्रुप नं. 4 मनसा सेवा के लिए स्वयं की स्थिति पॉवरफुल बनाओ, निरन्तर सेवाधारी बनो
सदा अपने को बाप के स्नेही, सहयोगी और सदा सेवाधारी आत्मायें समझते हो? जैसे स्नेह अटूट है ना। परमात्म-स्नेह को कोई भी शक्ति तोड़ सकती है? असम्भव है ना कि थोड़ा-थोड़ा सम्भव है? यह अविनाशी स्नेह विनाश हो नहीं सकता। स्नेह के साथ-साथ सदा सहयोगी हैं। किस बात में सहयोगी हैं? जो बाप के डायरेक्शन्स हैं उसमें सदा सहयोगी हैं। सदा श्रीमत पर चलने में सहयोगी हैं और सदा सेवाधारी हैं। ऐसे नहीं कि सेवा का चांस मिला तो सेवाधारी। सदा सेवाधारी। ब्राह्मण बनना अर्थात् सेवा की स्टेज पर ही रहना। ब्राह्मणों का काम क्या है? सेवा करना। वो नामधारी ब्राह्मण धामा खाने वाले और आप सेवा करने वाले। तो हर सेकेण्ड सेवा की स्टेज पर हैं ऐसे समझते हो? कि जब चांस मिलता है तब सेवा करते हो? चांस पर सेवा करने वाले हो वा सदा सेवाधारी हो? खाना बनाते भी सेवा करते हो? क्या सेवा करते हो? याद में खाना बनाते हो तो यह सेवा करते हो। कोई भी कार्य करते हो तो याद में रहने से वायुमण्डल शुद्ध बनता है। क्योंकि वृत्ति से वायुमण्डल बनता है। तो याद की वृत्ति से वायुमण्डल बनाते हो। सेवाधारी अर्थात् हर समय अपने श्रेष्ठ दृष्टि से, वृत्ति से, कृति से सेवा करने वाले। जिसको भी श्रेष्ठ दृष्टि से देखते हो तो श्रेष्ठ दृष्टि भी सेवा करती है। तो निरन्तर सेवाधारी हैं। ब्राह्मण आत्मा सेवा के बिना रह नहीं सकती। जैसे यह शरीर है ना तो श्वांस के बिना नहीं रह सकता तो ब्राह्मण जीवन का श्वांस है सेवा। जैसे श्वांस न चलने पर मूर्छित हो जाते हैं ऐसे अगर ब्राह्मण आत्मा सेवा में बिज़ी नहीं तो मूर्छित हो जाती है। ऐसे पक्के सेवाधारी हो ना। तो जितना स्नेही हैं, उतना सहयोगी, उतना ही सेवाधारी हैं। सेवा का चांस तो बहुत है ना कि कभी किसको मिलता है, किसको नहीं मिलता? वाणी से सेवा का चांस नहीं मिलता लेकिन मनसा से सेवा का चांस तो हर समय है ही। सबसे पॉवरफुल और सबसे बड़े से बड़ी सेवा मनसा सेवा है। वाणी की सेवा सहज है या मनसा सेवा सहज है? मनसा सेवा के लिये पहले अपने को पॉवरफुल बनाओ। वाणी की सेवा तो स्थिति नीचे-ऊपर होते हुए भी कर लेंगे। भाषण करके आ जायेंगे। कोई कोर्स करने वाला आयेगा तो भी कोर्स करा देंगे। लेकिन मनसा सेवा ऐसे नहीं हो सकती। अगर मनसा थोड़ा भी कमजोर है तो मनसा सेवा नहीं हो सकती। वाणी की कर सकते हो। ऐसे करना नहीं है लेकिन चलता है। तो अब मनसा, वाचा, कर्मणा सब प्रकार की सेवा करो तब फुल मार्क्स ले सकेंगे। निरन्तर सेवाधारी बनो क्योंकि जितनी सेवा करते हो उतना प्रत्यक्षफल मिलता ही है। तो सेवाधारी अर्थात् प्रत्यक्षफल खाने वाले।
सभी सन्तुष्ट आत्मायें हो ना। संगम पर सन्तुष्ट नहीं रहेंगे तो कब रहेंगे? संगमयुग है ही सन्तुष्टता का युग। तो सभी सन्तुष्ट हैं कि थोड़ी खिटखिट है? न स्वयं में, न दूसरों के सम्पर्क में आने में। स्वयं सन्तुष्ट हैं लेकिन सम्पर्क में आने में सन्तुष्टता, इसमें थोड़ा फ़र्क है। माला के मणके हो ना। तो माला कैसे बनती है? सम्बन्ध से। अगर दाने का दाने से सम्पर्क नहीं हो तो माला बनेगी? तो माला के मणके हैं इसलिए सम्बन्ध-सम्पर्क में भी सदा सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना। स़िर्फ रहना नहीं है, करना भी है तब माला के मणके बनते हैं। क्योंकि सभी परिवार वाले हो, निवृत्ति वाले नहीं। परिवार का अर्थ ही है सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना। बापदादा सभी स्थानों को एक-दो से आगे ही रखते हैं। ऐसे नहीं फलाना स्थान आगे है, दूसरे पीछे हैं। बाप के लिये सब आगे हैं। चाहे नये हैं, चाहे पुराने हैं, लेकिन सब आगे हैं। और अगर गुप्त हैं तो सबसे आगे हैं। जैसे गुप्त दान महादान कहा जाता है। ऐसे अगर गुप्त पुरुषार्थी हैं, नाम आउट नहीं होता है तो ऐसे नहीं समझो कि पीछे हैं लेकिन गुप्त पुरुषार्थी सदा आगे हैं। गुप्त सेवाधारी सदा ही आगे है। तो सभी क्या याद रखेंगे? कौन हो? निरन्तर सेवाधारी। सदा सेवा की स्टेज पर पार्ट बजा रहे हो। घर में नहीं, स्टेज पर हो। सेन्टर पर नहीं, स्टेज पर हो। तो स्टेज पर अलर्ट रहते हैं, घर में जायेंगे तो अलर्ट नहीं रहेंगे, अलबेले हो जायेंगे। स्टेज पर जायेंगे तो अलर्ट हो जायेंगे। तो सदा सेवा की स्टेज पर हैं इस स्मृति से सदा अलर्ट रहना है। अच्छा!
ग्रपु नं. 5 मास्टर सर्वशक्तिमान् बन समय पर हर शक्ति को कार्य में लगाओ
अपने को सदा मास्टर सर्वशक्तिमान् अनुभव करते हो? मास्टर का अर्थ है कि हर शक्ति को जिस समय आह्वान करो तो वो शक्ति प्रैक्टिकल स्वरूप में अनुभव हो। जिस समय, जिस शक्ति की आवश्यकता हो, उस समय वो शक्ति सहयोगी बने ऐसे है? जिस समय सहनशक्ति चाहिये उस समय स्वरूप में आती है कि थोड़े समय के बाद आती है? अगर मानो शस्त्र एक मिनट पीछे काम में आया तो विजयी होंगे? विजय नहीं हो सकेगी ना। तो मास्टर सर्वशक्तिमान अर्थात् शक्ति को ऑर्डर किया और हाज़िर। ऐसे नहीं कि ऑर्डर करो सहन शक्ति को और आये सामना करने की शक्ति। तो उसको मास्टर सर्वशक्तिमान कहेंगे? जैसे कई परिस्थिति में सोचते हो कि किनारा नहीं करना है, सहन करना है लेकिन फिर सहन करते-करते सामना करने की शक्ति में आ जाते हो। ऐसे ही निर्णय शक्ति की आवश्यकता है। लेकिन निर्णय शक्ति यथार्थ समय पर यथार्थ निर्णय नहीं ले तो उसको क्या कहेंगे? मास्टर सर्वशक्तिमान् या कमजोर? तो ऐसे ट्रायल करो कि जिस समय जो शक्ति आवश्यक है उस समय वो शक्ति कार्य में आती है? एक सेकेण्ड का भी फ़र्क पड़ा तो जीत के बजाय हार हो जाती है। सेकेण्ड की बात है ना। निर्णय करना हाँ या ना। और हाँ के बजाय अगर ना कर लिया तो सेकेण्ड का नुकसान सदा के लिये हार खिलाने के निमित्त बन जाता है। इसलिये मास्टर सर्वशक्तिमान् का अर्थ ही है जो हर शक्ति ऑर्डर में हो। जैसे ये शरीर की कर्मेन्द्रियां ऑर्डर में हैं ना। हाथ पांव जब चलाओ, जैसे चलाओ वैसे चलाते हो ना ऐसे सर्वशक्तियां इतना ऑर्डर में चलें। जितना यूज़ करते जायेंगे उतना अनुभव करते जायेंगे।
माताओं में समाने की शक्ति है या थोड़ा कुछ होता है तो क्रोध आ जाता है? थोड़ा बच्चों पर क्रोध आ जाता है। पाण्डवों को गुस्सा आता है? बच्चों पर नहीं, बड़ों पर आता है? सदा अपना ये स्वमान स्मृति में रखो कि हम मास्टर सर्वशक्तिमान हैं। इस स्वमान की सीट पर सदा स्थित रहो। जैसी सीट होती है वैसे लक्षण आते हैं। कोई भी ऐसी परिस्थिति सामने आये तो सेकेण्ड में अपने इस सीट पर सेट हो जाओ। सीट पर सेट नहीं होते तो शक्तियां भी ऑर्डर नहीं मानती। सीट वाले का ऑर्डर माना जाता है। तो सेट होना आता है ना। सीट पर बैठने वाले कभी अपसेट नहीं होते। या तो है सीट या तो है अपसेट। लक्ष्य अच्छा है, लक्षण भी अच्छे हैं। सभी महावीर हैं। कभी-कभी स़िर्फ थोड़ा माया से खेल करते हो। अब के विजयी ही सदा के विजयी बनेंगे। अब विजयी नहीं तो फिर कभी भी विजयी नहीं बनेंगे। इसलिये संगमयुग है ही सदा विजयी बनने का युग। द्वापर-कलियुग हार खाने का युग है और संगम विजय प्राप्त करने का युग है। इस युग को वरदान है। तो वरदानी बन विजयी बनो।
नया प्लैन कोई बनाया है? अच्छा है, जितनी सेवा बढ़ाते हो, उतना स्वयं को आगे बढ़ाते हो। औरों की सेवा करने के पहले अपनी सेवा स्वत: ही हो जाती है। अब कोई ऐसा नामीग्रामी माइक निकालो जो स्नेह के साथ समीप वाली आत्मा बन जाये। जिस एक द्वारा अनेकों की सेवा सहज होती रहे। अभी ऐसी विशेष आत्मायें मैदान पर लाओ। समझा? अच्छा!
ग्रुप नं. 6 त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित होकर तीनों कालों को देखो तो सदा खुशी रहेगी
सदा यह नशा रहता है कि हम विशेष आत्मायें हैं? तो गाया हुआ है कोटों में कोई, कोई में भी कोई तो पहले सुनते थे लेकिन अभी अनुभव कर रहे हो कि हम ही कोटों में कोई आत्मायें थी और हैं और सदा बनेंगी। कभी सोचा था कि इतना विशेष पार्ट इस ड्रामा के अन्दर हमारा नूँधा हुआ है! लेकिन अभी प्रैक्टिकल में अनुभव कर रहे हो। पक्का निश्चय है ना। कल्प-कल्प कौन बनता है? क्या कहेंगे? हम ही थे, हम ही हैं और हम ही रहेंगे। तीनों काल का ज्ञान अभी आ गया है। त्रिकालदर्शी बन गये ना। एक सेकेण्ड में तीनों काल को देख सकते हो? क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे स्पष्ट है ना। कल पुजारी, आज पूज्य बन रहे हैं। जब त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित होते हो तो कितना मज़ा आता है। जैसे कोई भी देश में जब टॉप प्वॉइन्ट पर खड़े होकर सारे शहर को देखते हैं तो मज़ा आता है ना। ऐसे ही यह संगमयुग टॉप प्वॉइन्ट है तो इस पर खड़े होकर देखो तो मज़ा आयेगा। कल थे और कल बनने वाले हैं। इतना स्पष्ट अनुभव होता है? कल क्या बनने वाले हो? देवता। कितने बार बने हो? अनेक बार बने हो। तो कितना सहज और स्पष्ट हो गया। फ़लक से कहते हो ना हम ही तो थे और कौन होंगे। अभी तो यही दिल कहता है ना कि और कौन बनेगा, हम थे, हम ही बन रहे हैं इसको कहते हैं मास्टर नॉलेजफुल। फुल नॉलेज आ गई है ना। एक काल की नहीं, तीनों काल की। तो जैसे बाप नालेजफुल है, बाप की महिमा में फुल के कारण सागर कहते हैं। सागर सदा फुल रहता है। तो नॉलेजफुल बन गये। एक काल के भी ज्ञान की कमी नहीं। भरपूर। इतना नशा है?
सबसे ज्यादा खुशी किसको रहती है? सदा समान रहती है कि कभी कम, कभी ज्यादा रहती है? कुमारों को माया नहीं आती है? चाहे कुमार हैं, चाहे अधर कुमार हैं लेकिन अभी ब्रह्माकुमार हैं। अधर कुमार भी कुमार हैं, अधर कुमारी भी ब्रह्माकुमारी है। कुमारी जीवन या कुमार जीवन बहुत श्रेष्ठ जीवन है लेकिन ब्रह्माकुमार हैं तो। तो जो सदा खुश रहते हैं वो ब्रह्माकुमार हैं। दुनिया वाले तो सोचते रह जाते हैं और आप सदा सम्पन्न बन गये। वो सोचते रहते हैं पता नहीं क्या होगा, कब होगा और आप क्या कहते हो? जो होना था वो हो रहा है, जो पाना था वो पा लिया है, चैलेन्ज करते हो ना।
माताओं को सबसे बड़े ते बड़ी खुशी है कि बाप ने हमें अपना बना लिया। नाउम्मीद से सदा के उम्मीदवार बन गये। दुनिया वालों ने नाउम्मीद बनाया और बाप ने उम्मीदों के सितारे बना लिया। जो औरों को भी उम्मीदों के सितारे बनाने के निमित्त बने। एक्स्ट्रा खुशी यह है कि हमें बाप ने पसन्द कर लिया। कितना सहज पसन्द किया। कोई तकलीफ नहीं। पाण्डवों को क्या नशा है? पाण्डवों को अपना नशा है, अपनी खुशी है। पाण्डव सदा बाप के साथी दिखाते हैं। पाण्डवों ने कभी साथ नहीं छोड़ा, अन्त तक साथ निभाया। वही पाण्डव हो ना। पाण्डव दिल से गाते हैं कि हमारा साथी सदा भगवान् है। सदा साथ रहने वाले हैं। सदा साथ निभाने वाले हैं। ऐसे पाण्डव हो ना? सदा साथ रहने वाली वरदानी आत्मायें हैं। जब वरदाता साथ है तो वरदान भी साथ है ना। वरदानों से सदा झोली भरी हुई है। वरदान भरते-भरते इतने वरदानी बनते हो जो अनेक जन्म अनेक आत्माओं को वरदानी स्वरूप में दिखाई देते हो। आपके जड़ चित्रों से वरदान लेने आते हैं ना। ऐसे वरदानी आत्मायें बन गये। कभी वरदानों से अलग हो ही नहीं सकते। सदा भरपूर हैं।
संगमयुग के राजदुलारे | अभी स्वराज्य अधिकारी, भविष्य के विश्व राज्य अधिकारी | अव्यक्त बापदादा मुरली
Alternative Titles:
- राजदुलारे बनने का रहस्य | स्वराज्य से विश्व राज्य तक | अव्यक्त मुरली
- एक राज्य, एक धर्म, एक पवित्रता | भविष्य के राज्य अधिकारी बनने की विधि
- संगमयुग के राजा कौन हैं? | बापदादा की अमूल्य शिक्षा | BK Murli Class
अध्याय : संगमयुग के राजदुलारे – भविष्य के राज्य अधिकारी
अध्याय का उद्देश्य
इस अध्याय का उद्देश्य यह समझना है कि संगमयुग में परमात्मा द्वारा प्राप्त स्वराज्य ही भविष्य के विश्व-राज्य का आधार है। बापदादा बताते हैं कि जो आत्माएँ आज अपने मन, बुद्धि, संस्कार और कर्मेन्द्रियों पर राज्य करना सीखती हैं, वही भविष्य में विश्व के राज्य अधिकारी बनती हैं।
1. राजदुलारे कौन हैं?
बापदादा कहते हैं कि प्रत्येक ब्राह्मण आत्मा परमात्मा के दिव्य स्नेह की अधिकारी है।
यह दुलार साधारण नहीं बल्कि परमात्म दुलार है, जो करोड़ों में किसी भाग्यवान आत्मा को प्राप्त होता है।
इसलिए प्रत्येक ब्राह्मण आत्मा राजदुलारी है—
- अभी स्वराज्य की अधिकारी।
- भविष्य में विश्व राज्य की अधिकारी।
उदाहरण
जैसे किसी राजकुमार को बचपन से ही राज्य संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता है, वैसे ही संगमयुग में आत्माओं को स्वराज्य का अभ्यास कराया जाता है।
Murli Notes
- परमात्मा का दुलार आत्मा को राजा बनाता है।
- स्वराज्य भविष्य के राज्य की तैयारी है।
- राजयोगी कभी प्रजायोगी नहीं बनता।
2. स्वराज्य का वास्तविक अर्थ
स्वराज्य का अर्थ केवल स्वयं पर नियंत्रण नहीं बल्कि—
- मन पर राज्य
- बुद्धि पर राज्य
- संस्कारों पर राज्य
- कर्मेन्द्रियों पर राज्य
यदि आत्मा स्वयं की मालिक है तो वह स्वराज्य अधिकारी है।
उदाहरण
जिस प्रकार कुशल चालक वाहन को पूर्ण नियंत्रण में रखता है, उसी प्रकार राजयोगी अपने मन और इन्द्रियों को श्रीमत अनुसार चलाता है।
Murli Notes
- स्वराज्य = आत्म-नियंत्रण।
- मन का मालिक बनो, मन का दास नहीं।
- कर्मेन्द्रियाँ राजा की प्रजा हैं।
3. माया का पर-राज्य कैसे पहचानें?
जब आत्मा—
- क्रोध में आ जाए,
- लोभ में फँस जाए,
- अहंकार में आ जाए,
- मोह में बंध जाए,
तो समझना चाहिए कि माया का पर-राज्य शुरू हो गया।
उदाहरण
जिस प्रकार किसी देश पर शत्रु अधिकार कर ले तो राजा कैदी बन जाता है, वैसे ही विकार आत्मा को पराधीन बना देते हैं।
Murli Notes
- परवशता माया की निशानी है।
- अधिकारी बनो, अधीन नहीं।
- माया का आदेश नहीं, श्रीमत का आदेश मानो।
4. एक राज्य और एक धर्म
भविष्य का स्वर्णिम राज्य—
- एक राज्य
- एक धर्म
- एक संस्कृति
पर आधारित होगा।
आज ब्राह्मण जीवन में इसका अभ्यास करना है।
यहाँ धर्म का अर्थ है—
पवित्रता की धारणा।
उदाहरण
यदि विद्यालय में सभी विद्यार्थी एक ही अनुशासन का पालन करें तो व्यवस्था बनी रहती है।
इसी प्रकार आत्मा जब केवल श्रीमत पर चलती है, तब आंतरिक राज्य स्थिर रहता है।
Murli Notes
- पवित्रता ही ब्राह्मण धर्म है।
- मन, वचन, कर्म की एकरूपता ही एक धर्म है।
- स्वप्न में भी अपवित्रता न हो।
5. सुख, शांति और सम्पत्ति का वास्तविक अर्थ
बापदादा बताते हैं—
सच्चा सुख बाहरी साधनों से नहीं, परमात्म-स्मृति से मिलता है।
सच्ची शांति परिस्थितियों से नहीं टूटती।
सच्ची सम्पत्ति—
- ज्ञान
- गुण
- शक्तियाँ
हैं।
उदाहरण
बैंक बैलेंस समाप्त हो सकता है, लेकिन ज्ञान और गुणों का खजाना कभी समाप्त नहीं होता।
Murli Notes
- ज्ञान सबसे बड़ी सम्पत्ति है।
- गुण आत्मा का वास्तविक धन हैं।
- शक्तियाँ आध्यात्मिक सुरक्षा कवच हैं।
6. राजा और मंगता में अंतर
राजा हमेशा देने वाला होता है।
मांगने वाला राजा नहीं हो सकता।
यदि आत्मा इच्छाओं में रहती है तो वह मंगता बन जाती है।
उदाहरण
फलों से लदा वृक्ष स्वयं नहीं खाता, बल्कि सबको देता है।
वैसे ही श्रेष्ठ आत्मा दाता बनती है।
Murli Notes
- इच्छारहित जीवन ही सम्पन्न जीवन है।
- दाता बनो।
- संतुष्टता ही सम्पन्नता है।
7. बेफिक्र बादशाह कैसे बनें?
बापदादा कहते हैं—
चिन्ता नहीं,
चिन्तन करो।
कार्य कराने वाला परमात्मा है।
हम केवल निमित्त हैं।
उदाहरण
जब अनुभवी कप्तान जहाज़ चला रहा हो, तब यात्री निश्चिन्त रहते हैं।
उसी प्रकार परमात्मा के साथी बनकर बेफिक्र रहें।
Murli Notes
- चिन्ता छोड़ो।
- परमात्म चिन्तन अपनाओ।
- निमित्त भाव सफलता की कुंजी है।
8. स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन
बापदादा का स्पष्ट संदेश है—
विश्व परिवर्तन का आधार स्वयं का परिवर्तन है।
उदाहरण
यदि दीपक स्वयं प्रकाशित न हो तो दूसरे दीपक कैसे जलाएगा?
Murli Notes
- पहले स्वयं बदलो।
- परिवर्तन का कम्पन विश्व बदलता है।
- खुशी सबसे बड़ा आध्यात्मिक खजाना है।
9. कम्बाइण्ड स्वरूप की स्मृति
बापदादा कहते हैं—
सदा अनुभव करो—
मैं और मेरा बाबा साथ हैं।
यही सहज योग है।
उदाहरण
दो पहियों वाली साइकिल में यदि एक पहिया हट जाए तो यात्रा रुक जाती है।
वैसे ही आत्मा और परमात्मा की संयुक्त स्मृति आध्यात्मिक यात्रा को सहज बनाती है।
Murli Notes
- “मेरा बाबा” सबसे सहज योग है।
- अमृतवेले स्मृति का तिलक लगाओ।
- कम्बाइण्ड रहो, शक्तिशाली बनो।
10. समय की महत्ता
संगमयुग का एक-एक सेकंड अमूल्य है।
यही समय भविष्य के 21 जन्मों का भाग्य लिखता है।
उदाहरण
प्रतियोगी परीक्षा का अंतिम एक मिनट भी परिणाम बदल सकता है।
इसी प्रकार संगमयुग का एक संकल्प भी भाग्य बदल सकता है।
Murli Notes
- समय बचाना तीव्र पुरुषार्थ है।
- माया को दूर से ही हराओ।
- सदा विजयी बनो।
11. निरन्तर सेवाधारी बनो
सेवा केवल वाणी से नहीं होती।
मनसा,
वाचा,
कर्मणा—
तीनों प्रकार से सेवा करनी है।
उदाहरण
सुगंधित फूल बिना बोले भी वातावरण को सुगंधित बना देता है।
वैसे ही श्रेष्ठ संकल्पों से भी सेवा होती है।
Murli Notes
- मनसा सेवा सर्वोच्च सेवा है।
- सेवा ही ब्राह्मण जीवन की श्वास है।
- निरन्तर सेवाधारी बनो।
12. मास्टर सर्वशक्तिमान बनो
जिस समय जिस शक्ति की आवश्यकता हो—
वही शक्ति तुरंत कार्य करे।
यही मास्टर सर्वशक्तिमान की पहचान है।
उदाहरण
प्रशिक्षित सैनिक परिस्थिति अनुसार तुरंत सही हथियार चुनता है।
वैसे ही राजयोगी परिस्थिति अनुसार सही शक्ति का प्रयोग करता है।
Murli Notes
- सभी शक्तियाँ आदेश में हों।
- सहनशक्ति, निर्णयशक्ति, सामना शक्ति समय पर प्रयोग करो।
- स्वमान की सीट पर स्थित रहो।
13. त्रिकालदर्शी स्थिति
जो आत्मा—
भूत,
वर्तमान,
भविष्य—
तीनों को स्पष्ट जानती है, वही सदा निश्चिन्त और प्रसन्न रहती है।
उदाहरण
ऊँचे पर्वत से पूरा नगर स्पष्ट दिखाई देता है।
वैसे ही त्रिकालदर्शी स्थिति से सम्पूर्ण ड्रामा स्पष्ट दिखाई देता है।
Murli Notes
- हम थे, हैं और रहेंगे।
- वर्तमान भविष्य का बीज है।
- सदा खुशी में रहो।
प्रमुख मुरली संदर्भ (अव्यक्त मुरली)
अव्यक्त बापदादा मुरली
“संगमयुग के राजदुलारे सो भविष्य के राज्य अधिकारी”
(मधुबन, अव्यक्त मुरली – मूल स्रोत के अनुसार तिथि लिखें)
नोट: आपने जो मुरली साझा की है उसमें तिथि दिखाई नहीं दे रही है। कृपया मूल मुरली की तिथि जोड़ दें ताकि “Proper Date” के साथ इसे पूर्ण रूप से शामिल किया जा सके।
अध्याय का सार
✔ संगमयुग में स्वराज्य का अभ्यास ही भविष्य के विश्व-राज्य की तैयारी है।
✔ पवित्रता, स्व-नियंत्रण और श्रीमत पर चलना ही सच्चा राजयोग है।
✔ स्व-परिवर्तन का कम्पन विश्व-परिवर्तन का आधार है।
✔ बेफिक्र बादशाह बनकर सेवा करना ही श्रेष्ठ जीवन है।
✔ समय, शक्तियों और संकल्पों का श्रेष्ठ उपयोग ही राजदुलारे की पहचान है।
Golden Murli Notes
- “स्वराज्य अधिकारी ही भविष्य के विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं।”
- “पवित्रता ही ब्राह्मण धर्म है।”
- “चिन्ता नहीं, परमात्म चिन्तन करो।”
- “स्व-परिवर्तन ही विश्व-परिवर्तन का आधार है।”
- “सदा कम्बाइण्ड रहो—’मैं और मेरा बाबा’।”
YouTube Disclaimer (Hindi)
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह वीडियो केवल आध्यात्मिक शिक्षा, आत्म-जागृति और राजयोग मेडिटेशन के अध्ययन हेतु तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत विचार ब्रह्माकुमारीज़ की शिक्षाओं एवं अव्यक्त बापदादा मुरली पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी धर्म, संप्रदाय, व्यक्ति या संस्था की आलोचना या तुलना करना नहीं है। दर्शकों से निवेदन है कि इस ज्ञान को खुले मन से सुनें, स्वयं चिंतन करें और अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन हेतु अपनाएँ। ओम् शान्ति।
प्रश्नोत्तर (Q&A) : संगमयुग के राजदुलारे – भविष्य के राज्य अधिकारी
प्रश्न 1: संगमयुग में परमात्मा अपने बच्चों को किस नाम से संबोधित करते हैं?
उत्तर: परमात्मा अपने बच्चों को राजदुलारे कहते हैं, क्योंकि वे परमात्मा के दिव्य स्नेह के अधिकारी हैं और भविष्य के राज्य अधिकारी बनने वाले हैं।
प्रश्न 2: राजदुलारा बनने का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: राजदुलारा बनने का अर्थ है वर्तमान में स्वराज्य अधिकारी बनना और भविष्य में विश्व राज्य का अधिकारी बनना।
प्रश्न 3: स्वराज्य का अर्थ क्या है?
उत्तर: स्वराज्य का अर्थ है अपने मन, बुद्धि, संस्कार और कर्मेन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखना तथा श्रीमत अनुसार जीवन जीना।
प्रश्न 4: माया का पर-राज्य कैसे पहचानें?
उत्तर: जब आत्मा क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार या विकारों के अधीन हो जाती है, तब वह माया के पर-राज्य में आ जाती है।
प्रश्न 5: स्वराज्य अधिकारी की सबसे बड़ी पहचान क्या है?
उत्तर: स्वराज्य अधिकारी सदा स्वयं को श्रेष्ठ अधिकारी अनुभव करता है, किसी भी परिस्थिति में पराधीन नहीं बनता।
प्रश्न 6: “एक राज्य, एक धर्म” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि आत्मा पर केवल श्रीमत का राज्य हो और जीवन की एकमात्र धारणा पवित्रता हो।
प्रश्न 7: ब्राह्मण जीवन का मुख्य धर्म क्या है?
उत्तर: मन, वचन, कर्म, संबंध और व्यवहार में सम्पूर्ण पवित्रता ही ब्राह्मण जीवन का मुख्य धर्म है।
प्रश्न 8: सच्ची आध्यात्मिक सम्पत्ति क्या है?
उत्तर: ज्ञान, दिव्य गुण और आत्मिक शक्तियाँ ही वास्तविक आध्यात्मिक सम्पत्ति हैं।
प्रश्न 9: राजा और मंगता में क्या अंतर है?
उत्तर: राजा सदैव देने वाला (दाता) होता है, जबकि इच्छाओं और अपेक्षाओं में रहने वाला मंगता बन जाता है।
प्रश्न 10: बेफिक्र बादशाह कौन है?
उत्तर: जो हर कार्य में स्वयं को परमात्मा का निमित्त समझकर चिन्ता छोड़कर परमात्म-चिन्तन करता है, वही बेफिक्र बादशाह है।
प्रश्न 11: विश्व परिवर्तन का आधार क्या है?
उत्तर: स्व-परिवर्तन ही विश्व परिवर्तन का वास्तविक आधार है।
प्रश्न 12: सहज योग का सबसे सरल सूत्र क्या है?
उत्तर: सदा यह स्मृति रखना—“मैं और मेरा बाबा साथ हैं।”
प्रश्न 13: अमृतवेले कौन-सा तिलक लगाने की प्रेरणा दी गई है?
उत्तर: अमृतवेले स्मृति का तिलक लगाकर स्वयं को परमात्मा का संतान और ब्राह्मण आत्मा अनुभव करना चाहिए।
प्रश्न 14: संगमयुग के समय का महत्व क्या है?
उत्तर: संगमयुग का प्रत्येक क्षण अमूल्य है, क्योंकि यही भविष्य के 21 जन्मों का भाग्य बनाता है।
प्रश्न 15: तीव्र पुरुषार्थी किसे कहा जाता है?
उत्तर: जो समय, संकल्प और शक्तियों का श्रेष्ठ उपयोग करके माया पर सदा विजय प्राप्त करता है।
प्रश्न 16: मनसा सेवा क्यों श्रेष्ठ मानी गई है?
उत्तर: क्योंकि श्रेष्ठ संकल्पों और शक्तिशाली वृत्ति द्वारा बिना बोले भी अनेक आत्माओं का कल्याण किया जा सकता है।
प्रश्न 17: मास्टर सर्वशक्तिमान बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर: जिस समय जिस शक्ति की आवश्यकता हो, उस समय वही शक्ति तुरंत कार्य में आ जाए—यही मास्टर सर्वशक्तिमान की पहचान है।
प्रश्न 18: त्रिकालदर्शी स्थिति क्या है?
उत्तर: भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों का स्पष्ट ज्ञान और अनुभव होना ही त्रिकालदर्शी स्थिति है।
प्रश्न 19: बापदादा के अनुसार सच्ची खुशी का आधार क्या है?
उत्तर: परमात्मा से प्राप्त सर्व प्राप्तियों का अनुभव और स्वयं को भाग्यवान आत्मा समझना ही सच्ची खुशी का आधार है।
प्रश्न 20: इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: अभी स्वराज्य अधिकारी बनकर, पवित्रता, श्रीमत, सेवा और स्व-परिवर्तन द्वारा भविष्य के विश्व राज्य अधिकारी बनने का पुरुषार्थ करना ही संगमयुग का लक्ष्य है।
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