(16) How does transcendental bliss intensify the moment body-consciousness is completely eradicated?

AT.S.-(16)देह अभिमान खत्म होते ही अति इंद्रिय सुख कैसे बढ़ता है?

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अति इंद्रिय सुख
कैसे बढ़ता है?

अति इंद्रिय सुख
कैसे बढ़ता है? कैसे बढ़ता है अति इंद्रिय सुख?

मालूम है किसी को?
जितना-जितना बाबा का कहना मानते हैं,
जितना-जितना हम बाबा का कहना मानते जाएंगे,
उतना-उतना अति इंद्रिय सुख बढ़ता जाता है।
और बाबा का कहना हम कब मानते हैं?

जब हमें प्राप्ति होती है
और
जब बाबा से स्नेह होता है।

असली जड़ पर नहीं पहुंच रहे हो।

विकर्म विनाश होते हैं
और
तब हम आत्मा-आत्मा समझते और बाबा को भी आत्मा।

सामने इतना मोटा लिखा हुआ है, दिखाई नहीं दे रहा है ये क्या?

देह अभिमान त्याग करते ही भाई जी, हां,
अति सुख अनुभव।

देह अभिमान खत्म होते ही अति इंद्रिय सुख।

कैसे बढ़ता है, आज हम इसको सीखेंगे कि जब हमारे अंदर देह अभिमान खत्म हो जाता है तो अति इंद्रिय सुख बढ़ जाता है। परंतु कैसे बढ़ता है, यह आज का हमारा विषय है।

ठीक है।

भाई जी।

स्थूल सभी चीजों का त्याग जब हम करते हैं तो हमें अतीन्द्रिय सुख का अनुभव होता है।

यह सही है।

सब स्थूल सभी चीजों को त्याग करते हैं।
क्योंकि जब तक हमारा स्थूल साधनों में बुद्धि अटकी रहेगी, तब तक हम अति इंद्रिय सुख प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि स्थूल सुख शरीर से प्राप्त होता है।

जब हम शरीर के सुख को ले रहे हैं तो हम अपने को शरीर समझ रहे हैं। जब हम शरीर के सुख लेना बंद कर देते हैं, तब हम आत्मा के सुख को ले सकते हैं। क्योंकि फिर हम आत्मा ही रह गए। हम तो शरीर रहे ही नहीं।

क्योंकि जब तक हम अपने को शरीर समझेंगे, तब तक हमारा जिस्मानी सुख रहेगा। आत्मा समझेंगे तो रूहानी सुख, देह समझेंगे तो जिस्मानी सुख।

और देह को तीन ही चीज की आवश्यकता है, और कोई जरूरत नहीं। बाकी इच्छाएं…

देह को तीन चीजें चाहिए। क्या चाहिए तीन चीजें?

तीन चीजें क्या चाहिए?

शरीर को भोजन चाहिए और रहने के लिए स्थान चाहिए। एक छत।

भाई जी — रोटी, कपड़ा और मकान।

हां, एक वस्त्र चाहिए।
रोटी, कपड़ा और मकान बस।

फिल्म थी ना — रोटी, कपड़ा और मकान।

भाई, आता है रोटी, कपड़ा, मकान की जगह बहुत कुछ चाहिए।

वो सब रोटी, कपड़ा और मकान में आता है।

भाई जी, ये अनुभव होता है लेकिन…

आप यदि खाने वाली चीज कहेंगे तो रोटी में आ जाएगी।
और यूज़ करने वाली डेली यूज़ की कोई भी चीज कहेंगे, वो सारी मकान में आ जाएगी।

बहन जी, आजकल करना इतना है…

बहन जी, सारा कुछ इसमें मकान में आ जाता है।

आप किराए या होटल में जाकर रुकेंगे, खाने के लिए होटल पर खाना खाएंगे — कहां आएगा वो?

पहनने के लिए कपड़ा चाहिए।

नहीं, सिर्फ भाषा बदलेगी। बाकी कुछ नहीं बदलना।

यहां आपके पास धन कम है, आप जैसा भी मकान है वहां रहेंगे। जैसा आपके पास धन है वैसा खाना खा लेंगे। जैसे आप हैं वैसे कपड़े पहन लेंगे।

अब आपके पास पैसे ज्यादा हैं। आप ₹100 वाली रोटी न खाकर ₹5000 वाली थाली खाते हो।
आप ₹200-₹500 का सूट न पहनकर ₹5000 वाला सूट पहनते हो।

पहन लो, क्या फर्क पड़ता है?
कहां तो कपड़ा ही जाएगा ना उसको।

जी, शिवानी बहन कहती है — शरीर ही तो ढकना होता है।

हां, और क्या?
और सच्चाई भी तो यही है।

मैं वही तो कहूंगा।

हम सोचते हैं कि रात को सोने के लिए हमें कितनी जगह चाहिए? सिर्फ तीन फुट जगह चाहिए जहां हम सो जाएं।

भाई जी, ये ज्ञानियों की बातें हैं।

किसकी बातें हैं?

प्रॉब्लम वहीं है। इतनी समझदारी से सोचें — जितना है उतने में सब्र कर लो।

प्रॉब्लम आज से होती है। आदमी जरूरत से ज्यादा एक्सपेक्ट करता है, दुखी तब होता है।

देह अभिमान खत्म होते ही अतीन्द्रिय सुख कैसे बढ़ता है?

जब तक देह अभिमान खत्म नहीं होगा तब तक अतीन्द्रिय सुख नहीं बढ़ेगा।

जैसे-जैसे देह अभिमान खत्म होता जाएगा, अतीन्द्रिय सुख भी बढ़ता जाएगा।

आत्म अभिमान की असली शक्ति है।

देह से उतरते ही सुख क्यों चढ़ता है?

जैसे ही आत्मा देह से उतरती है तो सुख चढ़ता है।
अहंकार गया, आनंद आया।

आत्मा जैसे ही देह में उतरती है तो यह सारे गुण चले जाते हैं। जैसे-जैसे आत्मा देह से अलग होती है तो यह सुख और अनंत गुण आते जाते हैं।

देह अभिमान खत्म होते ही अति इंद्रिय सुख कैसे बढ़ता है? यही आज की क्वेरी थी।

हां जी।

भाई जी क्वेरी थी — जैसे अभी हम देह के सुख की बात कर रहे थे, तो जैसे सपोज शरीर को बीमारी हो जाती है या प्रॉब्लम होती है।

तो कोई गवर्नमेंट हॉस्पिटल में नहीं जा सकता क्योंकि वहां अच्छे से ट्रीटमेंट नहीं होगी, तो कोई बड़े फाइव स्टार हॉस्पिटल में चला जाता है।

तो क्या इसको लग्जरी बोलेंगे या नेसेसिटी?

देखिए, पहली बात यह है — जिसका जीवनकाल है, जिसके जीवन में अभी शरीर का सुख बाकी है, वो सरकारी में भी जाएगा तो ठीक होकर आ जाएगा।

और जिसका जीवनकाल नहीं है, वह फाइव स्टार क्या सेवन स्टार हॉस्पिटल में भी जाएगा तो भी कुछ नहीं हो सकता।

ये सारा खेल कर्मों की गति का है।

आपके पास पैसा है, आप जाओ। गलत नहीं ठहराएंगे।

परंतु पैसा नहीं है तो वहां जाकर दुखी मत हो।

अगर आपके पास पैसा नहीं है और कैंसर हो गया, हॉस्पिटल नहीं जा सकते — शरीर छूट जाएगा, और क्या करेंगे?

चुप।

एक दिन रोकर सब चुप।

जिनके पास बहुत पैसा है, उन्होंने खूब पैसा लगाया और तीन-चार दिन बाद पेशेंट मर गया, तो क्या करेंगे? एक दिन रोकर चुप बैठ जाएंगे।

होना तो वही है।

जाने वाले को कोई रोक नहीं सकता — अमीर हो या गरीब।

और जिस आत्मा ने जहां की सेवा लेनी है, वो वहीं की सेवा लेगा। नहीं लेनी है तो नहीं लेगा।

ठीक है कि नहीं?

समस्या योग की नहीं, पहचान की है।

बहुत से साधक कहते हैं — मैं योग करता हूं लेकिन अति इंद्रिय सुख स्थिर क्यों नहीं?

मैं योग करता हूं लेकिन मन चंचल है। विकार आते हैं। क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आ जाता है।

बाबा कहते — योग की कमी नहीं, देह अभिमान की अधिकता है।

तुम्हारे अंदर देह अभिमान ज्यादा है।

क्रोध बहुत जल्दी आता है — इसका क्या इलाज?

इलाज अपने पास है। हमने अपने आप को समझाया नहीं।

बाबा ने कई बार मुरलियों में कहा — कई बच्चे काम विकार पर जीत पा लेते हैं, परंतु क्रोध पर सोचते ही नहीं कि जीत पानी है।

क्रोध भी उतना ही बड़ा दुश्मन है जितना काम विकार।

योग की कमी नहीं, देह अभिमान की अधिकता है।

आज हम समझेंगे कि जैसे-जैसे देह अभिमान कम होता है वैसे-वैसे अतीन्द्रिय सुख अपने आप बढ़ता है।

देह अभिमान क्या है?

खुद को यह समझना कि मैं यह शरीर हूं — यही देह अभिमान है।

यह मेरा नाम है, मेरा पद है, मेरी पोजीशन है, यह संबंध मेरा है।

देह अभिमान आत्मा को भारी बनाता है।

जितने “मेरे” करते जाएंगे, उतना वजन बढ़ता जाएगा।

मेरा शरीर, मेरा बेटा, मेरा भाई, मेरी मां, मेरी पत्नी, मेरा पति।

मेरी गाड़ी, मेरा मकान।

जिनको हम “मेरा” कहते हैं, उनको सुई भी चुभेगी तो मुझे दर्द होगा।

तो इसलिए मेरा किसी को भी नहीं कहना।

देह अभिमान आत्मा को भारी बनाता है।

मुरली: देह अभिमान ही माया का मूल है।

आत्म अभिमान क्या है?

मैं आत्मा हूं। शरीर मेरा साधन है। शिव बाबा मेरा पिता है।

आत्म अभिमान आत्मा को हल्का बनाता है।

मुरली 18 जनवरी 1969:
“अपने को आत्मा समझो और पिता को याद करो।”

अति इंद्रिय सुख क्या है?

जो इंद्रियों से नहीं, परिस्थितियों से नहीं, संबंधों से नहीं मिलता।

आत्मा का परमात्मा से जुड़ने पर जो सहज आनंद प्रकट होता है वही अति इंद्रिय सुख है।

यह सुख आंख, कान, मुख या शरीर के किसी अंग से प्राप्त नहीं होता।

यह सुख आत्मा अनुभव करती है।

यह ईश्वरीय सुख आत्मिक अनुभूति का सुख है।

2 फरवरी 1968:
“यह ईश्वरीय सुख आत्मिक अनुभूति का सुख है।”

देह अभिमान और अति इंद्रिय सुख विरोधी हैं।

जहां देह अभिमान है, वहां अति इंद्रिय सुख टिक नहीं सकता।

देह अभिमान भारीपन लाता है, आत्म अभिमान हल्कापन।

देह अभिमान अपेक्षा रखता है।

अति इंद्रिय सुख तृप्ति देता है — कुछ नहीं चाहिए।

देह अभिमान में भय है, अति इंद्रिय सुख में निर्भयता।

देह अभिमान में तुलना है।

अति इंद्रिय सुख में संतोष है — जहां हूं, जो हूं, जैसा हूं, बाप का बच्चा हूं।

उदाहरण: गुब्बारे में पत्थर बांध दो, वह उड़ नहीं सकता।

देह अभिमानी आत्मा ऊंचाई नहीं पा सकती।

जैसे-जैसे देह अभिमान घटता है, अपेक्षाएं खत्म होती हैं।

लोगों से, परिस्थितियों से, स्वयं से अपेक्षाएं खत्म होती हैं।

अपेक्षा गई, शांति आई।

मन हल्का होने लगता है।

बोझ नहीं, शिकायत नहीं, तुलना नहीं।

याद सहज हो जाती है।

प्रयास कम, अनुभव अधिक।

मुरली 10 नवंबर 1970:
“देह से न्यारा बनने से याद सहज हो जाती है।”

देह अभिमान टूटते ही अति इंद्रिय सुख क्यों बढ़ता है?

क्योंकि आत्मा अपने मूल स्वरूप में आती है।

बुद्धि ऊपर उठती है।

परमात्मा का साथ अनुभव होता है।

यह सुख कमाया नहीं जाता, प्रकट होता है।

उदाहरण: कमरे से पर्दा हटाओ, सूरज अपने आप दिखेगा।

मुरली 15 अगस्त 1972:
“जहां देह अभिमान नहीं, वहां ही परम सुख है।”

देह अभिमान के सूक्ष्म रूप भी होते हैं:

मैं सही हूं।
मुझे बुरा लगा।
मेरी इज्जत।
मेरी सेवा।

यही सूक्ष्म देह अभिमान अति इंद्रिय सुख को रोकता है।

अव्यक्त वाणी 21 मार्च 1987:
“सूक्ष्म देह अभिमान ही योग में रुकावट है।”

अति इंद्रिय सुख बढ़ने के लक्षण:

  • प्रतिक्रिया घटती है
  • मौन बढ़ता है
  • संतोष रहता है
  • “जो हुआ अच्छा, जो हो रहा है अच्छा, जो होगा वह भी अच्छा”

मुरली 19 अक्टूबर 1967:
“आत्मिक स्थिति का प्रभाव चेहरे पर दिखाई देता है।”

संगम युग देह अभिमान समाप्त करने का अभ्यास काल है।

संगम युग में देह अभिमान छोड़ा जाता है, आत्म अभिमान सिखाया जाता है।

अति इंद्रिय सुख झलक के रूप में मिलता है।

मुरली 2 अक्टूबर 1966:
“अब देह से न्यारे बनने का समय है।”

निष्कर्ष:

देह अभिमान रुकावट है।
आत्म अभिमान मार्ग है।
अति इंद्रिय सुख परिणाम है।

जितना देह से उतरे, उतना परम सुख में चढ़े।

अंतिम संदेश:

यदि अति इंद्रिय सुख स्थाई चाहिए, थोड़ी देर का नहीं —

अनुभव मत पकड़ो।
दूसरों को मत बदलो।
अपनी पहचान बदलो।

मैं आत्मा हूं।
मैं यह शरीर नहीं हूं।
शिव बाबा मेरा पिता है।

यही स्मृति परम सुख की चाबी है।

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