PR.(17)परम अवस्था और परमधाम क्या यह दोनों एक ही है?
हम अपनी गलतफहमी को समझने का प्रयास कर रहे हैं।
पहले समझते थे कि परम अवस्था परम था।
बाबा कहते मुझे याद करना है।
मुझे परमधाम में याद करो।
मैं हमेशा ही परम अवस्था में रहता हूं।
परम अवस्था होती ही परमधाम में है।
तो हम यह समझ बैठे थे कि परम अवस्था ही परमधाम है।
परंतु आज हम यह प्रश्न देखेंगे — परम अवस्था और परमधाम क्या यह दोनों एक ही है?
इसको बहुत बारीकी से समझना है।
क्या जहां शांति है वही परमधाम है या परमधाम कोई अलग से लोक है?
हमारे सामने प्रश्न उठा था कि हम आत्मा, हमने छोड़ दिया शरीर।
हम आत्मा परम अवस्था में चले गए।
तो अब हमें कहां जाना है मुझे बताओ।
हम कहां जाए?
हम कहीं भी रहे हम परम अवस्था में हैं।
हम आत्मा को अग्नि जला नहीं सकती, वायु सुखा नहीं सकती, शस्त्र काट नहीं सकता, पानी गीला नहीं कर सकता।
मैं कहीं भी रहूं क्या फर्क पड़ता है?
मैं आग में रहूं कोई फर्क नहीं पड़ता, समुद्र में चला जाऊं तो कोई फर्क नहीं पड़ता, बाढ़ में चला जाऊं तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
मेरे को कोई नुकसान हो ही नहीं सकता।
तो मैं जहां हूं वहीं परमधाम है।
तो क्या हर जगह परमधाम है?
डिस्क्लेमर: यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरली शिक्षाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मा की अंतिम अनुभूति और परमधाम से संबंध को अनुभवात्मक रूप में प्रस्तुत करना है।
क्या जहां आत्मा को शांति मिल जाए वही परमधाम है?
अगर ऐसा है तो क्या पृथ्वी ही परमधाम है?
क्या पृथ्वी ही परमधाम है?
आत्मा ने यही शरीर छोड़ा, यहीं पर ही कहीं भी रह जाए।
और फिर क्या परमात्मा सर्वव्यापी हो जाएगा?
वे परमात्मा आत्मा सब जगह हो गए।
आज हम इस गहरे भ्रम को पूरी तरह क्लियर करेंगे।
आज का विषय बहुत सरल है, बहुत सूक्ष्म है।
लेकिन अगर यह क्लियर हो जाए तो आधा आध्यात्मिक भ्रम समाप्त हो जाएगा।
परम अवस्था और परमधाम — क्या यह दोनों एक ही हैं या अलग-अलग हैं?
डिबेट पॉइंट:
कुछ लोग कहते हैं जहां आत्मा परम शांति अनुभव करे वही परमधाम है।
सुनने में यह बात अच्छी लगती है।
लेकिन अगर इसे मान लें तो बहुत बड़ा कंफ्यूजन पैदा हो जाता है।
अगर जहां शांति है वही परमधाम है तो:
ध्यान में शांति मिली — वही परमधाम
मंदिर में शांति मिली — वही परमधाम
प्रकृति में शांति मिली — वही परमधाम
तो क्या हर जगह परमधाम हो गया?
और अगर हर जगह परमधाम है तो परमात्मा भी हर जगह हो गया — यानी सर्वव्यापी।
अब हम इस कंफ्यूजन को तोड़ेंगे।
यहां सबसे बड़ी गलती क्या हो रही है?
हम “अवस्था” (State) और “स्थान” (Place) को मिक्स कर रहे हैं।
इन दोनों को अलग करना है।
पॉइंट 1: परम अवस्था क्या है?
आत्मा की स्थिति — शांति, सुख, निर्विकल्प अवस्था।
जहां कोई संकल्प नहीं, जहां शांति है, जहां सुख है — वही परम अवस्था है।
यह यहां भी अनुभव हो सकता है।
पॉइंट 2: परमधाम क्या है?
आत्माओं का मूल घर।
एक सूक्ष्म लोक जहां आत्माएं रहती हैं।
जहां से आत्माएं आती हैं।
यह सिर्फ अनुभव नहीं है — यह एक वास्तविक डायमेंशन है।
मुरली में बाबा कहते हैं:
तुम आत्माएं बिंदु स्वरूप हो। तुम्हारा घर परमधाम है — जहां शांति ही शांति है।
वहां शरीर नहीं है, इसलिए मन और बुद्धि सक्रिय नहीं रहते।
कोई संकल्प नहीं चलता।
ड्रामा अनुसार जब तक वहां रहना है, तब तक पूर्ण शांति रहती है।
फिर समय आने पर आत्मा वापस आती है।
इसका अर्थ:
आत्मा बिंदु है, परमधाम उसका घर है।
घर कोई अनुभव नहीं होता — घर एक स्थान होता है।
जैसे कोई व्यक्ति विदेश में रहकर खुश हो सकता है,
लेकिन उसका मूल घर अलग ही होता है।
फाइनल लॉजिक:
अगर हम कहें जहां शांति है वहीं परमधाम है,
तो परमधाम हर जगह और परमात्मा भी हर जगह — यानी सर्वव्यापी।
लेकिन सत्य यह है:
परमात्मा एक निराकार बिंदु है और परमधाम में स्थित है — सर्वव्यापी नहीं है।
पावरफुल निष्कर्ष:
आत्मा परम अवस्था का अनुभव कहीं भी कर सकती है,
लेकिन उसका घर परमधाम ही है।
इसलिए:
परम अवस्था = अनुभव
परमधाम = स्थान
दोनों एक नहीं हैं।
एंडिंग लाइन:
शांति का अनुभव यहां हो सकता है,
लेकिन शांति का सागर — परमधाम ही है।


