(17)07-06-1970/“The Method to Become a Divine Form”

AW.(17)07-06-1970/“दिव्य मूर्त बनने की विधि”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“दिव्य मूर्त बनने की विधि”

नयनों द्वारा क्या देख रहे हैं? आप सभी भी नयनों द्वारा देख रहे हो। बापदादा भी नयनों का आधार ले देख रहे हैं। बापदादा क्या देखते हैं? आप सभी क्या देख रहे हैं? देख रहे हो वा देखते हुए भी नहीं देखते हो? क्या स्थिति है? बापदादा क्या देख रहे यही आप देख रहे हो? संकल्पों को कैच करने की प्रैक्टिस होगी तो संकल्प रहित भी सहज बन सकेंगे। ज्यादा संकल्प तब चलाना पड़ता है जब किसके संकल्प को परख नहीं सकते हैं। लेकिन हरेक के संकल्पों को रीड करने की प्रैक्टिस होगी तो व्यर्थ संकल्प ज्यादा नहीं चलेंगे। और सहज ही एक संकल्प में एकरस स्थिति में एक सेकेण्ड में स्थित हो जायेंगे। तो संकल्पों को रीड करना – यह भी एक सम्पूर्णता की निशानी है। जितना-जितना अव्यक्त भाव में स्थित होंगे उतना हरेक के भाव को सहज समझ जायेंगे। एक दो के भाव को न समझने का कारण अव्यक्त भाव की कमी है। अव्यक्त स्थिति एक दर्पण है। जब आप अव्यक्त स्थिति में स्थित होते हो तो कोई भी व्यक्ति के भाव अव्यक्त स्थिति रूपी दर्पण में बिल्कुल स्पष्ट देखने में आयेगा। फिर मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। दर्पण को मेहनत नहीं करनी पड़ती है कोई के भाव को समझने में। जितनी-जितनी अव्यक्त स्थिति होती है, वह दर्पण साफ और शक्तिशाली होता है। इतना ही बहुत सहज एक दो के भाव को स्पष्ट समझते हैं। अव्यक्त स्थिति रूपी दर्पण को साफ और स्पष्ट करने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं। उन तीन बातों से कोई एक बात भी सुनाओ। (हरेक ने बताया) आज हरेक की सरलता, श्रेष्ठता और सहनशीलता यह तीन चीजें एक-एक की देख रहे हैं। इन तीनों बातों में से कोई एक भी ठीक रीति धारण है तो दर्पण स्पष्ट है। अगर एक भी बात की कमी है तो दर्पण पर भी कमी का दाग दिखाई पड़ेगा। इसलिए जो भी कार्य करते हो, हर कार्य में तीन बातें चेक करो। सभी प्रकार से सरलता भी हो, सहनशीलता भी हो और श्रेष्ठता भी हो। साधारणपन भी न हो। अभी कहाँ श्रेष्ठता के बजाय साधारणता दिखाई पड़ती है। साधारणपन को श्रेष्ठता में बदली करो और हर कार्य में सहनशीलता को सामने रखो। और अपने चेहरे पर, वाणी पर सरलता को धारण करो। फिर देखो सर्विस वा कर्तव्य की सफलता कितनी श्रेष्ठ होती है। अभी तक कर्तव्य की रिजल्ट क्या देखने में आती है? प्लैन और प्रैक्टिकल में अन्तर कितना है?

अन्तर का कारण क्या है? तीनों ही रूप में अभी पूर्ण प्लेन नहीं हुए हो। स्मृति में भी प्लेन, वाणी में भी प्लेन होना चाहिए। कोई भी पुराने संस्कार का कहाँ दाग न हो। और कर्म में भी प्लेन अर्थात् श्रेष्ठता। अगर प्लेन हो जायेंगे तो फिर प्लैन और प्रैक्टिकल एक हो जायेंगे। फिर सफलता प्लेन (एरोप्लेन) की माफिक उड़ेगी। इसलिए हर बात में मन्सा, वाचा, कर्मणा और छोटी बात में भी सावधानी चाहिए। मन, वाणी, कर्म में तो होना ही है लेकिन उसके साथ-साथ यह जो अलौकिक सम्बन्ध है उसमें भी प्लेन होंगे तो सर्विस की सफलता आप सभी के मस्तक पर सितारे के रूप में चमक पड़ेगी। फिर हरेक आप एक-एक को सफलता का सितारा देखेंगे। सुनाया था ना कि स्लोगन कौन सा याद रखो? सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। फिर तुमको कोई भी देखेंगे तो उनको दूर से दिव्यमूर्त देखने में आयेंगे। साधारण-मूर्त नहीं, लेकिन दिव्य मूर्त। आजकल बहुत सर्विस में बिज़ी हो। जो कुछ किया बहुत अच्छा किया। आगे के लिए सफलता को समीप लाओ। जितना-जितना एक दो के समीप आयेंगे उतना सफलता समीप आयेगी। एक दो के समीप अर्थात् संस्कारों के समीप। तब कोई भी सम्मेलन की सफलता होगी। जैसे समय समीप आ रहा है वैसे सभी समीप आ रहे हैं। लेकिन अब ऐसी समीपता में क्या भरना है? जितनी समीपता उतना एक दो को सम्मान देना। जितना एक दो को सम्मान देंगे उतना ही सारी विश्व आप अभी का सम्मान करेंगी सम्मान देने से सम्मान मिलेगा। देने से मिलता है न कि लेने से। कोई चीज़ लेने से मिलती है और कोई चीज़ देने से मिलती है। तो कोई को भी सम्मान देना गोया सर्व का सम्मान लेना है। और भाषा में भी परिवर्तन चाहिए। आज सभी सर्विसएबुल बैठे हैं ना तो इसलिए भविष्य के इशारे दे रहे हैं। कभी भी कोई का विचार स्पष्ट न हो तो भी ना कभी नहीं करनी चाहिए। शब्द सदैव हाँ निकलना चाहिये। जब यहाँ हाँ जी करेंगे तब वहाँ सतयुग में भी आपकी प्रजा इतना हाँ जी, हाँ जी करेगी। अगर यहाँ ही ना जी ना जी करेंगे तो वहाँ भी प्रजा दूर से ही प्रणाम करेगी। तो ना शब्द को निकाल देना है।

कोई भी बात हो पहले हाँ जी। हाँ जी, हाँ जी कहना ही दूसरे के संस्कार को सरल बनाने का साधन है। समझा। सुनाया था वर्तमान समय जो कर्म कर रहे हो। वह भविष्य के लॉ बन रहे हैं। आप सभी का कर्म भविष्य का लॉ है। जो लॉ-मेकर्स होते हैं वह सोच समझ कर शब्द निकालते हैं। क्योंकि उनका एक-एक शब्द भविष्य के लिए लॉ बन जाता है। सभी के हर संकल्प भविष्य के लॉ बन रहे हैं। तो कितना ध्यान देना चाहिए! अभी तक एक बात को पकड़ते हैं दूसरी बात छूट जाती है। लेकिन दोनों ही बातें याद रहें। कभी विधि को पकड़ते हैं तो विधान को छोड़ देते हैं। कब विधान को पकड़ते हैं तो विधि को छोड़ देते हैं। लेकिन विधि और विधान दोनों के साथ ही विधाता की याद आती है। अगर विधाता ही याद रहे तो विधि और विधान दोनों ही साथ स्मृति में रहेगा। लेकिन विधाता भूल जाता है तो एक चीज़ छूट जाती है। विधाता की याद में रहने से विधि और विधान दोनों साथ रहते हैं। विधाता को भूलने से कभी विधान छूट जाता है तो कभी विधि छूट जाती है। जब दोनों साथ रहेंगे तब सफलता गले का हार बन जायेगी। अच्छा। आज बहुत शिक्षा दी। यह स्नेह है। क्योंकि बापदादा समान बनाना चाहते हैं। समान बनाने का साधन स्नेह हुआ ना।

कुमारियों का पेपर तो अब लेना है। साहस को प्रत्यक्ष रूप में लाने के लिए साहस में बहुत-बहुत शक्ति भरनी है। अब कितनी शक्ति भरी है, वह पेपर लेंगे। अच्छा।

पार्टीयों के साथ :-

1\. जितना-जितना अपने को सर्विस के बन्धन में बांधते जायेंगे तो दूसरे बन्धन छूटते जायेंगे। आप ऐसे नहीं सोचो कि यह बन्धन छूटे तो सर्विस में लग जायें। ऐसे नहीं होगा। सर्विस करते रहो। बन्धन होते हुए भी अपने को सर्विस के बन्धन में जोड़ते जाओ। यह जोड़ना ही तोड़ना है। तोड़ने के बाद जोड़ना नहीं होता है। जितना जोड़ेंगे उतना ही टूटेगा। जितना अपने को सर्विस में सहयोगी बनायेंगे उतना ही प्रजा आपकी सहयोगी बनेगी। कोई भी कारण है तो उनको हल्का छोड़कर पहले सर्विस के मौके को आगे रखो। कर्तव्य को पहले रखना होता है। कारण होते रहेंगे। लेकिन कर्तव्य के बल से कारण ढ़ीले पड़ जायेंगे।

2\. माताओं के जो संगठन बने हुए है उनमें घुस जाओ। मेम्बर बनने से फिर कइयों को आप समान बनाने का चांस मिलेगा। सम्पर्क में आने से ही चांस मिलेगा। अभी माताओं की संस्थाओं में आप लोगों का नाम बाला नहीं हुआ है। पहले गुप्त वेष में पांव रखो फिर वह तुम्हारे बन जायेंगे। भटकी हुई माताओं को राह बतानी है। तो फिर मातायें जो बिचारी सितम सहन करती हैं, उन्हों को भी आप बचा सकेंगे। कई मातायें सहारा चाहती हैं, उन्हों को सहारा मिल जायेगा। तो यह सर्विस कर कमाल कर दिखाओ फिर देखो कितने हैण्ड्स मिलते हैं। बहुत समय की यह बात प्रैक्टिकल में लानी है। जैसे वह एशलम (शरण) देते हैं ना। वह है अनाथ आश्रम। यह तो सनाथ आश्रम है। अच्छा।

3\. अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है? एक सेकेण्ड भी अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है तो उसका असर काफी समय तक रहता है। अव्यक्त स्थिति का अनुभव पावरफुल होता है। जितना हो सके उतना अपना समय व्यक्त भाव से हटाकर अव्यक्त स्थिति में रहना है। अव्यक्त स्थिति से सर्व संकल्प सिद्ध हो जाते हैं। इसमें मेहनत कम और प्राप्ति अधिक होती है। और व्यक्त स्थिति में स्थित होकर पुरुषार्थ करने में मेहनत अधिक और प्राप्ति कम होती है। फिर चलते-चलते उलझन और निराशा आती है। इसलिए अव्यक्त स्थिति से सर्व प्राप्ति का अनुभव बढ़ाओ। अव्यक्त-मूर्त को सामने देख समान बनने का प्रयत्न करना है। जैसा बाप वैसे बच्चे। यह स्लोगन याद रखो। अन्तर न हो। अन्तर को अन्तर्मुख होकर मिटाना है। बाप कब निराश होते हैं? परिस्थितियों से घबराते हैं? तो बच्चे फिर क्यों घबराते हैं? ज्यादा परिस्थितियों को सामना करने का साकार सबूत भी देखा। कभी उनका घबराहट का रूप देखा? सुनाया था ना कि सदैव यह याद रखो कि स्नेह में सम्पूर्ण होना है। कोई मुश्किल नहीं है। स्नेही को सुध-बुध रहती है? जब अपने आप को मिटा ही दिया फिर यह मुश्किल क्यों? मिटा दिया ना। जो मिट जाते हैं वह जल जाते हैं। जितना अपने को मिटाना उतना ही अव्यक्त रूप से मिलना। मिटना कम तो मिलना भी कम। अगर मेले में भी कोई मिलन न मनाये तो मेला समाप्त हो जायेगा फिर कब मिलन होगा? स्नेह को समानता में बदली करना है। स्नेह को गुप्त और समानता को प्रत्यक्ष करो। सभी समाया हुआ है सिर्फ प्रत्यक्ष करना है। अपने कल्प पहले के समाये हुए संस्कारों को प्रत्यक्ष करना है। कल्प पहले की अपनी सफलता का स्वरूप याद आता है ना। अभी सिर्फ समाये हुए को प्रैक्टिकल प्रत्यक्ष रूप में लाओ। सदैव अपनी सम्पूर्णता का स्वरूप और भविष्य 21 जन्मों का रूप सामने रखना है। कई लोग अपने घर को सजाने के लिए अपने बचपन से लेकर, अपने भिन्न-भिन्न रूपों का यादगार रखते हैं। तो आप अपने मन मन्दिर में अपने सम्पूर्ण स्वरूप की मूर्ति, भविष्य के अनेक जन्मों की मूर्तियां स्पष्ट रूप में सामने रखो। फिर और कोई तरफ संकल्प नहीं जायेगा।

समीप रत्न के लक्षण क्या हैं? जो जितना जिसके समीप होते है उतना संस्कारों में भी समानता होती है। तो बापदादा के समीप अर्थात् लक्षण के नज़दीक आओ। जितना चेक करेंगे उतना जल्दी चेन्ज होंगे। आदि स्वरूप को स्मृति में रखो। सतयुग आदि का और मरजीवा जीवन के आदि रूप को स्मृति में रखने से मध्य समा जायेगा।

स्नेही हो वा सहयोगी भी हो? जिससे स्नेह होता है उनको रिटर्न में क्या दिया जाता है? स्नेह का रिटर्न है सहयोग। वह कब देंगे? जैसे बाप सर्व समर्थ है तो बच्चों को भी मास्टर सर्व समर्थ बनना है। विनाश के पहले अगर स्नेह के साथ सहयोगी बनेंगे तो वर्से के अधिकारी बनेंगे। विनाश के समय भल सभी आत्मायें पहचान लेंगी लेकिन वर्सा नहीं पा सकेंगी क्योंकि सहयोगी नहीं बन सकेंगी।

4\. कर्म बन्धन शक्तिशाली है या यह ईश्वरीय बन्धन? ईश्वरीय बन्धनों को अगर तेज करो तो कर्म बन्धन आपे ही ढीले हो जायेंगे। बन्धन से ही बन्धन कटता है। जितना ईश्वरीय बन्धन में बंधेंगे उतना कर्मबन्धन से छूटेंगे। जितना वह कर्मबन्धन पक्का है उतना ही यह ईश्वरीय बन्धन को भी पक्का करो तो वह बन्धन जल्दी कट गा।

5\. बिन्दु रूप में अगर ज्यादा नहीं टिक सकते तो इसके पीछे समय न गंवाओ। बिन्दी रूप में तब टिक सकेंगे जब पहले शुद्ध संकल्प का अभ्यास होगा। अशुद्ध संकल्पों को शुद्ध संकल्पों से हटाओ। जैसे कोई एक्सीडेन्ट होने वाला होता है। ब्रेक नहीं लगती तो मोड़ना होता है। बिन्दी रूप है ब्रेक। अगर वह नहीं लगता तो व्यर्थ संकल्पों से बुद्धि को मोड़कर शुद्ध संकल्पों में लगाओ। कभी-कभी ऐसा मौका होता है जब बचाव के लिए ब्रेक नहीं लगाई जाती है, मोड़ना होता है। कोशिश करो कि सारा दिन शुद्ध संकल्पों के सिवाय कोई व्यर्थ संकल्प न चले। जब यह सब्जेक्ट पास करेंगे तो फिर बिन्दी रूप की स्थिति सहज रहेगी।

1. बापदादा सभी को किसके द्वारा देख रहे हैं?

उत्तर: बापदादा नयनों का आधार लेकर सभी को देख रहे हैं और यह देख रहे हैं कि हमारी स्थिति कैसी है—हम वास्तव में देख रहे हैं या देखते हुए भी नहीं देख रहे हैं।

2. संकल्पों को कैच करने की प्रैक्टिस का क्या लाभ है?

उत्तर: संकल्पों को कैच और रीड करने की प्रैक्टिस से व्यर्थ संकल्प कम हो जाते हैं और एक संकल्प में एकरस स्थिति में एक सेकण्ड में स्थित होना सहज हो जाता है।

3. संकल्पों को रीड करना किसकी निशानी है?

उत्तर: संकल्पों को रीड करना सम्पूर्णता की निशानी है।

4. अव्यक्त स्थिति को दर्पण क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि अव्यक्त स्थिति में स्थित होने पर दूसरे व्यक्ति के भाव स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं, जैसे साफ दर्पण में सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है।

5. अव्यक्त स्थिति रूपी दर्पण को साफ और शक्तिशाली बनाने के लिए कौन-सी तीन बातें आवश्यक हैं?

उत्तर: सरलता, श्रेष्ठता और सहनशीलता।

6. सरलता, श्रेष्ठता और सहनशीलता को जीवन में कैसे धारण करना चाहिए?

उत्तर: हर कार्य में सरलता, श्रेष्ठता और सहनशीलता को चेक करना चाहिए। चेहरे और वाणी में सरलता, कर्म में श्रेष्ठता और परिस्थितियों में सहनशीलता रखनी चाहिए।

7. साधारणता को किसमें बदलना है?

उत्तर: साधारणता को श्रेष्ठता में बदलना है।

8. प्लैन और प्रैक्टिकल में अन्तर क्यों दिखाई देता है?

उत्तर: क्योंकि अभी स्मृति, वाणी और कर्म में पूर्णता नहीं आई है। पुराने संस्कारों के दाग और कमी के कारण प्लैन और प्रैक्टिकल में अन्तर रह जाता है।

9. प्लेन होने का क्या अर्थ है?

उत्तर: स्मृति में प्लेन, वाणी में प्लेन और कर्म में श्रेष्ठता—अर्थात् पुराने संस्कारों का कोई दाग न हो और हर कर्म श्रेष्ठ हो।

10. प्लैन और प्रैक्टिकल एक होने पर क्या परिणाम होगा?

उत्तर: जब प्लैन और प्रैक्टिकल एक हो जायेंगे तो सफलता एरोप्लेन की तरह उड़ने लगेगी।

11. किन तीनों स्तरों पर सावधानी आवश्यक है?

उत्तर: मन्सा, वाचा और कर्मणा में सावधानी आवश्यक है। इसके साथ अलौकिक सम्बन्धों में भी शुद्धता और श्रेष्ठता रखनी है।

12. सफलता का जन्मसिद्ध अधिकार किसका है?

उत्तर: “सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।”

13. एक-दूसरे के समीप आने का क्या अर्थ है?

उत्तर: एक-दूसरे के समीप आने का अर्थ केवल शारीरिक रूप से पास आना नहीं, बल्कि संस्कारों में एक-दूसरे के समीप और समान होना है।

14. सफलता को समीप कैसे लाया जा सकता है?

उत्तर: जितना एक-दूसरे के समीप आयेंगे, संस्कारों में समानता लायेंगे और एक-दूसरे को सम्मान देंगे, उतनी सफलता समीप आयेगी।

15. सम्मान देने से क्या प्राप्त होता है?

उत्तर: सम्मान देने से सम्मान मिलता है। किसी को सम्मान देना अर्थात् सर्व का सम्मान प्राप्त करना है।

16. भाषा में कौन-सा परिवर्तन करना चाहिए?

उत्तर: “ना” शब्द को कम करके पहले “हाँ जी” कहने की आदत डालनी चाहिए। दूसरे के विचार स्पष्ट न हों तब भी सहजता और सकारात्मकता रखनी चाहिए।

17. “हाँ जी” कहने का क्या लाभ बताया गया है?

उत्तर: “हाँ जी” कहना दूसरे के संस्कारों को सरल बनाने का साधन है और इससे भविष्य में भी सहयोग एवं सम्मान का वातावरण बनता है।

18. वर्तमान कर्मों को भविष्य का लॉ क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि वर्तमान समय में किये गये कर्म और निकाले गये शब्द भविष्य के संस्कार और व्यवस्था का आधार बनते हैं। इसलिए हर संकल्प और कर्म में बहुत सावधानी चाहिए।

19. विधि और विधान दोनों को साथ रखने का साधन क्या है?

उत्तर: विधाता की याद। विधाता स्मृति में रहने से विधि और विधान दोनों सहज रूप से साथ रहते हैं।

20. विधाता को भूलने पर क्या होता है?

उत्तर: विधाता की स्मृति भूलने पर कभी विधि छूट जाती है और कभी विधान छूट जाता है।

21. विधि और विधान दोनों साथ रहने पर क्या परिणाम होता है?

उत्तर: दोनों साथ रहने पर सफलता गले का हार बन जाती है।

22. बापदादा बच्चों को समान क्यों बनाना चाहते हैं?

उत्तर: बापदादा बच्चों को अपने समान बनाने के लिए स्नेह देते हैं। इसलिए समान बनाने का साधन स्नेह है।

23. सर्विस के बन्धन में बंधने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: जितना स्वयं को सर्विस के बन्धन में जोड़ते जायेंगे, उतने ही दूसरे बन्धन ढीले और समाप्त होते जायेंगे।

24. सर्विस के अवसर को प्राथमिकता क्यों देनी चाहिए?

उत्तर: क्योंकि कारण और परिस्थितियाँ आते रहेंगे, लेकिन कर्तव्य को पहले रखने से कर्तव्य का बल उन कारणों को कमजोर कर देता है।

25. माताओं की संस्थाओं में सेवा करने का क्या उद्देश्य है?

उत्तर: माताओं के संगठनों में सम्पर्क बनाकर भटकी हुई माताओं को सही राह दिखाना, उन्हें सहारा देना और अपने समान बनाने का अवसर प्राप्त करना है।

26. अव्यक्त स्थिति का अनुभव कैसा होता है?

उत्तर: अव्यक्त स्थिति का अनुभव बहुत शक्तिशाली होता है। एक सेकण्ड का अनुभव भी काफी समय तक प्रभाव रख सकता है।

27. व्यक्त और अव्यक्त स्थिति में क्या अन्तर है?

उत्तर: अव्यक्त स्थिति में मेहनत कम और प्राप्ति अधिक होती है, जबकि व्यक्त भाव में पुरुषार्थ करने पर मेहनत अधिक और प्राप्ति कम अनुभव होती है।

28. अव्यक्त-मूर्त बनने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: अव्यक्त स्थिति में अधिक से अधिक रहने का अभ्यास करना चाहिए और अव्यक्त-मूर्त को सामने रखकर उसके समान बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

29. कौन-सा स्लोगन सदैव याद रखना चाहिए?

उत्तर: “जैसा बाप, वैसे बच्चे।”

30. परिस्थितियों के सामने घबराना क्यों नहीं चाहिए?

उत्तर: क्योंकि बापदादा परिस्थितियों से घबराने का उदाहरण नहीं देते। बच्चों को भी स्नेह और शक्ति के आधार पर परिस्थितियों का सामना करना चाहिए।

31. स्नेह को किसमें बदलना है?

उत्तर: स्नेह को समानता में बदलना है। स्नेह को गुप्त रखते हुए समानता को अपने कर्मों में प्रत्यक्ष करना है।

32. मन-मन्दिर में किसकी मूर्ति स्पष्ट रूप से रखनी चाहिए?

उत्तर: अपने सम्पूर्ण स्वरूप की मूर्ति और भविष्य के अनेक जन्मों के श्रेष्ठ स्वरूपों को मन-मन्दिर में स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए।

33. समीप रत्न के लक्षण क्या हैं?

उत्तर: जो जितना बापदादा के समीप होता है, उसके संस्कार और लक्षण भी उतने ही समान होते हैं। इसलिए बापदादा के समीप आने का अर्थ उनके लक्षणों के समीप आना है।

34. स्वयं को जल्दी चेंज करने का साधन क्या है?

उत्तर: स्वयं को निरन्तर चेक करना। जितना चेक करेंगे, उतना जल्दी परिवर्तन होगा।

35. स्नेही होने के साथ और क्या बनना है?

उत्तर: स्नेही होने के साथ सहयोगी भी बनना है।

36. स्नेह का रिटर्न क्या है?

उत्तर: स्नेह का रिटर्न सहयोग है।

37. मास्टर सर्वशक्तिमान बनने का क्या अर्थ है?

उत्तर: बाप सर्व समर्थ हैं, इसलिए बच्चों को भी अपने जीवन में शक्ति को धारण करके मास्टर सर्वशक्तिमान बनना है।

38. ईश्वरीय बन्धन को मजबूत करने से क्या होता है?

उत्तर: जितना ईश्वरीय बन्धन मजबूत करेंगे, उतना कर्म-बन्धन स्वतः ढीला होता जायेगा।

39. बिन्दी रूप में स्थित होने में कठिनाई हो तो क्या करना चाहिए?

उत्तर: बिन्दी रूप में जबरदस्ती टिकने के बजाय पहले शुद्ध संकल्पों का अभ्यास करना चाहिए और अशुद्ध या व्यर्थ संकल्पों को शुद्ध संकल्पों की ओर मोड़ देना चाहिए।

40. बिन्दी रूप को किसके समान बताया गया है?

उत्तर: बिन्दी रूप को ब्रेक के समान बताया गया है। जब ब्रेक न लगे तो बुद्धि को व्यर्थ संकल्पों से मोड़कर शुद्ध संकल्पों में लगाना चाहिए।

41. बिन्दी रूप की स्थिति सहज कब होगी?

उत्तर: जब दिनभर शुद्ध संकल्पों का अभ्यास पक्का हो जायेगा और व्यर्थ संकल्पों को रोकने या मोड़ने की शक्ति विकसित होगी, तब बिन्दी रूप की स्थिति सहज हो जायेगी।

42. “दिव्य मूर्त” बनने की मुख्य विधि क्या है?

उत्तर: अव्यक्त स्थिति में स्थित होना, सरलता-श्रेष्ठता-सहनशीलता धारण करना, मन-वाणी-कर्म में पवित्रता रखना, एक-दूसरे के संस्कारों को समझना, सम्मान देना, स्नेह को सहयोग में बदलना और विधाता की स्मृति में रहना। इससे साधारण-मूर्त के बजाय दिव्य-मूर्त स्वरूप प्रत्यक्ष होता है।

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