(18) “The first and the last”

(18)“प्रथम और अन्तिम पुरूषार्थ”

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“प्रथम और अंतिम पुरुषार्थ | अव्यक्त मुरली 3 अप्रैल 1983 |”


प्रस्तावना

ओम शांति।
आज हम सुनने जा रहे हैं 3 अप्रैल 1983 की अव्यक्त मुरली, जिसका विषय है —
“प्रथम और अंतिम पुरुषार्थ”।
बापदादा आज बेहद की स्थिति में रहने वाले बच्चों से बेहद के स्थान पर मिलने आए हैं।


1. बेहद का बाबा और बेहद के बच्चे

बाबा कहते हैं —
आप सभी बेहद के सेवाधारी हो।
आपकी बुद्धि, दृष्टि और वृत्ति बेहद की होनी चाहिए।
साकार शरीर में रहते हुए भी आपका स्टेज बेहद का होना चाहिए।


2. प्रथम पुरुषार्थ – आत्मा की पहचान

बाबा समझाते हैं कि पहला पुरुषार्थ है —
“मैं आत्मा हूँ” इस स्मृति में रहना।
देह-अभिमान भूलकर आत्म-अभिमान में रहना ही पहला कदम है।
यही आत्म-जागरूकता हमें परमात्मा से जोड़ती है।


3. अंतिम पुरुषार्थ – पूर्ण पवित्रता और परम स्थित

बाबा कहते हैं —
अंतिम पुरुषार्थ है संपूर्ण पवित्रता और बेहद की स्थिति
जहाँ व्यर्थ और नकारात्मकता का नाम-निशान भी न हो।
आत्मा इतनी शक्तिशाली हो कि हर परिस्थिति में स्थिर रहे।


4. आत्मा की यात्रा – आरम्भ से पूर्णता तक

जैसे कोई छात्र शुरुआत में एबीसी सीखता है और अंत में पूर्ण ज्ञानी बन जाता है,
वैसे ही आत्मा का पहला पुरुषार्थ है आत्म-अभिमानी बनना और अंतिम पुरुषार्थ है संपूर्णता प्राप्त करना।
बीच का सम्पूर्ण पाठ आत्मा को इस परम यात्रा तक ले जाता है।


5. बाबा की शुभकामना

बापदादा की शुभकामना है —
हर बच्चा इस बात को याद रखे कि यात्रा की शुरुआत और अंत दोनों साफ़ और शक्तिशाली हों।
तभी जीवन सफल और ईश्वर प्रदत्त लक्ष्य प्राप्त होगा।

“प्रथम और अंतिम पुरुषार्थ | अव्यक्त मुरली प्रश्नोत्तर |”


प्रश्न 1:बाबा इस मुरली में किन बच्चों से मिलने आते हैं?

उत्तर:बाबा बेहद के स्थान पर, बेहद की स्थिति में स्थित रहने वाले, बेहद की बुद्धि, बेहद की दृष्टि, बेहद की वृत्ति और बेहद के सेवाधारी बच्चों से मिलने आते हैं। ये वही बच्चे हैं जो स्वयं को आत्मा समझकर सेवा में तत्पर रहते हैं।


प्रश्न 2:बाबा ने “प्रथम पुरुषार्थ” किसे कहा?

उत्तर:प्रथम पुरुषार्थ है – आत्म स्वरूप की स्थिति
यानी स्वयं को देह नहीं, बल्कि आत्मा अनुभव करना। यही वह पहला कदम है जो पूरे राजयोग की नींव है।


प्रश्न 3:“अंतिम पुरुषार्थ” किसे कहा गया है?

उत्तर:अंतिम पुरुषार्थ है – संपूर्णता की स्थिति, अर्थात् परमात्मा समान पवित्र, निर्विकारी, निराकारी बन जाना। यह वह अंतिम अवस्था है जिसमें आत्मा पूर्णता प्राप्त करती है।


प्रश्न 4:बाबा ने “प्रथम और अंतिम पुरुषार्थ” को क्यों साथ रखा?

उत्तर:क्योंकि शुरुआत और अंत दोनों ही आत्मा को याद दिलाते हैं कि यात्रा कहाँ से शुरू हुई और कहाँ समाप्त होनी है।

  • शुरुआत में आत्मस्मृति (प्रथम पुरुषार्थ) आवश्यक है।

  • और अंत में पूर्णता (अंतिम पुरुषार्थ) आवश्यक है।
    बीच के सारे कदम इन्हीं दोनों के बीच आते हैं।


प्रश्न 5:बाबा ने बच्चों को बेहद का सेवाधारी क्यों कहा?

उत्तर:क्योंकि सच्ची सेवा केवल देहधारी के लिए नहीं, बल्कि आत्मा की उन्नति के लिए होती है। बेहद का सेवाधारी वही है जो आत्मिक दृष्टि और परमात्मा की शक्ति से सबको लाभ पहुँचाता है।


प्रश्न 6:इस मुरली से हमें जीवन के लिए मुख्य शिक्षा क्या मिलती है?

उत्तर:हमें याद रखना है कि –

  1. प्रथम पुरुषार्थ (आत्मस्मृति) से शुरुआत करनी है।

  2. अंतिम पुरुषार्थ (पूर्णता) को लक्ष्य बनाना है।

  3. बीच में चाहे जो परिस्थिति आए, हमें बेहद की दृष्टि और बेहद का सेवाधारी बनकर चलते रहना है।

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के ईश्वरीय ज्ञान, मुरली एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक अध्ययन, आत्म-चिंतन और आत्म कल्याण है।
यह किसी भी प्रकार के धार्मिक मत, परंपरा या व्यक्तिगत भावनाओं का विरोध नहीं करता।
कृपया इसे मनन और आत्म विकास की दृष्टि से ही सुनें और अपनाएँ।

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