AAT.(18)आत्मा की स्वर्णिम यात्रा 84 जन्म और डायमंड जन्म का रहस्य
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
अध्याय – आत्मा की स्वर्णिम यात्रा : 84 जन्म और डायमंड जन्म का रहस्य
(आधारित: अव्यक्त मुरली — 16 नवंबर 2025)
विषय : 84 जन्म और संगम युग का महत्व
प्रस्तावना
84 जन्मों का चक्र—हर आत्मा की अनोखी यात्रा है। यह यात्रा कहाँ से शुरू होती है? कैसे चलती है? और कब पूर्ण होती है?
आज की अव्यक्त मुरली (16 नवम्बर 2025) में बापदादा ने संगम युग के डायमंड जन्म की महत्ता को बहुत सुंदर रीति से समझाया।
सृष्टि चक्र – आत्मा की 84 जन्मों की यात्रा कहाँ से शुरू होती है?
परमधाम से यात्रा की शुरुआत
हर आत्मा की यात्रा आत्मा के गृह—परमधाम से प्रारंभ होती है।
वहां आत्मा शांति, प्रकाश और मूल स्वरूप में होती है।
उदाहरण:
जैसे कोई खिलाड़ी मैदान में उतरने से पहले विश्राम-कक्ष में होता है, वैसे ही आत्मा परमधाम में स्थिर रहती है और फिर समय आने पर सृष्टि पर अवतरित होती है।
कृष्ण का जन्म संगम युग में — मुरली की अद्भुत बात
बाबा ने स्पष्ट कहा —
“कृष्ण का जन्म संगम युग के अंत में होता है।”
यह गूढ़ ज्ञान केवल ईश्वरीय मुरली में ही मिलता है।
दो घटनाएँ एक साथ
-
पुरानी दुनिया का विनाश
-
नई सृष्टि में श्रीकृष्ण का जन्म
यही कारण है कि संगम युग को हीरा-युग कहा जाता है।
मुरली वचन (16 Nov 2025 – सार)
बाबा ने कहा:
“मेरी जयंती सो कृष्ण जयंती, मेरी जयंती सो गीता जयंती, मेरी जयंती सो तुम्हारी जयंती, मेरी जयंती सो सतयुग की जयंती।”
अर्थ:
जिस क्षण आत्मा ने “बाबा” कहा—
उसी क्षण से उसके कई जन्म बदल गए।
आध्यात्मिक जन्म — ब्राह्मण जीवन की शुरुआत
आपका जन्म कब हुआ?
जिस क्षण आपने कहा—
“मैं आत्मा हूँ, शिव बाबा मेरा बाप है”
—वही हुआ आपका अध्यात्मिक जन्म।
यह जन्म विशेष क्यों है?
क्योंकि इसी क्षण:
-
कृष्ण जन्म का बीज पड़ा
-
गीता ज्ञान का पुनर्जन्म हुआ
-
स्वर्ग का द्वार खुला
-
सतयुग का प्रारंभ हुआ
-
और ब्राह्मण कुल की पहचान मिली
डायमंड जन्म क्या है?
ब्राह्मण जीवन = डायमंड जन्म
बाबा कहते हैं—
“यह जन्म डायमंड जन्म है।”
क्यों?
कारण:
-
आत्मा के सभी दाग मिटते हैं
-
आत्मा बेदाग, पवित्र और शक्तिशाली बनती है
-
विकारों पर विजय का पुरशार्थ शुरू होता है
-
बाबा से सीधी शक्ति मिलती है
-
हर कर्म दिव्य बन जाता है
उदाहरण:
जैसे कोयले को आग में डालो तो हीरा बनता है,
वैसे ही संगम युग पर आत्मा पुरशार्थ की गर्मी में हीरा बनती है।
ध्यान रहे:
कृष्ण का शारीरिक जन्म डायमंड जन्म नहीं कहलाता।
डायमंड जन्म = पुरशार्थ का जन्म।
84 जन्मों का नियम — हर आत्मा का अपना चार्ट
हर आत्मा के अपने-अपने संस्कार और दाग होते हैं।
इसलिए दाग मिटाने का अनुपात भिन्न है:
-
कोई 10%
-
कोई 20%
-
कोई 100%
केवल 1 जन्म वाली आत्मा भी क्या करती है?
यदि कोई आत्मा केवल 1 साल के लिए आती है, तब भी—
-
6 महीने गर्भ में
-
6 महीने बाहर
वह अपने हिसाब-किताब पूरे करती है और वापस चली जाती है।
बाबा कहते हैं—
“हर आत्मा को फिक्स मेरिट बनानी ही होती है।”
सतयुग – स्वर्णिम युग (1250 वर्ष)
मुख्य विशेषताएँ
-
वंश : सूर्यवंशी
-
कला : 16 → 12 कला
-
जन्म : 8 जन्म
-
जनसंख्या : प्रारंभ में 9 लाख
कौन बनते हैं लक्ष्मी-नारायण?
वही आत्माएं जो संगम युग पर ब्राह्मण बनती हैं—
सतयुग में श्रीकृष्ण और राधा के रूप में जन्म लेकर
बाद में लक्ष्मी और नारायण बनती हैं।
उदाहरण:
ब्राह्मण जीवन = बीज
सतयुग = फल
त्रेता युग – सिल्वर एज (1250 वर्ष)
विशेषताएँ
-
वंश : चंद्रवंशी
-
कला : 14–12 कला
-
जन्म : 12 जन्म
-
जनसंख्या :
-
प्रारंभ: 2 करोड़
-
अंत: 33 करोड़
-
राम और सीता कौन?
यह भी वही आत्माएं हैं—
पर उनके चरित्र प्रतीकात्मक हैं, वास्तविक नहीं।
द्वापर युग – ताम्र युग
द्वापर में शुरू होती है:
-
भक्ति
-
देवताओं की पूजा
-
शिवलिंग पूजा (राजा विक्रमादित्य द्वारा)
-
राधा-कृष्ण की पूजा
-
लक्ष्मी-नारायण की पूजा
यहाँ आत्मा रजोप्रधान हो जाती है।
उदाहरण:
जैसे मोबाइल की बैटरी 100% से 20% होती जाती है, वैसे ही आत्मा की शक्ति भी घटती जाती है।
उपसंहार
संगम युग =
आत्मा का सबसे ऊँचा, सबसे मूल्यवान, डायमंड जन्म।
इसी जन्म से:
-
84 जन्मों की गुणवत्ता बदलती है
-
भविष्य के राज्य की नींव रखी जाती है
-
कृष्ण का जन्म, गीता का जन्म, सतयुग का जन्म—सभी की शुरुआत होती है
इसलिए बाबा कहते हैं—
“संगम युग हर आत्मा का डायमंड जन्म है।”
प्रश्न 1: 84 जन्मों का चक्र किस बात का प्रतीक है?
उत्तर: यह चक्र हर आत्मा की संपूर्ण यात्रा का प्रतीक है—परमधाम से उतरने से लेकर फिर परमधाम लौटने तक। 84 जन्मों में आत्मा पवित्रता से पतितता की यात्रा और फिर संगम पर पुनः दिव्यता की यात्रा पूरी करती है।
सृष्टि चक्र – आत्मा की यात्रा कहाँ से शुरू होती है?
प्रश्न 2: आत्मा की 84 जन्मों की यात्रा कहाँ से आरंभ होती है?
उत्तर: यह यात्रा परमधाम से शुरू होती है। वहाँ आत्मा बिल्कुल शांत, प्रकाशमय और अपने मूल स्वरूप में स्थित रहती है।
प्रश्न 3: परमधाम में आत्मा की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर: आत्मा स्थिर, शांति-स्वरूप और निराकार प्रकाश-रूप में होती है। कोई हलचल, कोई विकार नहीं—सिर्फ शांति।
उदाहरण:
जिस तरह खिलाड़ी मैच से पहले विश्राम-कक्ष में ऊर्जा संचित करता है, वैसे ही आत्मा परमधाम में शक्ति संचित कर सृष्टि पर उतरती है।
कृष्ण का जन्म और संगम युग — एक गूढ़ ज्ञान
प्रश्न 4: कृष्ण का जन्म कब होता है?
उत्तर: बाबा के अनुसार —
“कृष्ण का जन्म संगम युग के अंत में होता है।”
प्रश्न 5: संगम युग के अंत में कौन सी दो घटनाएँ एक साथ होती हैं?
उत्तर:
-
पुरानी दुनिया का विनाश
-
नई सृष्टि में श्रीकृष्ण का जन्म
इसीलिए संगम युग को हीरा-युग (Diamond Age) कहा जाता है।
मुरली वचन का अर्थ
प्रश्न 6: बाबा ने कहा था — “मेरी जयंती सो कृष्ण जयंती…” इसका अर्थ क्या है?
उत्तर: जब आत्मा “बाबा” को पहचानती है, उसी क्षण उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। यही जन्म—
-
कृष्ण जन्म का बीज बनता है,
-
गीता ज्ञान का पुनर्जन्म होता है,
-
स्वर्ग का द्वार खुलता है,
-
और सतयुग की नींव पड़ती है।
ब्राह्मण जीवन — आध्यात्मिक जन्म
प्रश्न 7: ब्राह्मण जीवन का आध्यात्मिक जन्म कब होता है?
उत्तर: जब आत्मा कहती है—
“मैं आत्मा हूँ, शिव बाबा मेरा बाप है।”
उस क्षण अध्यात्मिक जन्म होता है।
प्रश्न 8: यह जन्म विशेष क्यों है?
उत्तर: क्योंकि इसी जन्म में—
-
आत्मा का नया संस्कार जन्म लेता है
-
गीता का पुनर्जन्म होता है
-
स्वर्ग की नींव रखी जाती है
-
और ब्राह्मण कुल की पहचान बनती है
डायमंड जन्म — असली अर्थ
प्रश्न 9: डायमंड जन्म किसे कहा गया है?
उत्तर: ब्राह्मण जीवन को ही डायमंड जन्म कहा गया है। संगम युग पर आत्मा की पवित्रता और शक्ति अपने उच्चतम स्तर पर पहुँचती है।
प्रश्न 10: यह जन्म ‘डायमंड’ क्यों कहलाता है?
उत्तर:
-
आत्मा के सभी दाग मिटते हैं
-
आत्मा पवित्र और शक्तिशाली बनती है
-
विकारों पर विजय का पुरशार्थ शुरू होता है
-
बाबा की सीधी शक्तियों का अनुभव होता है
-
हर कर्म दिव्य बन जाता है
उदाहरण:
कोयला आग में तपा कर हीरा बनता है।
उसी तरह संगम की तपस्या आत्मा को ‘हीरा’ बना देती है।
ध्यान रहे:
कृष्ण का शारीरिक जन्म डायमंड जन्म नहीं है।
डायमंड जन्म = पुरशार्थ का जन्म।
84 जन्म – हर आत्मा का अलग चार्ट
प्रश्न 11: हर आत्मा के संस्कार अलग क्यों होते हैं?
उत्तर: क्योंकि हर आत्मा का कर्म-आधार, अनुभव और दाग अलग होते हैं। इसलिए दाग मिटाने का प्रतिशत भी अलग होता है:
-
कोई 10%
-
कोई 20%
-
कोई 100%
प्रश्न 12: 1 वर्ष के लिए आने वाली आत्मा क्या करती है?
उत्तर: वह भी अपने कर्म-लेन-देन पूरे करती है:
-
6 महीने गर्भ में
-
6 महीने बाहर
अपने सीमित संबंधों से हिसाब-किताब पूरा कर फिर लौट जाती है।
बाबा कहते हैं—
“हर आत्मा को फिक्स मेरिट बनानी ही होती है।”
सतयुग – स्वर्णिम युग
प्रश्न 13: सतयुग की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
-
वंश: सूर्यवंशी
-
कला: 16 से 12 कला
-
जन्म: 8 जन्म
-
जनसंख्या: 9 लाख
-
पूर्ण पवित्रता, पूर्ण सुख, पूर्ण दिव्यता
प्रश्न 14: लक्ष्मी-नारायण कौन बनते हैं?
उत्तर: वही आत्माएँ जो संगम युग पर ब्राह्मण बनती हैं। पहले वे श्रीकृष्ण और राधा बन कर जन्म लेते हैं, फिर वही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं।
उदाहरण:
ब्राह्मण जीवन = बीज
सतयुग = फल
त्रेता युग – सिल्वर एज
प्रश्न 15: त्रेता युग की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
-
वंश: चंद्रवंशी
-
कला: 14–12
-
जन्म: 12
-
जनसंख्या: 2 करोड़ → 33 करोड़
प्रश्न 16: त्रेता के राम और सीता कौन थे?
उत्तर: यह भी वही आत्माएँ हैं, पर उनका चरित्र प्रतीकात्मक है—जैसे सद्चरित्रता का आदर्श।
द्वापर युग – ताम्र युग
प्रश्न 17: द्वापर युग में क्या शुरू होता है?
उत्तर:
-
भक्ति
-
देवताओं की पूजा
-
शिवलिंग की पूजा
-
राधा-कृष्ण की पूजा
-
लक्ष्मी-नारायण की पूजा
प्रश्न 18: आत्मा की स्थिति क्या होती है?
उत्तर: आत्मा रजोप्रधान हो जाती है—शक्ति घटने लगती है।
उदाहरण:
जैसे मोबाइल 100% से 20% बैटरी पर आ जाए—
ऐसा ही आत्मिक शक्ति में गिरावट होती है।
उपसंहार – संगम युग का सर्वोत्तम महत्व
प्रश्न 19: संगम युग इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर:
-
यह आत्मा का सबसे ऊँचा जन्म है
-
डायमंड जन्म यहीं मिलता है
-
इसी जन्म से 84 जन्मों की गुणवत्ता बदलती है
-
भविष्य के राज्य की नींव बनती है
-
कृष्ण, गीता और सतयुग—सबकी शुरुआत यहीं से होती है
प्रश्न 20: बाबा संगम युग को ‘डायमंड युग’ क्यों कहते हैं?
उत्तर: क्योंकि यही वह युग है जहाँ आत्मा फिर से हीरा बनती है—
बेदाग, शक्तिशाली और दिव्य।
Disclaimer :
“यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज के आध्यात्मिक साहित्य—साकार मुरली, अव्यक्त वाणी तथा संस्थान की शिक्षाओं पर आधारित एक आध्यात्मिक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक ज्ञान, आत्म-उन्नति और सकारात्मकता का प्रसार करना है। यह किसी भी धर्म, मत या समुदाय की भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं है।”
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