(28)Is God corporeal or incorporeal?

विश्व नाटक :-(28)ईश्वर साकार है या निराकार?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

हम विश्व नाटक का अध्ययन कर रहे हैं कि संसार का आरंभ कैसे हुआ।
आज का हमारा विषय है कि ईश्वर साकार है या निराकार?
इस विषय पर आज हम मंथन करेंगे।

आज हम एक ऐसे प्रश्न को स्पर्श करने जा रहे हैं जिसने हजारों वर्षों से दार्शनिकों, संतो, वैज्ञानिकों को उलझाया है।
वह प्रश्न क्या है कि ईश्वर साकार है या निराकार?

क्या सृष्टि रचना किसी भौतिक शरीर वाले ईश्वर ने की है?
जैसा हमारे जैसा शरीर किसी का भौतिक शरीर है। उसने इस संसार को रचा है क्या?

पहला पहला क्वेश्चन था या क्या निराकार परमात्मा बिना शरीर के भी द्रव्य जगत में क्रिया कर सकता है?
जिसके पास अपना शरीर नहीं वह इस संसार में आकर कोई कर्म कर सकता है।

जगत में क्रिया शरीर के भी द्रव्य जगत में क्रिया कर सकता है।
क्वेश्चन है, दुनिया इन प्रश्नों को देखकर उलझ जाती है।
परंतु प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय इन प्रश्नों का ऐसा समाधान देता है जो तर्कसंगत है, आध्यात्मिक रूप से अनुभव योग्य है और मुरली के महावाक्यों से सिद्धि है।

आज का पूरा एपिसोड इनहीं गुण रहस्यों को सरल भाषा में खोलेगा।
आम दुनिया ईश्वर को कैसे देखती है।
दुनिया के बड़े हिस्से में यह मान्यता है कि ईश्वर ने इस जगत को बनाया है। यानी वह सृष्टि करता है।

लेकिन जैसे ही सृष्टि रचना कहा जाता है तो मन में तुरंत प्रश्न उठते हैं।
यदि ईश्वर ने रचना की तो क्या उसके भी हाथ पैर थे? जिसने रचना की उसके हाथ पैर नहीं थे।

यदि ईश्वर ने रचना की तो क्या उसके पास कोई उपकरण था?
यदि उसका शरीर था तो वह शरीर किस पदार्थ से बना था?
यदि शरीर द्रव्य से बना था तो वे द्रव्य पहले से कहां था?
ये सारे प्रश्न खड़े हो जाते हैं और यही तर्क उलझ जाता है।
भारतीय दर्शन के अनेक पंथ भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए।

शंकराचार्य ने तो स्पष्ट कहा जगत का वास्तविक निर्माण समझना असंभव है।
कपिल सांख्य दर्शन में कहते हैं इस प्रश्न का समाधान तात्विक रूप से असंभव है।

मतलब दुनिया की समझ यहां ठहर जाती है।
परमात्मा ने स्वयं क्या बताया?
मुरली का समाधान मुरली के अनुसार शिव बाबा आकर क्या बताते हैं?
मुरली हमें सबसे सरल, सबसे सुंदर उत्तर देती है।

ईश्वर साकार नहीं बल्कि निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप है।

18 जनवरी 1969 की अव्यक्त मुरली में बाबा कहते हैं मैं निर्गुण निर्विकारी बिंदु स्वरूप शिव हूँ।
मुझे शरीर की आवश्यकता नहीं, मैं रचना नहीं करता।
स्थूल किसी में कुछ भी तैयार करना हो, सजाएंगे, सवारेंगे।

इसका अर्थ परमपिता शिव परमात्मा मिट्टी, पानी, प्रकाश से क्या करते हैं?
शरीर का निर्वाहण करते हैं।

परमपिता शिव मिट्टी, पानी, प्रकाश से संसार बनाते नहीं बल्कि व्यवस्था स्थापित करते हैं।
ज्ञान देखकर मानव को परिवर्तन कर, परिवर्तन कर देते हैं।
सतो प्रधान बनने की शक्ति डालते हैं।

यदि ईश्वर निराकार है तो वो द्रव्य जगत में क्रिया कैसे करता है?
यह सबसे बड़ा प्रश्न है। और इसका समाधान संगम युग में मिलता है।

मुरली है 23 जनवरी 1965, मैं शरीर नहीं परंतु कर्म करने के लिए एक शरीर को अपनाता हूँ।
यानी ईश्वर शरीर लेकर नहीं जन्मता।
वे किसी एक चुने हुए मनुष्य तन में प्रवेश करते हैं और उसी के माध्यम से विश्व परिवर्तन का कार्य करवाते हैं।

इसलिए हम कहते हैं शिव बाबा साकार नहीं परंतु साकार माध्यम से साकार कार्य करते हैं।
यही ब्रह्मा बाबा प्रजापिता की भूमिका है।

क्या ईश्वर सृष्टि करता है?
सृष्टि की रचना करते हैं।
बी के ज्ञान का अद्वितीय उत्तर है।

संसार का द्रव्य नंबर एक शाश्वत है। अनादि है और विनाश होती है।
दुनिया नई पुरानी होती है। 15 मार्च 1970 को बाबा कहते हैं, दुनिया नई पुरानी होती है।
पर सृष्टि का बीज तत्व अभी नहीं होगा।

दुनिया नई पुरानी होती है पर पुरानी सृष्टि का बीज तत्व शाश्वत है।
वो कभी भी नया पुराना नहीं होता।
परमात्मा द्रव्य से संसार बनाते हैं, बनाते नहीं।
वे केवल पापी को पुण्य आत्मा बनाते।
पापी को पुण्य आत्मा बनाते। पावन बनाते हैं।
असत्य को सत्य में बदलते हैं।
अराजकता को व्यवस्था में बदलते हैं।
तमस्तानसी जगत को सतो प्रधान बनाते हैं।
यही सृष्टि निर्माण का मूल अर्थ है।
ईश्वर का कार्य है।
ज्ञान द्वारा इसी को सृष्टि रचना कहते हैं।

यदि ईश्वर देहधारी होता तो समस्या क्या होती?
यदि परमात्मा का शरीर होता तो वह जन्म मरण के कानून में बंध जाता।
उसके मात पिता होते, पूर्व कर्म होते।
वे प्रथम कारण के बिना नहीं रह सकते।
वे सर्व्यापक या सर्वशक्तिमान नहीं रह सकते।

इसलिए मुरली स्पष्ट कहती है 7 फरवरी 1968 में, मैं निराकार हूँ।
मेरा कोई जन्म नहीं। कोई कर्म बंधन नहीं।

न्याय विशेषिक और अन्य दर्शन क्यों उलझ गए?
क्योंकि वे बाहरी भौतिक रचना को ईश्वर से जोड़कर देखते थे।

लेकिन बी के ज्ञान बतलाता है, ईश्वर का निर्माता नहीं।
कोई ईश्वर का निर्माता नहीं।
ईश्वर द्रव्य का निर्माता नहीं।
जीवन का सुधारक है।
वो परिवर्तन करता है, सुधारता है परंतु बनाता नहीं।
यही कारण है कि भगवान केवल संगम युग पर अवतरित होते।
संगम युग पर अवतरित होते हैं और ज्ञान द्वारा विश्व का जीर्ण उद्धार करते हैं।
जीर्ण उद्धार करना जीर्ण अवस्था से श्रेष्ठ अवस्था तक पहुंचाना।

अंतिम सांस ईश्वर का स्वरूप निराकार ज्योति बिंदु परम शुद्ध चेतना।
ईश्वर शरीर नहीं लेता परंतु ब्रह्मा बाबा में प्रवेश कर साकार गति विधि करते हैं।

सृष्टि की रचना कैसे होती है?
द्रव्य नहीं बनता।
संस्कारों का नवनिर्माण होता है।
नया विश्व स्थापित करना यही बी के ज्ञान का अद्वितीय विज्ञान है।
तर्क संगत उत्तर।