अव्यक्त मुरली-(06)18-01-1985 “प्रतिज्ञा द्वारा प्रत्यक्षता (स्मृति दिवस पर विशेष)”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
18-01-1985 “प्रतिज्ञा द्वारा प्रत्यक्षता (स्मृति दिवस पर विशेष)”
आज समर्थ दिवस पर समर्थ बाप अपने समर्थ बच्चों को देख रहे हैं। आज का दिन विशेष ब्रह्मा बाप द्वारा विशेष बच्चों को समर्थी का वरदान अर्पित करने का दिन है। आज के दिन बापदादा अपनी शक्ति सेना को विश्व की स्टेज पर लाते – तो साकार स्वरूप में शिव शक्तियों का प्रत्यक्ष रूप में पार्ट बजाने का दिन है। शक्तियों द्वारा शिव बाप प्रत्यक्ष हो स्वयं गुप्त रूप में पार्ट बजाते रहते हैं। शक्तियों को प्रत्यक्ष रूप में विश्व के आगे विजयी प्रत्यक्ष करते हैं। आज का दिन बच्चों को बापदादा द्वारा समान भव के वरदान का दिन है। आज का दिन विशेष स्नेही बच्चों को नयनों में स्नेह स्वरूप से समाने का दिन है। आज का दिन बापदादा विशेष समर्थ और स्नेही बच्चों को मधुर मिलन द्वारा अविनाशी मिलन का वरदान देता है। आज के दिन अमृतवेले से चारों ओर के सर्व बच्चों के दिल का पहला संकल्प मधुर मिलन मनाने का, मीठे-मीठे महिमा के दिल के गीत गाने का, विशेष स्नेह की लहर का दिन है। आज के दिन अमृतवेले अनेक बच्चों के स्नेह के मोतियों की मालायें, हर एक मोती के बीच बाबा, मीठे बाबा का बोल चमकता हुआ देख रहे थे। कितनी मालायें होंगी। इस पुरानी दुनिया में 9 रत्नों की माला कहते हैं लेकिन बापदादा के पास अनेक अलौकिक अनोखी अमूल्य रत्नों की मालायें थीं। ऐसी मालायें सतयुग में भी नहीं पहनेंगे। यह मालायें सिर्फ बापदादा ही इस समय बच्चों द्वारा धारण करते हैं। आज का दिन अनेक बंधन वाली गोपिकाओं के दिल के वियोग और स्नेह से सम्पन्न मीठे गीत सुनने का दिन है। बापदादा ऐसी लगन में मगन रहने वाली स्नेही, सिकीलधे आत्माओं को रिटर्न में यही खुशखबरी सुनाते कि अब प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजने वाला ही है। इसलिए हे सहज योगी और मिलन के वियोगी बच्चे यह थोड़े से दिन समाप्त हुए कि हुए। साकार स्वीट होम में मधुर मिलन हो ही जायेगा। वह शुभ दिन समीप आ रहा है।
आज का दिन हर बच्चे के दिल से दृढ़ संकल्प करने से सहज सफलता का प्रत्यक्ष फल पाने का दिन है। सुना आज का दिन कितना महान है! ऐसे महान दिवस पर सभी बच्चे जहाँ भी हैं, दूर होते भी दिल के समीप हैं। बापदादा भी हर एक बच्चे को स्नेह और बापदादा को प्रत्यक्ष करने की सेवा के उमंग-उत्साह के रिटर्न में स्नेह भरी बधाई देते हैं क्योंकि मैजारिटी बच्चों की रूह-रूहान में स्नेह और सेवा के उमंग की लहरें विशेष थीं। प्रतिज्ञा और प्रत्यक्षता दोनों बातें विशेष थीं। सुनते-सुनते बापदादा क्या करते? सुनाने वाले कितने होते हैं लेकिन दिल का आवाज़ दिलाराम बाप एक ही समय में अनेकों का सुन सकते हैं। प्रतिज्ञा करने वालों को बापदादा बधाई देते। लेकिन सदा इस प्रतिज्ञा को अमृतवेले रिवाइज करते रहना। प्रतिज्ञा कर छोड़ नहीं देना। करना ही है, बनना ही है। इस उमंग-उत्साह को सदा साथ रखना। साथ-साथ कर्म करते हुए जैसे ट्रैफिक कन्ट्रोल की विधि द्वारा याद की स्थिति को लगातार बनाने में सफलता को पा रहे हो। ऐसे कर्म करते अपने प्रति अपने आपको चेक करने के लिए समय निश्चित करो। तो निश्चित समय प्रतिज्ञा को सफलता स्वरूप बनाता रहेगा।
प्रत्यक्षता के उमंग-उत्साह वाले बच्चों को बापदादा अपने राइट हैण्ड रूप से स्नेह की हैण्डशेक कर रहे हैं। सदा मुरब्बी बच्चे सो बाप समान बन उमंग की हिम्मत से पदमगुणा बाप दादा की मदद के पात्र हैं ही हैं। सुपात्र अर्थात् पात्र हैं।
तीसरे प्रकार के बच्चे – दिन रात स्नेह में समाये हुए हैं। स्नेह को ही सेवा समझते हैं। मैदान पर नहीं आते लेकिन मेरा बाबा, मेरा बाबा यह गीत जरूर गाते हैं। बाप को भी मीठे रूप से रिझाते रहते हैं। जो हूँ, जैसी हूँ, आपकी हूँ। ऐसी भी विशेष स्नेही आत्मायें हैं। ऐसे स्नेही बच्चों को बापदादा स्नेह का रिटर्न स्नेह तो जरूर देते हैं लेकिन यह भी हिम्मत दिलाते हैं कि राज्य अधिकारी बनना है। राज्य में आने वाला बनना है – फिर तो स्नेही हो तो भी ठीक है। राज्य अधिकारी बनना है तो स्नेह के साथ पढ़ाई की शक्ति अर्थात् ज्ञान की शक्ति, सेवा की शक्ति, यह भी आवश्यक है। इसलिए हिम्मत करो। बाप मददगार है ही। स्नेह के रिटर्न में सहयोग मिलना ही है। थोड़ी सी हिम्मत से, अटेन्शन से राज्य अधिकारी बन सकते हो। सुना, आज की रूहरूहान का रेसपाण्ड? देश विदेश चारों ओर के बच्चों की वतन में रौनक देखी। विदेशी बच्चे भी लास्ट सो फास्ट जाकर फर्स्ट आने के उमंग-उत्साह में अच्छे बढ़ते जा रहे हैं। वह समझते हैं जितना विदेश के हिसाब से दूर हैं उतना ही दिल में समीप रहते हैं। तो आज भी अच्छे-अच्छे उमंग-उत्साह की रूह-रूहान कर रहे थे। कई बच्चे बड़े स्वीट हैं। बाप को भी मीठी-मीठी बातों से मनाते रहते हैं। कहते बड़ा भोले रूप से हैं लेकिन हैं चतुर। कहते हैं आप प्रॉमिस करो। ऐसे मनाते हैं। बाप क्या कहेंगे? खुश रहो, आबाद रहो, बढ़ते रहो। बातें तो बहुत लम्बी चौड़ी हैं, कितनी सुनाए कितनी सुनावें। लेकिन बातें सभी मजे से बड़ी अच्छी करते हैं। अच्छा।
सदा स्नेह और सेवा के उमंग-उत्साह में रहने वाले, सदा सुपात्र बन सर्व प्राप्तियों के पात्र बनने वाले, सदा स्वयं के कर्मों द्वारा बापदादा के श्रेष्ठ दिव्य कर्म प्रत्यक्ष करने वाले, अपने दिव्य जीवन द्वारा ब्रह्मा बाप की जीवन कहानी स्पष्ट करने वाले – ऐसे सर्व बापदादा के सदा साथी बच्चों को समर्थ बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
दादी जी तथा दादी जानकी जी बापदादा के सामने बैठी हैं।
आज तुम्हारी सखी (दीदी) ने भी खास यादप्यार दी है। आज वह भी वतन में इमर्ज थी। इसलिए उनकी भी सभी को याद। वह भी (एडवांस पार्टी) में अपना संगठन मजबूत बना रहे हैं। उन्हों का कार्य भी आप लोगों के साथ-साथ प्रत्यक्ष होता जायेगा। अभी तो सम्बन्ध और देश के समीप हैं इसलिए छोटे-छोटे ग्रुप उन्हों में भी कारणें-अकारणें आपस में न जानते हुए भी मिलते रहते हैं। यह पूर्ण स्मृति नहीं है लेकिन यह बुद्धि में टचिंग है कि हमें मिलकर कोई नया कार्य करना है। जो दुनिया की हालते हैं, उसी प्रमाण जो कोई नहीं कर सकता है वह हमें मिलके करना है। इस टचिंग से आपस में मिलते जरूर हैं। लेकिन अभी कोई छोटे, कोई बड़े, ऐसा ग्रुप है। लेकिन गये सभी प्रकार के हैं। कर्मणा वाले भी गये हैं, राज्य स्थापना करने की प्लैनिंग बुद्धि वाले भी गये हैं। साथ-साथ हिम्मत उल्लास बढ़ाने वाले भी गये हैं। आज पूरे ग्रुप में इन तीन प्रकार के बच्चे देखे और तीनों ही आवश्यक हैं। कोई प्लैनिंग वाले हैं, कोई कर्म में लाने वाले हैं और कोई हिम्मत बढ़ाने वाले हैं। ग्रुप तो अच्छा बन रहा है। लेकिन दोनों ग्रुप साथ-साथ प्रत्यक्ष होंगे। अभी प्रत्यक्षता की विशेषता बादलों के अन्दर है। बादल बिखर रहे हैं लेकिन हटे नहीं हैं। जितना-जितना शक्तिशाली मास्टर ज्ञान सूर्य की स्टेज पर पहुँच जाते हैं वैसे यह बादल बिखरते जा रहे हैं। मिट जायेंगे तो सेकेण्ड में नगाड़ा बज जायेगा। अभी बिखर रहे हैं। वह भी पार्टी अपनी तैयारी खूब कर रही है। जैसे आप लोग यूथ रैली का प्लैन बना रहे हो ना, तो वह भी यूथ हैं अभी। वह भी आपस में बना रहे हैं। जैसे अभी भारत में अनेक पार्टियों की जो विशेषता थी वह कम हो फिर भी एक पार्टी आगे बढ़ रही है ना। तो बाहर की एकता का भी रहस्य है। अनेकता कमजोर हो रही है और एक शक्तिशाली हो रहे हैं। यह स्थापना के राज़ में सहयोग का पार्ट है। मन से मिले हुए नहीं है, मजबूरी से मिले हैं, लेकिन मजबूरी का मिलन भी रहस्य है। अभी स्थापना की गुह्य रीति रसम स्पष्ट होने का समय समीप आ रहा है। फिर आप लोगों को पता पड़ेगा कि एडवांस पार्टी क्या कर रही है और हम क्या कर रहे हैं। अभी आप भी क्वेश्चन करते हो कि वह क्या कर रहे हैं और वह भी क्वेश्चन करते हैं कि यह क्या कर रहे हैं। लेकिन दोनों ही ड्रामा अनुसार बढ़ रहे हैं।
जगदम्बा तो है ही चन्द्रमा। तो चन्द्रमा जगत अम्बा के साथ दीदी का शुरू से विशेष पार्ट रहा है। कार्य में साथ का पार्ट रहा है। वह चन्द्रमा (शीतल) है और वह तीव्र है। दोनों का मेल है। अभी थोड़ा बड़ा होने दो उसको, जगदम्बा तो अभी भी शीतलता की सकाश दे रही है लेकिन प्लैनिंग में, आगे आने में साथी भी चाहिए ना। पुष्पशान्ता और दीदी इन्हों का भी शुरू में आपस में हिसाब है। यहाँ भी दोनों का हिसाब आपस में समीप का है। भाऊ (विश्वकिशोर) तो बैकबोन है। इसमें भी पाण्डव बैकबोन हैं शक्तियाँ आगे हैं। तो वह भी उमंग-उत्साह में लाने वाले ग्रुप हैं। अभी प्लैनिंग करने वाले थोड़ा मैदान पर जायेंगे फिर प्रत्यक्षता होगी। अच्छा।
विदेशी भाई बहिनों से :- सभी लास्ट सो फास्ट जाने वाले और फर्स्ट आने के उमंग-उत्साह वाले हो ना। सेकेण्ड नम्बर वाला तो कोई नहीं है। लक्ष्य शक्तिशाली है तो लक्षण भी स्वत: शक्तिशाली होंगे। सभी आगे बढ़ने में उमंग-उत्साह वाले हैं। बापदादा भी हर बच्चे को यही कहते कि सदा डबल लाइट बन उड़ती कला से नम्बरवन आना ही है। जैसे बाप ऊंचे ते ऊंचा है वैसे हर बच्चा भी ऊंचे ते ऊंचा है।
सदा उमंग-उत्साह के पंखों से उड़ने वाले ही उड़ती कला का अनुभव करते हैं। इस स्थिति में स्थित रहने का सहज साधन है – जो भी सेवा करते हो, वह बाप करनकरावनहार करा रहा है, मैं निमित्त हूँ कराने वाला करा रहा है, चला रहा है, इस स्मृति से सदा हल्के हो उड़ते रहेंगे। इसी स्थिति को सदा आगे बढ़ाते रहो।
विदाई के समय :- यह समर्थ दिन सदा समर्थ बनाता रहेगा। इस समर्थ दिन पर जो भी आये हो वह विशेष समर्थ भव का वरदान सदा साथ रखना। कोई भी ऐसी बात आये तो यह दिन और यह वरदान याद करना तो स्मृति समर्थी लायेगी। सेकेण्ड में बुद्धि के विमान द्वारा मधुबन में पहुँच जाना। क्या था, कैसा था और क्या वरदान मिला था। सेकेण्ड में मधुबन निवासी बनने से समर्थी आ जायेगी। मधुबन में पहुँचना तो आयेगा ना। यह तो सहज है, साकार में देखा है। परमधाम में जाना मुश्किल भी लगता हो, मधुबन में पहुँचना तो मुश्किल नहीं। तो सेकेण्ड में बिना टिकट के, बिना खर्चे के मधुबन निवासी बन जाना। तो मधुबन सदा ही हिम्मत हुल्लास देता रहेगा। जैसे यहाँ सभी हिम्मत उल्लास में हो, किसी के पास कमजोरी नहीं है ना। तो यही स्मृति फिर समर्थ बना देगी।
1. आज का दिन — समर्थ दिवस का अलौकिक महत्व
18 जनवरी को बापदादा ने इसे समर्थ दिवस कहा।
यह वह दिन है जब—
-
ब्रह्मा बाप अपने समर्थ बच्चों को वरदान देते हैं।
-
शिवबाबा अपनी शक्ति सेना को विश्व मंच पर लाते हैं।
-
विश्व के आगे “शिव शक्तियों” की प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजता है।
उदाहरण:
जैसे किसी राज्याभिषेक के दिन राजा अपने योग्य वारिसों को तिलक, ताज और राज्य का अधिकार देता है—
वैसे ही आज ब्रह्मा बाप बच्चों को “समान भव” का तिलक देते हैं।
2. स्नेह की मालाएँ — बच्चों के प्रेम की अनोखी सम्पत्ति
अमृतवेले बापदादा ने बच्चों के स्नेह से बनी अलौकिक मालाएँ देखीं।
हर मोती के बीच चमकती आवाज़ थी— “मीठे बाबा… मेरा बाबा…”
मुरली नोट (18-01-1985):
“यह मालाएँ सतयुग में भी नहीं पहनते। यह मालाएँ सिर्फ अभी बच्चों के द्वारा धारण करते हैं।”
उदाहरण:
लोहे के युग की दुनिया ‘नौ रत्नों’ की माला कहती है,
लेकिन बाबा के पास असंख्य स्नेह-मोती हैं—
जो सिर्फ बच्चों के दिल से ही मिल सकते हैं।
3. स्नेही गोपिकाएँ — वियोग में भी मिलन की धुन
कुछ बच्चे बंधनों में हैं।
कुछ मैदान पर सेवा में हैं।
कुछ मन-मन में प्रेम के गीत गाते हैं।
बाबा इन सबको दिल से सुनते हैं और कहते हैं—
“थोड़े दिन और… फिर मधुर मिलन का शुभ दिन समीप है।”
4. प्रतिज्ञा — प्रत्यक्षता का आधार
आज का दिन है—
दृढ़ संकल्प करने का
और सतत सफलता का प्रत्यक्ष फल देखने का।
क्या प्रतिज्ञा?
-
“करना ही है… बनना ही है…”
-
प्रतिज्ञा को प्रतिदिन अमृतवेले रिवाइज करते रहना।
-
कर्म करते हुए समय निकालकर स्व-चेकिंग करना।
उदाहरण:
जैसे ट्रैफिक कंट्रोल निरंतर याद की स्थिति को बनाता है—
वैसे ही निश्चित समय प्रतिज्ञा को सफलता रूप बना देता है।
5. बापदादा का हैण्डशेक — राइट हैंड वाले बच्चे
प्रत्यक्षता की धुन में हिम्मत वाले बच्चों को
बाबा स्नेह की हैण्डशेक देते हैं।
मुरली नोट:
“सदा मुरब्बी बच्चे सो बाप समान… पदमगुणा मदद के पात्र हैं।”
अर्थ:
जो बच्चे जिम्मेदारी, मर्यादा और माधुर्य से चलते हैं—
वही वास्तव में बाप समान बनते हैं।
6. तीन प्रकार के बच्चे — अद्भुत आध्यात्मिक वर्गीकरण
(1) सेवा-समर्थ बच्चे
डायरेक्ट मैदान में उतरकर प्रत्यक्ष सेवा करने वाले।
(2) स्नेह-समर्पित बच्चे
जो कहते हैं—
“जो हूँ, जैसी हूँ, आपकी हूँ…”
लेकिन बाबा उनसे कहते हैं—
“राज्य अधिकारी बनो—सिर्फ स्नेह नहीं, ज्ञान+सेवा भी चाहिए।”
(3) उमंग-उत्साह वाले विदेशी बच्चे
जो कहते हैं—
“लास्ट सो फ़ास्ट — और फर्स्ट आने की प्रतिज्ञा।”
उदाहरण:
विदेशी बच्चे भले भारत से दूर हैं, लेकिन
दिल से सबसे नज़दीक हैं।
उनमें विशेष उमंग की लहर होती है।
7. एडवांस पार्टी — स्थापना की गुप्त रीति
बापदादा बताते हैं कि—
-
एडवांस पार्टी अपने संगठन को तैयार कर रही है
-
प्लैनिंग, कर्म, और हिम्मत — तीनों प्रकार के आत्माएँ वहाँ भी हैं
-
दोनों ग्रुप साथ-साथ प्रत्यक्ष होंगे
मुरली नोट (18-01-1985):
“अभी बादल बिखर रहे हैं…
मास्टर ज्ञान सूर्य की स्टेज पर पहुँचते ही बादल हट जायेंगे।”
8. जगदम्बा, दीदी और पुष्पशान्ता — तीन दिव्य शक्तियों का कल्याणकारी मेल
-
जगदम्बा = चन्द्रमा (शीतलता)
-
दीदी = तीव्रता (दृढ़ता + शक्ति)
-
पुष्पशान्ता = संयोग का हिसाब
ये मिलकर भविष्य की सेवा का विशाल प्लान तैयार कर रही हैं।
9. उड़ती कला का रहस्य — करनकरावनहार स्मृति
उड़ती कला प्राप्त होती है जब—
-
हम याद रखें कि “बाप करनकरावनहार है—मैं निमित्त हूँ।”
-
यह स्मृति आत्मा को हल्का, डबल लाइट बना देती है।
10. विदाई सन्देश — ‘समर्थ दिन’ का वरदान
बाबा कहते हैं—
“जब भी कमजोरी आए—इस दिन की स्मृति लौटा लेना।”
सेकंड में बुद्धि के विमान से—
“मधुबन निवासी बन जाना।”
उदाहरण:
परमधाम जाना मुश्किल लगता है,
लेकिन “मधुबन में पहुँचना तो सहज है”—
बस स्मृति से सेकंड में स्थिति बदल जाती है।
समापन आशीर्वाद
“सदा स्नेह और सेवा के उमंग-उत्साह में रहने वाले
सदा सुपात्र बनने वाले
और अपने दिव्य जीवन से प्रत्यक्षता लाने वाले—
ऐसे सभी बच्चों को
समर्थ बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।”
Q1: आज का दिन समर्थ दिवस क्यों कहा जाता है?
A1: 18 जनवरी को बापदादा ने इसे समर्थ दिवस कहा।
-
ब्रह्मा बाप अपने समर्थ बच्चों को वरदान देते हैं।
-
शिवबाबा अपनी शक्ति सेना को विश्व मंच पर लाते हैं।
-
विश्व के सामने “शिव शक्तियों” की प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजता है।
उदाहरण: जैसे राजा अपने योग्य वारिसों को तिलक और राज्य का अधिकार देते हैं, वैसे ही ब्रह्मा बाप बच्चों को “समान भव” का तिलक देते हैं।
Q2: स्नेह की मालाएँ क्या हैं और उनका महत्व क्या है?
A2: अमृतवेले बापदादा बच्चों के स्नेह से बनी अलौकिक मालाएँ देखते हैं।
-
हर मोती के बीच की आवाज़: “मीठे बाबा… मेरा बाबा…”
-
मुरली नोट (18-01-1985): “यह मालाएँ सतयुग में भी नहीं पहनते। यह मालाएँ सिर्फ अभी बच्चों द्वारा धारण करते हैं।”
उदाहरण: लोहे के युग की दुनिया ‘नौ रत्नों’ की माला कहती है, लेकिन बाबा के पास असंख्य स्नेह-मोती हैं जो सिर्फ बच्चों के दिल से मिल सकते हैं।
Q3: स्नेही गोपिकाएँ कौन हैं?
A3:
-
कुछ बच्चे बंधनों में हैं।
-
कुछ मैदान पर सेवा में हैं।
-
कुछ मन-मन में प्रेम के गीत गाते हैं।
बाबा कहते हैं: “थोड़े दिन और… फिर मधुर मिलन का शुभ दिन समीप है।”
Q4: प्रतिज्ञा का क्या महत्व है?
A4:
-
आज का दिन दृढ़ संकल्प करने और सतत सफलता का प्रत्यक्ष फल पाने का दिन है।
-
प्रतिज्ञा: “करना ही है… बनना ही है…”
-
प्रतिज्ञा को प्रतिदिन अमृतवेले रिवाइज करें और समय निकालकर स्व-चेकिंग करें।
उदाहरण: जैसे ट्रैफिक कंट्रोल याद की स्थिति बनाता है, वैसे ही निश्चित समय प्रतिज्ञा को सफलता रूप बनाता है।
Q5: बापदादा का हैण्डशेक किसे मिलता है?
A5:
-
प्रत्यक्षता की धुन में हिम्मत वाले बच्चों को बाबा स्नेह की हैण्डशेक देते हैं।
-
मुरली नोट: “सदा मुरब्बी बच्चे सो बाप समान… पदमगुणा मदद के पात्र हैं।”
-
अर्थ: जिम्मेदारी, मर्यादा और माधुर्य से चलने वाले बच्चे बाप समान बनते हैं।
Q6: तीन प्रकार के बच्चे कौन हैं?
A6:
-
सेवा-समर्थ बच्चे — डायरेक्ट मैदान में सेवा करने वाले।
-
स्नेह-समर्पित बच्चे — कहते हैं “जो हूँ, जैसी हूँ, आपकी हूँ…” लेकिन ज्ञान और सेवा भी आवश्यक है।
-
उमंग-उत्साह वाले विदेशी बच्चे — “लास्ट सो फ़ास्ट और फर्स्ट आने की प्रतिज्ञा।”
उदाहरण: विदेश के बच्चे भारत से दूर हैं, लेकिन दिल से समीप और विशेष उमंग के साथ बढ़ते हैं।
Q7: एडवांस पार्टी क्या है?
A7:
-
एडवांस पार्टी संगठन तैयार कर रही है।
-
इसमें प्लैनिंग, कर्म, और हिम्मत — तीनों प्रकार की आत्माएँ हैं।
-
दोनों ग्रुप साथ-साथ प्रत्यक्ष होंगे।
-
मुरली नोट: “अभी बादल बिखर रहे हैं… मास्टर ज्ञान सूर्य की स्टेज पर पहुँचते ही बादल हट जायेंगे।”
Q8: जगदम्बा, दीदी और पुष्पशान्ता का क्या महत्व है?
A8:
-
जगदम्बा = चन्द्रमा (शीतलता)
-
दीदी = तीव्रता (दृढ़ता + शक्ति)
-
पुष्पशान्ता = संयोग का हिसाब
ये मिलकर भविष्य की सेवा का विशाल प्लान तैयार कर रही हैं।
Q9: उड़ती कला क्या है?
A9:
-
उड़ती कला तब प्राप्त होती है जब हम याद रखें कि “बाप करनकरावनहार है—मैं निमित्त हूँ।”
-
यह स्मृति आत्मा को हल्का और डबल लाइट बनाती है।
Q10: ‘समर्थ दिन’ का विदाई संदेश क्या है?
A10:
-
बाबा कहते हैं: “जब भी कमजोरी आए—इस दिन की स्मृति लौटा लेना।”
-
सेकंड में बुद्धि के विमान से “मधुबन निवासी बन जाना।”
-
उदाहरण: परमधाम जाना कठिन लगता है, लेकिन स्मृति से सेकंड में स्थिति बदल जाती है।
समापन आशीर्वाद:
“सदा स्नेह और सेवा के उमंग-उत्साह में रहने वाले,
सदा सुपात्र बनने वाले,
और अपने दिव्य जीवन से प्रत्यक्षता लाने वाले—
ऐसे सभी बच्चों को समर्थ बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।”
Disclaimer:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं, अव्यक्त मुरली 18-01-1985, और व्यक्तिगत आत्म-अनुभव पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संप्रदाय, धर्म या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह सामग्री केवल आत्मिक उन्नति, राजयोग अभ्यास और सकारात्मक जीवन मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है। कृपया इसे spiritual guidance के रूप में लें, न कि किसी बहस या तर्क का आधार।
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