अव्यक्त मुरली-(18)”09-03-1984 “परिवर्तन को अविनाशी बनाओ”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
09-03-1984 “परिवर्तन को अविनाशी बनाओ”
बापदादा सभी चात्रक बच्चों को देख रहे हैं। सभी को सुनना, मिलना और बनना यही लगन है। सुनना, इसमें नम्बरवन चात्रक हैं। मिलना इसमें नम्बर हैं और बनना – इसमें यथा शक्ति तथा समान बनना। लेकिन सभी श्रेष्ठ आत्मायें, ब्राह्मण आत्मायें तीनों के चात्रक जरुर हैं। नम्बरवन चात्रक मास्टर मुरलीधर, मास्टर सर्वशक्तिवान बाप समान सदा और सहज बन जाते हैं। सुनना अर्थात् मुरलीधर बनना। मिलना अर्थात् संग के रंग में उसी समान शक्तियों और गुणों में रंग जाना। बनना अर्थात् संकल्प के कदम पर, बोल के कदम पर, कर्म के कदम पर कदम रखते हुए साक्षात् बाप समान बनना। बच्चे के संकल्प में बाप का संकल्प समान अनुभव हो। बोल में, कर्म में जैसा बाप वैसा बच्चा सर्व को अनुभव हो। इसको कहा जाता है समान बनना वा नम्बरवन चात्रक। तीनों में से चेक करो मैं कौन हूँ! सभी बच्चों के उमंग-उत्साह भरे संकल्प बापदादा के पास पहुँचते हैं। संकल्प बहुत अच्छे हिम्मत और दृढ़ता से करते हैं। संकल्प रुपी बीज शक्तिशाली है लेकिन धारणा की धरनी, ज्ञान का गंगाजल और याद की धूप कहो वा गर्मी कहो, बार-बार स्व अटेन्शन की रेख-देख इसमें कहाँ-कहाँ अलबेले बन जाते हैं। एक भी बात में कमी होने से संकल्प रुपी बीज सदा फल नहीं देता है। थोड़े समय के लिए एक सीजन, दो सीजन फल देगा। सदा का फल नहीं देगा। फिर सोचते हैं बीज तो शक्तिशाली था, प्रतिज्ञा तो पक्की की थी। स्पष्ट भी हो गया था। फिर पता नहीं क्या हो गया। 6 मास तो बहुत उमंग रहा फिर चलते-चलते पता नहीं क्या हुआ। इसके लिए जो पहले बातें सुनाई उस पर सदा अटेन्शन रहे।
दूसरी बात, छोटी-सी बात में घबराते जल्दी हो। घबराने के कारण छोटी-सी बात को भी बड़ा बना देते हो। होती चींटी है उसको बना देते हो हाथी। इसलिए बैलेन्स नहीं रहता। बैलेन्स न होने के कारण जीवन से भारी हो जाते हो। या तो नशे में बिल्कुल ऊंचे चढ़ जाते वा छोटी-सी कंकडी भी नीचे बिठा देती। नॉलेजफुल बन सेकेण्ड में उसको हटाने के बजाए कंकड़ी आ गई, रुक गये, नीचे आ गये, यह हो गया, इसको सोचने लग जाते हो। बीमार हो गया, बुखार वा दर्द आ गया। अगर यही सोचते और कहते रहे तो क्या हाल होगा! ऐसे जो छोटी-छोटी बातें आती हैं उनको मिटाओ, हटाओ और उड़ो। हो गया, आ गया, इसी संकल्प में कमजोर नहीं बनो। दवाई लो और तन्दरुस्त बनो। कभी-कभी बापदादा बच्चों के चेहरे को देख सोचते हैं अभी-अभी क्या थे, अभी-अभी क्या हो गये! यह वो ही हैं या दूसरे बन गये! जल्दी में नीचे ऊपर होने से क्या होता? माथा भारी हो जाता। वैसे भी स्थूल में अभी ऊपर अभी नीचे आओ तो चक्कर महसूस करेंगे ना। तो यह संस्कार परिवर्तन करो। ऐसे नहीं सोचो कि हम लोगों की आदत ही ऐसी है। देश के कारण वा वायुमण्डल के कारण वा जन्म के संस्कार, नेचर के कारण ऐसा होता ही है, ऐसी-ऐसी मान्यतायें कमजोर बना देती हैं। जन्म बदला तो संस्कार भी बदलो। जब विश्व परिवर्तक हो तो स्व परिवर्तक तो पहले ही हो ना। अपने आदि अनादि स्वभाव-संस्कार को जानो। असली संस्कार वह हैं। यह तो नकली हैं। मेरे संस्कार, मेरी नेचर यह माया के वशीभूत होने की नेचर है। आप श्रेष्ठ आत्माओं की आदि अनादि नेचर नहीं है, इसलिए इन बातों पर फिर से अटेन्शन दिला रहे हैं। रिवाइज करा रहे हैं। इस परिवर्तन को अविनाशी बनाओ।
विशेषतायें भी बहुत हैं। स्नेह में नम्बरवन हो, सेवा के उमंग में नम्बरवन हो। स्थूल में दूर होते भी समीप हो। कैचिंग पॉवर भी बहुत अच्छी है। महसूसता की शक्ति भी बहुत तीव्र है। खुशियों के झूले में भी झूलते हो। वाह बाबा, वाह परिवार, वाह ड्रामा के गीत भी अच्छे गाते हो। दृढ़ता की विशेषता भी अच्छी है। पहचानने की बुद्धि भी तीव्र है। बाप और परिवार के सिकीलधे लाडले भी बहुत हो। मधुबन के श्रृंगार हो और रौनक भी अच्छी हो। वैरायटी डालियां मिलकर एक चन्दन का वृक्ष बनने का एग्जैम्पल भी बहुत अच्छे हो। कितनी विशेषतायें हैं! विशेषतायें ज्यादा हैं और कमजोरी एक है। तो एक को मिटाना तो बहुत सहज है ना। समस्यायें समाप्त हो गई हैं ना! समझा।
जैसे सफाई से सुनाते हो, वैसे दिल से सफाई से निकालने में भी नम्बरवन हो। विशेषताओं की माला बनायेंगे तो लम्बी चौड़ी हो जायेगी। फिर भी बापदादा मुबारक देते हैं। यह परिवर्तन 99 प्रतिशत तो कर लिया, बाकी 1 प्रतिशत है। वह भी परिवर्तन हुआ ही पड़ा है। समझा। कितने अच्छे हैं जो अभी-अभी भी बदल करके ना से हाँ कर देते हैं। यह भी विशेषता है ना! उत्तर बहुत अच्छा देते हैं। इन्हों से पूछते हैं शक्तिशाली, विजयी हो? तो कहते हैं अभी से हैं! यह भी परिवर्तन की शक्ति तीव्र हुई ना। सिर्फ चींटी, चूहे से घबराने का संस्कार है। महावीर बन चींटी को पांव के नीचे कर दो और चूहे को सवारी बना दो, गणेश बन जाओ। अभी से विघ्न-विनाशक अर्थात् गणेश बनकर चूहे पर सवारी करने लग जाना। चूहे से डरना नहीं। चूहा शक्तियों को काट लेता है। सहन शक्ति खत्म कर लेता है। सरलता खत्म कर देता है, स्नेह खत्म कर देता है। काटता है ना और चींटी सीधे माथे में चली जाती है। टेन्शन में बेहोश कर देती है। उस समय परेशान कर लेती है ना। अच्छा!
सदा महावीर बन शक्तिशाली स्थिति में स्थित होने वाले, हर संकल्प, बोल और कर्म, हर कदम पर कदम रख बाप के साथ-साथ चलने वाले सच्चे जीवन के साथी, सदा अपनी विशेषताओं को सामने रख कमजोरी को सदा के लिए विदाई देने वाले, संकल्प रुपी बीज को सदा फलदायक बनाने वाले, हर समय बेहद का प्रत्यक्ष फल खाने वाले, सर्व प्राप्तियों के झूलों में झूलने वाले ऐसे सदा के समर्थ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
फ्रांस ग्रुप से:- सभी बहुत बार मिले हो और अब फिर से मिल रहे हो क्योंकि जब कल्प पहले मिले थे तब अब मिल रहे हो। कल्प पहले वाली आत्मायें फिर से अपना हक लेने के लिए पहुँच गई हैं? नया नहीं लगता है ना! पहचान याद आ रही है कि हम बहुत बारी मिले हैं! पहचाना हुआ घर लग रहा है। जब अपना कोई मिल जाता है तो अपने को देखकर खुशी होती है। अभी समझते हो कि वह जो सम्बन्ध था वह स्वार्थ का सम्बन्ध था, असली नहीं था। अपने परिवार में, अपने स्वीट होम में पहुँच गये। बापदादा भी भले पधारे कहकर स्वागत कर रहे हैं।
दृढ़ता सफलता को लाती है, जहाँ यह संकल्प होता है कि यह होगा या नहीं होगा वहाँ सफलता नहीं होती। जहाँ दृढ़ता है वहाँ सफलता हुई पड़ी है। कभी भी सेवा में दिलशिकस्त नहीं होना क्योंकि अविनाशी बाप का अविनाशी कार्य है। सफलता भी अविनाशी होनी ही है। सेवा का फल न निकले, यह हो नहीं सकता। कोई उसी समय निकलता है कोई थोड़ा समय के बाद इसलिए कभी भी यह संकल्प भी नहीं करना। सदा ऐसे समझो कि सेवा होनी ही है।
जापान ग्रुप से:- बाप द्वारा सर्व खजाने प्राप्त हो रहे हैं? भरपूर आत्मायें हैं, ऐसा अनुभव करते हो? कितना भी आज की दुनिया में कोई धनवान हो लेकिन जो खजाना आपके पास है वह किसी के पास भी नहीं है। तो वास्तविक सच्चे वी.आई.पी. कौन हैं? आप हो ना। वह पोजीशन तो आज है कल नहीं लेकिन आपका यह ईश्वरीय पोजीशन कोई छीन नहीं सकता। बाप के घर के श्रृंगार बच्चे हो। जैसे फूलों से घर को सजाया जाता है ऐसे बाप के घर के श्रृंगार हो। तो सदा स्वयं को मैं बाप का श्रृंगार हूँ, ऐसा समझ श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहो। कभी भी कमजोरी की बातें याद नहीं करना। बीती बातों को याद करने से और ही कमजोरी आ जायेगी। पास्ट सोचेंगे तो रोना आयेगा इसलिए पास्ट अर्थात् फिनिश। बाप की याद शक्तिशाली आत्मा बना देती है। शक्तिशाली आत्मा के लिए मेहनत भी मुहब्बत में बदल जाती है। जितना ज्ञान का खजाना दूसरों को देते हैं उतना वृद्धि होती है। हिम्मत और उल्लास द्वारा सदा उन्नति को पाते आगे बढ़ते चलो।
अध्याय : परिवर्तन को अविनाशी बनाओ
(अव्यक्त बापदादा मुरली – 09 मार्च 1984)
तीन चात्रक आत्माएँ – सुनना, मिलना और बनना
बापदादा सभी बच्चों को चात्रक रूप में देख रहे हैं —
जो सदा बाप की ओर आकृष्ट रहते हैं।
🔹 सुनना – मुरलीधर बनना
🔹 मिलना – संग के रंग में रंग जाना
🔹 बनना – संकल्प, बोल और कर्म में बाप समान बनना
Murli Note (09-03-1984)
“सुनना अर्थात् मुरलीधर बनना,
मिलना अर्थात् समान शक्तियों और गुणों में रंग जाना,
बनना अर्थात् हर कदम पर बाप के कदम पर कदम रखना।”
नम्बरवन चात्रक वही है —
जिसके संकल्प में बाप का संकल्प,
जिसके बोल में बाप का बोल,
और जिसके कर्म में बाप का स्वरूप अनुभव हो।
संकल्प शक्तिशाली, फिर भी फल सदा क्यों नहीं?
बापदादा कहते हैं —
संकल्प तो बच्चे बहुत दृढ़ करते हैं,
लेकिन संकल्प का बीज तभी फल देता है जब:
धारणा की धरनी हो
ज्ञान का गंगाजल हो
याद की धूप हो
स्व-अटेन्शन की रेख-देख हो
उदाहरण
कई आत्माएँ कहती हैं —
“6 महीने बहुत उमंग रहा, फिर पता नहीं क्या हो गया।”
कारण यह है कि
बीज तो शक्तिशाली था
लेकिन देख-रेख में अलबेलापन आ गया।
Murli Note
“एक भी कमी होने से संकल्प सदा का फल नहीं देता,
सिर्फ एक-दो सीजन का फल देता है।”
चींटी को हाथी क्यों बना देते हैं?
बापदादा स्पष्ट करते हैं —
बच्चे छोटी-सी बात में जल्दी घबरा जाते हैं।
जो चींटी होती है
उसे हाथी बना देते हैं
उदाहरण
-
हल्का-सा दर्द → “अब तो बीमार हो गया”
-
छोटा विघ्न → “सब खत्म हो गया”
-
एक बात → कई संकल्पों की उलझन
परिणाम
-
बैलेन्स खत्म
-
मन भारी
-
आत्मिक स्थिति ऊपर-नीचे
Murli Line
“अभी ऊपर, अभी नीचे आने से आत्मा को चक्कर आता है।”
नकली संस्कार नहीं, असली संस्कार पहचानो
बापदादा चेतावनी देते हैं —
यह कहना कमजोरी है कि
“हमारी नेचर ही ऐसी है।”
Murli Truth (09-03-1984)
“यह संस्कार आपके आदि-अनादि नहीं हैं,
यह माया के वशीभूत बने हुए नकली संस्कार हैं।”
आप:
-
श्रेष्ठ आत्मा हो
-
विश्व-परिवर्तक हो
इसलिए स्व-परिवर्तन पहला कदम है।
विशेषताएँ बहुत, कमजोरी सिर्फ एक
बापदादा बच्चों की विशेषताओं की लिस्ट बताते हैं:
✔ स्नेह में नम्बरवन
✔ सेवा के उमंग में नम्बरवन
✔ कैचिंग पावर तीव्र
✔ महसूसता की शक्ति
✔ दृढ़ता
✔ पहचानने की बुद्धि
✔ परिवार के सिकीलधे लाडले
निष्कर्ष
“विशेषताएँ बहुत हैं और कमजोरी एक है —
तो एक को मिटाना सहज है।”
99% परिवर्तन हो गया, 1% बाकी
बापदादा बच्चों को मुबारक देते हैं —
आपने 99% परिवर्तन कर लिया है।
जो आत्मा:
-
अभी-अभी ‘ना’ से ‘हाँ’ कर ले
-
तुरन्त बदल जाए
यह भी परिवर्तन की शक्ति है।
महावीर बनो, गणेश बनो
गहरा उदाहरण (Murli का)
-
चींटी → टेन्शन
-
चूहा → शक्तियों को काटने वाला
बापदादा कहते हैं —
“महावीर बन चींटी को पाँव के नीचे कर दो
और चूहे को सवारी बना दो — गणेश बन जाओ।”
विघ्न-विनाशक बनो,
विघ्न से डरने वाले नहीं।
दृढ़ता = सफलता (सेवा का अटल नियम)
Murli Note
“जहाँ यह संकल्प होता है – होगा या नहीं होगा,
वहाँ सफलता नहीं होती।”
जहाँ दृढ़ता है —
✔ सफलता निश्चित है
✔ सेवा का फल अविनाशी है
सेवा में कभी दिलशिकस्त नहीं होना।
विशेष संदेश : फ्रांस और जापान ग्रुप
फ्रांस ग्रुप
-
नया नहीं लगता
-
पहचाना हुआ घर
-
कल्प-कल्प का सम्बन्ध
जापान ग्रुप
-
सच्चे VIP आप हो
-
ईश्वरीय पोजीशन अविनाशी है
-
आप बाप के घर का श्रृंगार हो
-
प्रश्न 1: बापदादा बच्चों को “तीन चात्रक आत्माएँ” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि चात्रक आत्माएँ सदा बाप की ओर आकृष्ट रहती हैं—
सुनना (मुरलीधर बनना),
मिलना (संग के रंग में रंग जाना),
और बनना (संकल्प, बोल और कर्म में बाप समान बनना)।
प्रश्न 2: नम्बरवन चात्रक आत्मा की पहचान क्या है?
उत्तर:
जिसके संकल्प में बाप का संकल्प,
जिसके बोल में बाप का बोल,
और जिसके कर्म में बाप का स्वरूप अनुभव हो—वही नम्बरवन चात्रक है।
श्न 3: शक्तिशाली संकल्प होने के बाद भी सदा फल क्यों नहीं मिलता?
उत्तर:
क्योंकि संकल्प का बीज तभी सदा फल देता है जब—-
धारणा की धरनी हो,
-
ज्ञान का गंगाजल हो,
-
याद की धूप हो,
-
और स्व-अटेन्शन की निरंतर देख-रेख हो।
किसी एक की कमी से फल अस्थायी रह जाता है।
प्रश्न 4: “छह महीने बहुत उमंग था, फिर सब खत्म हो गया”—इसका कारण क्या है?
उत्तर:
बीज तो दृढ़ था, लेकिन उसकी देख-रेख में अलबेलापन आ गया। इसलिए संकल्प सदा का फल नहीं दे पाया।
प्रश्न 5: बापदादा “चींटी को हाथी बना देना” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि बच्चे छोटी-सी बात को बड़ा बना लेते हैं—
हल्का-सा दर्द बड़ी बीमारी बन जाता है,
छोटा विघ्न सब कुछ खत्म होने जैसा लगता है।
इससे बैलेंस बिगड़ता है और आत्मिक स्थिति ऊपर-नीचे होती रहती है।
प्रश्न 6: “अभी ऊपर, अभी नीचे” रहने का आत्मा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
इससे आत्मा को चक्कर आता है—मन भारी रहता है और स्थिरता नष्ट हो जाती है।
प्रश्न 7: “हमारी नेचर ही ऐसी है”—यह कहना कमजोरी क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि ये संस्कार आदि-अनादि नहीं, बल्कि माया के वशीभूत बने हुए नकली संस्कार हैं। असली स्वरूप श्रेष्ठ और पवित्र है।
प्रश्न 8: बापदादा स्व-परिवर्तन को पहला कदम क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि आप विश्व-परिवर्तक आत्माएँ हैं। जब स्वयं बदलते हैं, तभी विश्व परिवर्तन संभव होता है।
प्रश्न 9: बापदादा बच्चों की कौन-कौन सी विशेषताएँ बताते हैं?
उत्तर:
स्नेह में नम्बरवन,
सेवा के उमंग में नम्बरवन,
तेज़ कैचिंग पावर,
महसूसता की शक्ति,
दृढ़ता,
पहचानने की बुद्धि,
और परिवार के लाडले सिकीलधे बच्चे।
प्रश्न 10: “विशेषताएँ बहुत हैं, कमजोरी एक”—इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब गुण अधिक और कमी सिर्फ एक हो, तो उस एक को मिटाना सहज हो जाता है।
प्रश्न 11: 99% परिवर्तन के बाद भी बापदादा क्या संदेश देते हैं?
उत्तर:
जो आत्मा तुरन्त “ना” से “हाँ” कर लेती है, वह भी परिवर्तन की शक्ति का प्रमाण है। अंतिम 1% भी सहजता से पूरा हो सकता है।
प्रश्न 12: “महावीर बनो, गणेश बनो”—इसका गूढ़ अर्थ क्या है?
उत्तर:
चींटी जैसे छोटे विघ्नों को पाँव के नीचे कर दो (महावीर बनो)
और चूहे जैसे विघ्न-विनाशक को सवारी बना लो (गणेश बनो)।
अर्थात् विघ्न-विनाशक बनो, डरने वाले नहीं।
प्रश्न 13: सेवा में सफलता का अटल नियम क्या है?
उत्तर:
जहाँ “होगा या नहीं होगा” का संकल्प है, वहाँ सफलता नहीं।
जहाँ दृढ़ता है, वहाँ सफलता निश्चित है और सेवा का फल अविनाशी है।
प्रश्न 14: सेवा में दिलशिकस्त न होने की शिक्षा क्यों दी गई है?
उत्तर:
क्योंकि दृढ़ आत्मा जानती है—सफलता निश्चित है। अस्थायी परिणाम मन को कमजोर नहीं करते।
प्रश्न 15: फ्रांस ग्रुप के लिए बापदादा का विशेष संदेश क्या है?
उत्तर:
फ्रांस ग्रुप नया नहीं लगता—यह पहचाना हुआ घर है। यह कल्प-कल्प का सम्बन्ध है।
प्रश्न 16: जापान ग्रुप को बापदादा VIP क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि आपकी ईश्वरीय पोजीशन अविनाशी है। आप बाप के घर का श्रृंगार हो।सार:
बापदादा का स्पष्ट संदेश है—परिवर्तन करो, लेकिन ऐसा जो सदा के लिए हो। संकल्प, धारणा, याद और स्व-अटेन्शन से किया गया परिवर्तन ही अविनाशी परिवर्तन है। -
Disclaimer :
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त बापदादा मुरली
दिनांक 09-03-1984 के आध्यात्मिक अध्ययन और मनन पर आधारित है।
इसका उद्देश्य आत्मिक उन्नति, स्व-परिवर्तन और ईश्वरीय जीवन मूल्यों की समझ देना है।
यह किसी व्यक्ति, धर्म या मत की आलोचना नहीं है।

