(24)10-04-1984 “Love of God – The Basis of Brahmin Life”

अव्यक्त मुरली-(24)10-04-1984 “प्रभु प्यार – ब्राह्मण जीवन का आधार”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

10-04-1984 “प्रभु प्यार – ब्राह्मण जीवन का आधार”

आज बापदादा अपने स्नेही, सहयोगी, सहजयोगी आत्माओं को देख रहे हैं। योगी आत्मायें तो सभी हैं। ऐसे ही कहेंगे कि यह योगियों की सभा है। सभी योगी तू आत्मायें अर्थात् प्रभु प्रिय आत्मायें बैठी हैं। जो प्रभु को प्रिय लगती हैं वह विश्व की प्रिय बनती ही हैं। सभी को यह रुहानी नशा, रुहानी रुहाब, रुहानी फखुर सदा रहता है कि हम परमात्म प्यारे, भगवान के प्यारे जगत के प्यारे बन गये? सिर्फ एक आधी घड़ी की नज़र वा दृष्टि पड़ जाए, भक्त लोग इसके प्यासे रहते हैं और इसी को महानता समझते हैं। लेकिन आप ईश्वरीय प्यार के पात्र बन गये। प्रभु प्यारे बन गये। यह कितना महान भाग्य है। आज हर आत्मा बचपन से मृत्यु तक क्या चाहती है? बेसमझ बच्चा भी जीवन में प्यार चाहता है। पैसा पीछे चाहता लेकिन पहले प्यार चाहता। प्यार नहीं तो जीवन, निराशा की जीवन अनुभव करते, बेरस अनुभव करते हैं। लेकिन आप सर्व आत्माओं को परमात्म प्यार मिला, परमात्मा के प्यारे बने, इससे बड़ी वस्तु और कुछ है? प्यार है तो जहान है, जान है। प्यार नहीं तो बेजान, बेजहान हैं। प्यार मिला अर्थात् जहान मिला। ऐसा प्यार श्रेष्ठ भाग्य अनुभव करते हो? दुनिया इसकी प्यासी है। एक बूँद की प्यासी है और आप बच्चों का यह प्रभु प्यार प्रॉपर्टी है। इसी प्रभु प्यार से पलते हो अर्थात् ब्राह्मण जीवन में आगे बढ़ते हो। ऐसा अनुभव करते हो? प्यार के सागर में लवलीन रहते हो? वा सिर्फ सुनते वा जानते हो? अर्थात् सागर के किनारे पर खड़े-खड़े सिर्फ सोचते और देखते रहते हो! सिर्फ सुनना और जानना, यह है किनारे पर खड़ा होना। मानना और समा जाना, यह है प्रेम के सागर में लवलीन होना। प्रभु के प्यारे बनकर भी सागर में समा जाना, लीन हो जाना यह अनुभव नहीं किया तो प्रभु प्यार के पात्र बन करके पाने वाले नहीं लेकिन प्यासे रह गये। पास आते भी प्यास रह जाना इसको क्या कहेंगे? सोचो, किसने अपना बनाया! किसके प्यारे बने! किसकी पालना में पल रहे हैं? तो क्या होगा? सदा स्नेह में समाये हुए होने कारण समस्यायें वा किसी भी प्रकार की हलचल का प्रभाव पड़ नहीं सकता। सदा विघ्न-विनाशक समाधान स्वरुप, मायाजीत अनुभव करेंगे।

कई बच्चे कहते हैं – ज्ञान की गुह्य बातें याद नहीं रहती। लेकिन एक बात यह याद रहती है कि मैं परमात्मा का प्यारा हूँ। परमात्म-प्यार का अधिकारी हूँ। इसी एक स्मृति से भी सदा समर्थ बन जायेंगे। यह तो सहज है ना। यह भी भूल जाता फिर तो भूल भुलैया में फँस गये। सिर्फ यह एक बात सर्व प्राप्ति के अधिकारी बनाने वाली है। तो सदैव यही याद रखो, अनुभव करो कि मैं प्रभु का प्यारा जग का प्यारा हूँ। समझा! यह तो सहज है ना। अच्छा – सुना तो बहुत है, अब समाना है। समाना ही समान बनना है। समझा!

सभी प्रभु प्यार के पात्र बच्चों को, सभी स्नेह में समाए हुए श्रेष्ठ आत्माओं को, सभी प्यार की पालना के अधिकारी बच्चों को, रुहानी फखुर में रहने वाली, रुहानी नशे में रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात :-

सभी सहज योगी आत्मायें हो ना! सर्व सम्बन्ध से याद सहज योगी बना देती है। जहाँ सम्बन्ध है वहाँ सहज है। मैं सहजयोगी आत्मा हूँ, यह स्मृति सर्व समस्याओं को सहज ही समाप्त करा देती है क्योंकि सहजयोगी अर्थात् सदा बाप का साथ है। जहाँ सर्व शक्तिवान बाप साथ है, सर्व शक्तियाँ साथ हैं तो समस्या समाधान के रुप में बदल जायेगी। कोई भी समस्या बाप जाने, समस्या जाने। ऐसे सम्बन्ध के अधिकार से समस्या समाप्त हो जायेगी। मैं क्या करूँ! नहीं। बाप जाने, समस्या जाने। मैं न्यारा और बाप का प्यारा हूँ। तो सब बोझ बाप का हो जायेगा और आप हल्के हो जायेंगे। जब स्वयं हल्के बन जाते तो सब बातें भी हल्की हो जाती हैं। जरा भी सोच चलता तो भारी हो जाते और बातें भी भारी हो जाती। इसलिए मैं हल्का हूँ, न्यारा हूँ तो सब बातें भी हल्की हैं। यही विधि है, इसी विधि से सिद्धि प्राप्त होगी। पिछला हिसाब-किताब चुक्तू होते हुए भी बोझ अनुभव नहीं होगा। ऐसे साक्षी होकर देखेंगे तो जैसे पिछला खत्म हो रहा है और वर्तमान की शक्ति से साक्षी हो देख रहे हैं। जमा भी हो रहा है और चुक्तू भी हो रहा है। जमा की शक्ति से चुक्तू का बोझ नहीं। तो सदा वर्तमान को याद रखो। जब एक तरफ भारी होता तो दूसरा स्वत: हल्का हो जाता। तो वर्तमान भारी है तो पिछला हल्का हो जायेगा ना। वर्तमान प्राप्ति का स्वरुप सदा स्मृति में रखो तो सब हल्का हो जायेगा। तो पिछले हिसाब को हल्का करने का साधन है – वर्तमान को शक्तिशाली बनाओ। वर्तमान है ही शक्तिशाली। वर्तमान की प्राप्ति को सामने रखेंगे तो सब सहज हो जायेगा। पिछला सूली से काँटा हो जायेगा। क्या है, क्यों है, नहीं। पिछला है। पिछले को क्या देखना। जहाँ लगन है वहाँ विघ्न भारी नहीं लगता। खेल लगता है। वर्तमान की खुशी की दुआ से और दवा से सब हिसाब-किताब चुक्तू करो।

टीचर्स से:- सदा हर कदम में सफलता अनुभव करने वाली हो ना। अनुभवी आत्मायें हो ना! अनुभव ही सबसे बड़ी अथॉरिटी है। अनुभव की अथॉरिटी वाले हर कदम में हर कार्य में सफल हैं ही। सेवा के निमित्त बनने का चांस मिलना भी एक विशेषता की निशानी है। जो चांस मिलता है, उसी को आगे बढ़ाते रहो। सदा निमित्त बन आगे बढ़ने और बढ़ाने वाली हैं। यह निमित्त भाव ही सफलता को प्राप्त कराता है। निमित्त और निर्माण की विशेषता को सदा साथ रखो। यही विशेषता सदा विशेष बनायेगी। निमित्त बनने का पार्ट स्वयं को भी लिफ्ट देता है। औरों के निमित्त बनना अर्थात् स्वयं सम्पन्न बनना। दृढ़ता से सफलता को प्राप्त करते चलो। सफलता ही है, इसी दृढ़ता से सफलता स्वयं आगे जायेगी।

जन्मते ही सेवाधारी बनने का गोल्डन चांस मिला है, तो बड़े ते बड़ी चांसलर बन गई ना। बचपन से ही सेवाधारी की तकदीर लेकर आई हो। तकदीर जगाकर आई हो। कितनी आत्माओं की श्रेष्ठ तकदीर बनाने के कर्तव्य के निमित्त बन गई। तो सदा याद रहे वाह मेरे श्रेष्ठ तकदीर की श्रेष्ठ लकीर। बाप मिला, सेवा मिली, सेवास्थान मिला और सेवा के साथ-साथ श्रेष्ठ आत्माओं का श्रेष्ठ परिवार मिला। क्या नहीं मिला! राज्य भाग्य सब मिल गया। यह खुशी सदा रहे। विधि द्वारा सदा वृद्धि को पाते रहो। निमित्त भाव की विधि से सेवा में वृद्धि होती रहेगी।

कुमारों से:- कुमार जीवन में बच जाना, यह सबसे बड़ा भाग्य है। कितने झंझटों से बच गये। कुमार अर्थात् बन्धनमुक्त आत्मायें। कुमार जीवन बन्धनमुक्त जीवन है। लेकिन कुमार जीवन में भी फ्री रहना माना बोझ उठाना। कुमारों के प्रति बापदादा का डायरेक्शन है लौकिक में रहते अलौकिक सेवा करनी है। लौकिक सेवा सम्पर्क बनाने का साधन है। इसमें बिजी रहो तो अलौकिक सेवा कर सकेंगे। लौकिक में रहते अलौकिक सेवा करो। तो बुद्धि भारी नहीं रहेगी। सबको अपना अनुभव सुनाकर सेवा करो। लौकिक सेवा, सेवा का साधन समझकर करो, तो लौकिक साधन बहुत सेवा का चांस दिलायेगा। लक्ष्य ईश्वरीय सेवा का है लेकिन यह साधन है। ऐसे समझकर करो। कुमार अर्थात् हिम्मत वाले। जो चाहे वह कर सकते हैं, इसलिए बापदादा सदा साधनों द्वारा सिद्धि को प्राप्त करने की राय देते हैं। कुमार अर्थात् निरन्तर योगी क्योंकि कुमारों का संसार ही एक बाप है। जब बाप ही संसार है तो संसार के सिवाए बुद्धि और कहाँ जायेगी। जब एक ही हो गया तो एक की ही याद रहेगी ना और एक को याद करना बहुत सहज है। अनेकों से तो छूट गये। एक में ही सब समाये हुए हैं! सदा हर कर्म से सेवा करनी है, दृष्टि से, मुख से सेवा ही सेवा। जिससे प्यार होता है उसे प्रत्यक्ष करने का उमंग होता है। हर कदम में बाप और सेवा सदा साथ रहे। अच्छा

अध्याय : प्रभु प्यार – ब्राह्मण जीवन का आधार

(अव्यक्त बापदादा मुरली – 10 अप्रैल 1984)


 भूमिका : प्रभु प्रिय आत्माओं की दिव्य सभा

आज बापदादा अपने स्नेही, सहयोगी और सहजयोगी आत्माओं को देख रहे हैं।
यह योगियों की सभा है —
पर केवल योग करने वालों की नहीं,
प्रभु के प्रिय आत्माओं की सभा है।

 जो आत्मा प्रभु को प्रिय बन जाती है,
वह आत्मा विश्व को भी प्रिय बन जाती है।

बच्चों के दिल में सदा यह रुहानी नशा, रुहानी रुहाब और रुहानी फखुर रहता है कि —
“हम परमात्मा के प्यारे हैं।”


 संसार की सबसे बड़ी चाहना : प्यार

बापदादा स्पष्ट करते हैं —

  • बच्चा हो या बड़ा

  • गरीब हो या अमीर

  • ज्ञानी हो या अज्ञानी

हर आत्मा जीवन में सबसे पहले प्यार चाहती है।

पैसा बाद में,
सुविधा बाद में,
पर प्यार पहले

 जहाँ प्यार नहीं —
वहाँ जीवन बेरस, निराश और बेजान हो जाता है।

मुरली सूत्र

“प्यार है तो जहान है,
प्यार नहीं तो जीवन बेजान है।”


 प्रभु प्यार : ब्राह्मण जीवन की प्रॉपर्टी

दुनिया एक बूँद प्यार की प्यासी है,
और ब्राह्मण आत्माओं को —
प्रभु प्यार पूरी प्रॉपर्टी के रूप में मिला है।

 इसी प्रभु प्यार से ब्राह्मण जीवन पलता है
 इसी से आगे बढ़ता है
 इसी से समर्थ बनता है

प्रश्न उठता है —
क्या हम प्यार में लवलीन रहते हैं
या केवल सुनते और जानते हैं?


 उदाहरण : प्रेम का सागर

  • सुनना और जानना → सागर के किनारे खड़े रहना

  • मानना और समा जाना → सागर में लवलीन हो जाना

 जो प्रभु का प्यारा बनकर भी सागर में नहीं समाया,
वह पास आकर भी प्यासा रह गया।

मुरली संकेत

“समाना ही समान बनना है।”


 प्रभु प्यार की शक्ति : विघ्न-विनाशक

जिस आत्मा को यह स्मृति है —
“मैं प्रभु का प्यारा हूँ”

उस पर —

  • समस्याओं का प्रभाव नहीं पड़ता

  • हलचल हिला नहीं सकती

  • माया जीत अनुभव स्वतः होता है

 ऐसी आत्मा विघ्न-विनाशक समाधान स्वरूप बन जाती है।


 एक स्मृति, सर्व प्राप्ति

कई बच्चे कहते हैं —
“ज्ञान की गहरी बातें याद नहीं रहती।”

बापदादा कहते हैं —
कोई बात नहीं!

यदि यह एक स्मृति पक्की है —

“मैं परमात्मा का प्यारा हूँ”

तो यही स्मृति —

  • सर्व शक्तियों का आधार

  • सर्व प्राप्तियों की चाबी

  • समर्थ स्थिति का मूल मंत्र है

मुरली सूत्र

“यह एक स्मृति ही सर्व प्राप्ति का आधार है।”


 सहजयोगी आत्मा की विधि

बापदादा सहजयोग की विधि बताते हैं —

  • जहाँ सम्बन्ध है, वहाँ सहजता है

  • जहाँ बाप साथ है, वहाँ समाधान है

 मंत्र:

“मैं न्यारा हूँ, बाप मेरा प्यारा है।”

 बोझ बाप का
 आत्मा हल्की
 समस्याएँ हल्की


 पिछला हल्का करने की विधि

पिछला हिसाब भारी लगता है?
तो उपाय है —

वर्तमान को शक्तिशाली बनाओ

  • वर्तमान की खुशी

  • वर्तमान की प्राप्ति

  • वर्तमान की स्मृति

तो —

  • पिछला सूली से काँटा बन जाता है

  • हिसाब चुक्तू होता है

  • बोझ अनुभव नहीं होता

मुरली सूत्र

“वर्तमान की शक्ति से पिछला हल्का हो जाता है।”


 टीचर्स के लिए विशेष संदेश

  • अनुभव ही सबसे बड़ी अथॉरिटी है

  • निमित्त बनना = स्वयं को लिफ्ट देना

  • सेवा का चांस = भाग्य की निशानी

 निमित्त भाव + निर्माण = सदा सफलता


 कुमारों के लिए विशेष संदेश

  • कुमार जीवन = बन्धनमुक्त जीवन

  • फ्री रहना = व्यर्थ को बुलाना

  • बिजी रहना = उन्नति का साधन

🔹 लौकिक में रहते अलौकिक सेवा करो
🔹 साधनों को सेवा का माध्यम समझो
🔹 कुमार = निरन्तर योगी

मुरली सूत्र

“जब बाप ही संसार है,
तो बुद्धि और कहाँ जायेगी?”


 सारांश : प्रभु प्यार की महिमा

  • प्रभु प्यार = ब्राह्मण जीवन का आधार

  • एक स्मृति = सर्व प्राप्ति

  • सहजयोग = समस्या का समाधान

  • वर्तमान की शक्ति = पिछला हल्का

  • निमित्त भाव = सदा सफलता

प्रभु प्यार में समाना ही समान बनना है।

प्रश्न 1 : बापदादा आज कैसी आत्माओं की सभा देख रहे हैं?

उत्तर :
बापदादा आज उन आत्माओं की सभा देख रहे हैं जो –

  • स्नेही हैं

  • सहयोगी हैं

  • सहजयोगी हैं

  • और प्रभु को प्रिय हैं

यह केवल अभ्यास की सभा नहीं,
बल्कि प्रभु प्यार में रहने वाली आत्माओं की सभा है।


प्रश्न 2 : संसार की सबसे बड़ी चाहना क्या है?

उत्तर :
बापदादा स्पष्ट करते हैं —
संसार की सबसे बड़ी चाहना प्यार है।

  • बच्चा हो या बड़ा

  • गरीब हो या अमीर

  • ज्ञानी हो या अज्ञानी

 हर आत्मा सबसे पहले प्यार चाहती है।
जहाँ प्यार नहीं, वहाँ जीवन बेरस और बेजान हो जाता है।


प्रश्न 3 : प्रभु प्यार को ब्राह्मण जीवन की प्रॉपर्टी क्यों कहा गया है?

उत्तर :
क्योंकि —

  • दुनिया एक बूँद प्यार की प्यासी है

  • और ब्राह्मण आत्माओं को प्रभु प्यार पूरी प्रॉपर्टी के रूप में मिला है

 इसी प्रभु प्यार से

  • ब्राह्मण जीवन पलता है

  • आगे बढ़ता है

  • और समर्थ बनता है


प्रश्न 4 : प्रभु प्यार को जानना और उसमें समाना — इसमें क्या अंतर है?

उत्तर :

  • सुनना और जानना → सागर के किनारे खड़े रहना

  • मानना और समा जाना → सागर में लवलीन हो जाना

जो सागर के पास होकर भी उसमें नहीं समाया,
वह पास आकर भी प्यासा रह गया।

मुरली सूत्र:
“समाना ही समान बनना है।”


प्रश्न 5 : प्रभु प्यार की स्मृति आत्मा को क्या शक्ति देती है?

उत्तर :
जिस आत्मा को यह स्मृति है —
“मैं प्रभु का प्यारा हूँ”

उस पर —

  • समस्याओं का प्रभाव नहीं पड़ता

  • हलचल हिला नहीं सकती

  • माया जीत अनुभव स्वतः होता है

ऐसी आत्मा विघ्न-विनाशक समाधान स्वरूप बन जाती है।


प्रश्न 6 : यदि ज्ञान की गहरी बातें याद न रहें तो क्या करें?

उत्तर :
बापदादा कहते हैं — कोई बात नहीं।

यदि केवल यह एक स्मृति पक्की है —
“मैं परमात्मा का प्यारा हूँ”

तो यही स्मृति —

  • सर्व शक्तियों का आधार

  • सर्व प्राप्तियों की चाबी

  • समर्थ स्थिति का मूल मंत्र है


प्रश्न 7 : सहजयोगी आत्मा की पहचान क्या है?

उत्तर :
सहजयोगी आत्मा जानती है —

  • जहाँ सम्बन्ध है, वहाँ सहजता है

  • जहाँ बाप साथ है, वहाँ समाधान है

मंत्र:
 “मैं न्यारा हूँ, बाप मेरा प्यारा है।”

परिणाम —

  • बोझ बाप का

  • आत्मा हल्की

  • समस्याएँ हल्की


प्रश्न 8 : पिछला हिसाब भारी लगे तो क्या उपाय है?

उत्तर :
उपाय है — वर्तमान को शक्तिशाली बनाना

  • वर्तमान की खुशी

  • वर्तमान की प्राप्ति

  • वर्तमान की स्मृति

तो —
 पिछला सूली से काँटा बन जाता है
 हिसाब चुक्तू हो जाता है

मुरली सूत्र:
“वर्तमान की शक्ति से पिछला हल्का हो जाता है।”


प्रश्न 9 : टीचर्स के लिए बापदादा का विशेष संदेश क्या है?

उत्तर :

  • अनुभव ही सबसे बड़ी अथॉरिटी है

  • निमित्त बनना = स्वयं को लिफ्ट देना

  • सेवा का चांस = भाग्य की निशानी

निमित्त भाव + निर्माण = सदा सफलता


प्रश्न 10 : कुमारों के लिए बापदादा का विशेष मार्गदर्शन क्या है?

उत्तर :

  • कुमार जीवन = बन्धनमुक्त जीवन

  • फ्री रहना = व्यर्थ को बुलाना

  • बिजी रहना = उन्नति का साधन

 लौकिक में रहते अलौकिक सेवा
 साधनों को सेवा का माध्यम
 कुमार = निरन्तर योगी


सारांश : प्रभु प्यार की महिमा

  • प्रभु प्यार = ब्राह्मण जीवन का आधार

  • एक स्मृति = सर्व प्राप्ति

  • सहजयोग = समस्या का समाधान

  • वर्तमान की शक्ति = पिछला हल्का

  • निमित्त भाव = सदा सफलता

Disclaimer (डिस्क्लेमर)

यह वीडियो ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय ज्ञान एवं अव्यक्त बापदादा मुरलियों पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या है।
इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, प्रेरणा और सकारात्मक जीवन दृष्टि प्रदान करना है।
यह किसी धार्मिक विवाद या व्यक्तिगत निर्णय का विकल्प नहीं है।
दर्शक अपने विवेक से ग्रहण करें।

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