(19)12-03-1985 “The Power of Truth”

अव्यक्त मुरली-(19)12-03-1985 “सत्यता की शक्ति”

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12-03-1985 “सत्यता की शक्ति”

आज सत बाप, सत शिक्षक, सतगुरू अपने सत्यता के शक्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे हैं। सत्य ज्ञान वा सत्यता की शक्ति कितनी महान है उसके अनुभवी आत्मायें हो। सब दूरदेश वासी बच्चे भिन्न धर्म, भिन्न मान्यतायें, भिन्न रीति रसम में रहते हुए भी इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की तरफ वा राजयोग की तरफ क्यों आकर्षित हुए? सत्य बाप का सत्य परिचय मिला अर्थात् सत्य ज्ञान मिला, सच्चा परिवार मिला, सच्चा स्नेह मिला, सच्ची प्राप्ति का अनुभव हुआ। तब सत्यता की शक्ति के पीछे आकर्षित हुए। जीवन थी, प्राप्ति भी थी यथा शक्ति ज्ञान भी था लेकिन सत्य ज्ञान नहीं था। इसलिए सत्यता की शक्ति ने सत्य बाप का बना लिया।

सत शब्द के दो अर्थ हैं – सत सत्यता भी है और सत अविनाशी भी है। तो सत्यता की शक्ति अविनाशी भी है। इसलिए अविनाशी प्राप्ति, अविनाशी सम्बन्ध, अविनाशी स्नेह, अविनाशी परिवार है। यही परिवार 21 जन्म भिन्न-भिन्न नाम रूप से मिलते रहेंगे। जानेंगे नहीं। अभी जानते हो कि हम ही भिन्न सम्बन्ध से परिवार में आते रहेंगे। इस अविनाशी प्राप्ति ने, पहचान ने दूर देश में होते हुए भी अपने सत्य परिवार, सत्य बाप, सत्य ज्ञान की तरफ खींच लिया। जहाँ सत्यता भी हो और अविनाशी भी हो, यही परमात्म पहचान है। तो जैसे आप सभी इसी विशेषता के आधार पर आकर्षित हुए, ऐसे ही सत्यता की शक्ति को, सत्य ज्ञान को विश्व में प्रत्यक्ष करना है। 50 वर्ष धरनी बनाई, स्नेह में लाया, सम्पर्क में लाया। राजयोग की आकर्षण में लाया, शान्ति के अनुभव से आकर्षण में लाया। अब बाकी क्या रहा? जैसे परमात्मा एक है यह सभी भिन्न-भिन्न धर्म वालों की मान्यता है। ऐसे यथार्थ सत्य ज्ञान एक ही बाप का है अथवा एक ही रास्ता है, यह आवाज जब तक बुलन्द नहीं होगा तब तक आत्माओं का अनेक तिनकों के सहारे तरफ भटकना बन्द नहीं होगा। अभी यही समझते हैं कि यह भी एक रास्ता है। अच्छा रास्ता है। लेकिन आखिर भी एक बाप का एक ही परिचय, एक ही रास्ता है। अनेकता की यह भ्रान्ति समाप्त होना ही विश्व शान्ति का आधार है। यह सत्यता के परिचय की वा सत्य ज्ञान के शक्ति की लहर जब तक चारों ओर नहीं फैलेगी तब तक प्रत्यक्षता के झण्डे के नीचे सर्व आत्मायें सहारा नहीं ले सकतीं। तो गोल्डन जुबली में जबकि बाप के घर में विशेष निमन्‍त्रण देकर बुलाते हो, अपनी स्टेज है। श्रेष्ठ वातावरण है, स्वच्छ बुद्धि का प्रभाव है। स्नेह की धरनी है, पवित्र पालना है। ऐसे वायुमण्डल के बीच अपने सत्य ज्ञान को प्रसिद्ध करना ही प्रत्यक्षता का आरम्भ होगा। याद है जब प्रदर्शनियों द्वारा सेवा का विहंग मार्ग का आरम्भ हुआ तो क्या करते थे? मुख्य ज्ञान के प्रश्नों का फार्म भराते थे ना। परमात्मा सर्वव्यापी है वा नहीं है? गीता का भगवान कौन है? यह फार्म भराते थे ना। ओपीनियन लिखाते थे। पहेली पूछते थे। तो पहले यह आरम्भ किया लेकिन चलते-चलते इन बातों को गुप्त रूप में देते हुए सम्पर्क स्नेह को आगे रखते हुए समीप लाया। इस बारी जबकि इस धरनी पर आते हैं तो सत्य परिचय स्पष्ट परिचय दो। यह भी अच्छा है, यह तो राज़ी करने की बात है। लेकिन एक ही बाप का एक यथार्थ परिचय स्पष्ट बुद्धि में आ जाए, यह भी समय अब लाना है। सिर्फ सीधा कहते रहते हो कि बाप यह ज्ञान दे रहा है, बाप आया है लेकिन वह मानकर जाते हैं कि यही परमात्म ज्ञान है? परमात्मा का कर्तव्य चल रहा है? ज्ञान की नवीनता है यह अनुभव करते हैं? ऐसी वर्कशॉप कभी रखी है? जिसमें परमात्मा सर्वव्यापी है या नहीं है, एक ही समय आता है या बार-बार आता है? ऐसे स्पष्ट परिचय उन्हें मिल जाए जो समझें कि दुनिया में जो नहीं सुना वह यहाँ सुना। ऐसे जो विशेष स्पीकर बन करके आते, उन्हों से यह ज्ञान के राज़ों की रूह-रूहान करने से उन्हों की बुद्धि में आयेगा। साथ-साथ जो भाषण भी करते हो उसमें भी अपने परिवर्तन के अनुभव सुनाते हुए एक-एक स्पीकर, एक-एक नये ज्ञान की बात को स्पष्ट कर सकते हो। ऐसे सीधा टॉपिक नहीं रखें कि परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है, लेकिन एक बाप को एक रूप से जानने से क्या-क्या विशेष प्राप्तियाँ हुई, उन प्राप्तियों को सुनाते हुए सर्वव्ययापी की बातों को स्पष्ट कर सकते हो। एक परमधाम निवासी समझ याद करने से बुद्धि कैसे एकाग्र हो जाती है वा बाप के सम्बन्ध से क्या प्राप्तियों की अनुभूति होती है। इस ढंग से सत्यता और निर्मानता दोनों रूप से सिद्ध कर सकते हो। जिससे अभिमान भी न लगे कि यह लोग अपनी महिमा करते हैं। नम्रता और रहम की भावना अभिमान की महसूसता नहीं कराती। जैसे मुरलियों को सुनते हुए कोई भी अभिमान नहीं कहेगा। अथॉरिटी से बोलते हैं, यह कहेंगे। भल शब्द कितने ही सख्त हों लेकिन अभिमान नहीं कहेंगे! अथॉरिटी की अनुभूति करते हैं। ऐसे क्यों होता है? जितनी ही अथॉरिटी है उतना ही नम्रता और रहम भाव है। ऐसे बाप तो बच्चों के आगे बोलते हैं लेकिन आप सभी इस विशेषता से स्टेज पर इस विधि से स्पष्ट कर सकते हो। जैसे सुनाया ना, ऐसे ही एक सर्वव्यापी की बात रखें, दूसरा नाम रूप से न्यारे की रखें, तीसरा ड्रामा की प्वॉइंट बुद्धि में रखें। आत्मा की नई विशेषताओं को बुद्धि में रखें। जो भी विशेष टापिक्स हैं, उसको लक्ष्य में रख अनुभव और प्राप्ति के आधार से स्पष्ट करते जावें जिससे समझें कि इस सत्य ज्ञान से ही सतयुग की स्थापना हो रही है। भगवानुवाच क्या विशेष है जो सिवाए भगवान के कोई सुना नहीं सकते। विशेष स्लोगन्स जिसको आप लोग सीधे शब्द कहते हो – जैसे मनुष्य, मनुष्य का कभी सतगुरू, सत बाप नहीं बन सकता। मनुष्य परमात्मा हो नहीं सकता। ऐसी विशेष प्वॉइंट तो समय प्रति समय सुनते आये हो, उसकी रूप रेखा बनाओ। जिससे सत्य ज्ञान की स्पष्टता हो। नई दुनिया के लिए यह नया ज्ञान है। नवीनता और सत्यता दोनों अनुभव हो। जैसे कॉन्फ्रेन्स करते हो, सेवा बहुत अच्छी चलती है। कॉन्फ्रेन्स के पीछे जो भी कुछ साधन बनाते हो, कभी चार्टर, कभी क्या बनाते हो। उससे भी साधन अपनाते हो, सम्पर्क को आगे बढ़ाने का। यह भी साधन अच्छा है क्योंकि चांस मिलता है पीछे भी मिलते रहने का। लेकिन जैसे अभी जो भी आते हैं, कहते हैं हाँ यह बहुत अच्छी बात है। प्लैन अच्छा है, चार्टर अच्छा है, सेवा का साधन भी अच्छा है। ऐसे यह कहके जाएं कि नया ज्ञान आज स्पष्ट हुआ। ऐसे विशेष 5-6 भी तैयार किये तो… क्योंकि सभी के बीच तो यह रूह-रूहान चल नहीं सकती। लेकिन विशेष जो आते हैं। टिकट देकर ले आते हो। विशेष पालना भी मिलती है। उन्हों में से जो नामीग्रामी हैं उन्हों के साथ यह रूहरिहान कर स्पष्ट उन्हों की बुद्धि में डालना जरूर चाहिए। ऐसा कोई प्लैन बनाओ जिससे उन्हों को यह नहीं लगे कि बहुत अपना नशा है, लेकिन सत्यता लगे। इसको कहा जाता है तीर भी लगे लेकिन दर्द नहीं हो। चिल्लावे नहीं। लेकिन खुशी में नाचे। भाषणों की रूपरेखा भी नई करो। विश्व शान्ति के भाषण तो बहुत कर लिए। आध्यात्मिकता की आवश्यकता है, आध्यात्मिक शक्ति के सिवाए कुछ हो नहीं सकता। यह तो अखबार में आता है लेकिन आध्यात्मिक शक्ति क्या है! आध्यात्मिक ज्ञान क्या है! इसका सोर्स कौन है! अभी वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं! समझें कि भगवान का कार्य चल रहा है। अभी कहते हैं मातायें बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं। समय प्रमाण यह भी धरनी बनानी पड़ती है। जैसे सन शोज़ फादर है वैसे फादर शोज़ सन है। अभी फादर शोज़ सन हो रहा है। तो यह बुलन्द आवाज प्रत्यक्षता का झण्डा लहरायेगा। समझा!

गोल्डन जुबली में क्या करना है, यह समझा ना! दूसरे स्थानों पर फिर भी वातावरण को देखना पड़ता है लेकिन बाप के घर में, अपना घर अपनी स्टेज है तो ऐसे स्थान पर यह प्रत्यक्षता का आवाज बुलन्द कर सकते हो। ऐसे थोड़े भी इस बात में निश्चयबुद्धि हो जाएं – तो वही आवाज बुलन्द करेंगे। अभी रिजल्ट क्या है! सम्पर्क और स्नेह में स्वयं आये, वही सेवा कर रहे हैं। औरों को भी स्नेह और सम्पर्क में ला रहे हैं। जितने स्वयं बने उतनी सेवा कर रहे हैं। यह भी सफलता ही कहेंगे ना। लेकिन अभी और आगे बढ़ें। नाम बदनाम से बुलन्द हुआ। पहले डरते थे, अभी आना चाहते हैं। यह तो फर्क हुआ ना। पहले नाम सुनने नहीं चाहते थे, अभी नाम लेने की इच्छा रखते हैं। यह भी 50 वर्ष में सफलता को प्राप्त किया। धरनी बनाने में ही समय लगता है। ऐसे नहीं समझो 50 वर्ष इसमें लग गये तो फिर और क्या होगा! पहले धरनी को हल चलाने योग्य बनाने में टाइम लगता है। बीज डालने में टाइम नहीं लगता। शक्तिशाली बीज का फल शक्तिशाली निकलता है। अभी तक जो हुआ यही होना था, वही यथार्थ हुआ। समझा!

(विदेशी बच्चों को देख) यह चात्रक अच्छे हैं। ब्रह्मा बाप ने बहुत समय के आह्वान के बाद आपको जन्म दिया है। विशेष आह्वान से पैदा हुए हो। देरी जरूर लगाई लेकिन तन्दरूस्त और अच्छे पैदा हुए हो। बाप का आवाज पहुँच रहा था लेकिन समय आने पर समीप पहुँच गये। विशेष ब्रह्मा बाप खुश होते हैं। बाप खुश होंगे तो बच्चे भी खुश होंगे ही लेकिन विशेष ब्रह्मा बाप का स्नेह है। इसलिए मैजारिटी ब्रह्मा बाप को न देखते हुए भी ऐसे ही अनुभव करते हो जैसे देखा ही है। चित्र में भी चैतन्यता का अनुभव करते हो। यह विशेषता है। ब्रह्मा बाप के स्नेह का विशेष सहयोग आप आत्माओं को है। भारत वाले क्वेश्चन करेंगे ब्रह्मा क्यों, यही क्यों?… लेकिन विदेशी बच्चे आते ही ब्रह्मा बाप के आकर्षण से स्नेह में बंध जाते हैं। तो यह विशेष सहयोग का वरदान है। इसलिए न देखते हुए भी पालना ज्यादा अनुभव करते रहते हो। जिगर से कहते हो – ब्रह्मा बाबा। तो यह विशेष सूक्ष्म स्नेह का कनेक्शन है। ऐसे नहीं कि बाप सोचते हैं यह हमारे पीछे कैसे आये! न आप सोचते न ब्रह्मा सोचते। सामने ही हैं। आकार रूप भी साकार समान ही पालना दे रहे हैं। ऐसे अनुभव करते हो ना! थोड़े समय में कितने अच्छे टीचर्स तैयार हो गये हैं! विदेश की सेवा में कितना समय हुआ? कितने टीचर्स तैयार हुए हैं? अच्छा है, बापदादा बच्चों के सेवा की लगन देखते रहते हैं क्योंकि विशेष सूक्ष्म पालना मिलती है ना। जैसे ब्रह्मा बाप के विशेष संस्कार क्या देखे! सेवा के सिवाए रह सकते थे? तो विदेश में दूर रहने वालों को यह विशेष पालना का सहयोग होने कारण सेवा का उमंग ज्यादा रहता है।

गोल्डन जुबली में और क्या किया है? खुद भी गोल्डन और जुबली भी गोल्डन। अच्छा है, बैलेन्स का अटेन्शन जरूर रखना। स्वयं और सेवा। स्व उन्नति और सेवा की उन्नति। बैलेन्स रखने से अनेक आत्माओं को स्व सहित ब्लैसिंग दिलाने के निमित्त बन जायेंगे। समझा! सेवा का प्लैन बनाते हुए पहले स्व स्थिति का अटेन्शन, तब प्लैन में पॉवर भरेगी। प्लैन है बीज। तो बीज में अगर शक्ति नहीं होगी, शक्तिशाली बीज नहीं तो कितनी भी मेहनत करो श्रेष्ठ फल नहीं देगा। इसलिए प्लैन के साथ स्व स्थिति की पॉवर जरूर भरते रहना। समझा! अच्छा।

ऐसे सत्यता को प्रत्यक्ष करने वाले, सदा सत्यता और निर्मानता का बैलेन्स रखने वाले, हर बोल द्वारा एक बाप के एक परिचय को सिद्ध करने वाले, सदा स्व उन्नति द्वारा सफलता को पाने वाले, सेवा में बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने वाले, ऐसे सतगुरू के, सत बाप के सत बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

विदाई के समय दादी जी भोपाल जाने की छुट्टी ले रही हैं

जाने में ही सेवा है, रहने में भी सेवा है। सेवा के निमित्त बने हुए बच्चों के हर संकल्प में, हर सेकेण्ड में सेवा है। आपको देखकर जितना उमंग-उत्साह बढ़ेगा उतना ही बाप को याद करेंगे। सेवा में आगे बढ़ेंगे। इसलिए सफलता सदा साथ है ही है। बाप को भी साथ ले जा रही हो, सफलता को भी साथ ले जा रही हो। जिस स्थान पर जायेंगी वहाँ सफलता होगी। (मोहिनी बहन से) चक्कर लगाने जा रही हो। चक्कर लगाना माना अनेक आत्माओं को स्व-उन्नति का सहयोग देना। साथ-साथ जब स्टेज का चांस मिलता है तो ऐस नया भाषण करके आना। पहले आप शुरु कर देना तो नम्बरवन हो जायेंगी। जहाँ भी जायेंगी तो सब क्या कहेंगे? बापदादा की यादप्यार लाई हो? तो जैसे बापदादा स्नेह की, सहयोग की शक्ति देते हैं, वैसे आप भी बाप से ली हई स्नेह, सहयोग की शक्ति देते जाना। सभी को उमंग-उत्साह में उड़ाने के लिए कोई न कोई ऐसे टोटके बोलती रहना। सब खुशी में नाचते रहेंगे। रुहानियत की खुशी में सबको नचाना और रमणीकता से सभी को खुशी-खुशी से पुरुषार्थ में आगे बढ़ना सिखाना।

अध्याय 1 : सत्यता की शक्ति – आत्माओं को खींचने वाली दिव्य शक्ति

(Murli Date: 12-03-1985 | Avyakt BapDada)

बापदादा आज अपने बच्चों को “सत्यता की शक्ति स्वरूप” में देख रहे हैं।
सत्य ज्ञान केवल जानकारी नहीं, बल्कि अनुभव की शक्ति है।

 Murli Point

“सत्य ज्ञान वा सत्यता की शक्ति कितनी महान है – उसके अनुभवी आत्मायें हो।”

 उदाहरण

दूर-दूर देशों में रहने वाली आत्माएँ,
भिन्न धर्म, भिन्न मान्यताएँ, भिन्न संस्कार होते हुए भी
राजयोग और इस ईश्वरीय विश्वविद्यालय की ओर क्यों आकर्षित हुईं?

 कारण था –

  • सत्य बाप का सत्य परिचय

  • सच्चा परिवार

  • सच्चा स्नेह

  • सच्ची प्राप्ति का अनुभव

जहाँ सत्य होता है, वहाँ आत्मा स्वयं खिंचती चली आती है।


 अध्याय 2 : “सत” का गूढ़ अर्थ – सत्य भी, अविनाशी भी

 Murli Clarification

“सत” शब्द के दो अर्थ हैं:
सत्यता
अविनाशीपन

इसलिए सत्यता की शक्ति = अविनाशी शक्ति

 Murli Insight

  • अविनाशी सम्बन्ध

  • अविनाशी स्नेह

  • अविनाशी परिवार

  • 21 जन्मों का दिव्य कनेक्शन

आज जानते हैं –
हम ही वही आत्माएँ हैं जो भिन्न-भिन्न नाम-रूप से फिर मिलेंगी।


 अध्याय 3 : एक बाप – एक सत्य – एक रास्ता

विश्व शान्ति का आधार

 Murli Point

“अनेकता की भ्रान्ति समाप्त होना ही विश्व शान्ति का आधार है।”

आज आत्माएँ यह मानती हैं कि –
 “यह भी एक रास्ता है”
लेकिन समय की माँग है कि यह आवाज बुलन्द हो:

एक ही बाप का एक ही यथार्थ रास्ता है।

जब तक यह स्पष्टता नहीं होगी,
तब तक आत्माएँ अनेक “तिनकों” के सहारे भटकती रहेंगी।


 अध्याय 4 : 50 वर्ष की सेवा – धरनी तैयार हुई

अब बीज डालने का समय

 Murli Analogy

  • पहले धरनी तैयार होती है

  • फिर बीज डाला जाता है

  • शक्तिशाली बीज → शक्तिशाली फल

50 वर्षों में
✔️ स्नेह की धरनी बनी
✔️ सम्पर्क बना
✔️ राजयोग का आकर्षण फैला

अब समय है –
सत्य परिचय को प्रत्यक्ष करने का


 अध्याय 5 : प्रत्यक्षता की विधि – तीर लगे, दर्द न हो

 Murli Guidance

सीधे विरोध नहीं,
अनुभव और प्राप्ति के आधार पर सत्य स्पष्ट करो।

 उदाहरण

सीधे यह न कहो –
 “परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है”

बल्कि यह बताओ –
✔️ एक बाप को जानने से क्या-क्या प्राप्त हुआ
✔️ परमधाम की स्मृति से बुद्धि कैसे एकाग्र हुई
✔️ बाप के सम्बन्ध से जीवन में क्या परिवर्तन आया

 यही है सत्यता + निर्मानता का बैलेन्स


 अध्याय 6 : अथॉरिटी + नम्रता = सत्यता की पहचान

 Murli Secret

मुरली कितनी ही सख्त क्यों न हो –
उसमें अभिमान नहीं,
बल्कि अथॉरिटी और रहम होता है।

 जितनी अथॉरिटी,
 उतनी ही नम्रता।

यही विशेषता बच्चों को स्टेज पर लानी है।


 अध्याय 7 : Golden Jubilee – प्रत्यक्षता का झण्डा

 Murli Direction

“अपना घर, अपनी स्टेज है – यहाँ प्रत्यक्षता की आवाज बुलन्द कर सकते हो।”

अब केवल यह न कहें –
✔️ “अच्छी बात है”
✔️ “अच्छा प्लान है”

बल्कि आत्माएँ यह कहें –
“आज नया सत्य ज्ञान स्पष्ट हुआ।”


 अध्याय 8 : विदेशी बच्चों का विशेष वरदान

 Murli Observation

विदेशी बच्चे –

  • ब्रह्मा बाप को देखे बिना

  • ब्रह्मा बाप का स्नेह अनुभव करते हैं

 यह है सूक्ष्म पालना का वरदान

इसी कारण कम समय में
✔️ अच्छे टीचर्स
✔️ तीव्र सेवा
✔️ गहरा उमंग


 अध्याय 9 : स्व-उन्नति और सेवा – दोनों का बैलेन्स

 Murli Formula

  • प्लैन = बीज

  • स्व-स्थिति = शक्ति

अगर बीज में शक्ति नहीं,
तो फल श्रेष्ठ नहीं होगा।

 पहले स्व स्थिति,
 फिर सेवा की योजना

अध्याय 1 : सत्यता की शक्ति – आत्माओं को खींचने वाली दिव्य शक्ति

(Avyakt Murli | 12-03-1985)


 प्रश्न 1: बापदादा आज अपने बच्चों को किस स्वरूप में देख रहे हैं?

उत्तर:
बापदादा आज अपने बच्चों को “सत्यता की शक्ति स्वरूप” में देख रहे हैं।
अर्थात् ऐसे बच्चे जो सत्य को केवल जानते नहीं, बल्कि सत्य का अनुभव कर चुके हैं


 प्रश्न 2: सत्य ज्ञान और सामान्य ज्ञान में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर:
सामान्य ज्ञान केवल जानकारी देता है,
जबकि सत्य ज्ञान अनुभव की शक्ति बन जाता है।
यही अनुभव आत्मा को स्थिर, निश्चयी और आकर्षक बनाता है।


 प्रश्न 3: भिन्न धर्मों और संस्कारों की आत्माएँ राजयोग की ओर क्यों आकर्षित हुईं?

उत्तर:
क्योंकि उन्हें मिला –

  • सत्य बाप का सत्य परिचय

  • सच्चा परिवार

  • सच्चा स्नेह

  • सच्ची प्राप्ति का अनुभव

जहाँ सत्य होता है, वहाँ आत्मा प्रयास से नहीं, स्वतः खिंचती है



अध्याय 2 : “सत” का गूढ़ अर्थ – सत्य भी, अविनाशी भी

 प्रश्न 4: “सत” शब्द का गूढ़ अर्थ क्या है?

उत्तर:
“सत” के दो अर्थ हैं:
1️⃣ सत्यता
2️⃣ अविनाशीपन

इसलिए सत्यता की शक्ति = अविनाशी शक्ति


 प्रश्न 5: अविनाशी सत्यता से आत्मा को क्या प्राप्ति होती है?

उत्तर:

  • अविनाशी सम्बन्ध

  • अविनाशी स्नेह

  • अविनाशी परिवार

  • 21 जन्मों का दिव्य कनेक्शन

आत्मा जान जाती है कि
हम वही हैं जो भिन्न नाम-रूप से फिर मिलेंगे



अध्याय 3 : एक बाप – एक सत्य – एक रास्ता

 प्रश्न 6: विश्व शान्ति का वास्तविक आधार क्या है?

उत्तर:
अनेकता की भ्रान्ति का समाप्त होना ही विश्व शान्ति का आधार है।


 प्रश्न 7: आज आत्माओं की सबसे बड़ी उलझन क्या है?

उत्तर:
आज आत्माएँ मानती हैं –
 “यह भी एक रास्ता है”
लेकिन जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि
एक ही बाप का एक ही यथार्थ रास्ता है,
तब तक आत्माएँ भटकती रहेंगी।



अध्याय 4 : 50 वर्ष की सेवा – धरनी तैयार हुई

 प्रश्न 8: 50 वर्षों की सेवा का मुख्य परिणाम क्या है?

उत्तर:
50 वर्षों में –

  • स्नेह की धरनी बनी

  • सम्पर्क बना

  • राजयोग का आकर्षण फैला

अब समय है बीज डालने का, अर्थात्
सत्य परिचय को प्रत्यक्ष करने का


प्रश्न 9: बापदादा “धरनी” और “बीज” की उपमा क्यों देते हैं?

उत्तर:
क्योंकि

  • पहले धरनी तैयार होती है

  • फिर बीज डाला जाता है

शक्तिशाली बीज ही शक्तिशाली फल देता है।



अध्याय 5 : प्रत्यक्षता की विधि – तीर लगे, दर्द न हो

 प्रश्न 10: सत्य को स्पष्ट करने की सही विधि क्या है?

उत्तर:
सीधे विरोध नहीं,
बल्कि अनुभव और प्राप्ति के आधार पर सत्य स्पष्ट करना


 प्रश्न 11: सत्यता और निर्मानता का संतुलन कैसे रखा जाए?

उत्तर:
सीधे यह न कहें कि –
 “परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है”

बल्कि यह बतायें –

  • एक बाप को जानने से जीवन में क्या परिवर्तन आया

  • परमधाम की स्मृति से बुद्धि कैसे एकाग्र हुई

  • बाप के सम्बन्ध से क्या प्राप्तियाँ हुईं

 यही है तीर भी लगे, दर्द न हो



अध्याय 6 : अथॉरिटी + नम्रता = सत्यता की पहचान

 प्रश्न 12: मुरली के शब्द सख्त होते हुए भी अभिमान क्यों नहीं लगते?

उत्तर:
क्योंकि मुरली में

  • अथॉरिटी होती है

  • नम्रता होती है

  • रहम भाव होता है

 जितनी अथॉरिटी, उतनी ही नम्रता।


 प्रश्न 13: बच्चों को स्टेज पर कौन-सी विशेषता लानी है?

उत्तर:
सत्यता + नम्रता + अथॉरिटी
ताकि सत्य स्पष्ट हो, लेकिन अहंकार न लगे।



अध्याय 7 : Golden Jubilee – प्रत्यक्षता का झण्डा

 प्रश्न 14: गोल्डन जुबली का विशेष उद्देश्य क्या है?

उत्तर:
गोल्डन जुबली में
प्रत्यक्षता की आवाज बुलन्द करना


 प्रश्न 15: सेवा की सफलता की पहचान क्या होगी?

उत्तर:
जब आत्माएँ यह न कहें कि –
✔️ “अच्छी बात है”

बल्कि यह कहें –
“आज नया सत्य ज्ञान स्पष्ट हुआ।”



अध्याय 8 : विदेशी बच्चों का विशेष वरदान

 प्रश्न 16: विदेशी बच्चों की विशेषता क्या बताई गई है?

उत्तर:
विदेशी बच्चे –

  • ब्रह्मा बाप को देखे बिना

  • ब्रह्मा बाप का स्नेह अनुभव करते हैं

 यह है सूक्ष्म पालना का वरदान


 प्रश्न 17: इस वरदान का सेवा में क्या प्रभाव दिखता है?

उत्तर:
कम समय में –

  • अच्छे टीचर्स तैयार हुए

  • सेवा में तीव्र गति

  • गहरा उमंग-उत्साह



अध्याय 9 : स्व-उन्नति और सेवा – दोनों का बैलेन्स

 प्रश्न 18: सेवा में श्रेष्ठ फल के लिए सबसे पहली आवश्यकता क्या है?

उत्तर:
सबसे पहले स्व-स्थिति की शक्ति


 प्रश्न 19: बापदादा “प्लैन” को बीज क्यों कहते हैं?

उत्तर:
क्योंकि

  • प्लैन = बीज

  • स्व-स्थिति = शक्ति

 अगर बीज में शक्ति नहीं,
तो फल श्रेष्ठ नहीं होगा।


 प्रश्न 20: सेवा का सही क्रम क्या होना चाहिए?

उत्तर:
1️⃣ पहले स्व-स्थिति पर अटेन्शन
2️⃣ फिर सेवा की योजना

 तभी सेवा में बाप की प्रत्यक्षता होगी।

Disclaimer:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त मुरली (12-03-1985) पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, सत्य ज्ञान की समझ और जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देना है। यह किसी धर्म, मत या व्यक्ति की आलोचना नहीं करता। सभी विचार ईश्वरीय ज्ञान (मुरली) के अध्ययन और व्यक्तिगत आत्मिक अनुभव पर आधारित हैं

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