(03)How can we celebrate a true Christmas from within? How can we find inner joy amidst the external celebrations?

यीशु का संदेश:-(03)सच्चा क्रिसमस भीतर कैसे मनाए?बाहरी उत्सव से आंतरिक खुशी कैसे मिलेगी?

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

अध्याय: सच्चा क्रिसमस – यशु का संदेश

(आध्यात्मिक मंथन | क्रिसमस विशेष)


 भूमिका: क्रिसमस – बाहर नहीं, भीतर

आज हम तीसरा विषय कर रहे हैं: सच्चा क्रिसमस भीतर कैसे मनाएँ
दुनिया में क्रिसमस का अर्थ बदल गया है। रोशनी, गीत, केक, उपहार – बाहरी उत्सव में सब व्यस्त हैं।

प्रश्न: क्या क्रिसमस सिर्फ तारीख है या आंतरिक अनुभव?
यदि केवल उत्सव से शांति आती, तो आज दुनिया इतनी अशांत क्यों है?


 क्रिसमस का वास्तविक अर्थ

  • क्रिसमस का मतलब यशु का शारीरिक जन्म नहीं, बल्कि भीतर नई चेतना का जन्म है।

  • नई चेतना का जन्म = अवगुणों को छोड़कर दिव्य गुण अपनाना।

  • उदाहरण: वाल्मीकि डाकू से संत बने। अवगुण छोड़ें → आत्मा पवित्र बनती है।

मुरली नोट – 25 दिसंबर 1971
“किंगडम ऑफ गॉड इज विद इन यू। भगवान का राज्य आपके भीतर है।”


 शांति भीतर कैसे आती है?

  • ईश्वर, स्वर्ग, शांति – सब आपके अंदर हैं।

  • चेतना का जन्म = ईश्वरीय अनुभूति + शांति।

  • उदाहरण: मोबाइल चार्जर में कनेक्शन होना आवश्यक है। आत्मा का कनेक्शन परमात्मा के साथ।

मुरली – 25 दिसंबर 1971
“यीशु ने आत्माओं को देहभान से ऊपर उठने और भीतर की स्थिति बदलने की शिक्षा दी।”


 बाहरी क्रिसमस क्यों शांति नहीं देता?

  • रीति अपनाई, पर अंदर की स्थिति नहीं बदली

  • सुख-दुख अनुभव करता है आत्मा, परिस्थिति नहीं।

  • उदाहरण: घर में दीपक जल जाए, लेकिन अंधेरा हो तो रोशनी का क्या फायदा?

मुरली – 26 दिसंबर 1976
“जब आत्मा अपने स्वरूप को भूल जाती है, तब उत्सव भी अशांति का कारण बन जाता है।”


 सच्चा क्रिसमस क्या है?

  • आत्मा में शांति का जन्म

  • अवगुणों का अंत और नई चेतना की शुरुआत

  • उदाहरण: समुद्र की सतह तूफानी, पर गहराई में शांति।

  • शरीर = सतह; आत्मा = गहराई।

मुरली – 24 दिसंबर 1969
“आत्मा शांत स्वरूप है। उसे बाहर नहीं, भीतर खोजो।”


 त्याग और क्षमा: सच्चे क्रिसमस के उपहार

  • यशु का जीवन = त्याग का उदाहरण।

  • त्याग = क्रोध, अहंकार, बदले की भावना छोड़ना।

  • उदाहरण: सही होते हुए भी शांत रहना = सच्चा त्याग।

  • क्षमा = आत्मा की आजादी।

मुरली – 25 दिसंबर 1990
“सच्चा उत्सव तब है जब आत्मा विकारों का त्याग कर पवित्र बनती है।”

मुरली – 26 दिसंबर 1976
“क्षमा करने वाली आत्मा सदा हल्की और प्रसन्न रहती है।”


 सच्चा क्रिसमस भीतर मनाने के चार आत्मिक स्टेप्स

  1. पहचान बदलो – मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं।

  2. परमात्मा को याद करो – उसके गुण अपने जीवन में उतारो।

  3. स्वभाव बदलो – क्रोध की जगह शांति, अहंकार की जगह नम्रता, विकार की जगह गुण।

  4. संकल्प बदलो – आज शांति फैलाऊँ।

 उदाहरण: एक शांत व्यक्ति पूरे परिवार का वातावरण बदल सकता है।

मुरली – 24 दिसंबर 1978
“जब आत्मा नई स्थिति धारण करती है, वही उसका नया जन्म कहलाता है।”


 क्रिसमस साल में एक दिन नहीं, हर रोज

  • यदि शांति सिर्फ 25 दिसंबर को है, तो वह क्रिसमस नहीं।

  • सच्चा क्रिसमस = हर दिन की स्थिति

मुरली – 8 दिसंबर 1987
“जो आत्मा सदा शांत स्थिति में रहती है वही सदा उत्सव मनाती है।”


 समापन संदेश

  • इस बार क्रिसमस भीतर मनाएँ

  • केक कम काटें, अहंकार ज्यादा काटें, मोमबत्तियां कम जलाएँ, आत्मा की रोशनी ज्यादा जलाएँ

  • जब आत्मा शांत और पवित्र बनती है, वही सच्चा क्रिसमस है।

  • प्रश्न 1: क्रिसमस का वास्तविक अर्थ क्या है?
    उत्तर: क्रिसमस केवल यशु का शारीरिक जन्म नहीं, बल्कि भीतर नई चेतना का जन्म है। नई चेतना = अवगुणों को छोड़कर दिव्य गुण अपनाना।
    उदाहरण: वाल्मीकि डाकू से संत बने। जब हम अपने अवगुण छोड़ते हैं, तो हमारी आत्मा पवित्र बनती है।
    मुरली – 25 दिसंबर 1971: “किंगडम ऑफ गॉड इज विद इन यू। भगवान का राज्य आपके भीतर है।”


    प्रश्न 2: शांति भीतर कैसे आती है?
    उत्तर: ईश्वर, स्वर्ग, शांति – सभी हमारे अंदर हैं। जब चेतना का जन्म होता है, तब आत्मा को ईश्वरीय अनुभूति और शांति मिलती है।
    उदाहरण: मोबाइल चार्जर में कनेक्शन होना आवश्यक है। इसी तरह, आत्मा का कनेक्शन परमात्मा से होना चाहिए।
     मुरली – 25 दिसंबर 1971: “यीशु ने आत्माओं को देहभान से ऊपर उठने और भीतर की स्थिति बदलने की शिक्षा दी।”


    प्रश्न 3: बाहरी क्रिसमस क्यों शांति नहीं देता?
    उत्तर: केवल रीति अपनाने से स्थिति नहीं बदलती। सुख-दुख का अनुभव आत्मा करती है, परिस्थिति नहीं।
    उदाहरण: घर में दीपक जल जाए, लेकिन अंधेरा हो तो रोशनी का क्या फायदा?
     मुरली – 26 दिसंबर 1976: “जब आत्मा अपने स्वरूप को भूल जाती है, तब उत्सव भी अशांति का कारण बन जाता है।”


    प्रश्न 4: सच्चा क्रिसमस क्या है?
    उत्तर: सच्चा क्रिसमस = आत्मा में शांति का जन्म, अवगुणों का अंत, और नई चेतना की शुरुआत।
    उदाहरण: समुद्र की सतह तूफानी, पर गहराई में शांति।

    • शरीर = सतह

    • आत्मा = गहराई
       मुरली – 24 दिसंबर 1969: “आत्मा शांत स्वरूप है। उसे बाहर नहीं, भीतर खोजो।”


    प्रश्न 5: त्याग और क्षमा का सच्चे क्रिसमस से क्या संबंध है?
    उत्तर:

    • त्याग: क्रोध, अहंकार, बदले की भावना छोड़ना।

    • उदाहरण: सही होते हुए भी शांत रहना = सच्चा त्याग।

    • क्षमा: आत्मा की आजादी। खुद को मुक्त करना।
       मुरली – 25 दिसंबर 1990: “सच्चा उत्सव तब है जब आत्मा विकारों का त्याग कर पवित्र बनती है।”
       मुरली – 26 दिसंबर 1976: “क्षमा करने वाली आत्मा सदा हल्की और प्रसन्न रहती है।”


    प्रश्न 6: सच्चा क्रिसमस भीतर मनाने के स्टेप्स क्या हैं?
    उत्तर: चार आसान आत्मिक स्टेप्स:

    1. पहचान बदलो: मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं।

    2. परमात्मा को याद करो: उसके गुण अपने जीवन में उतारो।

    3. स्वभाव बदलो: क्रोध की जगह शांति, अहंकार की जगह नम्रता, विकार की जगह गुण।

    4. संकल्प बदलो: आज शांति फैलाऊँ।

    उदाहरण: एक शांत व्यक्ति पूरे परिवार का वातावरण बदल सकता है।
     मुरली – 24 दिसंबर 1978: “जब आत्मा नई स्थिति धारण करती है, वही उसका नया जन्म कहलाता है।”


    प्रश्न 7: क्रिसमस साल में एक दिन मनाना चाहिए या हर रोज?
    उत्तर: सच्चा क्रिसमस हर दिन होना चाहिए। यदि शांति सिर्फ 25 दिसंबर को है और 26 दिसंबर से वही अशांति, तो वह क्रिसमस नहीं।
     मुरली – 8 दिसंबर 1987: “जो आत्मा सदा शांत स्थिति में रहती है वही सदा उत्सव मनाती है।”


    प्रश्न 8: समापन संदेश क्या है?
    उत्तर:

    • इस बार क्रिसमस भीतर मनाएँ।

    • केक कम काटें, अहंकार ज्यादा काटें, मोमबत्तियां कम जलाएँ, आत्मा की रोशनी ज्यादा जलाएँ।

    • जब आत्मा शांत और पवित्र बनती है, वही सच्चा क्रिसमस है।

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