MURLI 28-12-2025 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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28-12-25
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 18-03-08 मधुबन

कारण शब्द को निवारण में परिवर्तन कर मास्टर मुक्तिदाता बनो, सबको बाप के संग का रंग लगाकर समान बनने की होली मनाओ

आज सर्व खजानों के मालिक बापदादा अपने चारों ओर के खजाने सम्पन्न बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे के खजाने में कितने खजाने जमा हुए हैं, यह देख हर्षित हो रहे हैं। खजाने तो सभी को एक ही समय एक ही जैसे मिले हैं फिर भी जमा का खाता सभी बच्चों का अलग-अलग है लेकिन समय प्रमाण अभी बापदादा सभी बच्चों को सर्व खजानों से सम्पन्न देखने चाहते हैं, क्योंकि यह खजाने सिर्फ अभी एक जन्म के लिए नहीं हैं, यह अविनाशी खजाने अनेक जन्म साथ चलने वाले हैं। इस समय के खजानों को तो सभी बच्चे जानते ही हो। बापदादा ने क्या-क्या खजाने दिये हैं वह कहने से ही सबके सामने आ गये हैं। सबके सामने खजानों की लिस्ट इमर्ज हो गई है ना! क्योंकि बापदादा ने पहले भी बताया है कि खजाने तो मिले लेकिन जमा करने की विधि क्या है? जो जितना निमित्त और निर्मान बनता है उतना ही खजाने जमा होते हैं। तो चेक करो – निमित्त और निर्मान बनने की विधि से हमारे खाते में कितने खजाने जमा हुए हैं। जितने खजाने जमा होंगे, उतना वह भरपूर होगा। उनके चलन और चेहरे से भरपूर आत्मा का रूहानी नशा स्वत: ही दिखाई देता है। उसके चेहरे पर सदा रूहानी नशा वा फ़खुर चमकता है और जितना ही रूहानी फ़खुर होगा उतना ही बेफिक्र बादशाह होगा। रूहानी फ़खुर अर्थात् रूहानी नशा बेफिक्र बादशाह की निशानी है। तो अपने को चेक करो कि मेरी चलन और चेहरे पर बेफिक्र बादशाह का निश्चय और नशा है? दर्पण तो सबको मिली हुई है ना! तो दिल के दर्पण में अपना चेहरा चेक करो। किसी भी प्रकार का फिक्र तो नहीं है? क्या होगा! कैसे होगा! यह तो नहीं होगा! कोई भी संकल्प रह तो नहीं गया है? बेफिक्र बादशाह का संकल्प यही होगा जो हो रहा है वह बहुत अच्छा और जो होने वाला है वह और ही अच्छे ते अच्छा होगा। इसको कहा जाता है फ़खुर, रूहानी फ़खुर अर्थात् स्वमानधारी आत्मा। विनाशी धन वाले जितना कमाते उतना समय प्रमाण फिकर में रहते। आपको अपने ईश्वरीय खजानों के लिए फिकर है? बेफिक्र हो ना! क्योंकि जो खजानों के मालिक और परमात्म बालक हैं वह सदा ही स्वप्न में भी बेफिक्र बादशाह हैं, क्योंकि उसको निश्चय है कि यह ईश्वरीय खजाने इस जन्म में तो क्या लेकिन अनेक जन्म साथ हैं, साथ रहेंगे इसीलिए वह निश्चयबुद्धि निश्चिंत हैं।

तो आज बापदादा चारों ओर के बच्चों का जमा का खाता देख रहे थे। पहले भी सुनाया है कि विशेष तीन प्रकार के खाते जमा किये हैं और कर सकते हैं। एक है – अपने पुरुषार्थ प्रमाण खजाने जमा करना। यह एक खाता है। दूसरा खाता है – दुआओं का खाता। दुआओं का खाता जमा होने का साधन है सदा सम्बन्ध-सम्पर्क और सेवा में रहते हुए संकल्प, बोल और कर्म में, तीनों में स्वयं भी स्वयं से सन्तुष्ट और दूसरे भी सर्व और सदा सन्तुष्ट हों। सन्तुष्टता दुआओं का खाता बढ़ाती है। और तीसरा खाता है – पुण्य का खाता। पुण्य के खाते का साधन है – जो भी सेवा करते हैं, चाहे मन से, चाहे वाणी से, चाहे कर्म से, चाहे सम्बन्ध में, सम्पर्क में आते सदा नि:स्वार्थ और बेहद की वृत्ति, स्वभाव, भाव और भावना से सेवा करना, इससे पुण्य का खाता स्वत: ही जमा हो जाता है। तो चेक करो – चेक करना आता है ना! आता है? जिसको नहीं आता हो वह हाथ उठाओ। जिसको नहीं आता है, कोई नहीं है माना सभी को आता है। तो चेक किया है? कि स्व पुरुषार्थ का खाता, दुआओं का खाता, पुण्य का खाता तीनों कितनी परसेन्ट में जमा हुआ है? चेक किया है? जो चेक करता है वह हाथ उठाओ। चेक करते हो? पहली लाइन नहीं करती है? चेक नहीं करते? क्या कहते हैं? करते हैं ना! क्योंकि बापदादा ने सुना दिया है, इशारा दे दिया है कि अभी समय की समीपता तीव्रगति से आगे बढ़ रही है इसलिए अपनी चेकिंग बार-बार करनी है क्योंकि बापदादा हर बच्चे को राजयोगी सो राजा बच्चा देखने चाहते हैं। यही परमात्म बाप को रूहानी नशा है कि एक-एक बच्चा राजा बच्चा है। स्वराज्य अधिकारी सो विश्व राज्य अधिकारी परमात्म बच्चा है।

खजाने तो बापदादा द्वारा मिलते ही रहते हैं। इन खजानों को जमा करने की बहुत सहज विधि है – विधि कहो या चाबी कहो, वह जानते हो ना! जमा करने की चाबी क्या है? जानते हो? तीन बिन्दियां। है ना सभी के पास चाबी? तीन बिन्दियां लगाओ और खजाने जमा होते जायेंगे। माताओं को चाबी लगाने आती हैं ना, मातायें चाबी सम्भालने में होशियार होती हैं ना! तो सभी माताओं ने यह तीन बिन्दियों की चाबी सम्भालकर रखी है? लगाई है? बोलो, मातायें चाबी है? जिसके पास है वह हाथ उठाओ। चाबी चोरी तो नहीं हो जाती है? वैसे घर के हर चीज़ की चाबी माताओं को सम्भालने बहुत अच्छी आती है। तो यह चाबी भी सदा साथ में रहती है ना!

तो वर्तमान समय बापदादा यही चाहते हैं – अभी समय समीप होने के नाते से बापदादा एक शब्द सभी बच्चों के अन्दर से, संकल्प से, बोल से और प्रैक्टिकल कर्म से चेन्ज करना देखने चाहते हैं। हिम्मत है? एक शब्द यही बापदादा हर बच्चे का परिवर्तन कराना चाहते हैं, जो एक ही शब्द बार-बार तीव्र पुरुषार्थ से अलबेला पुरुषार्थी बना देता है और अभी समय अनुसार कौन सा पुरुषार्थ चाहिए? तीव्र पुरुषार्थ और सब चाहते भी हैं कि तीव्र पुरुषार्थियों की लाइन में आयें लेकिन एक शब्द अलबेला कर देता है। पता है वह शब्द कौन सा है? परिवर्तन करने के लिए तैयार हो? हैं तैयार? हाथ उठाओ, तैयार हैं? देखो, आपका फोटो टी.वी. में आ रहा है। तैयार हैं, अच्छा मुबारक हो। अच्छा – तीव्र पुरुषार्थ से परिवर्तन करना है या कर लेंगे, देख लेंगे… ऐसे तो नहीं? एक शब्द जान तो गये होंगे, क्योंकि सब होशियार हैं, एक शब्द वह है कि ‘कारण’ शब्द को परिवर्तन कर ‘निवारण’ शब्द को सामने लाओ। कारण सामने आने से वा कारण सोचने से निवारण नहीं होता है। तो बापदादा सिर्फ बोलने तक नहीं लेकिन संकल्प तक यह ”कारण” शब्द को ”निवारण” में परिवर्तन करने चाहते हैं क्योंकि कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं और वह कारण शब्द सोचने में, बोलने में, कर्म में आने में तीव्र पुरुषार्थ के आगे बन्धन बन जाता है क्योंकि आप सभी का बापदादा से वायदा है, स्नेह से वायदा है कि हम सभी भी बाप के, विश्व परिवर्तन के कार्य में साथी हैं। बाप के साथी हैं, बाप अकेला नहीं करता है, बच्चों को साथ लाते हैं। तो विश्व परिवर्तन के कार्य में आपका क्या कार्य है? सर्व आत्माओं के कारणों को भी निवारण करना क्योंकि आजकल मैजारिटी दु:खी और अशान्त होने के कारण अभी मुक्ति चाहते हैं। दु:ख अशान्ति से, सर्व बन्धनों से मुक्ति चाहते हैं और मुक्तिदाता कौन? बाप के साथ आप बच्चे भी मुक्तिदाता हैं। आपके जड़ चित्रों से आज तक क्या मांगते हैं? अभी दु:ख अशान्ति बढ़ते देख सभी मैजारिटी आत्मायें आप मुक्तिदाता आत्माओं को याद करती हैं। मन में दु:खी होके चिल्लाते हैं – हे मुक्तिदाता मुक्ति दो। क्या आपको आत्माओं के दु:ख अशान्ति की पुकार सुनने नहीं आती? लेकिन मुक्तिदाता बन पहले इस ‘कारण’ शब्द को मुक्त करो। तो स्वत: ही मुक्ति का आवाज आपके कानों में गूंजेगा। पहले अपने अन्दर से इस शब्द से मुक्त होंगे तो दूसरों को भी मुक्त कर सकेंगे। अभी तो दिन-प्रतिदिन आपके आगे मुक्तिदाता मुक्ति दो की क्यू लगने वाली है। लेकिन अभी तक अपने पुरुषार्थ में भिन्न-भिन्न कारण शब्द के कारण मुक्ति का दरवाजा बन्द है इसीलिए आज बापदादा इस शब्द के, इसके साथ और भी कमजोर शब्द आते हैं। विशेष है कारण फिर उसमें और भी कमजोरियाँ होती हैं, ऐसे वैसे, कैसे, यह भी इनके साथी शब्द हैं, जो दरवाजे बन्द के कारण हैं।

तो आज सब होली मनाने आये हो ना। सब भाग-भाग करके आये हैं। स्नेह के विमान में चढ़के आये हैं। बाप से स्नेह है, तो बाप के साथ होली मनाने पहुंच गये हैं। मुबारक हो, भले पधारे। बापदादा मुबारक देते हैं। बापदादा देख रहे हैं, कुर्सी पर चलने वाले भी, तबियत थोड़ी नीचे ऊपर होते भी हिम्मत से पहुंच गये हैं। बापदादा यह दृश्य देखते हैं, यहाँ क्लास में आते हैं ना। प्रोग्राम में आते हैं तो चेयर पर भी चलके पण्डे को पकड़कर आ जाते हैं। तो इसको क्या कहा जायेगा? परमात्म प्यार। बापदादा भी ऐसे हिम्मतवान, दिल के स्नेही बच्चों को बहुत-बहुत दिल की दुआयें, दिल का प्यार विशेष दे रहे हैं। हिम्मत रखके आये हैं, बाप की और परिवार की मदद है ही। सभी को स्थान ठीक मिला है? मिला है? जिसको स्थान ठीक मिला है वह हाथ उठाओ। फॉरेनर्स को ठीक मिला है? मेला है मेला। वहाँ मेले में तो रेत भी चलती रहती है, खाना भी चलता रहता है। आपको ब्रह्मा भोजन अच्छा मिला, मिलता है? अच्छा हाथ हिला रहे हैं। सोने के लिए तीन पैर पृथ्वी मिली? ऐसा मिलन फिर 5 हजार वर्ष के बाद संगम पर ही होगा। फिर नहीं होगा।

तो आज बापदादा को संकल्प है कि सब बच्चों के जमा खाते को देखें। देखा भी है, आगे भी देखेंगे क्योंकि बापदादा ने यह पहले ही बच्चों को सूचना दे दी है कि जमा के खाते जमा करने का समय अब संगमयुग है। इस संगमयुग पर अब जितना जमा करने चाहो, सारे कल्प का खाता अब जमा कर सकते हो। फिर जमा के खाते की बैंक ही बन्द हो जायेगी। फिर क्या करेंगे? इसलिए बापदादा को बच्चों से प्यार है ना। तो बापदादा जानते हैं कि बच्चे अलबेलेपन में कभी भूल जाते हैं, हो जायेगा, देख लेंगे, कर तो रहे हैं, चल तो रहे हैं ना। बड़े मजे से कहते, आप देख नहीं रहे हो, हम कर रहे हैं, हाँ चल तो रहे हैं और क्या करें? लेकिन चलना और उड़ना कितना फ़र्क है? चल रहे हो मुबारक है। लेकिन अभी चलने का समय समाप्त हो रहा है। अभी उड़ने का समय है, तभी मंजिल पर पहुंच सकेंगे। साधारण प्रजा में आना, भगवान का बच्चा और साधारण प्रजा! शोभता है?

आज होली मनाने आये हो ना तो होली का अर्थ है बीती सो बीती, तो आज से बापदादा यही चाहता है कि बीती सो बीती, कोई भी कारण से अगर कोई भी कमजोरी रही हुई है तो अब घड़ी बीती सो बीती कर अपना चित्र स्मृति में लाओ, अपना ही चित्रकार बन अपना चित्र निकालो। पता है – बापदादा अभी भी एक-एक बच्चे का कौन सा चित्र सामने देख रहा है? पता है कौन सा चित्र देख रहे हैं? अभी आप सभी भी अपना चित्र खींचो। आता है चित्र खींचने, आता है ना! श्रेष्ठ संकल्प की कलम से अपना चित्र अभी-अभी सामने लाओ। पहले सभी ड्रिल करो, माइन्ड ड्रिल। कर्मेन्द्रियों की ड्रिल नहीं, मन की ड्रिल करो। रेडी, ड्रिल करने के लिए रेडी हैं! कांध हिलाओ। देखो सबसे श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ चित्र होता है – ताज, तख्त, तिलकधारी का। तो अपना चित्र सामने लाओ और सब संकल्प किनारे कर देखो, आप सभी बापदादा के दिलतख्त नशीन हैं। तख्त है ना! ऐसा तख्त तो कहाँ भी नहीं मिलेगा। तो पहले यह चित्र निकालो कि मैं विशेष आत्मा, स्वमानधारी आत्मा, बापदादा की पहली रचना श्रेष्ठ आत्मा, बापदादा के दिलतख्तनशीन हूँ। तख्तनशीन हो गये! साथ में परमात्म रचना इस वृक्ष के जड़ में बैठी हुई पूर्वज और पूज्य आत्मा हूँ, इस स्मृति का तिलकधारी हूँ। स्मृति का तिलक लगाया! साथ में बेफिकर बादशाह, सारा फिकर का बोझ बापदादा को अर्पण कर डबल लाइट की ताजधारी हूँ। तो ताज, तिलक और तख्तधारी, ऐसी बाप अर्थात् परमात्म प्यारी आत्मा हूँ।

तो यह चित्र अपना खींच लिया। सदा यह डबल लाइट का ताज चलते फिरते धारण कर सकते हो। कभी भी अपना स्वमान याद करो तो यह ताज, तिलक, तख्तनशीन आत्मा हूँ, यह अपना चित्र दृढ़ संकल्प द्वारा सामने लाओ। याद है – शुरू-शुरू में आप लोगों का अभ्यास बार-बार एक शब्द की स्मृति में रहता था, वह एक शब्द था – मैं कौन? यह मैं कौन? यह शब्द बार-बार स्मृति में लाओ और अपने भिन्न-भिन्न स्वमान, टाइटल, भगवान के मिले हुए टाइटल। आजकल लोगों को, मनुष्य को मनुष्य से टाइटल मिलता तो भी कितना महत्व समझते हैं और आप बच्चों को बाप द्वारा कितने टाइटल वा स्वमान मिले हैं? सदा स्वमान की लिस्ट अपने बुद्धि में मनन करते रहो। मैं कौन? लिस्ट लाओ। इसी नशे में रहो तो कारण जो है ना, वह शब्द मर्ज हो जायेगा और निवारण, हर कर्म में दिखाई देगा। जब निवारण का स्वरूप बन जायेंगे तो सर्व आत्माओं को निर्वाणधाम, मुक्तिधाम में सहज जाने का रास्ता बताए मुक्त कर लेंगे।

तो दृढ़ संकल्प करो – आता है दृढ़ संकल्प करना? जब दृढ़ता होती है तो दृढ़ता सफलता की चाबी है। जरा भी दृढ़ संकल्प में कमी नहीं लाओ क्योंकि माया का काम है हार खिलाना और आपका काम क्या है? आपका काम है – बाप के गले का हार बनना, न माया से हार खाना। तो सभी यह संकल्प करो मैं सदा बाप के गले की विजय माला हूँ। गले का हार हूँ। गले का हार विजयी हार है।

तो बापदादा हाथ उठवाते हैं तो आप क्या बनेंगे? सब क्या उत्तर देते हैं? एक ही उत्तर देते हैं लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। राम-सीता नहीं। तो लक्ष्मी-नारायण बनने वाले हम बापदादा के विजयी माला के मणके हैं, पूज्य आत्मायें हैं। भक्त आपकी माला का मणका जपते-जपते अपनी समस्याओं को समाप्त करते हैं। ऐसे श्रेष्ठ मणके हो। तो आज बापदादा को क्या देंगे? होली की कोई तो गिफ्ट देंगे ना! यह कारण शब्द, यह तो तो, और कारण, तो तो करेंगे तो तोता बन जायेंगे ना। तो तो भी नहीं, ऐसे वैसे भी नहीं, कोई भी प्रकार का कारण नहीं, निवारण। अच्छा।

बापदादा एक-एक बच्चे को समान बनने की, श्रेष्ठ संकल्प करने की पदम पदमगुणा मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। नशा है ना – हमारे जितना पदम-पदम भाग्यवान कौन? इसी नशे में रहो। अच्छा।

अभी एक सेकण्ड में सभी ब्राह्मण अपने राजयोग का अभ्यास करते हुए मन को एकाग्र करने का मालिक बन मन को जहाँ चाहो, जितना समय चाहो, जैसे चाहो वैसे अभी-अभी मन को एकाग्र करो। कहाँ भी मन यहाँ-वहाँ चंचल नहीं हो। मेरा बाबा, मीठा बाबा, प्यारा बाबा इस स्नेह के संग के रंग की, आध्यात्मिक होली मनाओ। (ड्रिल) अच्छा।

चारों ओर के श्रेष्ठ विशेष होली और हाइएस्ट बच्चों को, सदा स्वयं को बाप समान सर्व शक्तियों से सम्पन्न मास्टर सर्वशक्तिवान अनुभव करने वाले, सदा हर कमजोरियों से मुक्त बन अन्य आत्माओं को भी मुक्ति दिलाने वाले मुक्तिदाता बच्चों को, सदा स्वमान की सीट पर सेट रहने वाले, सदा अमर भव के वरदान के अनुभव स्वरूप रहने वाले, ऐसे चारों ओर के, चाहे सामने बैठने वाले, चाहे दूर बैठे स्नेह में समाये हुए बच्चों को यादप्यार वा अपने उमंग-उत्साह, पुरुषार्थ के समाचार देने वालों को बापदादा का बहुत-बहुत दिल का यादप्यार और दिल की पदम पदमगुणा यादप्यार स्वीकार हो और सभी राजयोगी सो राज्य अधिकारी बच्चों को नमस्ते।

वरदान:- आलमाइटी सत्ता के आधार पर आत्माओं को मालामाल बनाने वाले पुण्य आत्मा भव
जैसे दान पुण्य की सत्ता वाले सकामी राजाओं में सत्ता की फुल पावर थी, जिस पावर के आधार पर चाहे किसी को क्या भी बना दें। ऐसे आप महादानी पुण्य आत्माओं को डायरेक्ट बाप द्वारा प्रकृतिजीत, मायाजीत की विशेष सत्ता मिली हुई है। आप अपने शुद्ध संकल्प के आधार से किसी भी आत्मा का बाप से सम्बन्ध जोड़कर मालामाल बना सकते हो। सिर्फ इस सत्ता को यथार्थ रीति यूज़ करो।
स्लोगन:- जब आप सम्पूर्णता की बधाईयां मनायेंगे तब समय, प्रकृति और माया विदाई लेगी।

 

अव्यक्त इशारे – अब सम्पन्न वा कर्मातीत बनने की धुन लगाओ

जब मन-बुद्धि कर्म में बहुत बिज़ी हो, उस समय डायरेक्शन दो फुलस्टॉप। कर्म के भी संकल्प स्टॉप हो जाएं। यह प्रैक्टिस एक सेकण्ड के लिये भी करो लेकिन अभ्यास करते जाओ, क्योंकि अन्तिम सर्टीफिकेट एक सेकण्ड के फुलस्टॉप लगाने पर ही मिलना है। सेकण्ड में विस्तार को समा लो, सार स्वरूप बन जाओ, यही अभ्यास कर्मातीत बनायेगा।

प्रश्न 1: बापदादा आज बच्चों को किस रूप में देखना चाहते हैं?
उत्तर: बापदादा आज हर बच्चे को सर्व खजानों से सम्पन्न, बेफिक्र बादशाह और राजयोगी सो राजा बच्चा के रूप में देखना चाहते हैं।


प्रश्न 2: खजाने सभी को समान मिले हैं, फिर जमा का खाता अलग-अलग क्यों है?
उत्तर: क्योंकि जमा करने की विधि अलग-अलग है। जो जितना निमित्त और निर्मान बनता है, उतना ही खजाने जमा होते हैं।


प्रश्न 3: खजाने जमा करने के मुख्य तीन खाते कौन-से हैं?
उत्तर:

  1. स्व पुरुषार्थ का खाता

  2. दुआओं का खाता (सन्तुष्टता द्वारा)

  3. पुण्य का खाता (नि:स्वार्थ सेवा द्वारा)


प्रश्न 4: दुआओं का खाता कैसे बढ़ता है?
उत्तर: जब सम्बन्ध-सम्पर्क और सेवा में रहते हुए संकल्प, बोल और कर्म से स्वयं भी और दूसरे भी सन्तुष्ट रहते हैं, तब दुआओं का खाता स्वतः बढ़ता है।


प्रश्न 5: पुण्य का खाता जमा करने की सहज विधि क्या है?
उत्तर: मन, वाणी, कर्म और सम्बन्ध—चारों से नि:स्वार्थ, बेहद की भावना से सेवा करना।


प्रश्न 6: बेफिक्र बादशाह की निशानी क्या है?
उत्तर: चेहरे और चलन में रूहानी नशा (स्वमान) और फखुर का स्वतः दिखाई देना।


प्रश्न 7: खजाने जमा करने की “तीन बिन्दियों की चाबी” क्या है?
उत्तर:

  • मैं आत्मा हूँ

  • बाबा मेरा है

  • ड्रामा श्रेष्ठ है
    इन तीन बिन्दुओं को जीवन में लगाने से खजाने स्वतः जमा होते हैं।


प्रश्न 8: बापदादा आज कौन-सा एक शब्द बदलने की प्रेरणा दे रहे हैं?
उत्तर: “कारण” शब्द को बदलकर “निवारण” शब्द को जीवन में लाने की।


प्रश्न 9: “कारण” शब्द पुरुषार्थ में बाधा क्यों बनता है?
उत्तर: क्योंकि कारण सोचने से तीव्र पुरुषार्थ रुक जाता है, और संकल्प, बोल व कर्म में बन्धन बन जाता है।


प्रश्न 10: “निवारण” शब्द अपनाने से क्या परिवर्तन आता है?
उत्तर: आत्मा समस्या देखने वाली नहीं, समाधान देने वाली बन जाती है और स्वतः मुक्तिदाता का स्वरूप प्रकट होता है।


प्रश्न 11: मास्टर मुक्तिदाता बनने का पहला कदम क्या है?
उत्तर: पहले अपने अन्दर से “कारण” शब्द से मुक्त होना, तभी दूसरों को मुक्ति दे सकेंगे।


प्रश्न 12: आज की सच्ची होली मनाने का अर्थ क्या है?
उत्तर: बीती सो बीती—पुरानी कमजोरियों, कारणों और अलबेलेपन को समाप्त कर नये संकल्पों की होली मनाना।


प्रश्न 13: बापदादा बच्चों को कौन-सा चित्र स्मृति में लाने को कहते हैं?
उत्तर: स्वयं को ताज, तिलक और तख्तधारी, डबल लाइट बेफिक्र बादशाह, और दिलतख्तनशीन आत्मा के रूप में देखना।


प्रश्न 14: “मैं कौन?” का अभ्यास क्यों आवश्यक है?
उत्तर: क्योंकि इससे स्वमान जागृत होता है, कारण स्वतः मर्ज हो जाते हैं और निवारण जीवन में दिखाई देता है।


प्रश्न 15: दृढ़ संकल्प की पहचान क्या है?
उत्तर: दृढ़ संकल्प ही सफलता की चाबी है; इसमें जरा-सी भी ढील नहीं होनी चाहिए।


प्रश्न 16: माया का काम और हमारा काम क्या है?
उत्तर:

  • माया का काम: हार खिलाना

  • हमारा काम: बाप के गले का विजय हार बनना


प्रश्न 17: बापदादा आज होली की गिफ्ट के रूप में क्या चाहते हैं?
उत्तर: जीवन से हर प्रकार का कारण समाप्त कर, निवारण को स्थायी स्वरूप बनाना।


प्रश्न 18: अन्तिम समय के लिए विशेष अभ्यास क्या बताया गया है?
उत्तर: एक सेकण्ड का फुलस्टॉप—मन-बुद्धि को विस्तार से समेटकर सार स्वरूप में स्थित होना।


प्रश्न 19: वरदान का सार क्या है?
उत्तर: आलमाइटी सत्ता के आधार पर आत्माओं को मालामाल बनाने वाले पुण्य आत्मा बनना और शुद्ध संकल्प से आत्माओं को बाप से जोड़ना।


प्रश्न 20: इस संदेश का निष्कर्ष क्या है?
उत्तर: कारण से मुक्त होकर निवारण का स्वरूप बनना, स्वयं सम्पन्न बनना और सबको बाप के संग का रंग लगाकर समान और मुक्त बनाना—यही सच्ची होली और मास्टर मुक्तिदाता का स्वरूप है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मिक उन्नति, आत्म-परिवर्तन और राजयोग अभ्यास द्वारा जीवन में शांति एवं शक्ति का अनुभव कराना है। यह किसी भी प्रकार की धार्मिक, सामाजिक या व्यक्तिगत मान्यताओं को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं है। सभी विचार आध्यात्मिक अध्ययन और आत्मचिंतन हेतु हैं।

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